ख़ालिद जावेद उर्दू के ऐसे लेखक हैं जिनको हिन्दी में खूब पढ़ा जाता है। हाल में उनका उपन्यास रेख्ता से आया है- इक्कीस एक सौ बाईस। इस उपन्यास पर यह विस्तृत टिप्पणी की है कवि-लेखक यतीश कुमार ने। आप यहाँ पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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“लिखना पत्थर पर नाखून से खराशें डालने जैसा है और पढ़ना किताब के जंग लगे ताले को खोलना।”
ख़ालिद जावेद अपनी बात खुलकर, पेशे-लफ़्ज़ में करते हैं और किताब को गंभीरता से पढ़ने की हिदायत भी देते हैं। उनकी किताबें मैंने पहले भी पढ़ी हैं और उन पर लिखा भी है। यह ‘मौत’ सीरीज़ की पाँचवीं किताब है। इसका मतलब है कि इस किताब से आशाएँ भी पाँच गुना हो चली हैं। ऐसा तब होता है, जब लेखक की हर किताब सोपान की एक सीढ़ी बने, जो कि ख़ालिद जावेद के मामले में सही भी है।
बारीकी लेखक का मज़बूत पहलू है और, जैसे कि ‘नेमतख़ाना’ में देखा गया था, हर दृश्य की डिटेलिंग इतनी उम्दा थी कि अँधेरे का विवरण भी इतना साफ़ नज़र आता है। इस किताब में भी शुरुआत से यही मैंने पाया।
किताब खोली तो एक फ़ितूर मिला। अक्सर लेखक ऐसी फ़ितूरी करते हैं, पर यहाँ विज्ञान से जुड़ा किरदार सनक पाले दिख रहा है। किरदार ऐसा कि जिज्ञासा की घड़ी हमेशा चलती रहती है।
इस किताब को मैंने उस समय पढ़ा, जब पुराने बिलासपुर की ज़मीन तलाश रहा था। ज़मीन के नीचे दफ़्न एक शहर को खोजने की बेचैनी भीतर लगातार बनी हुई थी। पहली शाम खिड़की से बाहर झाँका तो देखा कि आज भी उन डूबे हुए मंदिरों में से लगभग आठ के अवशेष दिखाई दे रहे हैं। इस समय गोविंद सागर झील का जलस्तर काफ़ी नीचे उतर आया है। देखते-देखते सामने अँधेरा घिर आया। खिड़की अब पहाड़ के साथ अँधेरे में इस तरह विलीन हो चुकी थी कि उसका खुलना मानो सिर्फ़ कमरे के भीतर ही रह गया हो।
मैं चुपचाप, कुछ घबराकर, ख़ालिद जावेद की किताब फिर से उठा लेता हूँ। जब भी बेचैनी मुझे घेरती है, किताबें मेरी सबसे भरोसेमंद पनाहगार बन जाती हैं। ‘धूप शहर के मुँह में रेत की तरह किरकिरा रही है’– जैसी पंक्तियाँ पढ़ते हुए बाहर की तपिश और भीतर की बेचैनी एक-दूसरे में घुलने लगती हैं। रात के बारह बजे तक मैं ख़ालिद जावेद के रचे हुए आग के संसार में झुलसता रहता हूँ। जो आदमी रोज़ दस बजे सो जाता है, वह आज बारह बजे तक भी क्यों नहीं सो पा रहा? और लो, अब तो एक बज चुका है, लेकिन मैं अब भी उसी किताब की पंक्तियों को रेखांकित करने में डूबा हुआ हूँ।
अगले दिन किताब साथ है और मैं झील में डूबे मंदिर के शिखर के पास उसके इतिहास को ढूंढने निकला हूँ। किताब साथ है और चलते हुए महसूस हो रहा है मैं लाशों के ढेर पर चल रहा हूँ। गर्मी ठीक उस किरदार की तरह मेरे बदन की जला रही है, अंतर बस इतना है कि मुझे बहुत तेज पसीना आ रहा है। उन आठ मंदिरों में से चार को देखने के बाद मैं वापस ऊपर सड़क पर आता हूँ। मैं पसीने से सराबोर हूँ। इस समय पुराना विलासपुर शहर और खालिद जावेद का लेखन दोनों के बीच और पसीना – पसीना हो रहा हूँ। गाड़ी में बैठता हूँ ड्राइवर को ऐसी फुल चिल्ड करने कहता हूँ।
