
कालिदास के मेघदूत में वर्णित स्थलों के माध्यम से कालिदास की जन्मस्थली की खोज पर यह गद्य लिखा है अभिषेक कुमार अम्बर ने। दिल्ली विश्वविद्यालय के शोध छात्र अभिषेक लेखकों और उनसे जुड़े स्थलों पर रचनात्मक गद्य लिखते रहे हैं। यह भी बहुत रोचक है। पढ़कर बताइएगा- मॉडरेटर
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पहाड़ के घर की छत पर बैठा मैं दूर तक फैली वादियों को निहार रहा हूँ। बरसात का मौसम है। धूप-छाँव अपना खेल खेल रहे हैं। कभी बादल धूप का रास्ता बंद कर रहे हैं तो कभी धूप बादलों को छितरा रही है। और इस खेल को देख कर हवा नादान बच्चों की तरह पेड़ों की पत्तियों से तालियाँ बजा रही है। न जाने किस देस से बादल आ रहे हैं जो न मेह बरसा रहे हैं और न आगे बढ़ने का नाम ले रहे हैं। किस को ढूँढ़ रहे हैं? इन घाटियों में, पहाड़ों के चोटियों पर बनी कंदराओं में, नदी के किनारों पर।
गाँव एकदम दो पहाड़ों के बीच की हल्की सी समतल ज़मीन पर बसा है, तो एक घाटी में उमड़े बादल दूसरी घाटी में जाने के लिए गाँव से शॉर्टकट ले रहे हैं। हवा की धुन पर नाचती धुंध कमरे की खिड़कियों से भीतर तक झाँक रही है दरवाज़ों पर दस्तक दे रही है। मैं इनसे कहना चाहता हूँ बरसो और बरस कर यहीं ठहर जाओ। लेकिन इन्हें न जाने किस की तलाश है कि एक पल से अधिक नहीं ठहरते। एक घाटी से दूसरी घाटी लाँघते जाते हैं हिमालय के शिखरों पर अपना बसेरा बनाने की चाह लिए।
ध्यान आता है आज आषाढ़ का पहला दिन है। मैं जिस भूमि पर बैठा हूँ वह महाकवि कालिदास की जन्मभूमि है। मान्यता है कि कालिदास का जन्म रुद्रप्रयाग ज़िले के कविल्ठा गाँव में हुआ था। आज मैं भी रुद्रप्रयाग ज़िले के ही अन्य गाँव में हूँ। हो सकता है कि यह मेघ कोई और नहीं बल्कि रामगिरि पर्वत से भेजे यक्ष के मेघदूत हों। जिन्हें साल दर साल यक्ष पठाता जाता है और यह उसके बताए रास्ते को भूल इन्हीं घाटियों में भटक रहे हों शताब्दियों से।
हे मेघदूत! कुछ तो कहो। क्या सच में भूल गए हो तुम राह। तभी नहीं बरसते तुम। घूमते रहते हो हर वर्ष आषाढ़ माह के प्रथम दिवस से हिमालय की इन वादियों में। वक़्त बदल गया है। और समय के साथ बदल गया है देस, दुनिया और यह केदारखण्ड भी। तो इसमें क्या हैरत कि आधुनिकता की अंधी दौड़ में भागती इस दुनिया के बाशिंदों ने बदल दिया हो उन स्थानों को। यक्ष भी कहाँ जानता होगा अपनी नगरी के यह बदलाव। क्या मैं बताऊँ तुम्हें राह उस नगर की जहाँ आज भी तुम्हारी प्रतीक्षा में बैठी होगी यक्षिणी। बस इतना कहना था कि मेघों ने मुझे हर तरफ़ से घेर लिया। लेने लगे बोसे कभी मेरे माथे पर तो कभी मेरे हाथों पर। जैसे भा गई हो उन्हें मेरी राह बताने की बात।
यकायक बिजली कड़की और मेघ के मुँह से स्वर फूटा।
मित्र! रामगिरि पर्वत से जब मैं चला था यक्ष का संदेसा लिए तो विंध्य पर्वत की ढलानों पर लुढ़कते हुए नर्मदा की बिखरती हुई शीतल शांत जल-धाराओं का किया था मैंने पान। जिससे पाई थी मैंने नवीन ऊर्जा, नई स्फूर्ति।
