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  • सर्जनात्मक शिक्षा: समय की माँग

    सृजनशीलता मानवीय व्यक्तित्व का सर्वोच्च और मूलभूत क्षमता है, जो व्यक्ति को जीवन एवं जगत्‌ के बहुआयामी यथार्थ के बने-बनाए ढाँचों और यांत्रिक सोच से मुक्त होकर; नए, मौलिक और ऐतिहासिक ढंग से समझने, महसूस करने तथा अभिव्यक्त करने की अद्वितीय क्षमता प्रदान करती है। यह कला, साहित्य, विज्ञान या दर्शन तक ही सीमित नहीं है; बल्कि दैनिक जीवन, सामाजिक संबंधों, राजनीतिक कार्यों और व्यक्तिगत चिंतन-मनन में भी निरंतर नयापन लानेवाली जीवंत शक्ति है। दुर्भाग्यवश, वर्तमान शिक्षा व्यवस्था— मुख्यतः परीक्षा, अंकों की होड़, कठोर प्रतिस्पर्धा, रट्टू प्रणाली और बाजार-उन्मुख सफलता के संकीर्ण मापदंडों पर आधारित हो गई है। भारी पाठ्यक्रम का बोझ, शिक्षकों पर अत्यधिक कार्यभार, अभिभावकों की अंधी महत्त्वाकांक्षा तथा भय-तनावपूर्ण वातावरण ने बच्चों की स्वाभाविक जिज्ञासा, कल्पनाशीलता और मौलिक चिंतन को लगभग कुंद कर दिया है। परिणामस्वरूप, शिक्षा सृजनशील व्यक्तियों के निर्माण के बजाय केवल उपयोगी उपभोक्ता या यांत्रिक पेशेवर तैयार कर रही है। ऐसे में सृजनशीलता को शिक्षा का केन्द्रीय उद्देश्य बनाना और शिक्षक-शिक्षार्थी दोनों को स्वतंत्र, संवेदनशील एवं रचनात्मक वातावरण उपलब्ध कराना आज अत्यंत प्रासंगिक, आवश्यक तथा समय की माँग बन गया है। इस माँग को धरातल में क्यों और कैसे उतारा जाय इस पर गत वर्ष राजकमल प्रकाशन से एक उल्लेखनीय पुस्तक ‘सर्जनात्मक शिक्षा’ नाम से प्रकाशित हुई है। इस पुस्तक के लेखक हैं— डॉ. राघव प्रकाश और डॉ. सविता पाईवाल। लेखक द्वय पिछले दो दशक से राजस्थान में ‘परिष्कार’ नामक उच्च शिक्षा की संस्थाओं से जुड़कर नवाचारी प्रयोग कर रहे हैं। प्रस्तुत पुस्तक चार भागों और बारह अध्यायों में विभाजित है। आइये इस पुस्तक पर प्रसिद्ध कवि महेश पुनेठा की टिप्पणी पढ़ते हैं- मॉडरेटर 

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    पुस्तक का पहला अध्याय है— ‘शिक्षा में आस्था का संकट’। इस अध्याय में कहा गया है कि सर्जनात्‍मक सर्जनात्‍मक शिक्षा का सबसे बड़ा संकट राजनीति और नौकरशाही की सत्तापरस्त मानसिकता है। दोनों ही विद्यार्थियों को चैतन्य, जागरूक और प्रश्न करने वाला बनाने वाली शिक्षा की बजाय यथास्थिति बनाए रखने वाली शिक्षा को बढ़ावा देते हैं, क्योंकि वे स्वयं को कभी चुनौती दिए जाने की स्थिति पैदा नहीं करना चाहते। शिक्षा-व्यवस्था की प्रमुख चुनौतियाँ अत्यंत गंभीर हैं कहते हुए वे लिखते हैं कि राजनीति का शिक्षा-विरोधी और दमनकारी चरित्र है, बाजार का केवल आर्थिक शोषण पर केंद्रित स्वरूप है। अभिभावकों की रट्टू और परीक्षा-केंद्रित सोच, शिक्षा प्रबंधकों की यथास्थितिवादी मानसिकता, अप्रासंगिक पाठ्यक्रम, जड़ शिक्षण-पद्धति, विद्यार्थी-विकास से पूरी तरह निरपेक्ष मूल्यांकन प्रणाली तथा समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सर्जनात्‍मक सहभागिता का अभाव इस शिक्षा-व्यवस्था के प्रतिगामी लक्षण हैं। लेखक द्वय मानते हैं कि इन सबके कारण शिक्षा सृजनशील व्यक्तियों के निर्माण के बजाय केवल डिग्रीधारी उपभोक्ता और नौकरीपेशा लोग तैयार कर रही है।

    अध्याय का निष्कर्ष है कि शिक्षा में सकारात्मक परिवर्तन लाने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से शिक्षकों, अभिभावकों, विद्यार्थियों तथा सिविल सोसाइटी पर ही है। बिना आस्था के इस संकट को दूर किए शिक्षा को सर्जनात्‍मक बनाना असंभव है।

    इस अध्याय में कही गई बातें कटु हैं, किन्तु सत्य और आँखें खोलने वाली हैं। इन्हें स्वीकार किए बिना और उनके समाधान ढूँढ़े बिना शिक्षा को सर्जनात्‍मक बनाना संभव नहीं है।

    (2)

    पुस्तक का द्वितीय अध्याय है— ‘आधुनिक युग में वैश्विक जीवन दृष्टि का संकट’। इसमें लेखक द्वय ने आज की दुनिया के समक्ष मौजूद संकटों से लड़ने के लिए सर्जनात्‍मक शिक्षा की जरूरत पर बल दिया है। वे मानते हैं कि स्वार्थ, लूट-खसोट और हिंसा में उलझे हुए इस विश्व को सर्जनात्मक एवं आनंदात्मक बनाने की दिशा केवल सर्जनात्‍मक शिक्षा से ही संभव है। जीवन-दृष्टि का संकट शिक्षा के संकट से ही उत्पन्न हुआ है। एक समाज की जीवन-दृष्टि ही उसकी शिक्षा-दृष्टि को निर्मित करती है। आधुनिक सभ्यता मूल्य-निरपेक्ष और रुग्ण है। यह विद्यार्थियों में नैतिकता का विकास नहीं करती, जबकि विज्ञान-तकनीक को अत्यधिक महत्त्व दिया जा रहा है। हमारा व्यापार, बाजार, राजनीति, धर्म और संस्कृति सब शोषणकारी बन गए हैं। जनप्रतिनिधि नैतिक रूप से इतने बीमार हैं कि उन्हें अपनी बीमारी का भी पता नहीं है। बच्चे बीमार अभिभावकों के बीच बड़े हो रहे हैं और बीमार शिक्षालयों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। स्कूल-कॉलेज उनकी स्वार्थ वृत्ति का पोषण कर उन्हें और अधिक बीमार बना रहे हैं। चिंतन-क्षमता और समस्या-समाधान क्षमता का क्षरण हो रहा है। उनका यह मंतव्य सही है कि यदि सर्जनात्‍मक शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया गया तो युद्ध, झगड़े, अपराध और टकराव कभी समाप्त नहीं होंगे।लेखक कहते हैं कि सदियों से परिवार, शिक्षण संस्थाएँ और राजनीतिक व्यवस्था मिलकर बच्चे की स्मृति, निर्णय क्षमता और सृजनशीलता पर प्रहार कर रही हैं। बाल-मस्तिष्क थक गया है और बच्चे शिक्षा से चिढ़कर मानसिक रूप से संस्थान से किनारा कर रहे हैं। दरअसल चिंतन, निर्णय और सृजनशीलता मनुष्य की जन्मजात क्षमताएँ हैं, जिन्हें सत्ताएँ विकसित नहीं होने देतीं। हमारी शिक्षा इतनी पंगु है कि शिक्षित लोग भी मनुष्य को मनुष्य के विरुद्ध लड़ने से नहीं रोक पाते, बल्कि साजिश रचते हैं।

    निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि बेहतर मानवता के निर्माण के लिए हमें महात्मा गाँधी समेत महान चिंतकों द्वारा प्रस्तुत मूल्य-आधारित जीवन-दृष्टि की ओर लौटना होगा। इसके लिए संवेदनशील, भावात्मक और सर्जनात्‍मक शिक्षण-प्रक्रिया विकसित करनी होगी, जिसमें सामाजिकता, विश्वास और रिश्तों का सौंदर्य जीवित हो सके।

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    पुस्तक का तृतीय अध्याय है— ‘अनुपयुक्त शिक्षा पद्धति’। इस अध्याय में विस्तार से समझाया गया है कि हमारी शिक्षा-पद्धति कितनी अनुपयुक्त है और वह बच्चों की सृजनशीलता को किस तरह कुचल रही है।सबसे पहले वे पाठ्यक्रम को दोषी ठहराते हैं — यह प्रासंगिक नहीं, गुलाम बनाने वाला, अधूरा और ऊबाऊ है। शिक्षण पद्धति को लेखक वर्चस्वशाली वर्ग द्वारा कम उम्र के विद्यार्थियों पर अपना ज्ञान, अनुभव और दृष्टि थोपने की प्रक्रिया मानते हैं। शिक्षक विद्यार्थियों के लिए मार्गदर्शक या मित्र की बजाय पुलिस और शासक का रूप धारण कर लेते हैं। अभिभावक भी अपने बच्चों को समझने के बजाय उन्हें आज्ञाकारी बनाने पर जोर देते हैं। परिणामस्वरूप पूरी शिक्षण-प्रक्रिया विद्‌यार्थी को अन्वेषक (खोजी) बनाने के बजाय अनुगामी (अंधानुकरण करने वाला) बनाने वाली हो गई है। सिखाने का तरीका अधिनायकवादी है। सर्जनात्‍मकता की अपेक्षा नहीं की जाती। मूल्यांकन प्रक्रिया विद्यार्थी के विकास से पूरी तरह उदासीन है। यह सीखने से तटस्थ और केवल अंकों पर आधारित है। लेखक बहुत महत्त्वपूर्ण बात कहते हैं कि हम बच्चे पर पहले से बना-बनाया ढाँचा थोप देते हैं और उसमें निहित क्षमताओं को विकसित करने का दायित्व नहीं निभाते। सबसे चिंताजनक स्थिति मूल्यांकन की है — एक शिक्षक पढ़ाता है, दूसरा परीक्षा लेता है, तीसरा उत्तर पुस्तिकाएँ जाँचता है और विद्यार्थी को यह भी नहीं बताया जाता कि उसे कम अंक क्यों दिए गए। इससे स्पष्ट होता है कि शिक्षक और विद्यार्थी दोनों कितने बेईमान, भ्रष्ट और परस्पर अविश्वसनीय हो गए हैं।

    शिक्षा के क्षेत्र में हमें बहुत कुछ बदलने की आवश्यकता है, अन्यथा हमारी शिक्षा व्यवस्था बच्चों की सृजनशीलता को कुचलती रहेगी और सच्चे विकास को रोकती रहेगी।

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    अगला अध्याय है— ‘पश्चिमी शिक्षा: एक ढहता किला’। इस अध्याय में यह बताने की कोशिश की गई है कि यूरोप और अमेरिका अपने सांस्कृतिक, राजनीतिक एवं आर्थिक नेतृत्व के माध्यम से समूची दुनिया को स्वार्थ, हिंसा और मूल्यहीनता की ओर ले गए। यह विचारधारा का भीषण संकट है।पश्चिम की शिक्षा व्यवस्था मानवता के विकास और व्यापक हित के लक्ष्य को छोड़कर पैकेजिंग और धन बटोरने वाली कॉर्पोरेट मंडी बन गई है। शिक्षण संस्थाएँ अब पूँजीवादी कंपनियों की तरह कार्य कर रही हैं। इस अध्याय में चिंता व्यक्त की गई है कि दुनिया के अन्य देश, अपने सामाजिक उत्तरदायित्व को समझने और निभाने के बजाय, इसी स्वार्थपूर्ण पश्चिमी (विशेषकर अमेरिकी) कॉर्पोरेट शिक्षा मॉडल की नकल कर रहे हैं। विश्व के शीर्ष 100 पश्चिमी विश्वविद्यालयों को भारत में संचालित करने की अनुमति देने से तो भारतीय शिक्षा में कॉर्पोरेट संस्कृति और मजबूत हो जाएगी।

    विश्वविद्यालय अब विशिष्ट उद्योगों के लिए सीमित संख्या में कार्मिक तैयार कर रहे हैं, जबकि शेष विद्यार्थी बेरोजगारी की कतार में खड़े हो रहे हैं। लोकतांत्रिक मूल्यों की घोर उपेक्षा हो रही है। भौतिक विज्ञान को बढ़ावा दिया जा रहा है, किंतु मानव सत्य, भाव सत्य और सांस्कृतिक सत्य उपेक्षित रह गए हैं, जिससे विद्यार्थियों का दृष्टिकोण संकीर्ण होता जा रहा है। इस अध्याय में यह भी कहा गया है कि वास्तविक लोकतांत्रिक संस्कृति ही सर्वजन हित की शिक्षा को जन्म दे सकती है। पश्चिमी शिक्षा-दृष्टि बदलने से पहले वहाँ की जीवन-दृष्टि को बदलना आवश्यक है। कुछ चैतन्य शिक्षक, शिक्षा प्रबंधक और शिक्षण संस्थाएँ परिवर्तन ला सकते हैं।

    यहाँ पर मेरी थोड़ी असहमति है। मुझे यह विचार आदर्शवादी लगता है कि कुछ शिक्षकों, प्रबंधकों और स्कूलों के बदलने से शिक्षा पद्धति को बदला जा सकता है। अंततः यह एक राजनीतिक सवाल है और जब तक राजनीतिक इच्छाशक्ति या विजनरी राजनीति नहीं होगी तब तक शिक्षा में बदलाव इतना आसान नहीं है। हाँ, यदि एक बड़ी संख्या में जनता का समर्थन इस बदलाव के साथ होता है तो वह संभव लगता है। इसके अलावा, पाश्चात्य शिक्षा को पूरी तरह गलत बताना भी ठीक नहीं लगता। पश्चिमी शिक्षा ने हमें आधुनिकता, वैज्ञानिक चेतना, लोकतंत्र, मानवाधिकार, आलोचनात्मक चिंतन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता-जैसे बहुत सारे महत्त्वपूर्ण मूल्य भी दिए हैं।

    (5)

