बस्तर में सवेरा मृत्यु की बांग से होता है

लेखक आशुतोष भारद्वाज जैसे बस्तर के जीवन की धडकन को अपने शब्दों में उतार देते हैं. भय, संशय, उहापोह के बीच सांस लेता बस्तर, जिसके जंगलों में नक्सलवादी रहते बताये जाते हैं- जानकी पुल.
=================================================================  
गरुड़ पर्व 
मार्च के आखिरी दिनों में बस्तर के पेड़ जब पत्तियां झरा चुकते हैं, धूप तुनकती है जंगल जल उठता है. रात किसी राह से गुजरते में आग की महीन कौंधती लकीर पेड़ों के दरमियाँ सांप सी सरकती है. क्या किसी ने बारूद बिछाया है? जमीन के नीछे छुपी बारूदी खंदक सुलगी है? मंडराती मौत? शुरू दफा ऐसा ही लगता है. बस्तर में आग फकत मौत का फरमान है. बांस की रगड़ खायी सूखी पत्तियों से फूटती जंगल में फैलती चिंगारी भी कारतूस का निशां देती है. बस्तर में आग मौत का मकान है.

भूमिगत खंदक दो किस्म की. बारूद बिछा रिमोट से विस्फोट किया या वह जो वजन या दबाब से आप फूटती है. इस जंगल की सड़क-पगडंडियों पर बतलाते हैं दूसरे किस्म का बारूद तूर्यावस्था में लेटा है. आपके कदम का बेसुध आघात उसे फोड़ देगा नीम की पत्ती सा आपका जिस्म बिखर जायेगा. जंगल को लेकिन बूझना हो तो इन्हीं सडकों पर चलना होता है यहीं से बीहड़ का रस्ता शुरू होता है. जहाँ मृत्यु है. इंसान और लाश का फर्क फकत एक संयोग है.

बस्तर में मौत के अनगिन चेहरे हैं. होंठ किसी के नहीं. बस्तर में मौत बोलती नहीं आँखों से बरसती है. लाश सोते वक्त अपनी पलकें नहीं बुझाती. चमकती पुतलियों से अपनी मृत्यु-कथा कहती है.

***
दक्षिण में बस्तर है, लेकिन उत्तर से आओ तो इस प्रांत का पहला शहर उस गल्पकार का होगा जिसका कथालोक मृत्यु-दीवार को चीरती खिडकी रचेगा. वह गल्पकार बस्तर की इस यात्राकथा और कथायात्रा का साथी नहीं. बस्तर में कोई साथी हो ही नहीं सकता. यहाँ आप अकेले हैं. चमकते पीतल के कारतूस के सामने कोई राग-सम्बन्ध वैसे भी शेष नहीं रहता.

इस कथा के कई किरदार-वाचक. सेवानिवृत सेनाधिकारी जिन्होंने भारत-बंगला युद्ध लड़ा था और अब यहाँ सिपाहियों को गुरिल्ला लड़ाई के पैंतरे सिखाते हैं. धुर जंगल में हरी तिरपाल तले रहता वह लड़ाका जिसका हथियार उन्मादी भूख में डूबा है. उत्तर पूर्व से आया वह सिपाही जो अपनी प्रेमिका से दो हजार मील दूर यहाँ अँधेरे जंगल में बन्दूक संभाले है या मृत्यु के मुहाने पर जी रहा आदिनिवासी. दंतेवाडा, सुकमा में कित्ते घर होंगे जिन्होंने कारतूस न देखा हो. जिन्दा गोली नहीं —- मांस में फंसी, गुर्दे में अटकी मुर्दा गोली.
बस्तर में सवेरा मृत्यु की बांग से होता है

***
बस्तर में पोस्टमोर्टम बंद चीरघर में नहीं होता. जंगल में पड़ी लाश को आदिनिवासी अपने घर उठा ले आते हैं, पुलिसियों को नहीं ले जाने देते. डॉक्टर जंगल के गाँव आता है. औरत डाक्टर का हाथ पकड़ उसे खुले आंगन में खींच लाती है — वहाँ उसका बेटा लेटा है. भरे गांव के सामने सफ़ेद दस्ताने पहने डॉक्टर छाती पर चमकते सुराख़ में ऊँगली फंसा गोली निकालता है. छाती की उम्र सत्रह साल फकत.

