
आज पढ़िए उर्दू की प्रसिद्ध लेखिका जीलानी बानो की कहानी, जिसका उर्दू से अनुवाद किया है शमीम उद्दीन अंसारी ने। अच्छे अनुवादक और विद्वान पाठक के रूप में जाने जाते हैं। आप यह कहानी पढ़िए। कहानी वागार्थ नामक पत्रिका में पहले प्रकाशित हो चुकी है- मॉडरेटर
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इस स्वांग के साथ, जो वक़्त ने आज रचाया था, लैला बस स्टॉप पर खड़ी थी। बा-हिम्मत, निडर, ख़ुद-सर (विद्रोही) लैला, जो क़दम-क़दम पर अपने नाम से वाबस्ता तसव्वुर की नफ़ी करती (नाम से जुड़ी कल्पना को नकारती) थी। आज फ़िज़ा में हर तरफ़ मई की गर्म शाम वाली घुटन का ग़लबा (बहुतायत) था, मगर लैला के अंदर तो जैसे ठंडी हवाओं के झक्कड़ (अंधड़) चल रहे थे। इतनी ठंड थी उसके अंदर कि बाज़ वक़्त तो वह कांपने लगती थी।
उसके सामने हैदराबाद का फ़ैशनेबल बाज़ार फैला हुआ था, जगमगा रहा था, महक रहा था। ये बाज़ार तो इंसान को कहीं से कहीं पहुँचा देते हैं। इंसान एक चीज़ खरीदने निकलता है और कोई और चीज़ संभाले घर लौटता है। लैला के आस-पास मर्दों, औरतों का हुजूम था। हर तरह की औरतें थीं। खाली हाथ कपड़ों की दुकानों को तरसी हुई नज़रों से देखने वाली औरतें। दोनों हाथों से वज़नी पैकेट संभाले कारों की तरफ़ जाने वाली औरतें जिनके मर्द बच्चों का हाथ थामे हुए चल रहे थे और बड़े खुश थे, जैसे बीवी की इस फ़ुज़ूल शॉपिंग पर इतने रुपये खर्च कर के उन्होंने बड़ी बाज़ी जीत ली हो।
वादा तो श्याम ने भी लैला से यही किया था कि वह लैला की हर ख़्वाहिश पूरी करेगा। लैला घूम कर स्टेट बैंक चौराहे की तरफ़ देखने लगी जिधर से श्याम की बस आया करती है। फिर वह दोनों रजिस्ट्रार ऑफ़िस जाएंगे—मैरिज सर्टिफ़िकेट पर साइन करने के लिए।
लैला ने अपने आप को ग़ौर से देखा। बस स्टॉप पर खड़े हुए लोगों में से कोई यक़ीन नहीं कर सकता कि वह चंद मिनट में दुल्हन बनने वाली है। ब्लू अमेरिकन जींस और सुर्ख (लाल) डिस्को पहने, कंधे पर एक बैग लटकाए, वह किसी कॉलेज की जूनियर स्टूडेंट लग रही थी। आज उसने नहाने के बाद अपने छोटे-छोटे कटे हुए झंडूले (घने और घुँघराले) बालों के झुंड को भी नहीं सुलझाया था। कोई मेकअप भी नहीं किया था। वह नहीं चाहती थी कि मम्मा ब्रिज खेल कर क्लब से वापस आ जाएं और पूछ लें कि वह कहाँ जा रही है। वह झूठ तो कभी बोलती नहीं और अगर सच कह देती तो…?