    पाँचवाँ अध्याय— ‘सही जीवन दृष्टि:विश्व बोध एवं परहित’। शिक्षा की दार्शनिक नींव को बहुत गहराई से प्रस्तुत करता है। यह अध्याय स्पष्ट रूप से कहता है कि मानव जन्मना, कर्मणा और विचरणा से वैश्विक है। हम अकेले नहीं रह सकते, इसलिए इस दुनिया को केवल व्यक्तिगत सुख के लिए नहीं, बल्कि सभी के लिए आनंददायक और विश्व-हितकारी बनाना चाहिए। अध्याय वसुधैव कुटुंबकम्‌, सर्वोदय और परहित को शिक्षा का केंद्रीय मूल्य मानता है। व्यक्तिगत उपलब्धियाँ नितांत व्यक्तिगत नहीं होतीं, वे सामूहिक ज्ञान-परंपरा का परिणाम हैं। शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थी में विश्व-मानव की भावना, करुणा और सर्जनात्‍मकता जगाना है। ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ और संकीर्ण ‘राष्ट्रवाद’ के स्थान पर सहकारिता, प्रेम, अहिंसा, सत्य, त्याग और सहिष्णुता जैसे मूल्यों को विकसित करना चाहिए। विभिन्न धर्मों-संस्कृतियों में इन मूल्यों की समानता को रेखांकित करते हुए यह अध्याय कहता है कि सच्ची शिक्षा पैकेज नहीं, बल्कि परहित को अंकुरित करने वाली होनी चाहिए। परिवार, विद्यालय और विश्वविद्यालय इस दिशा में समर्पित हों। अंबेडकर जी का उद्धरण बहुत प्रासंगिक है — “शिक्षा शेरनी का दूध है, जो पियेगा वह दहाड़ेगा ही’’। शिक्षा का फूल राजनीतिक प्रांगण में नहीं, संस्कृति की बगिया में ही खिलेगा। इस अध्याय में सभी प्रमुख धर्मों में उल्लिखित जीवन-मूल्यों पर बात करते हुए कुछ सार्वभौम जीवन-मूल्यों की पहचान की गई है और शिक्षा द्वारा उन जीवन मूल्यों को प्राप्त करने की बात की गई है। यह एक अच्छी कवायद है,जो इस अध्याय को महत्त्वपूर्ण बनाती है।

    यह अध्याय आदर्शवादी और प्रेरक है, लेकिन व्यावहारिक चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। सुझाव बहुत अच्छे हैं कि शिक्षा बच्चे की रुचि, क्षमता और जरूरत के अनुसार हो, परंतु पाठ्यक्रम, शिक्षण-पद्धति और मूल्यांकन तय करने का अंतिम अधिकार अक्सर राज्य सत्ता के पास रहता है। जब राजनीति और बाजार का गठबंधन शिक्षा पर हावी है, तब ईमानदारी, सादगी और परहित जैसे मूल्यों को स्थापित करना आसान नहीं। बाजारवाद स्वार्थ और उपभोग को बढ़ावा देता है, जबकि अध्याय सहकारिता और त्याग की बात करता है। ‘जनसत्ता’ की भागीदारी बढ़ाने और नीति-स्तर पर दबाव बनाने की बात सही है, किंतु यह कैसे संभव होगा — यह स्वयं एक बड़ी चुनौती है। फिर भी यह अध्याय हमें सोचने और उद्वेलित करने की शक्ति रखता है। यह बात बिल्कुल सही है कि बदलाव तभी संभव है जब हम परिवार और समुदाय के स्तर से प्रयोग शुरू करें और साथ ही सांस्कृतिक-राजनीतिक स्तर पर निरंतर प्रयास करें। ‘वसुधैव कुटुंबकम्‌’ की दृष्टि को केवल पढ़ना पर्याप्त नहीं, उसे जीने की कोशिश भी जरूरी है। यह बहुत विचारोत्तेजक अध्याय है।

    (6)

    शिक्षा के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सबसे पहली ज़रूरत है शिक्षा की सही समझ का होना। यदि शिक्षा की सही समझ ही नहीं होगी, तो फिर कैसे उन लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है, जिनका जिक्र अब तक के अध्यायों में किया गया है। छठे अध्याय में शिक्षा की सही समझ पर विस्तार से चर्चा की गई है। शुरुआत में ही कहा गया है कि शिक्षा व्यक्ति की स्वतंत्रता और सर्जनात्‍मकता को इस रूप में पोषित करती है कि वह क्षमता, सर्वोदय, सामाजिक सर्जनात्मकता तथा व्यक्ति के साथ-साथ सामूहिक आनंद को प्रोत्साहित कर सके। वह एक ओर वैज्ञानिकता को उत्प्रेरित करे तो दूसरी ओर कलात्मकता को भी अलंकृत करे। वह व्यक्ति की सोच और अभिव्यक्ति की सामर्थ्य को विकसित करे तथा उसमें विवेक और आत्म-अनुशासन को संस्कारित करे। इसमें स्वतंत्रता, क्षमता और सर्वोदय—तीनों को आपस में जुड़ा हुआ माना गया है। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं है। शिक्षा इन तीनों में प्राण फूँकने की प्रक्रिया का नाम है। साथ ही, शिक्षा भय के चंगुल से निकलकर ही बच्चे को स्वतंत्रता दे सकती है, और इस तरह समूचे समाज को भयमुक्त कर सकती है। भारत के विष्णु पुराण में सही कहा गया है—“ सा विद्या वा विमुक्तये”। सही मायने में शिक्षा वही है जो मनुष्य की चेतना को मुक्त कर सके—सांसारिक राग-द्वेष से मुक्त, भय से मुक्त। शिक्षा तो स्वतंत्र, निर्भीक चेतना का आनंददायक खेल है। लेकिन भय का सबसे बड़ा कारण अज्ञान है, शिक्षा के अभाव में है। स्वतंत्र पैदा हुए अज्ञानी मनुष्य को परिवार से लेकर बाजार तक सब डराने में तुले रहते हैं। विडंबना यह है कि जो शिक्षा विद्यार्थियों को भय से मुक्त कर सकती है, वही शिक्षा ज्ञान और करियर की प्रतियोगिता का विशाल पुतला खड़ा करके विद्यार्थी को भयभीत करने में लगी रहती है। दरअसल, शिक्षालय बच्चों को भयमुक्त करने के बजाय बच्चों में भय उत्पन्न करने की साजिश बन गए हैं।

    दुनिया में उन शिक्षकों की कमी नहीं है जो विद्यार्थी का तथाकथित नटखटपन (जो ज़्यादातर बच्चे की सर्जनात्मकता ही हुआ करती है) को अन्य प्रयत्नों से सर्जनात्‍मक बनाने के बजाय उसे भयभीत करके ही नियंत्रित करते हैं। यहाँ तक कि वे अभिभावकों को भी डराते रहते हैं। विद्यार्थी को भयमुक्त रखकर ही, उसकी अपनी रुचि, क्षमता और नवाचार की प्रवृत्ति को केंद्र में रखकर ही शिक्षा का सही रूप खड़ा किया जा सकता है। दरअसल, भयपूर्ण वातावरण में कुछ भी स्वस्थ नहीं रहता—न परिवार, न बाजार, न नारी, न ईश्वर। हमें अपनी दुनिया को बेहतर बनाने के लिए तथा शिक्षक और शिक्षा-क्षेत्र को ऊर्जावान और रचनात्‍मक बनाने के लिए पहले परिवार, शिक्षा प्रबंधन एवं स्वयं शिक्षकों को निर्भीक होना पड़ेगा और विद्यार्थी को भयमुक्त करना पड़ेगा। एक भयमुक्त व्यक्ति ही दूसरे की स्वतंत्रता का अधिक सम्मान कर सकता है। सही लोकतंत्र संयुक्त (निर्भय) वातावरण में ही जीवित रह सकता है। इस दृष्टि से भयरहित लोकतंत्र और भयरहित शिक्षा की स्थायी जुगलबंदी है। व्यक्ति की चेतना को उसके विवेक द्वारा संचालित करने के लिए स्वतंत्र कर देना ही सर्जनात्‍मक शिक्षा है।