जब पता चला आम्रकूट पर्वत को कि मैं लेकर जा रहा हूँ अलकापुरी यक्ष का संदेसा तो अपनी चट्टानों पर पल भर को झुका लिया था उसने श्रद्धा से मस्तक। मैं नींद में आम्रकूट की शिला पर अलसाया था और समीर मंद-मंद बह कर दाब रहा था मेरे पाँव।
दशार्ण देश, विदिशा, अवंति देश से होते हुए जब मैंने किया उज्जयनी में प्रवेश तो सुदूर आकाश में लहराता दिखा महाकाल मंदिर का ध्वज। मैंने जोड़ लिए दोनों हाथ। महादेव की स्तुति में घण्टों रहा मैं मग्न। बजते रहे मेरी बूंदों के मृदंग।
जब पहुँचा मैं ब्रह्मावर्त जनपद और क़दम रहा पांडु पुत्र अर्जुन की लीला देखने वाली कुरुक्षेत्र भूमि पर तो सहसा फूल गया मेरा गर्व से सीना। भर गया मुझमें जोश। चमकने लगी मेरे भीतर छुपी दामिनी।
किन्तु जब मेरी दृष्टि पड़ी शांत धीर-गंभीर बहती माँ सरस्वती पर तो खिल उठा मैं किसी बच्चे सरीखा। शांत जल में उतर के करने लगा अठखेलियाँ! जैसे शिशु करते हैं माँ की गोद में क्रीड़ा। माँ सरस्वती के जल का करके पान शुद्ध हो गया मेरा अंतःकरण। धुल गई सारी मलिनता, कलुषता।
जब मैं पहुँचा हिमवंत देश के प्रवेश द्वार प्रजापति दक्ष की नगरी कनखल तो हिमालय के उत्तुंग शिखरों से बहती माँ गंगा की शीतल धारा बहती देख नहीं रोक पाया मैं स्वयं को और समा गया जल में। याद आने लगे मुझे राजा सगर के पुत्र! माँ गंगा करेगी मेरा भी उद्धार। किन्तु याद आया तभी मुझे रामगिरि पर्वत पर उदास बैठा यक्ष। कल्पनाओं में दिखाई दी हिमालय के उत्तुंग शिखरों से घिरी अलकापुरी में बैठी पिय की बाट जोहती यक्षिणी।
मैंने की याचना। हे माँ! छोड़ कर किसी के दिये कार्य को अधूरा नहीं पा सकता मैं मुक्ति। दो मुझे आशीर्वाद कि सफल हो शीघ्र आऊँ तुम्हारे पास। मैं बढ़ता गया हिमालय के शिखरों की ओर और भटक रहा हूँ कभी पर्वतों पर, कभी घाटियों में और कभी दर्रों के बीच।
प्रिय मेघदूत! भटकना कोई शाप नहीं बल्कि एक नेमत है। जो भटकेगा वह हमेशा ज़िंदा रहेगा। तुम भटके तो शताब्दियों से हो अमर। नहीं भटकते तो थक-हार कर बरस पड़ते किसी खेत पर, किसी कुएं में, किसी नदी के ऊपर या घरों की छतों पर और बह गए होते नालियों में।
मित्र! मेरा भटकना भी तभी सार्थक है जब बरसा सकूँ विरहाग्नि में दग्ध यक्षिणी पर प्रिय के संदेस की बौछार। कहते हुए मन की बात उदास हो गए मेघ। श्वेत से श्याम हो गया मुख।
हे मेघदूत!
पुष्कर और आवर्तक के वंशज मेघदूत!
उदास न होओ। मैं बतलाता हूँ तुम्हें राह अलकापुरी नगर की।
ख़ुशी से झूमता मेघदूत पूरे पहाड़ पर छितरा गया। कभी उड़ने लगता चोटियों की ओर तो कभी घाटियों के पार। धुंधले हो गए पेड़ों के पीछे दीखते पर्वत, पर्वतों के पीछे दमकते रजत-शिखर।
मेघदूत! मेरी भी है एक शर्त, लेकर चलोगे मुझे अपने साथ उस अलकापुरी नगर जहाँ बाँट जोहती है यक्षिणी।
‘बेशक! तुम्हारी शर्त है मुझे मंज़ूर’
कर लिया मुझे मेघदूत ने अपनी पीठ पर सवार। हे मेघ! देख रहे हो सामने सैकड़ों चोटियों में एकदम अलग प्रतीत होती चोटी?