रात को भी घर में बड़ा हंगामा हो चुका था। डैडी और मम्मा ने जब देखा कि लैला की दोस्ती श्याम से बढ़ती ही जा रही है तो उन्होंने कल राशिद अंकल को बुलवाया था। राशिद अंकल डैडी के बचपन के दोस्तों में से थे और हर आड़े वक़्त पर काम आते थे। डैडी ठहरे पक्के बिज़नेसमैन जिन्हें फाइलों पर दस्तख़त करने के सिवा और कुछ न आता था और राशिद अंकल ने इतना पढ़ा था कि वह किसी कॉलेज के प्रिंसिपल हो गए थे। अब ये होता कि दौलत के चाबुक से डैडी का कोई टट्टू आगे न बढ़ता तो वह मदद के लिए राशिद अंकल के इल्म की लाठी का सहारा लेते। (अगरचे डैडी इस बात को फिर भी नहीं मानते थे कि कोई काम दौलत से नहीं हो सकता।)
जब कभी मम्मा और डैडी में बहुत जोरदार लड़ाई होती… डैडी दो चार डिनर सेट तोड़ डालते और मम्मा नींद की गोलियों का पैकेट तलाश करने लगतीं तो लैला फ़ोन कर के राशिद अंकल को बुलवा लेती। क्योंकि भारी-भरकम नशे में चूर डैडी को अकेले संभालना उसके लिए बहुत मुश्किल हो जाता था। बेचारे राशिद अंकल ये समझते थे कि मम्मा और डैडी में सुलह उन्होंने करायी है। लैला भी यही ज़ाहिर करती थी। इसलिए जाते वक़्त राशिद अंकल का बार-बार शुक्रिया अदा करती थी। हालाँकि वह जानती थी कि नशा उतरने के बाद वो दोनों आप ही आप नॉर्मल हो जाते हैं।
राशिद अंकल की ज़हानत का क़ायल होने की वजह से ही कल शाम डैडी ने सोचा कि वह राशिद अंकल को बुला कर उनसे कहें कि वह लैला को बहस में मात दे दें ताकि श्याम का नशा उसके सर से उतर जाए। बेचारे राशिद अंकल क्या जानते लैला बे-शुमार ड्रामों में एक्टिंग कर चुकी है। उसने इतने खेल खेले हैं कि बाज़ वक़्त आईने में अपनी सूरत पहचानना भी भूल जाती है। चुनाँचे कल शाम भी उसने राशिद अंकल की हर बात पर इक़रार में सर हिलाया क्योंकि वह जानती थी कि बूढ़ों को बहस में कोई नहीं हरा सकता। उन्होंने श्याम जैसे मुख़्लिस (सच्चे और खरे) इंसान के साथ ज़िंदगी गुज़ारने के जितने भयानक नक़्शे खींचे, लैला ने बड़ी तवज्जो से देखे। एक हिन्दू के साथ शादी करने के जितने खतरों से आगाह किया, लैला ने उन्हें क़ुबूल कर लिया…
उन्होंने कहा— “ज़माना बड़ा ख़राब है बेटा। अमली (व्यावहारिक) ज़िंदगी में क़दम रखोगी तो सारा रोमांस सर पर पैर रख कर भाग खड़ा होगा, क्योंकि हक़ीक़त बड़ी कड़वी होती है। तुम श्याम से मिल सकती हो, मगर एक हद के अंदर… शाम होने से पहले हमेशा घर लौट आया करो।”
इस वक़्त राशिद अंकल की बातें याद कर के लैला को हंसी आ गयी। खब्ती बूढ़ा! यूँ समझ रहा था जैसे मैं नन्ही-सी बच्ची हूँ। अब श्याम आएगा तो उसे कल की पूरी कहानी सुनाऊंगी।
वो भी बहुत हँसेगा राशिद अंकल की नसीहत पर। मगर श्याम को इतनी देर क्यों हो गयी? आने से पहले लैला ने एक चिट्ठी लिख कर मम्मा की टेबल पर रख दी थी कि वह आज श्याम से सिविल मैरिज कर रही है।
