अमेय कान्त के हालिया प्रकाशित काव्य-संग्रह ‘किसी छूटे हुए दिन में’ पर यह टिप्पणी लिखी है वरिष्ठ कवि राजेश सक्सेना ने। प्रस्तुत है- अनुरंजनी
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अचीन्हे विषयों से पहचान कराती कविताएँ : ‘किसी छूटे हुए दिन में
अमेय कान्त की कविताओं में एक शांत लयात्मक बहाव है, इन कविताओं में इस वाचाल समय का शोरगुल सुनाई नहीं देता ! अपने दूसरे संग्रह तक आते हुए अमेय ने अपनी कविता को मुहावरों और नारों से बचाकर रखा है, उनकी कविताओं की भाषा में संगीतात्मकता है। यह भाषा संतूर बजाती उंगलियों को छूती है, नदी के घाट पर रुके पानी की सतह को अपनी हथेली से दुलारती है और पड़ोस के घरों में अपने घर की गंध ढूँढने लगती है !
अमेय के सद्य: प्रकाशित कविता संग्रह ‘किसी छूटे हुए दिन में’ की कविताओं से गुज़रते हुए लगता है कि ये कविताएँ हमले नहीं करतीं, बल्कि अपनी गति में इनकी प्रवृत्ति अवलोकन और आलोचना की है। हालाँकि ऐसा भी नहीं है कि कवि अपने समय की चिंताओं, कुरूपताओं और विषमताओं से वाबस्ता नहीं है! संग्रह की पहली कविता ही भाषा के लिये चिंता की कविता है, जिसमें भाषा से गायब हो रहे चन्द्रबिंदु के प्रति कवि जागरूक है। वह इसे विषय बनाकर कविता लिख रहा है कि कैसे हमारी शब्दावली से अब चंद्रबिंदु गायब हो रहा है गोया उसकी कोई ज़रूरत नहीं है। चंद्रबिंदु के बिना अगर “मां” लिखें तो कितना अधूरा-सा और बेकार लगेगा लेकिन चंद्रबिंदु के साथ लिखा “माँ” पूरे माँ के व्यक्तित्व को अद्भुत तरीके से परिभाषित और सुन्दर बनाता है जिसमें वात्सल्य झलकता है। ठीक वैसे ही चन्द्रबिंदु के साथ लिखी “आँखें” कितनी दृष्टिपरक हैं, जैसे लिखा हुआ शब्द हमें सच में देख रहा हो ! फिर कवि इस तरह गायब हो रही गौरैया के लिए, उम्रदराज़ आदमी के लिये भी चिंता करता है कि कैसे उन्हें हाशिये पर धकेला जा रहा है। इस तरह चन्द्रबिंदु के बहाने वह हर चीज़ जो ज़रूरी और सुन्दर है, उसके बारे आगाह करता है !
“शहर” शीर्षक की कविताओं में शहर के सात विविध चित्र हैं, जिनके बदलाव पर कवि अपनी चिंता व्यक्त करता है! एक कविता 2002 में चर्चित हुए एक चित्र पर है जिसमें दो व्यक्ति हैं – एक डराता हुआ, दूसरा डरा हुआ। यह बेहद ज़रूरी और यथार्थ को बताती है कि उनके दिलों में आए मानवीय, करुण परिवर्तन ने उन्हें फिर से इंसान बना दिया ! यह कविता कवि के भीतर छुपे मनुष्य की संवेदना को प्रकट करती है !
एक अन्य कविता है, जो बहुत सुन्दर, रोचक और दिलचस्प विषय पर है। शीर्षक है – “प्रार्थनाएँ”। इस कविता में बारिश होने की प्रार्थना और किसी के घर, दफ़्तर पहुँचने या किसी समारोह के लिए बारिश रुक जाने की इच्छा – इन दोनों के द्वंद्व के बीच कविता का बनाव अपनी यात्रा करता है। कवि इस द्वंद्व के बीच सुन्दर बिम्ब खोजता है, जिनमें चिड़िया की चोंच की प्यास भी है और धरती में छिपे बीजों के अंकुरण की आकांक्षा भी।
“महानगर” कविता में आधुनिक विकास की अवधारणा और उसकी दुष्प्रवृत्तियों व दुष्प्रभावों पर संकेत है। बुज़ुर्ग पीढ़ियों का गाँवों और छोटे शहरों से अपने बच्चों के पास जाकर महानगरों की ऊँची ईमारतों में चौदहवें-पंद्रहवें माले पर रहना एक ऐसे दरख्त की तरह है जिसे उखाड़कर बिना जड़ो के वहाँ रोपा जा रहा है। यह कविता वर्तमान उम्रदराज़ पीढ़ियों की व्यथा पर गहरा तंज है जो बहुत यथार्थपरक सच्चाई भी है!