‘क्या वह, जिससे सूर्य की किरणें अठखेलियाँ कर रही हैं? कमल के फूल सा खिला सफ़ेद बर्फ़ से ढका चार चोटियों वाला पर्वत?’
अरे नहीं, नहीं! वह तो चौखम्बा पर्वत है। तुम भी आजकल के लोगों की तरह शॉर्टकट लेना चाहते हो क्या? जो सीधा हिम शिखर ही तुम्हारी नज़र में हैं। ज़रा उससे थोड़ा पहले हरे-भरे पर्वतों की श्रेणियों में जापान के फ़्यूज़ियामा पर्वत की तरह चमकती उस चोटी को देखो।
‘अच्छा! अच्छा! कितना ख़ूबसूरत पर्वत है! नाम क्या है इसका?’
नाम क्या पूरी कथा सुनाऊँगा। पहले तुम उस पर्वत की तरफ़ बढ़ो तो सही। अलकापुरी यात्रा का हमारा पहला पड़ाव वही है।
बस इतना सुनना था और मेघदूत हवा की गति से उस ओर बढ़ने लगा। उत्साह में भूल गया कि वह मेघ है वायु नहीं! ख़ैर मैंने भी वादे अनुसार कहानी प्रारंभ की।
जानते हो मेघ! तुम्हें यक्ष ने एक देवता को स्नान कराने के लिए कहा था जिसे शिव ने देवसेनाओं की रक्षा हेतु सूर्य से भी तेज़ अग्नि के मुख से सिंचित किया था।
‘हाँ! हाँ! याद आया। यक्ष ने मुझे स्कंद को स्नान कराने के लिए कहा था। क्या यह….!’
हाँ! यह स्कंद का निवास स्थान, वही क्रौंच पर्वत है।
क्रौंच पर्वत का नाम सुन मेघ की आँखों में फूट पड़े द्युति के सोते। वह तीव्र गति से उस ओर बढ़ने लगा।
मेघदूत! उतावले न होओ। तुम्हें सिर्फ़ एक कार्य नहीं यक्ष के बताए और कार्य भी करते चलना है पूर्ण। ज़रा नीचे देखो रुद्रप्रयाग और अगस्त्यमुनि की घाटियों में फैले सीढ़ीदार खेतों में और सुनो धान रोपती उन स्त्रियों का गान। देखो वह किन आशाओं भरे नेत्रों से तुम्हें रही हैं निहार।
‘वह अपने गान में क्या कह रही हैं?’
वह अपने गीत में कर रही हैं प्रियतम को याद जो सावन के महीने में आने की बात कह कर गया है करता हुआ सैंकडों नदियाँ पार। तुम आ गए हो तो तुम्हें देख उन्हें उम्मीद बँध रही है कि प्रिय ज़रूर आएंगे।
कहते हैं पपीहा साल भर प्यासा रहता है केवल स्वाति नक्षत्र की बूँद के लिए। प्रिय मेघदूत! देखो पीकर स्वाति नक्षत्र की बूँद कूक उठे हैं पपीहे। प्रत्येक वर्ष बुझ जाती है पपीहे की भी प्यास किन्तु यह स्त्रियाँ बड़ी अभागिन हैं उनकी पिया मिलन की प्यास नहीं बुझती।
ये हर साल जलती हैं सावन में बरसे मेह की आग में। पिया के मिलन में दिन गिनते गिनते इनकी उंगलियों की रेखाएँ घिस जाती हैं पर उंगलियों सरीखी इन सड़कों पर कोई नहीं आता दिखाई देता।
मेघदूत की आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे। जिससे स्त्रियों के तन-मन की आग शांत हो या न हो पेट की आग ज़रूर शांत हो जाएगी। उनकी फ़सलें अच्छी होंगी तो अन्न से कोठार भर जाएंगे। प्रियतम की प्रतीक्षा में रह पाएंगी वह एक वर्ष और ज़िंदा।
सिंचित कर विरहिणियों की उम्मीदों की फ़सलें हम बढ़ने लगे अपने लक्ष्य की ओर। ऊपर उठने लगा मेघों का रेशमी गात।
मित्र! कहो ना कथा उस पर्वत की जिस पर विराजते हैं स्कंद।
मेघदूत! बहुत प्राचीन है कथा। परशुराम जब हुए धनुर्विद्या में निपुण। जाँचने के लिए अपने बाणों का सामर्थ्य। तान ली धनुष की प्रत्यंचा क्रौंच की ओर। हो गया तीर प्रथम वार में आर-पार। बन गया क्रौंच पर्वत में रंध्र। कालांतर में गुज़रने लगे इससे होकर मानसरोवर के धवल हंसों के जोड़े दक्षिणापथ की ओर। तुमको भी करना होना उसी रंध्र से झुक कर प्रवेश।
किन्तु मित्र! इस कथा में नहीं था कहीं स्कंद का उल्लेख।
धैर्य धरो वारिद!