अगर मम्मा आज क्लब में बुरी तरह हार रही हों तो वह वक़्त से पहले भी घर आ सकती हैं। चिट्ठी पढ़ने के बाद वह हर तरफ़ आदमियों को दौड़ा देंगी। और फिर सारा प्लान अड़ा-अड़ा धम (चौपट) हो जाएगा। श्याम जल्दी से आ क्यों नहीं आता! अगर मम्मा ज़बरदस्ती मुझे घर ले गयीं तो श्याम का क्या होगा? फिर मम्मा मुझे श्याम से नहीं मिलने देंगी और वह ख़ुदकुशी कर लेगा। वह कई बार कह चुका है कि तुम मुझे नहीं मिलीं तो टैंक बंड से छलांग लगा दूंगा… और वह सचमुच ऐसा कर सकता है। बेहद जज़्बाती, पागल आर्टिस्ट है न वह। बात-बात पर घबराना और बे-बुनियाद अंदेशों पर रोना उसे बहुत अच्छा लगता है। लैला को इन बातों से चिढ़ थी। वह बार-बार श्याम से कहती थी कि मैं वह लैला नहीं जो दिल में क़ैस की याद छुपाए आँसू बहाती एक अमीर आदमी की दुल्हन बन कर चली गयी थी। मैं अपनी मर्ज़ी की मुख़्तार हूँ और जो कुछ करूंगी अपने दिल से करूंगी। मेरे सब बहन-भाइयों ने अपनी मर्ज़ी से शादी की। मेरे भाई ने यूरोप में बीसियों इश्क़ लड़ाए और आख़िर में हिंदुस्तानी ताजिर की लड़की से ब्याह रचाया। मम्मा ने सुना तो बहुत खुश हुईं कि इतनी अमीर बहू उनके घर आयी है। फिर आपा ने जब अचानक कश्मीर से फ़ोन किया कि उन्होंने नवाब क़यामत अली ख़ान से शादी कर ली है तो मम्मा ने खुश हो कर डैडी से कहा था— “अरे वह तो निज़ाम की रॉयल फ़ैमिली का मेम्बर है। बहुत प्रॉपर्टी है उनके पास। मेरी शेहला तो रानी बन कर राज करेगी।” और फिर जब आपा अपने सूखे मरियल दूल्हे के हाथ में हाथ डाले प्लेन से उतरीं तो लैला को बड़ा दुख हुआ। इतना सूखा मरियल दूल्हा था उनका। बिल्कुल अछूर की गाँठ। उसने तो दुख के मारे आपा को मुबारकबाद भी न दी। कार की तरफ़ जाते हुए आपा मम्मा को हीरे के ब्रेसलेट दिखा रही थी और मम्मा की खुशी थी कि सारे एयरपोर्ट को रोशन कर रही थी।
आपा के सूखे मरियल शौहर का ख्याल आते ही लैला के सामने श्याम आ खड़ा हुआ। ऊँचा-पूरा क़द, सेहतमंद और हँसमुख। उसे हर बात पर हंसी आती है… और कुछ न सूझता तो लैला की उस ज़िंदगी पर हंसना शुरू कर देता जो लैला को उससे शादी करने के बाद गुज़ारना थी। वह एक एडवरटाइजिंग कंपनी में डिज़ाइन बनाया करता है। सात सौ तनख्वाह मिलती है। एक छोटे से फ्लैट में रहता है। फ़र्श पर बिस्तर बिछा कर सो जाता है। कोने में स्टोव रख कर दाल-चावल पकाता है। पड़ोसी से मांग कर अख़बार पढ़ लेता है और फिर भी बेहद खुश रहता है। खूब हंसता है, हर वक़्त गुनगुनाता रहता है।
सड़क पर शाम के बेपनाह हुजूम में लैला श्याम की बस ढूँढने लगी। अचानक उसे ऐसा लगा जैसे अब वह श्याम के बगैर एक मिनट भी न जी सकेगी और श्याम है कि बस अंदेशों के मारे मरा जा रहा है कि कहीं मम्मा ऐन वक़्त पर रंग में भंग न डाल दें। ग़ुरबत ने उसे बुज़दिल बना दिया है। जब वह पहली बार लैला के साथ बंजारा हिल्स उसके घर आया था तो हर चीज़ को कितनी दिलचस्पी से देख रहा था… लैला का खूबसूरत गार्डन, शानदार ड्राइंग रूम, हर कोने पर खड़ा हुआ एक नौकर। ड्राइंग रूम पर रखे हुए फ्रूट्स, जूस, मिठाइयां, क़ीमती कटलरी और सुर्ख क़ालीन पर इधर से उधर डोलती, उछलती, क़हक़हे लगाती हुई लैला जो उस घर का सबसे क़ीमती, सबसे खूबसूरत डेकोरेशन पीस थी। यूँ लगता कि ड्रॉइंग रूम में बिखरे हुए तमाम रंगों के इम्तिज़ाज से (रंगो को मिलाकर) उस की माँ ने लैला को गढ़ा था। इसीलिए मम्मा बार-बार लैला को यूँ देखती है जैसे कोई बच्ची अपनी नन्ही-मुन्नी गुड़िया को देखती है। और हर बार उन्हें लैला में कोई न कोई कमी नज़र आ जाती।
“पिंकी चाँद! इस शलवार के सूट के साथ फिरोज़े का सेट पहनना।”
“इन कपड़ों पर ये सैंडल सूट नहीं कर रहे हैं, पिंकी डियर।”
“सेब खा लो, जूस पी लो, कौन सा सालन लोगी?”
