आज कुछ कविताएँ पढ़िए ऋचा गिरि की। स्त्री मन में उठने वाले संशयों, प्रश्नों को सहजता से कविता में अभिव्यक्त करने वाली ऋचा नोएडा में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में एचआर का काम देखती हैं। आइये उनकी कविताएँ पढ़ते हैं- मॉडरेटर
=============================
1. स्त्री
सीमाएं टीसती थी उसे
लोहे के पिंजरे के भीतर
पंख फड़फड़ाते गौरैया की तरह
हाथों में हल लिए
दिल्ली की सड़कों पर
बैठ गई थी,
क्रांति ने भी इस करवट को
लिखना चाहा था,
उस दिन,
अब उसने चुन लिया था
बनना दरियाई घोड़ा
शाहीन बाग में भी
पर खदेड़ दिया गया था उसे
और तब तक खदेड़ा गया
जब तक वह रसोई तक ना पहुंच जाए
सोच लिया था उसने
रसोई की धुंआरी को भर लेगी मुट्ठी में
और उड़ा देगी आकाश में,
चूल्हे की लपटों से सुलगा लेगी
अपने कोमल हृदय को थोड़ा
वो रखना चाहती थी
अपना हाथ
वहां जहां उसका
आधिपत्य था नैसर्गिक,
न जाने कितने
प्रकाश वर्ष से
महरूम रही होगी
और कितने प्रकाश वर्ष
लगेंगे इस मुक्ति में
2. क्यों बनाया देवी
मूर्तिकारों ने अक्सर
उन्हीं मूर्तियों को देवी कहकर बनाया
जो मूक रही
जिनमें आठ हाथ रहे
उस मूर्तिकार ने तो अपनी मूर्तियों के दो ही हाथ बनाए हैं
और वाणी भी दी है
पर सजीव मुखर मूर्तियां
दो हाथों वाली
चुभती ही रही इस लोक में
जैसे चुभता हो
कोई जंगली कांटा पैरों में
इन्होंने कभी नहीं चाहा था बनना देवी
क्यों बनाया इन्हें देवी?
3. रूपांतरित कर गई थी मुझे
उद्विग्न होकर सिल रही थी
आसमान जो फटा था
बिजली के कड़कने से उस रात
“पैसों की गर्मी है तुम्हें”
फफककर बोल रही थी,
मटमैले रूखे हाथों से
आंखों की कोरों को पोंछते हुए
इसी गर्मी के ताप से
सर्दी की ठिठुरन से
मुक्ति मिली है
इसी से खड़ी हो पाई है वह
कुछ ऊपर और थोड़ा बराबर
चूल्हे जलते हैं उसके घर के
इसी ताप से
रोटियां सिंकती हैं इसी पर
यह कुछ वैसी गर्मी लगी मुझे
जो दूर किसी टिमटिमाते
ग्रह की खिड़की से
झांकती संकल्पों को
दृढ़ करती हो,
रूपांतरित कर गई थी मुझे
यह रूपहले सिक्के,
या बुलियन की नहीं थी
द्रव्य या अशर्फियों कि भी नहीं
कदापि नहीं
वरना ग्लेशियर पिघल जाते
उस गर्मी से
और ले डूबते पूरे संसार को
4. है स्त्रियों को भी बोध
पता है नदी को
उसे बहना है
अपनी तलछट बटोर कर
त्रिभुजाकार आकृति लिए
करना है परित्याग सागर को
बोध है धरती को
उसे परिक्रमा करनी है अनवरत
सूर्य के चारों ओर
साथ ही घूमना है
अपनी धुरी पर
संज्ञान है चंद्रमा को
अलग-अलग तरह से
अपनी देह प्रदर्शित करना
अमावस्या से पूर्णिया तक
अलहदा रूपाकार में
तो आप कौन है जनाब ? जो कहे
कब उठना है,
कब बैठना है,
क्या बोलना है,
कैसे बोलना है,
कब घूंघट पहनना है,
कब हिजाब उतारना है,
है स्त्रियों को भी बोध!!
5. सामर्थ्य स्त्री का
ओ स्त्रियों! तुम बढ़ो
ऐसे जैसे बढ़ता है बलूत
धीरे-धीरे मजबूती से
फिर चढ़ो ऊपर जैसे चढ़ती हैं जंगली लताएँ
पहाड़ों पर
और गझिन बन फैल जाओ इतना कि सोच ना सके
कोई काटने की
प्रकृति जानती है तुम्हारा सामर्थ्य,
जो नहीं जानते
वो विकृति है
6. बहनापा
उसने रगड़ दी थी
अपनी अनुकंपी रूखी हथेलियां
मेरी पीठ पर हौले से
टूटते देह पर रखा था
अपना खुरदरा मटमैला हाथ
नहीं देखी गई थी उससे
मेरी कराह
फरवरी के महीने में ही
मुझे उससे प्रेम हो गया
स्त्रियां समझती है दूसरी स्त्रियों की वेदना,संघर्ष, दुख और खुशी भी
यह किसी ग्रंथिरस के प्रभाव में नहीं आता
यह बहनापा है
स्त्री का स्त्री से प्रेम
हर बार लैला-लैला नहीं होता
7. मौन है लोकतंत्र
दुबके पड़े हैं
कंबल,चादर, तकिए,
चरमराता कठोर चौकी भी
सिकुड़ के बैठा है,
ऊंघते हुए ये
कभी मुझे देखते है
कभी मैं इन्हें,
झांक रहा है कोहरा
टकटकी लगाए खिड़की पर
सब मौन है!