सामने जो कनकचौरी ग्राम के ऊपर दिख रहा है सीना ताने एक पर्वत और उसकी धार में शोभता है एक देवालय। है वही मंज़िल हमारी। किन्तु मेरे मित्र क्रौंच वासी स्कंद के गृह तक चढ़नी होगी हमको पैदल ही चढ़ाई। भूल जाओ तुम कि एक मेघ हो तुम और तुमको हासिल है उड़ने की क़ुव्वत।
कहते हो तुम ठीक बिल्कुल ठीक! लेकिन यह क्यों मोटी-मोटी रस्सियों से बांध रक्खा है पर्वत के शिखर को।
एक पल को मैं हँसा और बोला, मित्र यह कोई आम रस्सियाँ थोड़ी हैं इस्पात से बनी हैं यह। अब इन्हीं रस्सियों के सहारे लोग कर पाएँगे पर्वत के शिखर को फ़तह। चल नहीं पाते हैं जो दो क़दम भी पैसे देकर उड़ सकेंगे और चोटी पर बनाएंगे रील। जहाँ पहले दिन में 10-15 लोग मंदिर जाते थे अब 10-15 हज़ार लोग आएँगे। लोगों को आएगा आनंद और सरकार का भरेगा राज कोष।
‘और इस पर्वत के सामर्थ्य का क्या? क्या सही है डालना इस पर इतना बोझ’
चुप रहो। कोई सुन लेगा अगर कर दिए जाओगे घोषित देशद्रोही। इस लिए सवाल नहीं बस वाह-वाह करते रहो।
ख़ैर! ग्राम के उस द्वार से चढ़ने लगे हम सीढ़ी-सीढ़ी, पगडंडियाँ- पगडंडियाँ।
सुनो कथा! मय दानव का एक पुत्र था क्रौंचासुर। क्रौंच पर्वत पर जिसका दलन किया था स्कंद ने। और धारण की क्रौंचदारण, क्रौंचरिपु की उपाधि।
और सबसे मुख्य कथा जिस वजह से स्कंद करते हैं वास यहाँ। एक बार भगवान शिव ने अपने दोनों पुत्र गणेश और कार्तिकेय को ब्रह्मांड के सात चक्कर काटने की बात की और जो जीतेगा इसमें, उसकी पूजा सर्वप्रथम की जाएगी सारे जहाँ में ऐसा दिया वचन।
दोनों पुत्र हो गए तैयार। स्कंद यानी कार्तिकेय होकर मयूर पर सवार चल पड़े ब्रह्मांड की यात्रा पर। लेकिन चतुर-चपल गणेश करने लगे अपने माता-पिता की परिक्रमा। करके सात चक्कर पूरे, बोले आप दोनों ही हैं मेरे तो ब्रह्मांड!
सुनकर बात गणेश की, हो गए सब मंत्रमुग्ध शिव, पार्वती और सारे गण।
लौटकर जब आए वापस कार्तिकेय तो देखा कि गणेश हो गए हैं विजित। सुनकर सारी कथा कार्तिकेय हुए क्रोधित और अपने माँ-पिता को दान करके अपना माँस। केवल अस्थियों के साथ आ बसे इस क्रौंच पर्वत पर।
क्या कहा? सिर्फ़ अपनी अस्थियों के साथ?