और लैला यूँ मुँह बनाती, जैसे मम्मी कड़वी दवा पीने को कह रही हों… श्याम तो कई हफ़्तों तक सोचता था कि एक सेब खरीद लूँ, फैंटा पी लूँ। आज बस की बजाय ऑटो-रिक्शा से घर चला जाऊं। मगर जेब में पड़े दो रुपये उसे रोक लेते। क्योंकि रुपये बड़े ख़ुद-सर (विद्रोही) होते हैं वो जेब से बाहर निकलने के हज़ार बहाने ढूँढ निकालते हैं और दो-चार रुपये ज़्यादा निकल जाएँ तो बस के पीछे चलकर जाना पड़ता है…। ये रूटीन ठीक-ठाक चल रहा था कि एक दिन लैला उनकी कंपनी में पहुँच गयी। उसे एक ड्रामे के कर्टेन (पर्दे) तैयार कराने थे। और उसे बढ़े हुए बालों वाला ये सियाह-फ़ाम (काली रंगत वाला) हँस-मुख आर्टिस्ट बहुत अच्छा लगा। उन सब लड़कों से मुख़्तलिफ़, जो बड़े अदब से झुक कर लैला के लिए अपनी कार का दरवाज़ा खोलते हैं, बड़े तकल्लुफ़ के साथ किसी शानदार होटल में ले जाते हैं और बड़ी दरिंदगी के साथ उसे जानवरों की तरह चबा डालना चाहते हैं।
उधर श्याम को जैसे लैला के क़यामत-ख़ेज़ (क़यामत उठाने वाले) हुस्न की ख़बर ही न थी। वह तो उसे एक मामूली-सी लड़की समझता था और उसकी यही अदा लैला को बहुत अच्छी, बहुत सच्ची लगती थी। बात ये थी कि जब लोग खूबसूरत सजे हुए ड्राइंग रूम में बैठे-बैठे उकता जाते हैं तो उन्हें जंगल में पिकनिक मनाना अच्छा लगता है। क़ीमती सामान से सजे हुए खूबसूरत कमरे में एक काले भुजंग मज़दूर का स्टैच्यू ला कर रख दो तो ये कंट्रास्ट नज़रों को अच्छा लगता है न?
लैला ने भी एक दिन अपने नवादिरात (दुर्लभ चीजों) से सजे हुए ड्रॉइंग रूम में श्याम को ला कर बिठाया तो उसे बड़ा अच्छा लगा। वह सारे घर में खुशी की मारे यूँ उछलती फिर रही थी जैसे कोई छोटी बच्ची खेतों में से बीर-बहुट्टी (गहरे लाल रंग का छोटा रेंगने वाला कीड़ा, जो देखने में बहुत ही सुन्दर होता है) उठा लाई हो।
“मम्मा! मम्मा! वह कितना बड़ा आर्टिस्ट है! और कैसे सादा कपड़े पहने हुए है! मम्मा मम्मा! वह इतना ग़रीब है कि बेचारा दोपहर को लंच तक नहीं ले सकता।” और मम्मा इतने मशहूर आर्टिस्ट की इतनी आर्टिस्टिक ग़ुरबत पर बहुत मुतास्सिर हुईं। मैरून कलर की लिपस्टिक में रंगे हुए होंठों को निकाल कर बड़े दुख से बोलीं— “ओह! पुअर बॉय!”
