
हाल में ही रामचंद्र गुहा द्वारा राहुल गांधी पर लिखे एक लेख की बहुत चर्चा है। ऐसे में इस लेख की याद आई जो तक़रीबन तीन साल पहले प्रसिद्ध इतिहासकार, दास्तानगो महमूद फ़ारूक़ी ने लिखा था। राहुल गांधी पर लिखा एक बेहद संतुलित लेख। अंग्रेज़ी ने लिखे उस लेख का हिन्दी अनुवाद पढ़िए। अनुवाद मैंने किया है- प्रभात रंजन
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राहुल गांधी अगर राहुल गांधी न होते!
एक गुमनाम पर्यवेक्षक द्वारा
[टिप्पणी: यह लेख दिसंबर 2023 के विधानसभा चुनाव परिणाम आने से पहले लिखा गया था। अपने विषय के अनुरूप लेखक का मानना है कि चुनावी नतीजे अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं, मगर राजनीति का खेल उनसे आगे भी जारी रहता है।]
राहुल गांधी की मुश्किल यही है कि वे राहुल गांधी हैं। वे भारतीय राजनीति में एक ऐसी महत्वपूर्ण जगह घेरे हुए हैं, जो उनके हिस्से की नहीं है। उन्हें या तो तुरंत वह जगह किसी और के लिए खाली कर देनी चाहिए, या फिर स्वयं किसी और में बदल जाना चाहिए। भारत के प्रमुख विपक्षी नेता के प्रति निराश भारतीय उदारवादियों का एक बड़ा वर्ग लगभग इसी सोच को व्यक्त करता है। उनका मानना है कि भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी समस्या राहुल गांधी हैं, क्योंकि वे किसी “वास्तविक” विपक्षी नेता के उभरने में बाधा बने हुए हैं- जो पता नहीं शायद कहीं शून्य से प्रकट हो जाए। समस्या यह है कि वे लोग भी ठीक-ठीक नहीं बता पाते कि राहुल गांधी को कैसा होना चाहिए। आखिर यह समझना आसान नहीं है कि आज के भारत में लोगों को ऐसा क्या पसंद आएगा, जो वर्तमान महान नेता से अलग हो। मसलन, क्या होता यदि वे जवाहरलाल नेहरू जैसे होते- सुसंस्कृत, शहरी, प्रभावशाली वक्ता, आकर्षक व्यक्तित्व वाले, अभिजात्य लेकिन जनता से जुड़ाव रखने वाले? आह, यदि उनमें वह गरिमा और वह स्तर होता! लेकिन ठहरिए, आज के भारत में नेहरू शायद सबसे अधिक नापसंद किए जाने वाले व्यक्तियों में गिने जाते हैं। इसलिए यह उपाय भी शायद काम नहीं करता। तो क्या वे महात्मा गांधी जैसे होते- अधिक फकीराना, अधिक संन्यासी, अधिक चतुर और दूरदर्शी; ऐसे व्यक्ति जो गरीबी में रहकर भी बिना किसी पद या पुरस्कार की इच्छा के एक राजनीतिक दल खड़ा कर सके? लेकिन ठहरिए, आज के भारत में गांधी भी नेहरू के बाद शायद सबसे अधिक अस्वीकृति और विरोध झेलने वाले व्यक्तित्व हैं। इसलिए यह रास्ता भी नहीं चलेगा, विशेष रूप से हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए गांधी के निरंतर प्रयासों को देखते हुए। अच्छा, तो क्या वे सुभाषचंद्र बोस जैसे होते- साहसी योद्धा, दमदार सेनानी, सैन्य शक्ति के प्रतीक? हाँ, भारतीयों को इस तरह की अधपकी मर्दानगी काफी आकर्षित करती है। लेकिन रुकिए, बोस के साथ भी एक ‘मुस्लिम प्रसंग’ जुड़ा हुआ था- उनकी सेना में बहुत से मुस्लिम अधिकारी थे, बहुत से उर्दू गीत थे। इसलिए यह भी नहीं चलेगा। आखिर सब जानते हैं कि आज के भारत में कोई भी व्यक्ति, जिसकी पहचान या राजनीति में मुसलमानों के प्रति कोई सकारात्मक झुकाव दिखाई दे, राष्ट्रीय स्तर पर सफल नहीं हो सकता। तो फिर राहुल गांधी को क्या होना चाहिए? वे क्या बनें कि ऐसे प्रधानमंत्री को चुनौती दे सकें, जो अब भी बेहद लोकप्रिय हैं; जिनके पास चुनावी मशीनरी के रूप में सरकार है, लगभग पूरा बड़ा मीडिया है, बड़े उद्योगपति हैं, सोशल मीडिया मंच हैं, और हजारों-लाखों करोड़ रुपये की शक्ति है? एक ऐसे तर्क में, जो अपने ही प्रकार की पुनरुक्ति के कारण प्रशंसनीय कहा जा सकता है, अनेक उदारवादी मानते हैं कि मोदी को कोई बेहतर व्यक्ति ही हरा सकता है। लेकिन वह बेहतर व्यक्ति इसलिए सामने नहीं आ रहा, क्योंकि राहुल गांधी उसे आने नहीं दे रहे हैं!