हाँ! सिर्फ़ अपनी अस्थियों के साथ। सुनाते हुए स्कंद की कथा नहीं चला पता मार्ग का, चढ़ गए हम तीन किलोमीटर चढ़ाई। सामने सैंकड़ों सीढ़ियों पे चढ़ कर हम पहुँचे उस पवित्र स्थान पर जहाँ विराजते हैं स्कंद।
देखा मैंने मेघदूत अपने माथे को नवाए देहरियों पर, पखारता है कार्तिकेय के पाँव। किया दर्शन और आराधन, स्कंद का वंदन। गर्भगृह में विराजते थे कार्तिकेय, पार्वती और महेश। पूछा मुझसे कहाँ गए श्री गणेश?
आओ मेरे साथ ले गया मैं मंदिर के पृष्ठ भाग में जहाँ अकेले विराजते थे गणेश।
यह गर्भ गृह में क्यों नहीं किए गए स्थापित?
कार्तिकेय हैं गणेश से नाराज़। इसलिए नहीं विराजते साथ।
धन्य हुआ मैं आज। इतना कहकर उमड़-घुमड़ आया। मंदिर के प्रांगण में मेघदूत और बरसाया श्रद्धा का जल। करना चाहा स्कंद की अग्नि को थोड़ा शांत।
शाम हुई आँगन में खेलने लगी ढ़लते सूर्य की रश्मियाँ। पुजारी ने बजाया शंख। गूँज उठे आरती के बोल साथ में मृदंग। मेघदूत ने गरज-गरज के दिया साथ। आरती के बोल छू रहे थे नंदा देवी, त्रिशूल और चौखम्बा के शिखर।
सुबह हुई। हवाओं ने बजाए घण्ट। मैं उठा देखा कि मेघदूत लगा बैठा है धीर-गंभीर मंदिर के स्तंभों से।
‘क्या सोचते हो मेघदूत?’
‘सोचता हूँ किन शब्दों में करूँ यक्ष का धन्यवाद। अगर वह न भेजता मुझे इस प्रदेश तो क्या देख पाता मैं इस जीवन में ऐसे मनोरम स्थान, देवताओं की कर पाता आराधना।
मेघ को देखा और मैं बस मंद मंद मुस्काया।
आगे का सफ़र हुआ प्रारंभ। बढ़ने लगे हम कार्तिक स्वामी मंदिर से अलकापुरी की ओर। बरस रहे थे राह में हर ओर मेघ आषाढ़ के। चोटियों से लिपट-लिपट जाते कभी देवदारों के वनों के बीच हवा के साथ बहते जा रहे थे घाटियों की ओर।
देखो मेघ अब हम प्रवेश करने जा रहे हैं उस ज़िले में जहाँ स्थित है हमारी यात्रा के सब पड़ाव। सीमांत क्षेत्र में बसा चमोली ज़िला।
यह ज़िला क्या होता है?
अब कैसे बताऊँ तुम्हें। यह समझो कि है यह एक प्रदेश।
देखो! सामने जो तुम पहाड़ देख रहे हो। जिसके एक किनारे पर बसा है भव्य ख़ूबसूरत नगर। उसका नाम है गोपेश्वर, भगवान गोपीनाथ यानी महादेव की नगरी गोपेश्वर।
चलो ले चलता हूँ तुम्हें एक पल में वहाँ।
अरे सब्र करो मेघ। पहले देखो अपने बाएँ तरफ़ उत्तुंग शिखर पर एक शिवालय।
अहा! बड़ा मनोरम सुंदर मनभावन है मंदिर। क्या नाम है इसका?
तुंगनाथ, उत्तुंग शिखर पर। शिव का सबसे ऊँचा मंदिर।
इसकी भी है क्या कोई कथा?
मेघ! किसकी नहीं होती है कथा? सबकी एक न एक कहानी होती है।
क्या है कथा?