फिर इन दोनों ने मिल कर इस “पुअर बॉय” की खूब ख़ातिरें कीं। मगर इसके बाद जब भी श्याम लैला के साथ बंजारा हिल्स आता सिर्फ़ एक ही फ़रमाइश करता!
“फ्रिज का ठंडा पानी।”
मई की इस गर्म शाम में फ्रिज का ठंडा पानी लैला को भी याद आने लगा। श्याम के कमरे में एक मैली सी सुराही खिड़की में रखी रहती है। शादी की खुशी में शायद उसने वह सुराही भी न भरी हो। एक बार फर्स्ट शो देखने के बाद लैला श्याम के साथ उसके फ्लैट में गयी थी तो सुराही खाली और नल बंद था… दोनों को बड़ी प्यास लगी थी। इसलिए श्याम अपनी पड़ोसन से एक गिलास पानी मांग कर लाया, जो इन दोनों ने आधा-आधा पिया। बारी-बारी घूँट-घूँट पानी पीने में कितना मज़ा आता है! श्याम उसके इतना क़रीब हो तो हर चीज़ अच्छी लगती है, हर शय खूबसूरत हो जाती है। श्याम के घने बाल कितने अच्छे लगते हैं। उसकी स्याह आँखों में कैसा जादू है कि लैला को उसने अपने रंग में रंग डाला है।
श्याम को दाल-चावल अच्छे लगते थे। लैला भी वही खाने लगी। कॉलेज के बाद वह सारा वक़्त श्याम के साथ गुज़ारती। उसके बिखरे हुए रंग समेटती, उसके ब्रश धो कर रख देती। श्याम के इस छोटे से बे-सरो-सामान (कंगाल) कमरे में लैला को वह लफ्ज़ बे-मानी लगता जिसका नाम दौलत है… मगर अब मम्मा को लैला का श्याम को घर लाना अच्छा न लगता था। बल्कि लैला ने देखा कि जब श्याम चला जाता है तो मम्मा चुपके-चुपके मेज़ पर रखे हुए चमचे गिनने लगती हैं। उस जगह को ब्रश से झटकती हैं जहाँ श्याम बैठा था।
मम्मा अब बार-बार अपने भांजे असलम का ज़िक्र करती थीं जो लंदन के किसी मेडिकल रिसर्च इंस्टिट्यूट में कैंसर पर रिसर्च कर रहा था… लंदन की दौलत और असलम की ख़ूबसूरती। लंदन की आज़ादी और असलम की दौलत। मगर लैला को ये बातें सुनने की फ़ुर्सत ही कहाँ थी। उसे तो सिर्फ़ श्याम की बातें अच्छी लगती थीं।
शादी के बाद वह भी किसी कॉलेज में नौकरी करेगी। उनका एक छोटा सा ख़ूबसूरत घर होगा, जहाँ हर तरफ़ श्याम के रंग बिखरे होंगे। मम्मा ये क्यों नहीं समझतीं कि मुझे खुशी सिर्फ़ श्याम दे सकता है।
कल श्याम ने कहा था— “लैला मैं कल तुम्हारे लिए सिर्फ़ एक अंगूठी लाऊंगा और एक फूलों का हार।”
सिर्फ़ एक ही हार? लैला हंस पड़ी थी और फिर श्याम को अपनी बाहों में समेट कर बोली थी— “फिर तो वो हार हम दोनों से ऐसे लिपट जाएगा।”
ओह! मुझे भी तो श्याम के लिए एक अंगूठी ख़रीदना थी… मगर अब बस आती ही होगी। मुझे यहाँ न देख कर श्याम घबरा जाएगा… ओफ़्फ़ो! कितनी प्यास लग रही है! कहीं श्याम की सुराही खाली न हो!… मैंने एक ग़लती की। नाइटी साथ नहीं लायी। रात को जब श्याम के दोस्त मुबारकबाद देने आएंगे तो क्या मैं यही कपड़े पहने रहूँगी?