काश राहुल गांधी थोड़े अधिक त्यागी होते! उनके अनेक आलोचक तो यह चाहेंगे कि राहुल गांधी देश-प्रेम का अपना कथित जुनून छोड़ दें और अमेरिका के किसी शहर में लाइफ़ स्टाइल सलाहकार या सेल्फ हेल्प गुरु बन जाएँ। आखिर उन्हें शारीरिक फिटनेस, संतुलित जीवन, स्वच्छ जीवनशैली और आध्यात्मिकता में इतनी रुचि जो है! मोदी के सत्ता में आने से ठीक पहले भारत के एक अत्यंत प्रतिष्ठित राजनीतिक स्तंभकार ने राहुल गांधी का परिचय देते हुए लिखा था कि वे किसी बड़े कॉर्पोरेट के आदर्श वरिष्ठ अधिकारी जैसे लगते हैं। यह टिप्पणी पूरी तरह व्यंग्यात्मक भी नहीं थी। उनके कुछ हमदर्द आलोचक तो यह भी कहते हैं कि राहुल गांधी को किसी थिंक टैंक से जुड़ जाना चाहिए, क्योंकि वे एक भले, गरीबों के प्रति संवेदनशील और कुछ हद तक गैर-व्यावहारिक आदर्शवादी व्यक्ति दिखाई देते हैं। यदि अन्य शोध संस्थाएँ धन की कमी या सरकारी दबाव के कारण कमजोर पड़ भी गई हों, तो नीति आयोग या विवेकानंद फाउंडेशन जैसे संस्थान तो हैं ही, जहाँ वे और उनके चचेरे भाई वरुण गांधी मिलकर भारत के विकास की सही दिशा पर शांत और संतुलित लेख लिख सकते हैं। लेकिन इसके बजाय वे सार्वजनिक जीवन में बने हुए हैं, जिससे लोगों का ध्यान भटकता है। आलोचकों के अनुसार वे अनावश्यक रूप से सार्वजनिक स्थान घेर रहे हैं और एक कमजोर विकल्प के रूप में उपस्थित होकर मोदी की ही मदद कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें आसानी से पराजित किया जा सकता है। उनकी दृष्टि में राहुल गांधी मोदी के लिए किसी वरदान से कम नहीं हैं, क्योंकि मोदी हमेशा उनसे अधिक बड़े, अधिक शक्तिशाली और अधिक प्रभावशाली दिखाई देते हैं। लेकिन फिर प्रश्न उठता है कि मोदी के विकल्प के रूप में राहुल गांधी को ही क्यों स्वीकार किया जाए? देश में और भी तो कई वरिष्ठ नेता हैं। क्या हम विकल्पों के अभाव से इतना जूझ रहे हैं? और क्या यह भी सच नहीं है कि मुख्यधारा का मीडिया प्रायः उन्हें नजरअंदाज करता है? यदि ऐसा है, तो वे आखिर कौन-सा सार्वजनिक स्थान घेर रहे हैं? सामाजिक माध्यमों पर आने वाली कुछ छोटी-मोटी चर्चाओं को छोड़ दें, या कांग्रेस के संवाददाता सम्मेलनों को, जिन्हें स्वीकार करना होगा कि बहुत कम लोग देखते हैं। फिर वे लोगों को इतना परेशान क्यों करते हैं?
क्योंकि, उनके आलोचकों के अनुसार, राहुल गांधी किसी शशि थरूर, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट, या फिर तेजस्वी यादव जैसे जमीनी नेता, अथवा प्रशांत किशोर जैसे अधिक राजनीतिक कौशल वाले व्यक्ति को आगे आने और नेतृत्व संभालने नहीं दे रहे हैं। उनके अनुसार राहुल गांधी को एक ‘अच्छे लड़के’ की तरह स्वयं पीछे हट जाना चाहिए और उन अधिक योग्य लोगों के लिए जगह छोड़ देनी चाहिए, जो या तो साधारण परिवारों से अपनी योग्यता के बल पर आगे आए हैं, या राजनीति की बारीकियों को उनसे बेहतर समझते हैं। वे लोग अधिक प्रभावशाली वक्ता हैं, उपलब्धियों की चमक रखते हैं, टेलीविजन पर बेहतर दिखाई देते हैं, हिन्दी अधिक अच्छी बोलते हैं और सत्तारूढ़ व्यवस्था के साथ हिंदू धर्म, दर्शन और भारत की अवधारणा जैसे विषयों पर कहीं अधिक प्रभावी ढंग से बहस कर सकते हैं। विशेषकर ऑक्सफोर्ड यूनियन जैसे मंचों पर या उन परिस्थितियों में, जहाँ जटिल जातीय समीकरणों को साधने की आवश्यकता होती है। आलोचकों का आरोप है कि राहुल गांधी आज भी एक नौसिखिया नेता की तरह हैं। उनमें करिश्मा नहीं है, आवाज़ प्रभावशाली नहीं है, विश्वसनीयता कम है, हास्यबोध नहीं है, चतुराई नहीं है और व्यक्तित्व में वह गहराई नहीं है, जो एक बड़े नेता में अपेक्षित होती है। व्यक्तित्व की इन कमियों से आगे बढ़कर उनके चरित्र और कार्यशैली पर भी सवाल उठाए जाते हैं। कहा जाता है कि वे पार्टी कार्यकर्ताओं से जुड़ नहीं पाते, पार्टी के कामकाज में पूरी तरह मन नहीं लगाते, बीच-बीच में गायब हो जाते हैं और फिर अचानक लौट आते हैं। वे पार्टी को ठीक से चला नहीं पाते, लेकिन उसे स्वतंत्र