इससे पहले कथा कहूँ मैं थोड़ा ऊपर उठो और तुमको दर्शन करवाता हूँ उन देवालयों के। जिनके नाम और स्थान हैं जुदा जुदा पर जुड़ी है सब से एक कथा।
उठा मेघ, ऊपर ऊपर, बेहद ऊपर।
यह कथा है महाभारत के समय की जब पांडव ने जीत लिया रणक्षेत्र। भ्रातृ हत्या का पाप लगा। वह पहुँचे काशी कि शिव उनको देंगे सब पापों से तार।
पर शिव तो थे बेहद नाराज़! वह नहीं मिले काशी नगरी।
पांडव दौड़े-दौड़े आए केदार खंड। उत्तुंग शिखरों के बीच घास का एक लंबा चौड़ा बुग्याल! जिसमें चरते थे भैंसे शत शत।
भीम समझ गया शिव की लीला। धर कर अपना विकराल रूप दो पहाड़ों पर टिका पैर वो खड़ा हुआ।
सब भैंसे बारी-बारी से उसके नीचे से निकल गए। पर एक नहीं। वह पहचान गया यह और नहीं शिव हैं साक्षात। वह शिव रूपी भैंसे को पकड़ने को दौड़ा लेकिन तब तक शिव आधे से अधिक भूमि में समा गए। केवल हाथ आया पार्श्व भाग भैंसे रूपी शिव का।
आज वही रूप केदारखंड के उत्तुंग शिखरों में केदारनाथ के रूप में जाता है पूजा। भूमि में समाए शिव निकले अलग-अलग स्थानों पर। इस तरह बने पंच केदार।
हे मेघदूत! तुम अपनी बाई तरफ़ देखो जो तुंगनाथ का मंदिर है उसमें शिव की निकली थी भुजा।
तुम अपने अब उत्तर देखो। वह रुद्रनाथ निकला था जहाँ रौद्र रूप में शिव का मुख।
तुम रुद्रनाथ से अब थोड़ा बाएँ देखो कवि कालिदास की जन्मभूमि कालीमठ से थोड़ा ऊपर, चौखम्बा के बिल्कुल नीचे है मध्यमहेश्वर। जहाँ निकला था शिव का मध्यम भाग।
अब रुद्रनाथ से कुछ ऊपर, उर्गम घाटी के थोड़ा पार है कल्पेश्वर। निकली थी जहाँ शिव की जटाएँ।
मेघदूत ने निहारे पंच केदार, हो गया भाव विभोर। बरस पड़ी उसके शरीर से जल की कुछ बूँदें।
अब अपने ठीक नीचे देखो मेघदूत! अनजाने में ही सही तुमने शिव का कर दिया है अभिषेक। तुम्हारी बौछारों से भीग गई है सम्पूर्ण गोपेश्वर नगरी। निकलने लगे हैं चीड़ और देवदार के वनों की ढलुआ भूमि पर बिछे हुए पिरूल और घास के सीने पर रंग बिरंगे उच्छिलीन्ध्र (मशरूम)।
इस नगरी की क्या है कोई कथा?
इस नगरी में शिव गोपीनाथ बन बैठे। कहते हैं कृष्ण ने वृंदावन में जब रचाया रास तो शिव ने धारण किया गोपी का वेश। पहचान लिया कृष्ण ने उन्हें और बन बैठे वह गोपीनाथ।
देखो मेघदूत! मंदिर के गर्भगृह के द्वार पर इक मूर्ति खड़ी है हाथ जोड़। पहचानो इसे?
मैं नहीं पा रहा हूँ पहचान। कुछ तुम ही कहो!
यह और कोई नहीं है वही राजन जिसके साठ हज़ार पुत्रों को तारने के लिए गंगा का हुआ था पृथ्वी पर अवतरण।
अच्छा! अच्छा! राजा सगर बने हैं यहाँ द्वारपाल।
अब गोपीनाथ मंदिर के थोड़ा पीछे, फिर उसके नीचे देखो। दिखते हैं तुम्हें क्या कुछ मंदिर?
दिखते तो हैं!
यहाँ कामदेव को भस्म किया था शिव ने। अब बाक़ी कथा तो तुमको भी मालूम है पर क्या जानते हो। कहते हैं कि मंदिर के कुंड में रति आज भी एक मछली बनकर है प्रतीक्षारत कामदेव के पुनर्जन्म की।
गोपीनाथ को कर प्रणाम। हम चलते गए। पीपलकोटी, उर्गम घाटी, पहुँचे हम जोशीमठ नृसिंह देव को कर प्रणाम। फिर आगे के पथ पर दिया ध्यान। हैलंग घाटी, गोविंदघाट, भविष्यबद्री फिर श्री बद्रीनाथ!