    इस पाठ में सीखने को लेकर बहुत सारी बातें कही गई हैं—कि कैसे सीखना आनंददायक हो सकता है, उसमें संवाद की क्या भूमिका होती है, सीखने को कैसे सर्जनात्‍मक बनाया जा सकता है। इसमें सहभागिता और समीक्षा की क्या भूमिका है, इन बिंदुओं पर भी विस्तार से प्रकाश डाला गया है। यह कहा गया है कि समग्र शिक्षा का आज दायित्व है कि वह मनुष्य को सुविधा देने वाले विज्ञान को भी विकसित करे और मनुष्य को तृप्ति देने वाली कविताओं, संगीत को भी अवसर दे। वरना यह सुखभोगी दुनिया केवल शारीरिक सुख तक ही सीमित रह जाएगी और भावात्मक तृप्ति के महान आनंद को प्राप्त नहीं कर सकेगी। हर मस्तिष्क में कमोबेश विज्ञान और कविता, गणित और कल्पना—दोनों को जीने की ही नहीं, बल्कि दोनों को नया-नया रख सकने की क्षमताएँ रहती हैं। सर्जनात्‍मक शिक्षा का दायित्व है कि वह बच्चे की इन दोनों प्रकार की क्षमताओं को पहचाने और संतुलित रूप से विकसित करे।शिक्षक के माध्यम का सवाल एक संवेदनशील सवाल है। इसका संबंध केवल संप्रेषण से नहीं, बल्कि चिंतन, कल्पना और समझ से भी गहराई से जुड़ता है। अपनी मातृभाषा या परिवेशी भाषा में विद्यार्थी जितना सहज, सरल और स्वाभाविक ढंग से सीख और समझ सकता है, उतना दूसरी भाषा के माध्यम से नहीं। यदि शिक्षा के माध्यम की भाषा विद्यार्थी की प्राथमिक भाषा से अलग होती है, तो अवधारणाओं को समझने और ज्ञान-सृजन में बाधा उत्पन्न होती है। जो मेहनत किसी अवधारणा को समझने और आत्मसात करने में लगानी पड़ती है, उतनी ही मेहनत भाषा सीखने में भी लग जाती है। भाषा में पकड़ के बिना किसी भी विषय में गहराई से प्रवेश कर पाना कठिन होता है। इस पुस्तक में भाषा के प्रश्न पर व्यापकता से विचार किया गया है। पुस्तक में कहा गया है कि चूंकि सीखना बच्चे के दिमाग में ही घटित होता है, इसलिए बच्चों को उसी भाषा में शिक्षा दी जानी चाहिए जो उनकी अपनी हो। क्योंकि सीखना और भाषा दोनों मस्तिष्क की जुड़वाँ और अंतरंग प्रक्रियाएँ हैं। यह बड़ी महत्वपूर्ण बात कही गई है कि मातृभाषा के अलावा अन्य भाषा को भी शिक्षा का माध्यम बनाया जा सकता है, किंतु गणित, विज्ञान जैसे मात्रात्मक और तथ्यात्मक विषयों में; तथा समाज विज्ञान, संस्कृति, भावात्मक और कलात्मक अभिव्यक्तियों में अपनी मातृभाषा में ही स्वाभाविकता संभव है। क्योंकि मातृभाषा मस्तिष्क से सूचनात्मक के साथ-साथ संवेगात्मक रूप में भी विकसित हुई होती है। यह कहना भी बिल्कुल सही है कि हम युवकों को जैसे-तैसे दूसरी भाषा सिखाकर कुछ युवकों को अपवादस्वरूप अच्छे पैकेज वाला जॉब तो दिला सकते हैं, किंतु उन्हें दूसरी भाषा में स्वतंत्र और विचारशील बनाना मुश्किल है। विचार की स्वप्नशीलता और सर्जनात्मकता अपनी मातृभाषा में अधिक सहजता से विकसित होती है, क्योंकि वहाँ विचार और अभिव्यक्ति का द्वैध नहीं होता— दोनों एकमेक                  होते हैं।

    (7)

    शिक्षा में पाठ्यक्रम की भूमिका अत्यंत केंद्रीय है। यह शिक्षा की दिशा और गति दोनों तय करता है। यदि पाठ्यक्रम विविधतापूर्ण, लचीला और सर्जनात्‍मक हो तो बच्चों के अंदर सृजनशीलता और मौलिक चिंतन का विकास स्वाभाविक रूप से होता है।

    अध्याय 7 में पाठ्यक्रम पर की गई चर्चा मुझे बेहद प्रभावित करने वाली रही। इस अध्याय में केवल यह नहीं बताया गया है कि पाठ्यक्रम कैसा होना चाहिए, बल्कि यह भी गहराई से समझाया गया है कि ऐसा क्यों होना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण और नवीन विचार जो मुझे सबसे अधिक छू गया, वह यह है कि विद्यार्थियों को भी पाठ्यक्रम निर्माण में शामिल किया जाना चाहिए। यह बात पहले के अधिकांश शिक्षा दस्तावेजों में स्पष्ट रूप से नहीं मिलती। विद्यार्थी यदि पाठ्यक्रम में 10% परिवर्तन या संशोधन भी कर सके तो वह उसे अपना समझेगा, उसकी जिम्मेदारी बढ़ेगी और सीखने की प्रक्रिया अधिक अर्थपूर्ण हो जाएगी।पाठ्यक्रम विद्यार्थी और समाज की वर्तमान तथा भविष्य की आवश्यकताओं को केंद्र में रखकर तैयार होना चाहिए। इसमें विद्यार्थी की रुचि, क्षमता, गति, ज्ञानात्मक, भावात्मक और आत्मिक विकास को समान महत्त्व मिलना चाहिए। इसे क्षमता-केंद्रित, बहुआयामी और विकेंद्रीकृत बनाना चाहिए। शिक्षक, विद्यार्थी, अभिभावक, उद्योग विशेषज्ञ और समाज के अन्य हितधारकों की सक्रिय सहभागिता से पाठ्यक्रम तैयार किया जाए।यह अध्याय साफ-साफ कहता है कि शिक्षा का उद्देश्य छात्र को मशीनी नहीं, बल्कि संवेदनशील, विवेकशील और नैतिक मनुष्य बनाना है। पाठ्यक्रम प्रतियोगिता के चंगुल से मुक्त होकर क्षमता और स्वतंत्रता को प्राथमिकता दे। प्रत्येक विद्यार्थी किसी खास पाठ्यक्रम में फिट होने के लिए नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी अपने स्वभाव के अनुसार जीने के लिए पैदा होता है।साहित्य को हर विषय और हर स्तर पर अनिवार्य रूप से शामिल करने का सुझाव भी अत्यंत मूल्यवान है। ऐसा साहित्य जो मानवीय मूल्यों को प्रोत्साहित करे, कुरीतियों को उजागर करे और संवेदनाओं का विस्तार करे पाठ्‌यक्रम का अंग होना चाहिए। साथ ही प्रकृति के साथ सामंजस्य, शारीरिक श्रम, शोध की प्रवृत्ति, विश्लेषण-संश्लेषण की क्षमता और नैतिकता का तार्किक विकास भी पाठ्यक्रम का अनिवार्य अंग होना चाहिए।कुल मिलाकर यह अध्याय पाठ्यक्रम निर्माण से जुड़ी हर संस्था और हर व्यक्ति को अवश्य पढ़ना चाहिए। इसमें न केवल दृष्टि है, बल्कि एक गहरी समझदारी और मानवीय संवेदना भी है।