अब गाड़ी चंडीगढ़ की ओर रवाना है और पूरे रास्ते पसीना सुखाते हुए मैं इन पंक्तियों के आगोश में डूबता जाता हूँ। ‘दो मिट्टी के पहाड़ों के बीच मोहब्बत का पैग़ाम आसानी से नहीं पहुँचता’-इस एक वाक्य में जैसे पूरा भूगोल, इतिहास और मनुष्य का अकेलापन सिमट आता है। किताब की पंक्तियां मेरे चारों ओर चक्रव्यूह रच रही है। बहुत मुश्किल है अब इस चक्रव्यूह से बाहर आना इसे तोड़ना।
अचानक ऐसा लगता है जैसे अदीब जवाब देने की कोशिश में सवाल करता चलता है और ये सवाल इस किताब की जमीन तैयार कर रहे हैं। एक आदत इस अदीब की यह भी है कि इसके हाथ में फावड़ा है और जमीन में गड़े सवाल जिसके बीज नहीं उग रहे उसे खोद डालना उसकी फ़िदरत है। ‘जब किसी चीज़ को बनाने का अमल चल रहा होता है तो उसे देखा नहीं जाता’- ख़ालिद जावेद का लेखन भी कुछ ऐसा ही है; वह अर्थ को प्रकट नहीं करता, उसे धीरे-धीरे बनने देता है।
आग एक केंद्रीय रूपक के तौर पर इस कहानी में फैलता सिकुड़ता रहता है और इसे पढ़ते हुए आपके आंखों की पुतलियां भी छोटी बड़ी हो रही हैं। ‘क्या आँखें खोलकर ही सिर्फ़ नज़र आता है?- यह प्रश्न उपन्यास की पूरी संवेदनात्मक संरचना पर लागू होता दिखाई देता है।
पैरों में आग़ लिपटी है इसलिए वो बुझाने के तरीके सुझाता फिरता है। कहानी में तवील हर चीज है। रास्ता हो या अंधेरा या इंतजार हो या मंजिल की ओर ले जाती सीढ़ियाँ सब तवील। आग जिसके बदन से लिपटी हो वह जानवरों से प्रेम ज्यादा करता है। ‘हर बारिश की किस्मत में तूफ़ान बनना नहीं लिखा होता’- लेखक की भाषा लगातार आग और पानी, हिंसा और करुणा के बीच झूलती रहती है।
जो प्रत्यक्ष नहीं है वो आभास बनकर सताता है पर यह यथार्थ है आभासी नहीं। बुद्ध का रूपक सूर्य के पास गर्मी का ऐसा विवरण थोड़ी देर के लिए पाठक को रोक देता है यह सोचने के लिए कि लेखक किस कदर डूब कर किरदार बन जाता है । एक शय की तरह लेखक ही किरदार है ऐसा भरोसा होने लगता है। कल्पना की उड़ान नहीं कल्पना की जमीन गढ़ रहा है लेखक। ‘जानने के लिए देखना ज़रूरी नहीं’- यही बात इस उपन्यास की रचना-प्रक्रिया पर भी लागू होती है।
“अब कुएँ नहीं है पर आग तो है”- स्त्री की स्थिति, कमजोर मन की स्थित, कमजोर पल की स्थिति और भयानक परिस्थित सब को एक पंक्ति में समेटने की हिम्मत और सलीका लेखक की समय और समझ दोनों पर पकड़ को दर्शाती है। दर्द को देखने का लेखक का अपना नजरिया है। ‘मेरे दिल में एक गड्ढा है, जिसे मैं दुःख से भरता रहता हूँ’- यह केवल पात्र का कथन नहीं, पूरे उपन्यास की भाव-भूमि का सार लगता है।
किरदार का जो दर्द है उसके अंतिम तह तक जाकर उसे यूँ छूना कोई आसान काम नहीं। दर्द की दास्तान को गढ़ते हुए रिश्तों की बारीकी और धर्म की कशमकश की पेचीदगी को बहुत संभाल कर रचा गया है जिसे कम लिखे में ज्यादा समझाने वाली बात कहा जा सकता है। ‘सच की सबसे बड़ी खराबी है कि वह हमेशा इल्ज़ाम की तरह लगती है’- ऐसी सूक्तियाँ उपन्यास को महज़ कथा नहीं रहने देतीं, उसे विचार में बदल देती हैं।
उस किरदार के जीवन को एक पल भी जीना बतौर पाठक जहन्नुम लग रहा है। लेखक ने तो उसे पूरा का पूरा जिया है। आबले फूटने का दर्द कैसे सहा होगा जिसके बदन पर तिरस्कार का सोंटा इस कदर रोज मारा गया कि उसका जिस्म दर्द क्या होता है उसकी टीस क्या होती है भूल गया। ‘गुनाह और मुहब्बत के दरमियान बेचारा जिस्म इस तरह पिसता रहता है जैसे सिल पर कीमा पीसा जाता है’- यह रूपक पात्र की त्रासदी को असहनीय तीव्रता के साथ सामने रखता है। भोथर बदन होने का मतलब यह नहीं होता कि उसे जुबान और आंखों के कोड़े की खरोचें नहीं महसूस होती।
