पिछले साल सुधीर विद्यार्थी की एक किताब आई ‘बिदाय दे मा’। किताब में क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाकउल्ला ख़ाँ, शचींद्रनाथ सान्याल, सुखदेव, चंद्रशेखर आज़ाद, मणींद्रनाथ बनर्जी, सोहन सिंह भकना, राजकुमार और विजय कुमार सिन्हा, प्रताप सिंह बारहठ, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, खुदीराम बोस जैसे कुल बारह क्रांतिकारियों की माताओं का खोजपूर्ण और रोमांचकारी वर्णन है। इसी पुस्तक पर यह टिप्पणी लिखी है देश के जाने-माने भाषाविद सुरेश पंत ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
================
क्रांतिकारिता का दूध पिलाने वाली माताओं की गौरव गाथा
सुरेश पंत
” एक बार बिदाय दे माँ
आमि घुरे आसी…
हाँसी- हाँसी चड़बो फाँसी,
देखबे भारतबासी.”
यह बांग्ला देशभक्ति गीत बहुत लोकप्रिय है, जिसे पीतांबर दास ने खुदीराम बोस की फाँसी के बाद लिखा था। गीत में युवा देशभक्तों की वीरता और मातृभूमि के लिए सर्वोच्च त्याग कर देने की भावना भरी है। मुखड़े का आशय है—
“माँ, एक बार विदा करो,
मैं लौटकर आता हूँ
हँसते-हँसते चढ़ जाऊँगा फाँसी पर
और भारतवासी देखते रह जाएँगे।”
… …
‘बिदाय दे मा!’ उन वीर माताओं की गौरव गाथा है, जिनके लालों ने इस देश की स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा के लिए अपने प्राण अर्पित कर दिए। शहीदों की यशगाथा पर तो अनेक किताबें आईं किंतु वीर माँओं का नाम, उनके त्याग और संघर्ष का विवरण किसी इतिहास में दर्ज़ नहीं है, इसलिए इन्हें और इनके योगदान को कम ही लोग जानते हैं। उत्सुकता बनी रहती है कि कैसी होंगी वीरों की माँएँ, जिन्होंने अपनी संतान को कैसे उदात्त संस्कार दिए। एकदम साधारण से परिवारों में रहते हुए अपनी संतानों के सोच और चरित्र को उन्होंने कैसे गढ़ा कि वे देश की आज़ादी के लिए खुशी-खुशी शहीद हो गए । कैसे जीवन बिताया होगा उन्होंने अपने जिगर के टुकड़े को खोकर।
दुनिया की सारी माँओं के चेहरे एक समान होते हैं– दुलार भरे, नेह से भरपूर। बेटे को देखकर प्यार लुटाती माँ की आँखों को कौन नहीं जानता। माँ चाहे अशफ़ाक उल्ला ख़ाँ की हो भगत सिंह या चंद्रशेखर आजाद की, या उन सैकड़ों अजान-अनाम शहीदों की, माँ तो माँ ही होती है। कुछ वीर बलिदानियों की माँओं को गुमनामी के अँधेरे से निकालकर दुनिया के सामने प्रस्तुत करने का प्रयास है यह पुस्तक, ‘बिदाय दे माँ’। लेखक सुधीर विद्यार्थी इतिहास के अच्छे जानकार हैं और, जैसा कि उन्होंने दावा किया है, उन्होंने स्वयं घूम-घूम कर यह सामग्री जुटाई है।