    (8)

    चाहे स्कूलों में भौतिक और मानवीय संसाधन कितने भी पर्याप्त हों, पाठ्यक्रम कितना ही बेहतरीन, समावेशी और सर्जनात्‍मक क्यों न हो, यदि उसे बच्चों तक पहुँचाने के लिए आनंददायी, रोचक और प्रभावशाली शिक्षण-पद्धति अपनाई न जाए तो सारा प्रयास व्यर्थ साबित होगा। इसलिए लेखक द्वय मानते हैं कि  शिक्षण-पद्धति शिक्षा का मेरुदंड है।  इस अध्याय में वे मौजूदा शिक्षण-व्यवस्था की रूढ़िगत, यांत्रिक, शिक्षक-केंद्रित और एकतरफा पद्धति की आलोचना करते हुए विद्यार्थी-केंद्रित, सीखने को प्रोत्साहित करने वाली और यथास्थिति को तोड़ने वाली शिक्षण पद्धति की पुरजोर वकालत करते हैं। उन्होंने विद्यार्थियों की क्षमताओं के सर्वांगीण विकास के लिए छह प्रमुख शर्तें रखी हैं, जिनमें विद्यालयों में शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात 30 से अधिक न होना, उच्च शिक्षा में 50 से अधिक न होना, शिक्षक को पाठ्यक्रम संशोधन और परीक्षा लेने की स्वायत्तता, विद्यार्थियों की बौद्धिक-भावनात्मक क्षमताओं के अनुरूप शिक्षकों का प्रशिक्षण, शिक्षकों की अपनी बौद्धिक क्षमता एवं सर्जनात्‍मकता का निरंतर विकास, शोधपूर्ण एवं आत्म-निर्देशित प्रशिक्षण, पूरे शैक्षिक वातावरण को विद्यार्थी-केंद्रित एवं सर्जनात्‍मक बनाना, अभिभावकों का प्रशिक्षण तथा सरकार का पूर्ण सहयोग शामिल हैं। उन का मानना है कि इन सभी शर्तों के पूरे होने पर ही सच्ची सर्जनात्‍मक शिक्षा संभव हो सकती है।

    सबसे सुंदर और गहन बात यह है कि लेखक शिक्षक-विद्यार्थी संबंध को मात्र औपचारिक शैक्षणिक संबंध नहीं, बल्कि भावपूर्ण और मानवीय संबंध मानते हैं। इसके लिए शिक्षक को विद्यार्थी की रुचियों, समस्याओं, विशेष योग्यताओं, उपलब्धियों और बड़े सपनों से गहराई से जुड़ना चाहिए। शिक्षक को विद्यार्थी के व्यक्तित्व को समझकर उसके साथ एक संवेदनशील और प्रेमपूर्ण संबंध स्थापित करना चाहिए, ताकि विद्यार्थी खुलकर अपनी क्षमताओं का विकास कर सके। यह सुझाव अच्छा है कि विद्यार्थी की रुचि, वृत्ति और क्षमताओं का पूरा ध्यान रखते हुए शिक्षण किया जाना चाहिए, पर मौजूदा शिक्षा व्यवस्था और स्कूल ढाँचे में क्या यह संभव है ?  क्या एक ऐसा शिक्षक,जो तमाम तरह के दबावों के बीच करता है, एक समय में कक्षा के सभी बच्चों के लिए अलग-अलग रणनीति बना सकता है? अलग-अलग तरीके अपना सकता है? यह कितना व्यावहारिक है?

    इस अध्याय में समूह गतिविधियों पर विशेष जोर दिया गया है । उन्होंने सुझाव दिया है कि शिक्षण-पद्धति में कभी छोटे समूहों में, कभी पूरी कक्षा के साथ, कभी विभिन्न कक्षाओं को मिलाकर और कभी पूरे संस्थान के सभी विद्यार्थियों के साथ सामूहिक एवं सहभागी गतिविधियाँ आयोजित की जानी चाहिए। इन गतिविधियों से विद्यार्थियों का संकोच और अकेलापन टूटता है; सहभागिता, सहकारिता, सकारात्मक आत्मविश्वास और सहिष्णुता की प्रवृत्ति विकसित होती है। विद्यार्थी दूसरों की भिन्नता और समानता दोनों को समझते हैं तथा सम्मान के साथ स्वतंत्रता और संयम का महत्त्व सीखते हैं। इस अध्याय में सर्जनात्‍मकता की व्याख्या बहुत सार्थक और गहन है। लेखक कहते हैं कि सर्जनात्‍मकता हर मनुष्य में जन्मजात होती है, जो उसके सोचने, बोलने और काम करने में निरंतर प्रकट होती रहती है। सच्ची सर्जनात्‍मकता वे नए विचार हैं जो व्यक्ति, समाज, जीव-जगत्‌ और समूची दुनिया के कल्याण के लिए समर्पित हो। चोरी, तस्करी, हिंसा, शोषण, अत्यधिक मुनाफाखोरी आदि को सर्जनात्‍मकता की श्रेणी में शामिल नहीं किया जा सकता। सर्जनात्‍मकता कल्पना की उड़ान की अपेक्षा करती है, किंतु वह यथार्थ की डोर को हाथ में थामे रहती है। यह तथ्यों और तर्क की विरोधी नहीं, बल्कि उनका कल्याणकारी विस्तार है।