“मंगल वाद्य” ऐसी कविता है जिसमें कवि ने उन साजिंदों की व्यथा को स्वर दिया है जो अपने निजी दुःखों और नज़दीकी लोगों की मृत्यु के बाद भी दूसरों के लिये मंगल वाद्य बजा रहे हैं। यह रचना इस मायने में सार्थक है कि पेट पालने के लिये अपने कामों में लगे वे तमाम लोग जो अपने दुःखों को छुपाकर भी हमारे मंगल में शामिल हैं। उन्हें कवि का मन संवेदना से देख रहा है और उनके प्रति अपनी कृतज्ञ शब्दावली में उन्हें स्थान दे रहा है और जो किसी बाज़ार की ताकत का हिस्सा नहीं है !
“खुशबुएँ” कविता में कवि प्रेम के पराग में डूबकर खुशबुओं की पहचान करने की कोशिश करता है, जिसमें वस्तुतः वह प्रेयसी को खुशबुओं की पहचान का श्रेय दे रहा है, अस्तु यह कविता खुशबू के माध्यम से उस प्रेम को इंगित करती है जिसमें कवि प्रेम की गंध में डूबा है। लेकिन अंत में वह खुशबुओं को जानने का समझने का श्रेय सभी स्त्रियों को देकर इस कविता को निजता से निकालकर एक बड़े वृत्त में बदल देता है। इस वैयक्तिक अनुभूति को व्यापक सामाजिक बोध में बदल देने का कौशल कवि ने इसमें किया है !
कवि की दृष्टि ऐसे नए विषयों पर न सिर्फ़ जाती है बल्कि उन पर रचने के लिये काव्य तत्वों के साथ शब्द चुनाव और शिल्प उन्हें रोचक और अनूठा बना देती है। एक कविता है – “बेतार समय”। यह कविता लैंडलाइन फ़ोन और मोबाइल फ़ोन के माध्यम से समय और रिश्तों के अंतर्संबंधों के विषय पर बारीकी से अनुसंधान करती है और बताती है कि लैंडलाइन फ़ोन तार से जुड़ा होता था जो रिश्तों के तार को भी जोड़ता था। यह तार रिश्तों के संगीत का स्पन्दन भी था। लैंड लाइन के कारण आदमी यह झूठ नहीं बोल सकता था कि “मैं निकल गया हूँ, रास्ते में हूँ”, जबकि मोबाइल पर यह झूठ आसानी से बोला जा सकता है। यह बेतार से चलता है, हम एक ऐसे ही बेतार समय में जी रहे हैं। कवि ने इस कविता में यह जो द्वैत रचा है, वह यथार्थपरक होने के साथ, निर्जीव वस्तुओं की उपयोगिता से सामाजिक अंतस चेतना को विमर्श में लाती है !
” पहाड़ के शहर से ” विषय पर एक सुन्दर बिम्ब के साथ रचित यह कविता प्रेयसी की आँखों में क्षितिज के रंग खोजती है :-
‘शाम घुमावदार सड़कों की तरह /उतरती है पहाड़ों से/ और ओझल हो जाती है पेड़ों के बीच / तुम्हारी आँखों में फैल जाते हैं / क्षितिज के रंग’
कविता में शाम का दृश्यात्मक सौंदर्य प्रेयसी की आँखों में देखने की कल्पना में कवि ने बहुत सुन्दर प्रयोग के साथ रूपांतरण किया है, यह कवि के गहरे प्रेम और सौंदर्य की दृष्टि का संकेतक है!
एक और बहुत अचीन्हे विषय पर कवि ने कविता रची है। शीर्षक है “बहुत चलने वाली चप्पलें”। यह विषय कितना अलग और ध्यान खींचने वाला है कि कोई कवि इस पर भी कविता लिख सकता है? लेकिन यही कवि की ख़ूबी है कि वह अपने रचना संसार में क्या-क्या देखता है और उसे अपनी कविता में ढालता है। इस कविता में कवि ज़्यादा दिन चलने वाली चप्पलों से एक रिश्ता कायम होने के उदार भाव को संजोकर, मर्म स्पर्श करते हुए कविता के बहाव को बहुत सुन्दरता के साथ पाठक के सामने लाता है :-
‘बहुत चलने वाली चप्पलें/ पहनने वाले की टालमटोल और / नई की ज़रूरत के बीच / थोड़ी सी जगह में /बनाए रखती है / अपने लिये गुंजाइश’
यहाँ कवि अधिक चलने वाली चप्पल की अवधि से नई चप्पल की आमद के विरुद्ध बिम्ब और बेहतर वाक्य विन्यास से अपनी कविता को रचते हुए पुरानी चीज़ों से लगाव का दर्शन रचता है!
‘उनके घिसे हुए तलों पर / किसी अज्ञात लिपि में / लिखी होती हैं / अच्छे बुरे वक़्त की ढेरों कहानियाँ’
कविता में यहाँ कवि ने चप्पलों से लम्बे समय का रिश्ता एक संघर्ष और प्रेमिल वक़्त के साथ चलते हुए बताने का प्रयास किया है। यह रिश्ते की ऊष्मा को भी सामने लाता है ! फिर कविता के अंत में कवि ने एक दार्शनिक अंदाज़ में चीज़ों की नश्वरता और समय सापेक्ष बदलाव के सामने चप्पलों को अनश्वर निरुपित कर दिया है। यह कौशल कवि की लम्बी रेंज को बताता है !