रूप से चलने भी नहीं देते। वे स्वयं नेतृत्व नहीं संभालते, लेकिन वे और उनकी माँ किसी दूसरे व्यक्ति को भी नेतृत्व संभालने नहीं देते। आलोचकों के अनुसार वे जिम्मेदारी के बिना शक्ति का उपयोग करते हैं और कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टी को पर्दे के पीछे से नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं। यह भी कहा जाता है कि उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए खुली और वास्तविक प्रतिस्पर्धा वाले चुनावों को होने नहीं दिया, जबकि ऐसा होने पर कांग्रेस को कुछ विश्वसनीयता मिल सकती थी- भले ही वह विश्वसनीयता केवल छोटे और अभिजात्य बौद्धिक वर्गों तक ही सीमित क्यों न रहती। उनके आलोचक यह भी कहते हैं कि राहुल गांधी वास्तव में पार्टी संगठन के व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि शायद पूर्णकालिक राजनीतिक व्यक्ति भी नहीं हैं। वे महत्वपूर्ण नेताओं को पार्टी में बनाए नहीं रख पाते, लोगों के अहं को संतुष्ट करना नहीं जानते, जीत के लिए आवश्यक राजनीतिक समझौते नहीं करते और अक्सर पहुँच से बाहर रहते हैं। यहाँ तक कि जब वे उपलब्ध भी होते हैं, तब भी शाम के बाद उनसे संपर्क करना कठिन बताया जाता है। आलोचक व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि शायद वे किसी पार्टी में व्यस्त होते हैं, या मार्शल आर्ट का अभ्यास कर रहे होते हैं, या फिर किसी रहस्यमय गोपनीय मंडली की बैठकों में लगे होते हैं। वे सरकार गिराने की रणनीति पर चौबीसों घंटे काम नहीं करते। वे हर समय उपलब्ध नहीं रहते। वे ममता बनर्जी नहीं हैं, अमित शाह नहीं हैं, यहाँ तक कि स्टालिन जैसे नेता भी नहीं हैं। वे न तो जनता के बीच हर समय मौजूद रहने वाले नेता हैं, न संगठन के आदमी हैं, न सरकार चलाने वाले प्रशासक हैं और न ही मीडिया की दुनिया के खिलाड़ी। तो फिर, आलोचकों की दृष्टि में, वे आखिर सबका समय क्यों बर्बाद कर रहे हैं?
कई उदारवादी सचमुच यह मानते हैं कि राहुल गांधी को स्वयं को राजनीतिक रूप से समाप्त कर लेना चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे अनेक मोदी समर्थक भी चाहते हैं। और यदि इसके साथ कांग्रेस पार्टी भी समाप्त हो जाए, तो एक प्रसिद्ध इतिहासकार और पब्लिक इंटेलेक्चुअल के अनुसार, यह भी कोई बुरी बात नहीं होगी। उनका तर्क है कि कांग्रेस की राख से शायद तीस या पचास वर्ष बाद कोई वास्तविक और सशक्त विपक्षी दल जन्म लेगा। तब तक हम प्रतीक्षा कर सकते हैं, ठीक वैसे ही जैसे गरीब लोग आर्थिक विकास के लाभों के नीचे तक पहुँचने का इंतज़ार करते रहते हैं। यदि राहुल गांधी राजनीति से संन्यास ले लें या निर्वासन में चले जाएँ, तो शायद पाँच या दस वर्षों में कोई बेहतर नेता उभर आए। लेकिन आलोचक व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि राहुल गांधी मानो वर्तमान चुनाव नहीं, बल्कि 2036 के आम चुनाव की तैयारी कर रहे हैं। एक ओर वे लोग वर्तमान व्यवस्था को और अधिक समय देने को तैयार दिखाई देते हैं, इस उम्मीद में कि राहुल गांधी के हटते ही कोई मसीहा उभर आएगा, जैसे किसी फिल्म में अचानक रजनीकांत जैसी शख्सियत प्रवेश कर जाए। दूसरी ओर वे चाहते हैं कि मोदी को चुनौती देने वाला कोई बेहतर विकल्प अभी और इसी समय सामने आ जाए। कहा जाता है कि प्रकृति शून्य को पसंद नहीं करती। और चूँकि राजनीति भी किसी अर्थ में एक स्वाभाविक और जैविक प्रक्रिया है, इसलिए वह अंततः कोई न कोई विकल्प अवश्य पैदा करेगी। लेकिन समस्या यह है कि वे न तो यह बता पाते हैं कि वह विकल्प कौन होगा, न यह कि वह कहाँ से आएगा। वे मानो राजनीति को इच्छाओं और कल्पनाओं का खेल समझते हैं, जहाँ किसी वैकल्पिक संभावना या किसी रहस्यमय ‘एक्स फ़ैक्टर’ के सहारे सब कुछ बदल जाएगा। और वह ‘एक्स फ़ैक्टर’ क्या है? शायद आसमान से उतरने वाला कोई रहस्यमय नायक, ठीक वैसे जैसे किसी फ़िल्म में अचानक सलमान खान प्रवेश कर जाए और सारी कहानी बदल दे।