आखिर को थक कर बैठ गया मेघदूत नर-नारायण पर्वत के बीच। यह पुण्य धाम अहो यह पुण्यधाम। इस धाम को निहारकर मैं हो गया धन्य। हे मित्र! क्या यही है मेरी मंज़िल।
बस ज़रा दूर का और सफ़र फिर आ जाएगी मंज़िल। वह देवताओं के कोष के रक्षक धनपति कुबेर की अलकापुरी नगरी।
बद्रीनाथ के कर दर्शन गद्गद हो गया मेघदूत का मन। अब मन में बलवती थी यक्ष की प्रियतमा को संदेस सुनाने की चाह। लिए मन में इस चाह को हम चल पड़े माणा ग्राम की ओर। मातामूर्ति मंदिर, गणेश गुफा फिर व्यास गुफा।
व्यास गुफ़ा का द्वार बुहार रही थी एक स्त्री। पूछा जब उससे परिचय तो हैरान हुए हम दोनों।
‘हे मेघदूत! मैं हूँ पांचाल नरेश की पुत्री द्रौपदी।
मेघदूत ने पूछा – तुम क्या कर रही हो अकेली यहाँ। तुम तो थी पाँच-पाँच पुरुषों की स्त्री। क्यों आज कोई दिखता नहीं है साथ तुम्हारे इस मंदिर में।
गंभीर भाव से एक पल द्रौपदी ने मुझको देखा वह कहने लगी। क्या यह कथा तुम नहीं सुनाओगे। क्या मुझे ही सुनानी पड़ेगी यह कथा कहानी।
मैं एक क्षण को रहा मौन। मैं क्या बोलूँ। यह सोच रहा था मन ही मन।
तो सुनो मेघ! महाभारत की कथा लिखी थी इसी स्थान पर इसी गुफा में। जब महाभारत का युद्ध जीत पाँचों पांडव अपने पापों का प्रयाश्चित कर। जब चलने लगे स्वर्गारोहण को तो इसी स्थान से आगे द्रौपदी बढ़ न सकी। यह आसमान से बिजली सी गिरती सरिता, तुम देख रहे हो क्या? यह वही नदी है प्रयागराज के संगम पर जो आती नहीं कभी नज़र। यह गंगा यमुना की बहन माँ सरस्वती।
इसके ऊपर पत्थर का पुल इसको बनाया था भीम ने ताकि कर सके द्रौपदी सरस्वती नदी पार किन्तु वह आगे बढ़ न सकी। हो गई यहीं उसकी मृत्यु।
उसको इस नगरी में तन्हा छोड़कर पाँचों पांडव गए स्वर्गारोहण।
मेघ पूछ बैठा – हे द्रौपदी क्या तुम जानती हो अभी कितनी दूर है अलकापुरी नगरी और यक्ष की विरहाग्नि में जलती यक्षिणी।
यह स्वर्गारोहण का मार्ग है जो इसको देखो आगे जाकर यह घाटी खुलती है धनपति कुबेर की अलकापुरी नगरी में। वह विरह में व्याकुल यक्षिणी देखी है मैंने कभी नीलकंठ पर्वत के ऊपर। कभी अलकनंदा के तीरे। कभी बद्रीनाथ के मंदिर में। हो गया है बहुत कमज़ोर गात, अब करती भी नहीं वह कोई बात। कुछ रोज़ हुए तब से वह दिखी नहीं।
हम बढ़े स्वर्गारोहण पथ पर किन्तु मन में संशय कर बैठा घर। क्या विरह में जलती यक्षिणी हमको मिल पाएगी अलकापुरी नगरी में। यक्ष ने अपने घर का जो पता बतलाया था हम पहुँच गए वसुधारा से आगे अलकापुरी पर्वत के निकट अलकनंदा नदी के उद्गम पर। किन्तु यहाँ दिखती नहीं क्यों कोई नगरी।
क्रीड़ा पर्वत की चोटी पर बैठे थककर। हम दोनों का निश्छल अंतर्मन करके महादेव का आराधन फिर देख सका उस नगरी को।
अलकापुरी नगरी। हैं भव्य भवन, ऊँची अट्टालिकाएँ, खिलते हैं जिनके आँगन में ब्रह्मकमल। यक्ष, गंधर्व और किन्नर मृदंग की थापों पर करते नर्तन। दिखता है भव्य सजा धनपति कुबेर का भवन। उसके उत्तर में जब इंद्रधनुष के तोरण के द्वार वाला घर ढूंढ़ा। फिर आँगन में लगे मंदार के बाल वृक्ष से पूछा। क्या यही है राज्य बहिष्कृत यक्ष का घर?क्या यहीं निवास करती है उसकी प्रियतमा यक्षिणी?
