मुझे जब एक मित्र ने विजय विद्रोही के उपन्यास ‘करेला इश्क का’ पढने का आग्रह किया तो मुझे लगा कि वह पत्रकार है इसलिए एक पत्रकार की किताब पढने के लिए कह रही है. आजकल टीवी से जुड़े पत्रकारों की किताबों की बाढ़ आ गई है. कई किताबें तो बहुत अच्छी भी रहीं. कई पाठकों को खूब पसंद आई, कई उम्मीदें जगाकर रह गई. अब सवाल है कि विजय विद्रोही के इस उपन्यास को किस कैटेगरी में रखा जाए. जगरनॉट बुक्स से प्रकाशित यह उपन्यास आम पाठकों को ध्यान में रखकर लिखा गया.
कहानी का ताना बाना दिल्ली के लोमहर्षक निर्भया काण्ड की पृष्ठभूमि में बुना गया है. लेखक भूमिका में ही कह देता है कि यह कहानी कुछ महिला पत्रकारों के अनुभवों पर आधारित है. जाहिर है, यह उपन्यास है इसलिए इसमें कल्पना का तड़का भी लगाया गया है.
मेरी उस पत्रकार मित्र ने कहा था कि इस उपन्यास में उसे अपने पत्रकारिता के अनुभव याद आये. ‘सरजी’ जैसे पात्र प्रिंट में, टीवी में हर कहीं होते हैं. जिसने भी पत्रकारिता की हो उसका पाला किसी ने किसी सर जी से जरूर पड़ा होगा. लेकिन असली मजा तो इसकी कहानी में करेला में है. मैं तो पूरी कहानी इसी चक्कर में पढ़ गई कि वह करेला क्या है- जो इस उपन्यास के शीर्षक में है?
असल बात यही है कि वह करेला क्या है? वह करेला किसी जासूसी उपन्यास की गुत्थी की तरह है जिसको सुलझाने के लिए पूरा उपन्यास लिखा जाता है. करेला समाज का वह दायरा है जो प्रेमी-प्रेमिकाओं को मिलने नहीं देता. प्रेम करने वालों की हत्या कर देता है. करेला इस कहानी को खाप पंचायत तक ले जाता है. मैं उसका खुलासा यहाँ नहीं करूँगा क्योंकि वही इस कहानी की जान है. लेकिन एक बात है कि करेला के प्लाट के माध्यम से लेखक ने इस तरफ इशारा किया है कि समाज की तमाम तड़क भड़क के पीछे जो इसकी रूढ़ियाँ हैं वह आज भी बनी हुई हैं, उनको तोड़ पाना आसान नहीं है. एक बेहद सफल पत्रकार को भी अंतरजातीय विवाह करने में डर लगता है. कहानी के प्लाट में नवीनता है.
हाँ, एक बात जरूर है कि लेखक के पास जबरदस्त कहानी है लेकिन उपन्यास संपादन के अभाव में वह रोचकता पैदा नहीं कर पाता. बल्कि शुरू में पत्रकारीय ताना-बाना इतना अधिक बुना गया है कि वह कुछ हद तक इस उपन्यास को पढने से विमुख भी करने लगता है. मात्र 184 पृष्ठों के इस उपन्यास में बेवजह का विस्तार बहुत है जिसको संपादन के स्तर पर दूर किया जा सकता था. अगर इस उपन्यास का संपादन अच्छी तारः हुआ होता तो यह कमाल का उपन्यास बन सकता था.
बहरहाल, आप अगर जानना चाहते हैं कि इश्क का वह करेला क्या है तो उपन्यास को एक बार पढना ही होगा?
-प्रभात रंजन
पुस्तक- करेला इश्क का; प्रकाशक- जगरनॉट बुक्स, मूल्य- 250 रुपये.