दुर्भाग्य से राजनीति इस तरह नहीं चलती। राजनीति ‘अगर ऐसा होता तो?’ जैसे कल्पनालोक का खेल नहीं है, बल्कि वह उपलब्ध वास्तविक विकल्पों में से सबसे बेहतर विकल्प चुनने की कला है। और अपनी तमाम कमियों के बावजूद, इस समय राहुल गांधी वही विकल्प हैं। सबसे पहले इसलिए कि वे आज की भारतीय राजनीति में शायद सबसे निडर व्यक्ति हैं। वे सरकार, उसके निकट माने जाने वाले बड़े उद्योगपतियों और सत्ता-समर्थक मीडिया पर लगातार, बेधड़क, कठोर और बार-बार हमला करते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उन्हें जेल जाने का डर नहीं है। उन्हें अपना घर खोने का डर नहीं है, न पद खोने का और न ही संपत्ति खोने का, क्योंकि उनके पास खोने के लिए बहुत कुछ है भी नहीं। भय और दबाव से भरे राजनीतिक वातावरण में एक निडर आवाज़ अपने आप में मूल्यवान होती है, चाहे वह क्या कहती हो या उसे कितने लोग सुनते हों। मेरा अनुमान है कि राहुल गांधी जेल जाने से इसलिए नहीं डरते, क्योंकि उनके भीतर मानसिक और भावनात्मक रूप से वह क्षमता है, जो जेल जैसे कठिन अनुभव को सह सके। वे आत्मनिर्भर स्वभाव के हैं, उनका अपना परिवार नहीं है, वे कठिन परिस्थितियों में रह सकते हैं, जैसा कि उन्होंने कई बार दिखाया है। वे नियमित व्यायाम करते हैं, पुस्तकें पढ़ते हैं और प्रार्थना भी करते हैं। ये चारों गुण किसी व्यक्ति को कारावास जैसी स्थिति में टिके रहने में बहुत मदद करते हैं। इसके अतिरिक्त, उनकी ईमानदारी पर भी गंभीर आरोप लगाना कठिन है। कोई यह नहीं कह सकता कि उन्होंने सार्वजनिक पद का उपयोग धन कमाने या निजी लाभ के लिए किया है। वे भारतीय राजनीति के सबसे साहसी व्यक्तियों में भी हैं। उन्होंने एक के बाद एक प्रहार सहे हैं- ताने, उपहास, व्यंग्य, उपनाम, सामाजिक माध्यमों पर मज़ाक और राजनीतिक हमले। लेकिन किसी खिलौने की तरह जो बार-बार गिरकर फिर खड़ा हो जाता है, या किसी महान मुक्केबाज़ की तरह, वे हर बार वापस उठ खड़े होते हैं। वे प्रतिदिन अपमानजनक टिप्पणियों और नकारात्मक विशेषणों की ऐसी बौछार झेलते हैं, जो शायद बीस लोगों का मनोबल तोड़ दे, फिर भी वे विचलित नहीं दिखाई देते। वे सत्तारूढ़ व्यवस्था और उसके समर्थक मीडिया तंत्र को शायद देश के किसी भी अन्य नेता से अधिक बेचैन करते हैं। वे लगातार हिंदू-मुस्लिम एकता की बात करते हैं और दाढ़ी वाले मुसलमानों या नक़ाब पहनने वाली महिलाओं से मिलने-जुलने में किसी प्रकार का संकोच नहीं दिखाते। वे ऐसा सहजता और आत्मीयता से करते हैं, केवल कैमरों के लिए नहीं; जबकि कुछ अन्य विपक्षी नेता केवल अवसर विशेष पर टोपी पहनकर औपचारिकता निभाते दिखाई देते हैं। संभव है कि निजी जीवन में वे कुछ दूर-दूर रहने वाले व्यक्ति हों, लेकिन सार्वजनिक जीवन में वे लोगों के प्रति स्नेह दिखाते हैं और कई बार एक सांत्वनादायक उपस्थिति का प्रभाव छोड़ते हैं। हो सकता है उनमें आम लोगों से तुरंत जुड़ जाने की सहज क्षमता कम हो, लेकिन वे भारत के किसी भी अन्य नेता की तुलना में अधिक समय साधारण लोगों के बीच बिताते हैं और समाज के कहीं अधिक विविध वर्गों से मिलते हैं। भारत की पारंपरिक राजनीतिक शैली के अनुसार रोज़ाना दरबार लगाने के बजाय वे समाज के अलग-अलग वर्गों से मिलते हैं। यह किसी बनावटी सामाजिक अध्ययन जैसा लगे, तब भी यह सच है कि वे लोगों से मिलने के लिए निकलते हैं और अक्सर दूर-दराज़ तक जाकर उनसे संवाद करते हैं।
राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा एक असाधारण उपलब्धि थी। इस सरकार के दस वर्षों के दौरान विपक्ष द्वारा किया गया यह शायद सबसे प्रभावशाली और व्यापक राजनीतिक अभियान था, चाहे उसके प्रत्यक्ष राजनीतिक परिणाम कुछ भी रहे हों। इस यात्रा से कांग्रेस पार्टी फिर से लोगों की निगाहों में आई और जिन शहरों तथा गाँवों से यह गुज़री, वहाँ पार्टी में नई ऊर्जा का संचार किया। साथ ही इससे राहुल गांधी की व्यक्तिगत छवि भी मजबूत हुई। इस यात्रा ने लोगों को राहुल गांधी को नज़दीक से देखने का अवसर दिया और