****
रायपुर की एक कॉलोनी में पैंतालीस करीब के मेजर साहबरहते हैं. पूरा दिन पार्क में बैंच या गेट पर चौकीदार के पास बैठे रहेंगे. कभी वहीँ एक घर में रहते एक लड़के से देर तक बतियाते हैं. सिर्फ दो बातें कहते हैं — उनकी तबियत इन दिनों बहुत खराब चल रही है. अड्बंगी सी ध्वनियों में अनसुनी बीमारियों का जिक्र करेंगे. दूसरी, हाल ही शायद सुबह या पिछली रात उनके घर में किसी की मृत्यु हो गयी. किसकी? बाबा शायद अम्मा.. अस्पष्ट से कुछ संबंधकारक सर्वनाम गिनाते हैं. कुछ दिन मुलाकात लड़के से न हो पाए तो उसके घर की चारदीवारी पर आ पंजो पर उचक झांकते हैं. कभी गेट नहीं खटखटाते, गेट खोल अंदर दरवाजे पर आना उनकी फितरत नहीं. उचक कर देखेंगे, चारदीवारी से परे पोर्च, दरवाजा और उसके घर का हॉल. कोई बच्चा जिसकी बौल पडोसी के घर में चली गयी है लेकिन वो अंदर घुस उठाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है, गेट पर खड़ा इंतजार करता है कब कोई बाहर आये उससे बौल उठाने की कहे.

अगर दरवाजा खुला हो तो वह लड़का उन्हें हॉल में टहलता आता दिख जाता है..तुरंत धुंधली सी आवाज में पुकारेंगे — कल बाबा मर गया..आज नीचे पेट में बहुत दर्द है, डॉक्टर के पास जाना है.
यह बाबा कौन थे क्यूँ मरे उनके पास कोई वजह नहीं सिवाय इसके कि उन्हें किसी भैयाने दवाई नहीं दी.

उनके घर के सामने पुलिस की एक ठुलल्ड जीप दिखाई देती है. किसी थानेदार टाईप छुटभैये पुलिसिये का घर है. उनका बड़ा भाई शायद. लड़के के घर से उनकी छत दिखती है. कभी वो छत पर टहलते दीखते हैं तो हँसते हाथ हिलाते हैं. मेजर साहब को शायद बिस्कुट बहुत पसंद हैं. अक्सर मांगने आते हैं. बिस्कुट की शुरुआत दिलचस्प है. एक बार लड़के की कार के डैशबोर्ड पर पारले जी का एक पैकिट रखा था. शायद कुछ दिन तलक रखा रहा होगा, वह खाना या उठाना भूल गया होगा. उन्हीं दिनों एक मर्तबा उसकी चारदीवारी पर आये थे, बोले — बिस्कुट खाना है. वह रसोई में गया. घर में बिस्कुट नहीं है, उसने बतलाया. है तो. कहाँ? वहाँ, उन्होंने पोर्च में खड़ी कार को इशारा किया.

उन्हें देखने, उनसे मिलने के कुछ ही दिन बाद लड़के को लगा वे पहले कभी मेजर रहे होंगे, अगर नहीं तो उन्हें कम अस कम अब तो मेजर साब ही हो जाना चाहिए. कुछ ही दिन बाद लेकिन उनका यह नाम, अन्य नामों की तरह, बिगड गया. चौकीदार ने मेजर को मैगनेटो बना दिया, वे हो गए —- मैगनेटो साब. रायपुर में मैगनेटो एक मॉल है.