श्याम के दोस्त भी एक से एक मन-मौजी हैं। अख़्तर उर्दू का एक मशहूर शायर था और उसने रात उन दोनों की शादी पर एक दिलचस्प सेहरा सुनाया था। सादिक़ कुवैत में इंजीनियर था और उसने एलान किया था कि आज वह इन दोनों को एक शानदार होटल में डिनर देगा… परमेशर सिंह की स्टील के बर्तनों की दुकान थी और उसने उनकी शादी पर स्टील की दो थालियां प्रेजेंट की थीं। इससे तो अच्छा था कि वह बिजली का हीटर दे देता। केरोसिन की बदबू से लैला के सिर में दर्द हो जाता था। श्याम जब उस चूल्हे पर चाय बनाता है तो उस चाय में भी केरोसिन की बदबू आ जाती है जो श्याम को बिल्कुल महसूस नहीं होती। मगर श्याम की उस चाय के साथ उसके क़हक़हों की चाय भी मिलती थी। किसी दिन वह एलान करता कि आज लैला की आमद के सिलसिले में एक ‘एट-होम’ (पार्टी) दिया जा रहा है। उसके मकान के नीचे ही सड़क पर एक बढ़िया कड़ाही में गर्म-गर्म बेसन लगी मिर्चें बेचती थीं। उन मिर्चों के साथ खटाई की चटनी भी मिलती। ये मिर्चें खाने से रात भर मुँह जलता… मगर बड़ा मज़ा आता। वो जब भी श्याम के यहाँ आती तो फरमाइश करती थी, “मिर्चें लाओ ना।“
लैला के यहाँ तो मिर्च का कोई मज़ा ही न जानता था। डैडी को डायबिटीज़ थी, इसलिए वह नमक खाते न शक्कर। मम्मा को हाई ब्लड प्रेशर रहता था इसलिए वह नमक, मिर्च, चिकनाई कुछ न खातीं। इस फीकी, सीठी, उबली हुई चीज़ों वाली मेज़ से लैला को नफ़रत-सी हो गयी थी। अकेली वह कितनी मिठाई, कितने फल, कितनी पुडिंग खाती… और फिर भी मम्मा का इसरार कि कुछ और ठूँस लो। लैला को घर के खानों से मतली होती थी। फोम वाले बिस्तर पर उसे नींद न आती। उसका जी चाहता था वह भी दरी बिछा कर श्याम की तरह फ़र्श पर सो जाए।
श्याम उसे बार-बार डराता:
“सोच लो लैला, अपने हाथ से खाना बनाना पड़ेगा।”
“गोश्त हफ़्ते में एक दिन ही मिलेगा।”
“तुम बस में सफ़र कर सकोगी?”
“तुम मुझे डराना चाहते हो?” वह ख़फ़ा हो जाती थी— “मैंने जो फ़ैसला कर लिया है उसे कोई नहीं बदल सकता।”
और उसके गुस्से को देख कर श्याम सहम जाता। लैला के हाथ थाम कर गिरने से बच जाता।
“लैला अगर मैं तुम्हारा हाथ न थाम लेता तो कहाँ गिरता? मालूम है?”
“कहाँ?”
“टैंक बंड में।”
“चुप!” वह घबरा कर उसका मुँह बंद कर देती।
अल्लाह… कितनी प्यास लगी है! मगर श्याम की सुराही आज खाली होगी।
हाँ, ये बस श्याम ही की है। मगर, मगर मैं अब क्या करूँ? श्याम की सुराही जो खाली होगी। लैला ने हाथ के इशारे से टैक्सी रुकवाई और इससे पहले कि श्याम की बस स्टॉप पर रुकती, लैला ने टैक्सी ड्राइवर से कहा— “बंजारा हिल्स।”
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