एक पल को मंदार का वह वृक्ष सिसक उठा। फिर रोने लगा। थोड़ा संभला तो वह बोला। हाँ यही है वह अभागा आँगन।
मेघदूत ज़ोर ज़ोर से गरजा। उसने दी यक्षिणी को आवाज़। किन्तु कोई नहीं आया बाहर। फिर बोला मंदार के वृक्ष से। मैं रामगिरि पर्वत से आया हूँ अलकापुरी नगरी लेकर यक्ष का संदेसा। पर बाहर कोई आता ही नहीं।
घर में कोई हो तो बाहर आए। आषाढ़ मास के प्रत्येक दिवस जाती हैं यक्षिणी लेकर ब्रह्म कमल कैलास शिखर। महादेव को करने प्रसन्न। ताकि यक्ष से हो सके उसका पुनः मिलन।
फिर एक बार देखने लगा मेरी तरफ़ मेघदूत और बोला। कैलास नहीं अब अधिक दूर। यक्षिणी को संदेसा देकर कर आएंगे हम भी शिव के दर्शन।
हे मेघदूत! तुम कहते तो हो ठीक मगर अब समय नहीं है पहले सा। तुम मेघ हो और मैं इक मानव। तुम जा सकते हो कैलास शिखर, पर मैं नहीं।
तुम क्यों नहीं?
मैं भारत देश का नागरिक हूँ और कैलास स्थित है तिब्बत में।
तो क्या हुआ एक नगर की यात्रा और सही।
एक नगर की यात्रा होती तो बात ही क्या थी। बीच में आ गई है दो देशों की सीमा रेखा। जाने के लिए कैलास मुझे चाहिए होगा पासपोर्ट।
अब यह पासपोर्ट है क्या बला।
प्यारे! तुम मेघ हो तुम घूम सकते हो देस-विदेश का हर कोना। हम इंसान हैं। कहने को तो आज़ाद हैं पर इस पृथ्वी पर हम खींच के बैठे हैं रेखाएँ। उन रेखाओं को पार नहीं कर सकते हम पासपोर्ट बिना।
मुझे नहीं आती तुम्हारी यह बात समझ। तुम यह बताओ अब आगे होगा मेरा क्या?
तुम यहाँ बैठ नंदा देवी का करो ध्यान। अब वही करेंगी तुम्हारी मदद।
उस मेघदूत ने कई दिनों नंदा का किया आराधन। पूजन-वंदन। फिर होमकुंड की ओर से आता दिखा हमें चौसिंगिया खाड़ू(मेढ़ा)।
बोला मेघदूत – यह जीव है क्या?
यह चौसिंगिया खाड़ू नंदा देवी का है वाहन। तुम करो मेघ इसका वंदन। यह लेकर जाता है नंदा देवी का सामान कैलास। तुम इसके ऊपर करो छाँह और चलते जाओ जाता है यह जहाँ जहाँ।
क्या माँगूँ कुछ तुम देने का अगर करो वादा? यह मैंने कहा।
पक्का वादा।
देकर यक्षिणी को संदेस, कैलास शिखर पर कर प्रवेश। तुम मानसरोवर के जल को भर कर एक बार रुद्रप्रयाग आना। और मुझको भी कैलास देस की कथा सुनाना।
देकर के वचन मेघदूत चला गया चौसिंगिया खाड़ू के संग। भीगे जाते हैं मेरे दृग आज बरस न पडूँ मैं मेघ बन।