एक प्रकार का उत्साह पैदा किया। यहाँ तक कि भाजपा और मोदी के कट्टर समर्थक भी उन्हें देखने के लिए यात्रा मार्ग पर पहुँचे। हाल ही में एक चुनाव-पूर्व सर्वेक्षण के दौरान भाजपा समर्थक माने जाने वाले एक चुनाव विश्लेषक ने दावा किया कि कर्नाटक में कांग्रेस की जीत में भारत जोड़ो यात्रा की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने यह भी कहा कि राहुल गांधी ने अकेले अपने प्रयासों से कांग्रेस को तेलंगाना में सत्ता के लिए एक गंभीर दावेदार बना दिया, जो अपने आप में बड़ी उपलब्धि है, खासकर ऐसे राजनीतिक माहौल में जहाँ भाजपा का मुख्य मुकाबला प्रायः क्षेत्रीय दलों से होता है। कांग्रेस आज भी न केवल देश की एकमात्र दूसरी राष्ट्रीय पार्टी है, बल्कि वह एकमात्र ऐसी पार्टी भी है जो पूरी ताकत से भाजपा का मुकाबला करने के लिए तैयार दिखाई देती है।
राहुल गांधी ने इस सरकार के विरुद्ध कुछ सबसे यादगार भाषण भी दिए हैं। संसद के भीतर और बाहर उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी तथा सरकार की नीतियों पर सबसे सशक्त और तर्कपूर्ण आलोचनाएँ प्रस्तुत की हैं। उन्होंने इस सरकार के विरुद्ध वैचारिक स्तर पर भी सबसे स्पष्ट और संगठित प्रतिपक्ष खड़ा करने का प्रयास किया है। ‘सूट-बूट की सरकार’ जैसा चर्चित राजनीतिक वाक्यांश उन्होंने ही गढ़ा था। राफेल सौदे के मुद्दे पर वे सरकार को घेरने में अंततः सफल नहीं हुए, लेकिन उन्होंने उस प्रश्न को मजबूती से उठाया। उन्होंने महामारी आने से पहले ही सरकार को उसके संभावित खतरे के बारे में चेताया था। वे लगातार चीन की घुसपैठ के मुद्दे पर बोलते रहे हैं और किसानों तथा बेरोजगार युवाओं की समस्याओं को भी लगातार उठाते रहे हैं। संसद में मनोज झा और महुआ मोइत्रा जैसे कई अन्य प्रभावशाली वक्ता भी रहे हैं, लेकिन एक राष्ट्रीय नेता के रूप में राहुल गांधी के कुछ भाषण ऐसे रहे हैं, जिन्होंने लोगों को गहराई से प्रभावित किया है। स्मृति पर भरोसा करें तो कई अवसरों पर उनके भाषण अन्य नेताओं की तुलना में अधिक प्रेरक और प्रभावशाली प्रतीत हुए हैं।
राहुल गांधी ने कांग्रेस के लिए ऐसे प्रवक्ताओं की एक टीम भी तैयार की है, जो निर्भीकता और आक्रामकता के साथ अपनी बात रखते हैं। वे जिस बेफिक्री और आत्मविश्वास के साथ बोलते हैं, उससे लगता है कि उन्हें नेतृत्व की ओर से पूरी स्वतंत्रता प्राप्त है। पंकज खेड़ा, सुप्रिया श्रीनेत, आलोक शर्मा और सुरेंद्र राजपूत जैसे प्रवक्ता शिक्षित, निडर, तीखे और सुनने में प्रभावशाली हैं। उनकी शैली कभी-कभी 1990 के दशक के उन भाजपा नेताओं की याद दिलाती है, जो अपने तर्क, स्पष्टता और प्रभावशाली वक्तृत्व के लिए जाने जाते थे। ये प्रवक्ता जोशीले हैं, साहसी हैं और नियमित रूप से अपने विरोधियों का मुकाबला करते हैं, यहाँ तक कि सत्ता-समर्थक टेलीविजन एंकरों का भी। राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने सामाजिक माध्यमों पर भी अपनी उपस्थिति काफी मजबूत की है, हालाँकि कभी-कभी पार्टी इस उपलब्धि को लेकर कुछ अधिक ही आत्मसंतुष्ट दिखाई देती है। पिछले दस वर्षों में, और विशेष रूप से भारत जोड़ो यात्रा के बाद, कांग्रेस लगातार आवाज़ उठाती रही है, प्रदर्शन करती रही है, यात्राएँ निकालती रही है और राजनीतिक बहस में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती रही है। उसकी सक्रियता कई बार उसकी वास्तविक राजनीतिक ताकत, संसदीय संख्या और मीडिया में मिलने वाले सम्मान से कहीं अधिक दिखाई देती है। कई मायनों में उसने उसी तरह अपने वजन से अधिक प्रभाव पैदा करने की कोशिश की है, जैसा कभी भाजपा विपक्ष में रहते हुए किया करती थी।