एक और बहुत रोचक शीर्षक वाली कविता है – “कैंची, डंडा, सीट”। यह कविता सहज ही पाठक का ध्यान आकर्षित करती है। इसमें साइकिल चलाना सीखने की प्रक्रिया का अत्यंत दिलचस्प ढंग से वर्णन किया गया है। पहले कैंची चलाना सीखना, फिर डंडे पर संतुलन बनाना और अंत में सीट पर बैठकर साइकिल चलाने तक की यात्रा का ज़िक्र है। यह कितना अभिनव विषय है, जो कवि को कविता रचने के मनोभाव तक ले जाता है! कविता यह संकेत भी देती है कि सीट की आरामदायक सफलता बिना पूरी प्रक्रिया से गुज़रे प्राप्त नहीं होती; और यदि मिल भी जाए, तो वह क्या ही सफलता होगी :-
‘तीन चरणों में पूरा होने वाला / यह लंबा सफ़र/ सिखाता था / कि एक सम्मानजनक जगह तक पहुँचने के लिये / गुज़रना होता है / एक व्यवस्थित और क्रमबद्ध प्रक्रिया से!’
यह कविता जीवन में शॉर्टकट के माध्यम से सफलता हासिल करने के लिए लालायित लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश भी देती है। इसी तरह अचीन्हे विषयों और सूक्ष्म दृष्टिबोध पर केंद्रित ये कविताएँ पाठक को उन अनुभवों और विषयों से परिचित कराती हैं, जो सामान्यतः हमारी दृष्टि से ओझल रह जाते हैं।
अमेय की दृष्टि बहुत गहरी और व्यापक है। उन्हें विषयों के चुनाव का नायाब सलीका आता है। वे शिल्प एवं बिम्बों के सुन्दर प्रयोगों के माध्यम से बहुत सरोकारयुक्त और ज़रूरी कविताएँ लिख रहे हैं !
युद्ध की विभीषिकाओं पर भी कवि की दृष्टि है। तभी “गनीमत” शीर्षक की कविता में एक बच्ची के सवाल कि “लड़ाई में क्या हुआ?” के बाद उसके बनाए चित्र में पहाड़, नदी और आकाश देख कवि आश्वस्त है कि गनीमत है, बच्ची युद्ध के सवाल भले ही पूछ रही है, पर चित्र में अब भी पहाड़, आकाश नदी हँस रहे हैं और युद्ध उसके चित्र से बाहर है। यह उम्मीद की कविता है जिसमें एक बच्ची दुनिया की खूबसूरती रच रही है !
इसी तरह युद्ध पर केंद्रित एक और कविता है “युद्ध में स्त्रियाँ”। इस कविता में युद्ध से प्रभावित स्त्रियों के भीतर के दर्द, टूटन, बैचेनी और आँसुओं के साथ उनकी विभिन्न भूमिकाओं, चाहें वे पत्नी हों, माँ हों, बहन हों या बेटियाँ हों, सब पर कवि ने अपनी संवेदनाओं के माध्यम से एक नमीयुक्त फाहा रखने की कोशिश की है !
संग्रह की शीर्षक कविता “किसी छूटे हुए दिन में” एक प्रेमिल कविता है। इसमें छूटे हुए दिन की प्रेम भरी याद है और वह प्रकृति के रंगों, फूलों की गंध, पानी की आवाज़ के साथ झरते हुए गीत की तरह याद दिला रही है जहाँ उनकी स्मृति के कुछ लम्हे और फूल छूट गए हैं !
पूरे संग्रह की कई कविताओं पर बात की जा सकती है। ‘नदियाँ’, ‘फ़ॉरवर्ड’, ‘स्वाद’, ‘चीथड़े’, ‘महक’, ‘उसके संवाद’, ‘अल्पविराम’ आदि भी बहुत सुन्दर एवं भावपूर्ण कविताएँ हैं जिन्हें पढ़ा जाना चाहिए! “लाइफ़ इज ब्यूटीफ़ुल” ऐसी कविता है जो सीरिया के एक युद्ध वीडियो को देखकर कवि भावुक मन से निकली है। इसमें गिरते बमों के बीच एक पिता अपनी बेटी को समझा रहा है ये आवाज़ें हैं, इनसे हमें नहीं डरना है और बच्ची खिलखिलाने लगती है! गिरते बमों से न डरने की यह कविता साहस और जिजीविषा भरती है। वर्तमान में ईरान युद्ध में भी ऐसे कई दृश्य हमने देखे हैं !
कुल मिलाकर यह संग्रह अमेय कान्त की कविता यात्रा को एक उल्लेखनीय स्थापना के साथ विस्तारित करते हुए आगे के लिये महत्वपूर्ण पड़ाव की ओर ले जाएगा !
राजेश सक्सेना
48 – हरिओम विहार
तारामंडल के पास
उज्जैन म.प्र.
मोबा. 7869408734 ‘किसी छूटे हुए दिन में’ (कविता संग्रह)
अमेय कान्त
कीमत – 200 रूपए
वेरा प्रकाशन, जयपुर (राजस्थान)