नीरव है कमरे की दीवारें भी,
छत भी,
सर झुकाए हुए हैं हाथी,
सात दौड़ते घोड़े स्तब्ध है
दीवार पर उठँगे गौतम बुद्ध को देखते निर्निमेष
शाक्य भी मौन है,
बोल रही है तो बस
घड़ी की सुइयां प्रति सेकंड
टिक- टिक -टिक- टिक
डर है यह भी मूक ना हो जाए कहीं
किसी के पास बोलने को कुछ नहीं,
कुछ नहीं
सिवाय सवालों के
पर कौन करेगा?
अविच्छिन्न,
आर्तनाद उठ रही है
स्त्रियों की,
कभी पहाड़ियों की,
तो कभी दरख़्तों की
कई सवाल लिए
शौर्य मौन है,
वीरता मौन है,
हौसला मौन है,
दृढ़ता मौन है
और मौन है लोकतंत्र
क्यों?
8. मैं कश्मकश में हूँ
रात ऊँघती हुई लगती है
कभी सहमी, बेचैन,डरी हुई लगती है
इसलिए रखती है अपने पास
भेड़िया चांद
कीड़े वाला चांद
बर्फीला चांद
शिकारी चांद
यह सब इसके बॉडीगार्ड होंगे
कभी जब डर कम लगता होगा
तो बुलाती होगी
गुलाबी चांद या
फूलों वाले चांद को
कितने किस्से देखे होंगे इसने
शायद प्रेम,
करुणा,
अनुरक्ति
कम ही देखा हो
वरना इतनी सहमी नहीं रहती
और न ही रखती बॉडी गार्ड अपने साथ
साक्षी होंगी ये दुष्कर्मों की
कितने राज छिपाए होंगे अंदर,
प्रति रात देखती होगी
सहम जाती होगी थोड़ा और
पूछूँगी कभी इससे
क्यूँ नहीं बनती गवाह
उन दुष्कर्मों की
जो उसकी आंखों के नीचे होते है
क्यूँ नहीं करती आडम्बरों को ध्वस्त
अपने सत्य से
क्यूँ नहीं देती भांडा फोड़,
आग्रह करूंगी इसे
अदालत में आए चश्मदीद गवाह के रूप में
और सच कहे, सच के सिवा
कुछ न कहे
गीता पर हाथ रखकर
पर मैं कैसे सवाल पूछूं?
कहीं वो सहमी हुई मुझसे
ये न कह दे की पहले सूरज से आग्रह करो और
पूछो सवाल की
उसने कितने पाप देखे हैं
अपनी आँखों के सामने
मैं कश्मकश में हूँ!
किससे सवाल पूछूं?
चाँद वाली रात से
सूरज वाले दिन से
या उन लोगों से
9. चाह पुरुषों की
पुरुषों ने कभी नहीं चाहा
बनना गुलाम स्त्रियों का,
सिवाय बिस्तर पर
कभी थोड़ा करीब आए भी तो केवल हे-हे, ठी-ठी करने
शायद इसी में उन्हें आनंद मिला हो
पर सुकून तो नहीं मिला होगा
कहाँ ले पाए होंगे
स्त्रियों से प्रेम
इतनी ऊंची नाक लिए
जिसके पार नहीं दिखाई पड़ता
कोई जलप्रपात
उत्कंठा तो होती होगी इनके अंदर भी
अपनी स्त्री के पैरों में महावर लगाने की
हाथों में रचने की मेहंदी,
कभी चूड़ीहारन बन उनकी कलाइयों में पहनाने की लहठियाँ
क्या कभी पुरुषों को मन नहीं करता होगा कि
अपनी स्त्री के बालों में बना दे चोटियां
और खोंस दें
अपनी पसंद के फूल
पर शायद डरते होंगे
उन मुँहफटों से
कि कोई उन्हें
‘मउगा’ न कह दे!
10. याद है तुम्हें
याद है तुम्हें ?
जब तुम्हारी आंखे देखती थी
मेरी आंखों में नमी और बेचैन हो उठती थी
मेरी कलाइयों की चूड़ियों को टटोलते हुए
मेरे हृदय का स्पंदन टटोल लेते थे तुम
मेरे बालों को मेरी “यूएसपी” कहते
और अक्सर मेरी बनाई हुई
बिन नमक की सब्जी
मुस्काकर खा जाते
अच्छा लगता था मुझे
अब और अच्छा लगता है
तुम्हें देखना
बच्चों के बालों को सवारते हुए,
सोते हुए उनकी एड़ियां सहलाना,
तुम्हारा कभी घोड़ा बनना तो कभी टाइगर
एक बात बोलूंगी तुम्हें
मानोगे?
शाम की चाय साथ पिया करो
और मुझे भी प्यार करो बच्चों की तरह
मैं स्नेह पिपासु हूँ