कर्नाटक में कांग्रेस ने एक प्रभावशाली चुनाव अभियान चलाया। भले ही उसकी जीत का श्रेय पूरी तरह डी.के. शिवकुमार या सत्ता-विरोधी माहौल को दिया जाए, फिर भी यह महत्वपूर्ण है कि पार्टी नेतृत्व ने राज्य के नेताओं को अपनी शर्तों पर चुनाव लड़ने की पर्याप्त स्वतंत्रता दी। कर्नाटक में कांग्रेस ने भाजपा को केवल सामाजिक समीकरणों, चुनावी वादों या संख्यात्मक शक्ति के आधार पर नहीं हराया। उसने रणनीति, सूक्ष्म प्रबंधन, मीडिया संवाद और विभिन्न राजनीतिक समझौतों जैसे क्षेत्रों में भी बेहतर प्रदर्शन किया, जिनमें सामान्यतः भाजपा को बढ़त प्राप्त मानी जाती है। यह स्वीकार किया जा सकता है कि इस सफलता का एक बड़ा हिस्सा ऐसे व्यक्ति के प्रयासों से आया, जो पहले भाजपा से जुड़ा रहा था। लेकिन उसे पूरी जिम्मेदारी सौंपना भी कांग्रेस नेतृत्व के पक्ष में जाता है। कर्नाटक चुनाव के बाद मुख्यमंत्री के चयन की प्रक्रिया को संभालने में भी कांग्रेस ने सामूहिक नेतृत्व का परिचय दिया। राहुल गांधी ने समझदारी दिखाते हुए बातचीत और निर्णय प्रक्रिया की जिम्मेदारी मल्लिकार्जुन खड़गे को सौंप दी। खड़गे एक अनुभवी और चतुर राजनेता हैं। वे कठिन परिस्थितियों में भी अपना संतुलन बनाए रखते हैं और उनका बढ़ता राजनीतिक कद कांग्रेस के लिए शुभ संकेत माना जा सकता है। यह भी राहुल गांधी के नेतृत्व का ही परिणाम है कि खड़गे को प्रभावी और शक्तिशाली भूमिका निभाने का अवसर मिला। खड़गे को चार दशकों से अधिक का राजनीतिक अनुभव है और वे जटिल परिस्थितियों को संभालने के लिए जाने जाते हैं। लगभग तीस वर्ष पहले जब अभिनेता राजकुमार का अपहरण हुआ था, तब वीरप्पन से बातचीत करने वाले प्रतिनिधियों में वे भी शामिल थे। मई 2014 के उस निराशाजनक दिन, जब नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभाली, खड़गे ने लोकसभा में एक उल्लेखनीय भाषण दिया था। उस समय कांग्रेस के लोकसभा नेतृत्व के लिए उनके चयन से निराश बहुत से लोगों की तरह मैं भी आशंकित था, लेकिन अपने पहले ही भाषण में उन्होंने सबको चौंका दिया। उन्होंने धाराप्रवाह हिन्दी में बोलते हुए बार-बार मोदी को यह याद दिलाया कि भले ही भाजपा को बहुमत मिला हो, लेकिन कांग्रेस को भी लगभग 11 करोड़ मत प्राप्त हुए हैं। यह संख्या बहुत बड़ी थी और भाजपा से बहुत पीछे भी नहीं थी। उस समय उनका भाषण मेरे लिए, और शायद अनेक अन्य लोगों के लिए भी, निराशा के बीच कुछ सांत्वना लेकर आया था।
वर्तमान विधानसभा चुनावों के परिणाम चाहे जो भी हों, कांग्रेस आज उस स्थिति की तुलना में कहीं अधिक सक्रिय और ऊर्जावान दिखाई देती है, जितनी वह मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान थी। राहुल गांधी ने पार्टी में कुछ नया आत्मविश्वास भरा है और कुछ नया आत्मसम्मान भी। निस्संदेह वे कांग्रेस के सबसे लोकप्रिय राष्ट्रीय नेता हैं। यह शक्ति उन्हें राजनीति में प्रवेश करते समय अपने प्रयासों से नहीं मिली थी; वह उन्हें गांधी परिवार का सदस्य होने के कारण सहज रूप से प्राप्त हुई। लेकिन पिछले एक दशक में उन्होंने लगातार मेहनत की है और अपनी लोकप्रियता तथा स्वीकार्यता को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाया भी है।
कांग्रेस में ऐसा कोई अन्य नेता नहीं है जो जमीनी स्तर पर उनकी लोकप्रियता का मुकाबला कर सके, भले ही टेलीविजन स्टूडियो या सामाजिक माध्यमों पर कुछ अन्य नेता अधिक प्रभावशाली दिखाई देते हों। यह भी संभव है कि गांधी परिवार के बिना कांग्रेस पार्टी कई छोटे-छोटे दलों में बिखर जाती। यह सही हो या गलत, लेकिन गांधी परिवार ने कांग्रेस को एकजुट बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
एक बार मुकुल केशवन ने कहा था कि कांग्रेस हमेशा अवसरवादी सांप्रदायिकता का परिचय देती रही है। इंदिरा गांधी के समय में यह दिखाई दिया, राजीव गांधी द्वारा बाबरी मस्जिद के ताले खुलवाने के निर्णय में भी यह देखा गया, और कुछ लोगों के अनुसार आज मध्य प्रदेश में चलाए गए चुनाव अभियान में भी इसकी झलक दिखाई देती है। हालाँकि इस दृष्टिकोण से असहमति भी हो सकती है। यह भी कहा जा सकता है कि कांग्रेस ऐतिहासिक रूप से बहुसंख्यक हिंदू समाज की पार्टी रही है और अनेक अवसरों पर उसका संबंध हिंदू दक्षिणपंथी शक्तियों, यहाँ तक कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी रहा है।