****
क्राईम रिपोर्टर हवा में क़त्ल का निशां खोजता है. बस्तर का क्राईम रिपोटर हवा में मौत की गाँठ बांधता है. वह मृत्यु को डीकोड करता है, जिग्सो पजल से बिखरे लाश के तंतु समेटता है. वह ख़ुफ़िया जासूस है, पुलिस का विवेचना अधिकारी भी. वह एक मृत्युकार भी है, रूह और रंगत में उपन्यासकार का जुड़वां. उसे लाश की ठंडी, तटस्थ कथा अपने अखबार के लिए रचनी है. निर्मल वर्मा बतला गए हैं एक उपन्यासकार अपने किरदारों को सहानुभूति बराबर मात्रा में बांटता है, एक महान उपन्यासकार इस सहानुभूति के प्रति संघर्ष करता है. क्राईम रिपोर्टर को मालूम है सहानुभूति उसकी कथा को चकनाचूर करती है. वह बस्तर के अज्ञातवास में उपन्यास रचता है. फकत लाश उससे रूबरू, और कुछ नहीं. उसके झोले में थाने की फाईल से उड़ाई कुछ पोस्टमोर्टम रिपोर्ट हैं, ताजे लहू की तस्वीरें, मुर्दा गोलियों के खोल और कुछ दस्तावेज. इसमें से कुछ चीजों का प्रतिबंधित होना मुकरर्र हुआ है. उसे इन्हीं वर्जनाओं, प्रतिबंधों की दीवार में सेंध लगानी है.
***
किसी वाकये, अल्फाज पर उपन्यासकार हफ़्तों महीनों ठहरा रहता है. उपन्यास गल्प और गल्पकार की अखीरी मंजिल. गल्पकार उपन्यास रच मृत्यु के खौफ से उबरता है. कोरे पन्ने का खौफ मृत्यु से भी ज्यादा दहशतगर्द. बस्तर क्राइम रिपोर्टर का अंतिम मुकाम. हरेक लाश को उसे महीनों अपने कलम की नोंक पर थामे रहना है. उसकी नोटबुक जिन्दा कब्रों की वसीयत.
***
एक कारतूस भी अगर ठीक जगह छुए इंसान को चुप लाश बनाता है. कारतूस इसलिए क्रूर नहीं होता. बन्दूक के घोड़े को दबाती ऊँगली भी बेरहम नहीं, दरअसल बड़ी सहमी हुई होती है. अँधेरे जंगल की रात में फंसा सिपाही सेकिंडों में दसियों कारतूस उगल देने वाली अपनी बन्दूक अगर बेतहाशा घुमाता है, सत्रह, चौदह, तेरह, उन्नीस और बाईस साल की निर्दोष काया को लाश में तब्दील करता है तो वह फकत खुद को लाश होने से बचा रहा है. क़त्ल शुरू होता है जब वह लाश की छाती अपनी छुरी से चीर, छुरी पर रिसता लहू लाश के लहंगे से पोंछता है.
बस्तर में शिकार इंसान नहीं लाशों का होता है.

****
इंसान और लाश का फर्क फकत एक संयोग है.

****
खिंचते बुढ़ापे, तोड़ती बीमारी या मलेरिया-कैंसर की मृत्यु के बाद पुनर्जन्म, मुक्ति जैसी अतर्कित ही सही उम्मीद जुड़ती है. मृतक के दूसरे जीवन, अगर ऐसा कोई जीवन होता हो तो, की बेहतरी की कामना भी. संस्कार, अस्थि विसर्जन, श्राद्ध इत्यादि इसी उम्मीद की संतान. कुल्हाड़ी लेकिन उम्मीद को चकनाचूर करता अंत है. लाश जब चिथड़ों में बिखरी हो, पेट में छुपे लाल केंचुए कीचड़ में लिसड़ते हों तो गरुड़ पुराण भी तसल्ली नहीं देती. वेसे गरुड़ पुराण कब तसल्ली देती है यह अभी तय नहीं है.
महानगर में इंसान की मृत्यु होती है, जंगल में लाश बुझती है.

***
महुआ बस्तर का राष्ट्रीय पेय. शादी, प्रेम या दस साल के बच्चे समेत परिवार के चार लोगों का क़त्ल — आदमी और औरत हर लम्हे को महुए में डुबो पीते हैं. पिछले बीसेक सालों में इस जंगल की निधियां स्वाहा हुईं, महुआ लेकिन बेफिक्र रहा. महुआ न होता तो बस्तर का मानुष कब का मिट जाता.
साल में फकत पन्द्रह दिन महुआ मार्च-अप्रैल में टपकता है, पूरे साल महकता है. 

***
दिल्ली में रहते कई मासूमदिल लोग छापामार लड़ाके को मुल्क का असली और अखीरी योद्धा बतलाते हैं. वे, जाहिर है, कभी बस्तर नहीं आये. जंगल में मचान बना रहता यह लड़ाका खुद को आदिनिवासी का खुदा कहता है. इसकी ये सादादिली, उफ़. खुदा की खुदाई का आलम ये कि जब से जंगल में लड़ाई शुरू हुई इसने सिपाही कम अपने लोगों पर अधिक कुल्हाड़ी चलायी, उनकी आँखें निजी संग्रहालय में रखीं, कटा सर उनके पिता को ससम्मान भेंट किया. कसूर? वे माकूल मुखबिर नहीं थे. इस लड़ाके की ठगी, लुच्चई के किस्से अलग हैं. जिन कस्बों में बिजली भटकती हुई आती है, अंग्रेजी दारू की दुकान पर जेनरेटर रात दस तलक गुलजार रहता है. गरीबी रेखा से नीचे इन इलाकों में कौन पीता है कार्ल्सबर्ग बीअर?

***
यह युद्ध जो हमें बतलाया जाता है कि आदिनिवासी के लिए लड़ा जा रहा है, दरअसल शिकार सिर्फ इसी जंगल में रहते प्राणी को ही बनाता है. दोनों ओर के सेनापति शहरी हैं, दूर से युद्ध संचालित करते हैं — महफूज़ रहते हैं.