पुस्तक में क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक उल्ला ख़ाँ, शचींद्रनाथ सान्याल, सुखदेव, चंद्रशेखर आज़ाद, मणींद्रनाथ बनर्जी, सोहन सिंह भकना, राजकुमार और विजय कुमार सिन्हा, प्रताप सिंह बारहठ, भगत सिंह, सुभाष बोस, खुदीराम बोस जैसे कुल बारह क्रांतिकारियों की माताओं का खोजपूर्ण और रोमांचकारी वर्णन है। यह पुस्तक न कोई कहानी है, न उपन्यास लेकिन इसके चौबीस अध्यायों में ऐसा कुछ है जो पाठक को भीतर तक भिगो जाता है।
इन माँओं के साथ एक माँ ऐसी भी है जो जन्म देने वाली नहीं, नेह देनेवाली, पाल-पोसकर बड़ा करने और कुर्बानी के संस्कार देने वाली दीदी-माँ है– खुदीराम बोस की बड़ी बहन अपरूपा। मात्र 18 वर्ष के थे खुदीराम जब वे शहीद हुए थे। कहा जाता है कि घुँघराले बालों वाला वह किशोरं शहीद खुदीराम बोस जनता के बीच इतना लोकप्रिय हो चुका था कि उसकी चिता की भस्म के लिए दाहस्थल पर लोगों की होड़ लग गई। माताओं ने अपने बच्चों के गले में उनकी राख के ताबीज बाँधे। बंगाल के जुलाहे एक ख़ास क़िस्म की धोतियाँ बुनने लगे, जिनके किनारे पर खुदीराम लिखा होता था। स्कूल-कॉलेज में पढ़ने वाले लड़के खुदीराम वाली धोतियाँ पहनकर सीना तानकर चला करते थे। आज लोग कठिनाई से समझ पाएँगे कि शहादत भी फैशन स्टेटमेंट हो सकता है!
खुदीराम बोस के शहादत पर बंगाल के विद्रोही कवि काज़ी नज़रुल इस्लाम ने लिखा था,” क्या मैं इस देश की माताओं से पूछ सकता हूँ तुम में से कौन खुदीराम की माँ है ? क्या तुम अपने बेटे की गर्दन पर कसे फाँसी के फंदे की कल्पना भी कर सकती हो?
शहादतों को कैसे भुला देता है समाज– इसे समझने के लिए पुस्तक से यह उद्धरण पर्याप्त होगा। “कैसी है यह दुनिया! एक ओर बिस्मिल ज़िंदाबाद के नारे और चुनाव में वोट देने के लिए “बिस्मिल द्वार” का निर्माण, और दूसरी ओर उनके घर वालों की परछाई तक से भागना, उनकी निपूती बेवा माँ पर बदनामी की मार। एक ओर शहीद परिवार फंड के नाम पर हजारों का चंदा और दूसरी ओर पथ्य और दवा-दारू के लिए पैसों के अभाव में बिस्मिल के भाई का टीबी से घुटकर मर जाना। क्या यही है शहीदों का आदर और उनकी पूजा? ‘फिर आऊँगा माँ’ कहकर मैं चला आया। मन पर जाने कितना बड़ा भार लिए।”
आज़ादी की लड़ाई के लगभग सौ साल लंबे सफरनामे में देश की आधी आबादी की हिस्सेदारी एक भिन्न प्रकार का अध्याय है, जिसका विवरण अंकित करने में हर बार हमसे चूक हो जाती है। इसी बात को सामने रखते हुए ‘विदाय दे माँ’ में शहीदों और क्रांतिकारियों की माओं की चर्चा की गई है, जिनका योगदान इतिहास में अपना उपयुक्त स्थान नहीं प्राप्त कर सका है। संभवतः हम एक उदासीन, निर्मम और कृतघ्न समाज बन चुके हैं जिन्हें उन शहीदों के माता-पिता के बारे में कोई रुचि नहीं रही, जिनके कारण हमें आज़ादी नसीब हुई और हम दुनिया में सिर ऊँचा करके खड़े हैं।
*****
बिदाय दे मा
— सुधीर विद्यार्थी.
(विधा: कथेतर गद्य)
प्रकाशक
राजपाल एण्ड सन्स, दिल्ली
(प्रकाशन वर्ष 2024)
पृष्ठ संख्या: 192, मूल्य: 325 रुपए