घटनाओं का जिक्र करते हुए दृश्य में बार बार दर्द अपनी पराकाष्ठा प्राप्त कर रहा होता है और हर पन्ना पढ़ने वाले कि सिहरन की तरंगों में इजाफा करता जाता है। पढ़ने वाला भी उसी तकलीफ से जैसे गुजरने लगता है फिर किताब को डर कर बंद करता है। उससे रहा भी नहीं जाता तो फिर से खोलता है और यह अब एक सिलसिला सा बना रहता है पन्ना डर पन्ना खौफजदा रहता है पाठक। न उगला जाए न निगला जाए वाली स्थिति बनी रहती है। ‘मोहब्बत में जीते रहने का भरम उठाना जहन्नुम में जीते रहने का दूसरा नाम है’– ऐसी पंक्तियाँ पढ़ते हुए पाठक भी उस यातना का सहभागी हो जाता है।
किताब पढ़ते हुए कई बार लगा कितने पाकिस्तान की कोई झलक मिल रही है। अदीब समय के साथ उड़ते हुए अपनी शक्ल बदल कर आग से खेल रहा है। ‘कोई नहीं मरता, बस अपने अंदर से उभरता रहता है’– और शायद इसी कारण इस उपन्यास में मृत्यु भी एक निरंतर घटित होती प्रक्रिया बन जाती है। जहन्नुम जाने के रास्ते पर जो दृश्य रचे गए हैं उसके लिए लेखक की जितनी तारीफ की जाए कम है।
कल्पनाओं की अजब उड़ान है। कई बार पकड़ से बाहर कई बार समझ से भी बाहर। किताब का पहला हिस्सा जब तक बच्चे पत्नी साली और बचपन के इर्द गिर्द घूमता है पठनीयता जबरदस्त बनी रहती है। दूसरे हिस्से में आने के बाद कल्पना की उड़ान जमीन से बहुत ऊंची उड़ती है और यथार्थ कहीं कटे थपके सा इंतजार करता है कि पतंग अब नीचे आए कि तब नीचे आए। चूंकि शब्दों का जादू और सूक्तियों की आवाजाही बरकरार है तो रुक-रुक कर पढ़ ही लेता है, नहीं तो साँस में साँस संभालना मुश्किल हो जाता है।
दो दुनिया में एक साथ रहना भी तो मुमकिन नहीं इसलिए दुनियावी बातें आपके पल्ले आसानी से पड़ती है पर रूहानी बातें वो भी काले आत्मा के सिसकियों की तो मुश्किल आना लाजिमी है। एक तैयारी के साथ पढ़ने की जरूरत है इस किताब को। ‘हाथ और आँख, दोनों के आईने अलग-अलग हैं’- इस उपन्यास को भी केवल पढ़ना पर्याप्त नहीं; उसे देखना, महसूस करना और भीतर उतरकर जीना पड़ता है।
एक सलाह यह भी है कि इस किताब को पढ़ने से पहले सालिम सलीम की लिखी विवेचना पर एक नज़र डाल लें। इससे उपन्यास की वैचारिक ज़मीन तक पहुँचना अपेक्षाकृत सहज हो जाएगा। यदि आपने इससे पहले ख़ालिद जावेद की ‘मौत की किताब’ और ‘नेमतख़ाना’ पढ़ रखी है, तो ‘इक्कीस एक सौ बाईस’ का रस और पाठकीय सुख कहीं अधिक गहराई से अनुभव कर पाएँगे।
पाठकीय सुविधा की दृष्टि से: देवनागरी लिपि में प्रकाशित इस पुस्तक का प्रमुख पाठक-वर्ग हिंदी का है। ऐसे में अनुवादक, संपादक और प्रकाशक, तीनों से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि पाठकीय सुविधा का विशेष ध्यान रखा जाए। पुस्तक में प्रयुक्त कुछ उर्दू शब्दों के हिंदी अर्थ या संक्षिप्त शब्दार्थ दिए जाते, तो सामान्य हिंदी पाठकों के लिए पाठ अधिक सहज और ग्रहणीय हो सकता था। चूँकि पढ़ते समय पाठक बार-बार संदर्भ सूची की ओर नहीं लौटता, इसलिए अगले संस्करण में ऐसे शब्दों के अर्थ या फुटनोट जोड़ने पर विचार किया जाना चाहिए। इससे पुस्तक की पठनीयता और उसका पाठकीय अनुभव, दोनों और समृद्ध होंगे।