***
बस्तर की सात जिंदगी. दसेक साल पहले यूरोप के कई देशों से भी बड़े इस बीहड़ जिले के तीन हिस्से हुए, उसके बाद दो, फिर दो और. आज सात जिले — बस्तर, कांकेर, कोंडागांव, नारायणपुर, बीजापुर, दंतेवाडा और सुकमा. हिन्दोस्तान का एकमात्र जिला जिसकी छाती पर सात मर्तबा चाकू चला.

अस्सी, नब्बे के दशक तलक जब अविभाजित बस्तर के एसपी या कलक्टर उत्तरी नारायणपुर जाया करते थे, दक्षिणी सुकमा के विभागीय अधिकारी हफ़्तों लंबी झपकी निकाल लिया करते थे. मालूम था साहब जल्दी नहीं लौटेंगे, न उन्हें सुध होगी दक्षिण के हालात जानने की. नारायणपुर की कोख में अबुझमाड उर्फ अदेखा जंगल सोया है. छापामार लड़ाकों का बड़ा अड्डा. छ हजार वर्ग किलोमीटर में फैले इस माड को दो हजार बारह मार्च में सिपाहियों ने पहली दफा पार किया. उससे पहले जनगणना अधिकारी, पटवारी भी इस जंगल में कम गए थे. किसी को नहीं मालूम था भीतर क्या है कौन सा रस्ता लेना है. सैटेलाइट और गूगल की तस्वीरें ही इस अबूझे जंगल का नक्शा बतलाती थीं. सिपाही जब अंदर गए मालूम हुआ अंतरिक्ष से खींची जो फोटू लड़ाकों की मचान बतलाती थीं, वो पालतू जानवरों के बाड़े थे. उपग्रह से दीखते विशाल किले दरअस्ल थे प्राचीन बांस के अथाह झुरमुट.

बस्तर ने विज्ञान को चुप ध्वस्त किया.
***
साहित्य का भोपाल स्कूल जिन वर्षों में जन्मा, कांच के गिलास में लबालब शराब सा उसका शबाब छलका, वह बस्तर में मृत्यु के शुरू दिन थे. बस्तर तब उसी प्रांत का अंग था, जिसकी भोपाल राजधानी था. बस्तर के पुलिस अधिकारी राजधानी के आकाओं तलक सूचना दे रहे थे पड़ोसी प्रांत आन्ध्र से आते लड़ाकों के आरंभिक दस्ते की. आदिनिवासी का अवसाद अब फूट कर बाहर आएगा, बस्तर रणभूमि बनेगा — यह निर्धारित हो रहा था. भोपाल लेकिन राग मल्हार गा रहा था. इस स्कूल में कई डायरी लेखक, यायावर रहे. आदिकला, संगीत, पुरातनता, परंपरा इत्यादि पर बेइंतहा खुशफहम बातचीत हुई. नर्मदा के दक्खिन को लेकिन किसी ने नहीं छुआ.
तारीखें मिलायेंगे तो यह भी पता चलेगा बस्तर में शुरुआती क़त्ल की रात भोपाल में उत्सवधर्मिता के लम्हे थे. भोपाल की रूह पर रक्त के वो निशां हैं जिनसे झील पर बसा यह शहर नावाकिफ है. उसे यह निशां दिखलाये जाने चाहिए.

***
मेजर साब के गुर्दे कमजोर हैं. उनका इलाज भी नहीं हो पा रहा है. डैथ रिपोर्टर जब भी जंगल जाता है, हिचकी अटकी रहती है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

1 mins
WordPress Center Ankara Escort: Beypazarı Escort, Pursaklar Escort, Etimesgut Escort İstanbul Escort: Esenyurt Escort, Bahçelievler Escort, Maltepe Escort Bursa Escort: Gürsu Escort, Keles Escort, İznik Escort What are the best budget smartphones available in 2025? Reason Why Everyone Love Travel Doubts About Lifestyle You Should Clarify VKomatic Automatic Post Generator and VKontakte Auto Poster Plugin for WordPress Starto – WooCommerce Responsive Email Template PDF Creator for NEX-Forms WordPress Appointment Schedule Booking System Pro Tiva Testimonials Slider For WordPress MeMeMe – The Meme Generator | WP Plugin Smart NFT – Bulk minting (Addons) WooCommerce Manual Pricing – Name Your Price Plugin Most Wanted WordPress Plugins Pack ChatNet – PHP Chat Room & Private Chat Script