    इस अध्याय में होमवर्क की वर्तमान प्रणाली की तीखी आलोचना की गई है। लेखक इसे सर्जनात्‍मक और चंचल स्वभाव वाले बच्चों के लिए बड़ी सजा मानते हैं। उन्होंने कहा है कि बार-बार एक ही बात लिखने या रटने वाला होमवर्क विद्यार्थियों में कुंठा, विरक्ति और पलायन की भावना पैदा करता है। इसलिए अभ्यास कार्य विद्यार्थी की रुचि, गति और क्षमता के अनुरूप, अर्थपूर्ण और रुचिकर होना चाहिए। समूह कार्यों को अधिक स्थान दिया जाए तथा प्रतिदिन चिंतन और सहभागिता के लिए समय निर्धारित किया जाए।लेखक का जोर है कि शिक्षक कम बोलें, विद्यार्थियों को अधिक सोचने, निर्णय लेने, नेतृत्व करने और स्वयं खोजने का अवसर दें। कलाओं को शिक्षा में उचित स्थान मिलना चाहिए क्योंकि उनसे संवेदनशीलता का विकास होता है। शिक्षक विद्यार्थियों को नाम से जानें, उनकी छोटी-छोटी उपलब्धियों की प्रशंसा करें और कक्षा में सहयोगात्मक, ईर्ष्या-रहित वातावरण विकसित करें। मूल्यांकन भी सर्जनात्‍मक और सहभागी आधार पर होना चाहिए।निष्कर्ष में, यह अध्याय शिक्षण को मात्र ज्ञान-हस्तांतरण नहीं, बल्कि मानव-निर्माण, चरित्र-निर्माण और विचारशीलता के विकास का माध्यम मानता है। लेखक का स्पष्ट संदेश है कि शिक्षा का अंतिम उद्देश्य पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं, बल्कि संवेदनशील, सर्जनात्‍मक, विचारशील, नैतिक और मानवीय मूल्यों से युक्त व्यक्तित्व का विकास करना है। अत्यंत प्रासंगिक, गहन और प्रेरणादायक अध्याय है, जो वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन की माँग करता है।

    (9)

    इस पुस्तक का नया अध्याय ‘मूल्यांकन’ अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रासंगिक है। लेखक ने स्पष्ट रूप से दर्शाया है कि शिक्षा-प्रणाली में मूल्यांकन की भूमिका कितनी निर्णायक होती है। जैसा मूल्यांकन, वैसा ही शिक्षण। आज शिक्षा पूरी तरह परीक्षा-केंद्रित हो गई है, जिसके कारण बच्चे केवल परीक्षा पास करने की तैयारी करते हैं, सच्चा सीखना तो कहीं खो ही गया है।मुझे सबसे अधिक सहमति इस बात से है कि मूल्यांकन विद्यार्थी की निहित क्षमताओं को पोषित करने वाला, सर्जनात्मकता को प्रोत्साहित करने वाला और आनंददायक होना चाहिए। यह केवल ज्ञान की जाँच नहीं, बल्कि जीवन-कौशल, मूल्य-धर्मिता, आत्म-चिंतन और समग्र विकास को बढ़ावा देने वाला होना चाहिए। वर्तमान मूल्यांकन प्रणाली सीखने को नष्ट करती है, प्रतिस्पर्धा को बढ़ाती है और सर्जनात्मकता की उपेक्षा करती है। इसलिए हमें पारदर्शी, ईमानदार और अधिगम-केंद्रित मूल्यांकन की ओर बढ़ना होगा।आत्म-मूल्यांकन, सतत एवं व्यापक मूल्यांकन, क्षमता-केंद्रित मूल्यांकन तथा समग्र मूल्यांकन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। होमवर्क भी रट्टा मारने वाला नहीं, बल्कि चिंतन और सृजन को बढ़ावा देने वाला होना चाहिए।सबसे सुंदर बात पुस्तक के अंत में कही गई है — जब जीवन-दृष्टि बदलेगी, तभी शिक्षा-दृष्टि बदलेगी और उसके साथ मूल्यांकन की दृष्टि भी। मूल्यांकन भयमुक्त, आनंदात्मक और आत्म-निर्माण का माध्यम बने, न कि केवल अंक प्राप्त करने का औजार।इस अध्याय को पढ़कर लगता है कि यदि हम मूल्यांकन की इस नई सोच को अपनाने में सफल हो गए, तो शिक्षा न केवल नौकरी दिलाने का साधन बनेगी, बल्कि सच्चे मानवीय विकास और सर्जनात्मकता का पर्याय बन जाएगी। यह बदलाव शिक्षा तक सीमित नहीं रहेगा, पूरे समाज को प्रभावित करेगा।अत्यंत विचारणीय और आवश्यक अध्याय।

    (10)

    पुस्तक का दसवाँ अध्याय ‘शिक्षा प्रबंधन’ पर केंद्रित है। लेखक प्रबंधन को शिक्षा क्रांति का सबसे महत्त्वपूर्ण और प्रथम अभिकर्ता मानते हैं। उनका मानना है कि शिक्षालय मानव संस्कृति की कार्यशालाएँ हैं, जहाँ नई ज्ञान, तकनीक और कौशल का शोध व निर्माण होता है तथा प्रतिवर्ष नई पीढ़ी को तैयार करके समाज में नव-निर्माण के लिए भेजा जाता है।शिक्षा प्रबंधन विद्यार्थी, शिक्षक, संचालक और अभिभावकों के समर्पण पर आधारित होना चाहिए। प्रबंधन पारदर्शी, सहभागी, विद्यार्थी-केंद्रित, सर्जनात्‍मक और सामाजिक परिवर्तन के प्रति समर्पित होना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण भूमिका शिक्षक की है। शिक्षक को अभिनेता नहीं, बल्कि निर्देशक बनना चाहिए। वह डिग्री और डेटा देने वाला नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माता और सर्जनात्‍मकता जगाने वाला होना चाहिए। शिक्षक को विद्यार्थियों के साथ औपचारिक संबंध की जगह संवेदनशील संबंध स्थापित करना चाहिए। शिक्षक स्वयं सर्जनशील, जुनूनी और सतत सीखने वाला हो, तभी सर्जनात्‍मक शिक्षा संभव है।पुस्तक चैतन्य विद्यार्थी के गुणों का भी सुंदर वर्णन करती है — आत्मबोध, स्व-अनुशासन, सकारात्मक दृष्टि, सहभागिता, परख, सर्जनात्‍मकता, सुधार की भावना, मूल्य-धर्मिता और हितकारी स्वभाव।अभिभावकों को ‘प्रथम और सतत शिक्षक’ कहा गया है। उनकी जीवनशैली, व्यवहार, खान-पान, सामाजिक आचरण और मातृभाषा बच्चे के विकास पर गहरा प्रभाव डालते हैं। नैतिक मूल्य, त्याग, धैर्य, सत्यभाषण और भावनात्मक नियंत्रण मुख्य रूप से माता-पिता से ही आते हैं।मेरी राय में इस अध्याय की सबसे प्रासंगिक बात यह है कि आज केवल शिक्षकों के प्रशिक्षण की नहीं, बल्कि अभिभावकों के प्रशिक्षण की भी उतनी ही आवश्यकता है। आज माता-पिता बच्चों को आगे बढ़ते देखना चाहते हैं, लेकिन उनके पास समय की कमी है। समय होने पर भी वे बच्चों से प्रभावी संवाद करने में असमर्थ रहते हैं। जब तक अभिभावक बाल मनोविज्ञान, समाज और शिक्षा की सही समझ नहीं रखेंगे, तब तक बच्चों का समुचित मानसिक-बौद्धिक विकास करना बहुत कठिन है।लेखक ने इंटरनेट के अत्यधिक उपयोग से उत्पन्न चुनौतियों का भी जिक्र किया है और अभिभावकों को सुझाव दिया है कि वे बच्चों के साथ अधिक समय बिताएँ, अच्छी दोस्ती, साहित्य, फिल्में, पर्यटन और सर्जनात्‍मक गतिविधियों को प्रोत्साहित करें।यह अध्याय प्रबंधकों, शिक्षकों और अभिभावकों तीनों के लिए बहुत उपयोगी है। यह उन्हें नई दृष्टि देता है।कुल मिलाकर यह अध्याय शिक्षा को मात्र डिग्री देने वाली प्रक्रिया नहीं, बल्कि चरित्र-निर्माण, सर्जनात्‍मकता और समाज-निर्माण की प्रक्रिया मानता है। यह बहुत ही गहन, विचारणीय और आज के समय के लिए अत्यंत प्रासंगिक अध्याय है।