इस दृष्टि से देखें तो आज जो कुछ दिखाई देता है, वह कांग्रेस की विचारधारा से विचलन नहीं, बल्कि उसके लंबे इतिहास की एक स्वाभाविक परिणति है। लेकिन कांग्रेस हमेशा केवल अपने विभिन्न समूहों का योगफल भर नहीं रही। उसमें कुछ अतिरिक्त भी रहा है। उसने समावेशन, विविधता और सह-अस्तित्व की भाषा को जीवित रखा है, भले ही कई बार वह केवल प्रतीकात्मक या औपचारिक ही क्यों न रही हो। राजनीति में पाखंड भी एक मायने में महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि वह आदर्शों और प्रतीकों के प्रति सम्मान को दर्शाता है। वह हमें उन आकांक्षाओं की याद दिलाता है, जिन्हें हम शायद पूरी तरह प्राप्त न कर सकें, लेकिन जिन्हें हम आदर्श के रूप में बनाए रखते हैं। कांग्रेस लोगों को उम्मीद करने, प्रश्न पूछने और आलोचना करने की कुछ गुंजाइश देती रही है। दूसरे संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन शासनकाल में मीडिया ने कांग्रेस को काफी नुकसान पहुँचाया था, लेकिन तब भी कांग्रेस ने मीडिया को उस तरह नियंत्रित या दबाने की कोशिश नहीं की, जैसी प्रवृत्तियाँ आज दिखाई देती हैं। कर्नाटक में कांग्रेस ने हिजाब प्रतिबंध को वापस लिया, जो वर्तमान बहिष्करणवादी माहौल में एक छोटी उपलब्धि नहीं मानी जा सकती। हमास के हमलों के बाद इज़राइल की आलोचना करने वाले विश्व के शुरुआती राजनीतिक दलों में कांग्रेस भी शामिल थी। नरेंद्र मोदी स्वयं कांग्रेस के महत्व को समझते हैं। शायद यही कारण है कि सत्ता संभालने के बाद से वे लगातार ‘गांधी-मुक्त कांग्रेस’ और ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ की बात करते रहे हैं। फिर भी कांग्रेस अब तक पूरी तरह पराजित या समाप्त नहीं हुई है। बल्कि यह संभव है कि वह पहले की तुलना में अधिक मजबूत होकर उभरे। और इस दृढ़ता तथा जीवटता का एक बड़ा श्रेय राहुल गांधी को भी जाता है।
राहुल गांधी बहुत-सी चीजें और बेहतर कर सकते हैं। वे नेतृत्व को अधिक सामूहिक बना सकते हैं और उसमें अधिक लोगों को शामिल कर सकते हैं, जिससे अधिक नेताओं की हिस्सेदारी और जिम्मेदारी सुनिश्चित होगी। राहुल गांधी रोजगार के प्रश्न पर अन्य अधिकांश नेताओं की तुलना में अधिक बोलते हैं, और सही भी है, क्योंकि आज भारत की सबसे गंभीर समस्या रोजगार ही है। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि रोजगार सृजन के लिए उनके पास कोई स्पष्ट और ठोस योजना नहीं है। वे कृषि के आधुनिकीकरण की बात करते हैं, लेकिन शायद वे यह नहीं समझते कि कई दशकों से ग्रामीण आबादी का केवल एक छोटा हिस्सा ही पूरी तरह खेती पर निर्भर है। वास्तव में गाँवों में रहने वाले लोगों में किसान स्वयं अल्पसंख्यक हैं। इसलिए यदि किसानों की स्थिति बेहतर भी हो जाए, तब भी उससे व्यापक स्तर पर रोजगार पैदा नहीं होगा। कोल्ड स्टोरेज, बाज़ारों तक बेहतर पहुँच और कुटीर या हस्तशिल्प आधारित गतिविधियों को बढ़ावा देने जैसी बातें अक्सर बहुत अस्पष्ट लगती हैं। आज की उत्तर-औद्योगिक दुनिया में कारखाने पहले की तरह बड़े पैमाने पर रोजगार नहीं देते। श्रम-प्रधान नौकरियाँ दुनिया के अधिकांश हिस्सों में कम होती जा रही हैं। ऐसे में भारत के गरीबों और ग्रामीणों को रोजगार कहाँ से मिलेगा और कैसे मिलेगा, यह एक कठिन प्रश्न है। मनरेगा जैसी योजनाएँ गरीब ग्रामीण मजदूरों के हाथ में कुछ क्रय-शक्ति अवश्य पहुँचाती हैं, लेकिन अपने नाम के बावजूद यह वास्तव में स्थायी रोजगार सृजन की योजना नहीं है। रोजगार के लिए कौशल विकास और पूँजी दोनों की आवश्यकता होती है। और यदि आप पूँजी के प्रति अविश्वास रखते हैं या उसका लगातार विरोध करते हैं, तो नई पूँजी का निर्माण कैसे होगा? लेखक के अनुसार, पूँजी की आलोचना करते हुए उसके लाभ भी नहीं उठाए जा सकते। इसी संदर्भ में वह व्यंग्यात्मक प्रश्न उठाता है कि राहुल गांधी जिन हेलीकॉप्टरों से यात्रा करते हैं, वे कहाँ से आते हैं और उनका खर्च कौन उठाता है?