    (11)

    पुस्तक का 11वाँ अध्याय संवेदनशीलता को लेकर विस्तृत चर्चा करता है। इस अध्याय में संवेदनशीलता की आवश्यकता तथा सर्जनात्‍मकता के साथ उसके गहरे अंतर्संबंधों पर बहुत गहराई से प्रकाश डाला गया है। साथ ही इसका सूक्ष्म विश्लेषण भी प्रस्तुत किया गया है।यह बात बिल्कुल सही है कि शिक्षा का तब तक कोई वास्तविक महत्व नहीं है, जब तक वह मनुष्य की संवेदनशीलता का विस्तार नहीं करती। यदि शिक्षा में संवेदना नहीं है तो ऐसे शिक्षित व्यक्ति शिक्षित नौकर या रोबोट से ज्यादा कुछ नहीं होते। आज के दौर का एक बड़ा संकट यही है कि हमारे देश में या हमारे चारों ओर ऐसे तमाम लोग मिल जाएँगे जो जानकारी, सूचनाओं या ज्ञान के मामले में बहुत प्रतिभावान हैं, किंतु उनके भीतर संवेदनशीलता नहीं दिखाई देती। एक दक्ष डॉक्टर या कुशल इंजीनियर तो आसानी से मिल जाएगा, लेकिन एक संवेदनशील डॉक्टर या संवेदनशील इंजीनियर मिलना बहुत कठिन है। जबकि वास्तव में जरूरत संवेदनशील लोगों की ही है। एक संवेदनशील व्यक्ति ही वास्तव में अच्छा इंसान हो सकता है। आज इस दुनिया को संवेदनशील लोगों की अत्यधिक आवश्यकता है। सर्जनात्‍मकता यदि संवेदना से लैस न हो तो ऐसी सर्जनात्‍मकता भी एक तरह से कागज के फूलों जैसी हो जाती है। संवेदना ही उसकी खुशबू है। शिक्षा हो या साहित्य, सबका मूल काम मनुष्य की संवेदनशीलता या संवेदनाओं का विस्तार करना ही है। इन तमाम बातों पर इस अध्याय में बहुत अच्छी, गहरी और सार्थक चर्चा मिलती है। पुस्तक में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि मानवता के संतुलित विकास के लिए अब हमें संपूर्ण समाज की संवेदना को और सर्जनात्‍मक शिक्षा के माध्यम से प्रत्येक विद्यार्थी की संवेदना तथा मूल्यबोध को मजबूत करने की जरूरत है। संवेदना का विकास करने से आशय है — सभी अच्छी प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन देना, दुष्ट प्रवृत्तियों पर नियंत्रण रखना, सहभागिता का विकास करना, सर्जनात्‍मकता का विकास करना और मूल्य-धर्मिता का विकास करना। इन सभी तत्त्वों के समन्वय से संवेदना बनती है। जब तक विवेक द्वारा नकारात्मक प्रवृत्तियों (दुश्मनों) पर नियंत्रण नहीं लगाया जा सकता, तब तक सच्चे अर्थों में संवेदनशील होना काफी कठिन है। संवेदना के विकास में परिवार की भूमिका सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण होती है। यह बात बिल्कुल सही है क्योंकि एक बच्चा सबसे अधिक समय अपने परिवार के साथ ही व्यतीत करता है। अध्याय में यह भी बहुत महत्वपूर्ण बात कही गई है कि संवेदना का अभाव इस दुनिया का सबसे बड़ा घाटा ही नहीं, बल्कि सबसे बड़ा रोग भी है। यह मानवता की सबसे बड़ी विडंबना भी है। विवेक संवेदना-युक्त ज्ञान है, जबकि मूल्य आधारित ज्ञान है। संवेदना मूलतः मूल्य है तथा मूल्य मूलतः संवेदना है। यहाँ मुझे हिंदी के प्रतिष्ठित कवि मुक्तिबोध की वह महत्त्वपूर्ण बात याद आती है जिसमें वे ‘संवेदनात्मक ज्ञान’ और ‘ज्ञानात्मक संवेदना’ की चर्चा करते हैं। वे मानते हैं कि ज्ञान संवेदना पैदा करने वाला होना चाहिए और संवेदना ज्ञान-युक्त होनी चाहिए। अर्थात् विवेकपूर्ण संवेदना अत्यंत आवश्यक है। भावुकता से निकली संवेदना सही नहीं हो सकती, इसलिए संवेदना को भी ज्ञान-युक्त होना बहुत जरूरी है। मुक्तिबोध का मानना है कि केवल संवेदना से रचना भावुकता तक सीमित रह जाती है, जबकि केवल ज्ञान से वह सूखी और निर्जीव हो जाती है। दोनों का समन्वय ही मार्मिक और सार्थक साहित्य-सृजन संभव बनाता है। यह बात भले ही मुक्तिबोध ने साहित्य के संदर्भ में कही हो, लेकिन शिक्षा के संदर्भ में भी यह पूरी तरह सटीक बैठती है। यदि रचना की जगह शिक्षा रख दी जाए तो भी यह उतनी ही प्रासंगिक है। संवेदना के अभाव में हम मानवता को न केवल आगे और ऊँचा नहीं ले जा पाएँगे, बल्कि उसे बार-बार लहूलुहान भी करते रहेंगे। हमने ज्ञान-विज्ञान द्वारा मजबूत घर तो बना लिए हैं, लेकिन ऐसे हथियार भी बना लिए हैं जो इन मजबूत घरों को एक क्षण में स्वाहा कर सकते हैं। विचार करने की बात यह है कि संवेदना और विवेक के अभाव में हम अपनी मजबूती में अधिक असुरक्षित हो गए हैं।

    सर्जनात्‍मकता लोगों के गर्भ में पलती है, लोगों के हाथों में पलती है, लोगों द्वारा पोषित, संवर्धित, सम्मानित और पुनः सृष्ट होती रहती है। इसलिए वह शिक्षा भी लोक-कल्याण और सुख-आनंद दोनों की पक्षधर होती है, जो व्यक्ति की और समाज की सर्जनशीलता का पोषण और पुनःसृजन करती है। यह भी एकदम सही कहा गया है कि सृजनशीलता अपने मूल रूप में व्यक्तिगत रचनाओं में व्यक्त होती है, लेकिन वह एक से लेकर सैंकड़ों, हजारों, लाखों लोगों की सामूहिक सृजनशीलता और सहभागिता का भी परिणाम होती है। यह बात निश्चित रूप से बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि व्यक्ति अकेले अपने बल पर नहीं बनता। उसके पीछे उसका परिवेश, उन तमाम लोगों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सहयोग या प्रभाव रहता है जिनके संपर्क में वह आता है। उतना ही नहीं, बल्कि उसकी परंपरा और संस्कृति का भी उसके बनने में गहरा योगदान होता है। इसलिए सर्जनात्‍मकता व्यक्तिगत होते हुए भी कहीं न कहीं सामूहिक है।