महात्मा गांधी की तरह राहुल गांधी भी राजनीति में रहना चाहते हैं, लेकिन उससे ऊपर दिखाई देना चाहते हैं। ऐसा नहीं लगता कि प्रधानमंत्री बनने की इच्छा उन्हें उसी तरह प्रेरित करती है, जैसी सामान्यतः किसी राष्ट्रीय स्तर के महत्वाकांक्षी नेता को प्रेरित करती है। यह एक असामान्य स्थिति है। लेकिन महात्मा गांधी और राहुल गांधी के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर है। महात्मा गांधी ने उस राजनीतिक संगठन को स्वयं बनाया था, जिससे वे एक दूरी भी बनाए रखते थे। उन्होंने उससे लाभ और सुविधाएँ प्राप्त करते हुए उसका तिरस्कार नहीं किया। उन्होंने राजनीति और राजनीतिक दलों का एक नया मॉडल खड़ा किया था, जो त्याग और सादगी से भरे जीवन से निकला था। राहुल गांधी गरीबों के प्रति सहानुभूति रखते हैं, लेकिन उन्होंने उस गरीबी के आधार पर कोई वैसी राजनीतिक संरचना नहीं बनाई है, न ही उन्होंने त्याग, सादगी, संघर्ष और जेल-यात्राओं को अपनी राजनीतिक पहचान का आधार बनाया है। वे विशेषाधिकार प्राप्त पृष्ठभूमि से आते हैं। इसलिए कुछ लोगों को यह विचित्र लगता है कि वे एक स्थापित राजनीतिक दल के लाभ और संसाधनों का उपयोग भी करें और साथ ही स्वयं को त्याग तथा वैराग्य के प्रतीक के रूप में भी प्रस्तुत करें। उनकी सभी कमियों और विशेषताओं के साथ, उन्हें उस राजनीतिक दल को पूरी तरह स्वीकार करना चाहिए, जिसके भीतर वे काम कर रहे हैं और जिसके लिए संघर्ष कर रहे हैं। यदि इसका अर्थ यह है कि उन्हें ऐसे लोगों के साथ भी काम करना पड़े जो भ्रष्ट, साधारण या अत्यधिक चतुर राजनीतिक खिलाड़ी हों, तो भी ऐसा करना होगा। यदि इसका अर्थ आलोचकों को क्षमा करना या विश्वासघात को अनदेखा करना हो, तो भी ऐसा करना होगा। वे यह लड़ाई अकेले नहीं जीत सकते। यह तभी जीती जा सकती है जब पार्टी मजबूत हो। जैसा कि भगवान कृष्ण ने सिखाया था, युद्ध का पहला नियम विजय है। और विजय के लिए सैनिकों की आवश्यकता होती है, भले ही वे पूरी तरह आदर्श न हों। हर पार्टी कार्यकर्ता, बिना किसी अपवाद के, उस उद्देश्य का एक सैनिक होता है और उसके साथ उसी प्रकार व्यवहार किया जाना चाहिए। महात्मा गांधी ने भी अनेक बातों पर समझौते किए थे। उन्होंने सरदार पटेल के साथ भी काम किया, जबकि जीवन के अंतिम दिनों में पटेल के कुछ आचरण उन्हें पूरी तरह संतोषजनक नहीं लगते थे। फिर भी उन्होंने सहयोग बनाए रखा, हालाँकि वे स्वयं चाहते थे कि कांग्रेस अंततः स्वयं को भंग कर दे। लेखक का सुझाव है कि राहुल गांधी भी भविष्य में कांग्रेस को भंग करने की बात कर सकते हैं, लेकिन केवल तब, जब वे पहले वह राजनीतिक विजय प्राप्त कर लें, जिसकी वे कामना करते हैं।
राहुल गांधी को बड़े उद्योगपतियों और बड़े मीडिया को पूरी तरह खारिज भी नहीं करना चाहिए। पुराना मीडिया, जिसे उनके समर्थक अक्सर सत्ता-समर्थक मीडिया कहते हैं, आज भी भारत में सामाजिक माध्यमों की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली है, चाहे कांग्रेस को सामाजिक माध्यम कितने ही प्रिय क्यों न हों। लेखक का मत है कि भले ही न्यूज़ एंकर, उनके मालिक और यहाँ तक कि उनके दर्शक भी उसे अप्रिय लगते हों, फिर भी वे भारतीय समाज के एक बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं। मीडिया से जुड़े बहुत से लोग केवल अपना काम कर रहे होते हैं। ऐसे में उन्हें पूरी तरह नकारकर जनता की चेतना तक पहुँचना संभव नहीं है। राजनीति में आदर्शवाद जितना महत्वपूर्ण है, व्यवहारिकता और यथार्थबोध भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, और कई बार उससे भी अधिक। लेखक के अनुसार राहुल गांधी ने संसद में नरेंद्र मोदी को गले लगाकर एक चतुर राजनीतिक कदम उठाया था। हालाँकि उसका मानना है कि बाद में ज्योतिरादित्य सिंधिया की ओर देखकर मुस्कराना शायद उनके लिए उतना लाभकारी नहीं रहा, जितनी उन्होंने अपेक्षा की थी। राजनीति का अर्थ है सबको साथ लेकर चलना- यहाँ तक कि उन लोगों को भी, जिन्हें आप पसंद नहीं करते या जिनसे सहमत नहीं होते। यही कारण है कि राजनीति हर किसी के बस की बात नहीं होती। लेकिन यदि आप राजनीति में हैं, तो आपको अपूर्ण लोगों, चतुर लोगों, और आवश्यकता पड़ने पर बुरे लोगों के साथ भी काम करना पड़ता है। महाभारत के कर्ण को भी दुर्योधन का सहारा लेना पड़ा था। लेखक का तर्क है कि राहुल गांधी को कम नहीं, बल्कि अधिक ऐसे सहयोगियों की आवश्यकता है, जो कठिन राजनीतिक लड़ाइयाँ लड़ सकें।
अहमदनगर किले से लिखे गए अपने प्रसिद्ध निबंधों में, जिन्हें मौलाना आज़ाद ने उसी समय लिखा था जब पंडित नेहरू भारत एक खोज लिख रहे थे, आर्किमिडीज़ का एक कथन उद्धृत किया था। उसका आशय था- “मुझे खड़े होने के लिए बस थोड़ी-सी जगह दे दीजिए, फिर देखिए मैं दुनिया को कैसे हिला देता हूँ।”