    शिक्षा द्वारा संवेदना का विकास तभी हो सकता है जब शिक्षक और बच्चे के बीच आत्मीय संबंध स्थापित हो। इसी बात को महसूस करते हुए इस अध्याय में लिखा गया है कि ऑनलाइन शिक्षा से कौशल विकास तो कमजोर होगा ही, किंतु ज्ञानात्मक और विशेष रूप से भावनात्मक विकास का बड़ा भारी संकट उपस्थित हो जाएगा। ऑनलाइन संप्रेषण से पूरी दुनिया की बाहरी सामाजिकता बढ़ती हुई नजर आ रही है, जो सोशल मीडिया के द्वारा काफी हद तक हो भी रहा है, किंतु दूसरी ओर भावात्मक सामाजिकता क्षीण होती जा रही है, और आगे भी होती जाएगी। इस प्रकार इस तकनीक से एक नया भावात्मक-सांस्कृतिक संकट उपस्थित हो गया है, जिसका उत्तर दुनिया की शिक्षा व्यवस्था को हर हाल में और यथाशीघ्र तलाशना होगा। पूरी दुनिया में मूल्यबोध की भारी कमी नजर आ रही है, जिसे सर्जनात्‍मक शिक्षा को ही संभालना होगा।

    यह सही रेखांकित किया गया है कि राजनीति और व्यापार ने मनुष्य को जिस तरह अलग-अलग खेमों में बाँट दिया है और उसे एक-दूसरे का विरोधी बल्कि शत्रु के रूप में प्रस्तुत कर दिया है, उसे केवल संवेदना-केंद्रित और संवेदना-युक्त शिक्षा ही जोड़ सकती है और ‘वसुधैव कुटुंबकम्‌’ में बदल सकती है।

    अंतिम अध्याय में भी बहुत रोचक चर्चा है कि व्यक्ति की अस्मिता उसकी अपनी सृजनशीलता में ही तो है। इसलिए उसे विकसित करना, उससे आनंदित होना और उसका सम्मान करना उसका अपना मानवीय अधिकार है। हमारे परिवार, हमारे शिक्षक, हमारे विद्यालय और विश्वविद्यालय हर विद्यार्थी की सर्जनात्‍मक क्षमताओं के विकास के अधिकारों की रक्षा करें और उनका सम्मान करें। वह इस दुनिया में किसी का अनुगामी बनने के लिए पैदा नहीं हुआ है। उसकी पैदाइश स्वतंत्र चेतना के साथ विश्व के ज्ञान, विज्ञान, समाज और संवेदना को ग्रहण करते हुए एक बेहतर मानवता का निर्माण करने के लिए इस धरती पर हुई है, और वह उसमें पूर्णतः सक्षम है। केवल कुछ देवता, देवदूत या ईश्वर के अवतार नहीं हैं, बल्कि प्रत्येक मनुष्य अपने-आप में एक अवतार है। वह आत्मोद्धार करने के लिए ही पैदा हुआ है और उसका आत्मोद्धार ही संपूर्ण मानवता का उद्धार है। यही समावेशी उद्धार है। आधुनिक शब्दावली में यही समावेशी विकास है। सर्जनात्‍मक प्रयत्न आनंदात्मक ही होते हैं। अपनी ओर से कुछ रचना करना, अपने प्रिय प्रश्नों से कुछ नया बनाना, इस दुनिया को अपने योगदान से बेहतर बनाना— यह हमें आनंद ही देगा। हमें सकारात्मक और सर्जनात्‍मक जीवन-दृष्टि अपनाकर प्रत्येक व्यक्ति को अपनी सृजनशीलता विकसित करने की स्वतंत्रता देनी चाहिए, उसके लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराना चाहिए और एक नई सामाजिक, राजनीतिक एवं शैक्षिक व्यवस्था बनानी चाहिए ताकि प्रत्येक मनुष्य अपनी सृजनशीलता के फूल की खुशबू सूँघ सके और उसके अमृत का पान कर सके।इस प्रकार यह पुस्तक शिक्षा में बदलाव की नहीं, बल्कि बदलाव के लिए शिक्षा की बात करती है। यह बदलाव सर्जनात्‍मक शिक्षा के माध्यम से ही संभव है। इस दिशा में सभी को मिलकर काम करने की आवश्यकता है। इसी के द्वारा हम एक सुंदर, शांतिपूर्ण और अहिंसक समाज तथा विश्व का निर्माण कर सकते हैं।

    (12)

    अंत में, सार रूप में कहना चाहूँगा कि यह पुस्तक शिक्षा के हर पहलू पर गहन, शोधपरक और समग्र चर्चा करती है। लेखक द्वय का पूरा जोर सर्जनात्‍मक शिक्षा पर है। वे मानते हैं कि सृजनशीलता ही वह कुंजी है, जो शिक्षा और समाज की जटिल समस्याओं के तालों को खोल सकती है।पुस्तक केवल सैद्धांतिक नहीं है, बल्कि व्यावहारिक भी है। इसमें शिक्षक, अभिभावक और समाज के लिए उपयोगी सुझाव दिए गए हैं। ज्ञानात्मक विकास के साथ-साथ भावात्मक और मूल्य-परक विकास पर भी बराबर बल दिया गया है। पुस्तक का परम लक्ष्य स्पष्ट है — अच्छे इंसान का निर्माण और एक अहिंसक, शांतिपूर्ण, सहयोगी तथा संवेदनशील समाज की रचना।लेखक द्वय शिक्षा की मौजूदा समस्याओं — बाजार का प्रभाव, परीक्षा पद्धति, ज्ञान-केंद्रित तंत्र, ऑनलाइन शिक्षा की सीमाएँ, परिवारों का बिगड़ता माहौल और राजनीतिक हस्तक्षेप — को बड़ी बेबाकी और तार्किकता से उठाते हैं। वे कहते हैं कि शिक्षा की जिम्मेदारी केवल स्कूल या शिक्षक की नहीं, बल्कि अभिभावक, परिवार, संस्थान और सरकार की संयुक्त जिम्मेदारी है।

    सबसे महत्वपूर्ण और शानदार बात यह है कि लेखक सृजनशीलता को हर बच्चे का जन्मजात अधिकार मानते हैं। वे हर बच्चे की विशिष्टता को सम्मान देते हैं और शिक्षा को सूचनाओं का बोझ बनाने के बजाय जिज्ञासा, रुचि और क्षमता के अनुसार विकसित करने का पक्ष लेते हैं। दार्शनिक रूप से वे बुद्ध के ‘आप्पो दीपो भव’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्‌’ की भावना को अपनाते हैं। उनका मानना है कि सर्जनात्‍मकता में ही आनंद है, और मनुष्य से इसे छीनकर उसका आनंद भी छीन लिया गया है।

    कुल मिलाकर यह पुस्तक शिक्षा को मात्र डिग्री और नौकरी का साधन मानने वाली सोच से ऊपर उठकर उसे मानवीय विकास और सृजनशील आनंद का माध्यम बनाने का सुंदर आह्वान है।जो भी शिक्षा, समाज और बेहतर भविष्य में विश्वास रखता है, उसको यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए।

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    सर्जनात्‍मक शिक्षा

                                                                  लेखकः डॉ. राघव प्रकाश

                                                                      डॉ. सविता पाईवाल

                                                                समीक्षकः महेश चंद्र पुनेठा

                                                        प्रकाशकः राजकमल प्रकाशन, दिल्ली

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