वरिष्ठ लेखिका अलका सरावगी से बातचीत पढ़िए। यह बातचीत की है लेखक यतीश कुमार ने। अलका जी की लेखन यात्रा को लेकर हुई इस बातचीत में अनेक नये बिंदु सामने आये। आइये पढ़ते हैं- मॉडरेटर
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यतीश कुमार– अलका सरावगी साहित्य की दुनिया में कैसे आईं?
अलका सरावगी- पीछे मुड़कर देखती हूँ तो ज़िंदगी के बहुत सारे संयोग नज़र आते हैं। अशोक सेक्सरिया जी से मुलाक़ात हुई बाल-कोश बनाने के दौरान। मेरे बचपन का कोई अनुभव सुनकर उन्होंने कहा, क्यों न आप इसे लिखें। मुझे लगा, इसमें लिखने लायक क्या है, लेकिन फिर मैंने उसे लिखा। वह कलकत्ता से निकलनेवाली ‘परिवर्तन’ पत्रिका में छपा। उसके बाद एक जुनून सा चढ़ा। नवभारत टाइम्स में ‘आठवाँ कॉलम’ के लिए कई बार लिखा। दूसरा संयोग यह हुआ कि कलकत्ता के पास ही एक गाँव की यात्रा से लौटकर एक कहानी लिखी गई— ‘आपकी हँसी’। वह रवींद्र कालिया ने ‘वर्तमान साहित्य’ के महाविशेषांक में छापी और बस, मैं वैचारिकी की दुनिया से निकलकर कहानी की दुनिया में विचरने लगी।
यतीश कुमार- बचपन, कॉलेज जीवन और उन दिनों साहित्य से आपके रिश्ते ने एक लेखिका बनने की आपकी यात्रा को कैसे आकार दिया?
अलका सरावगी- बचपन से ही मुझे पढ़ने का ऐसा शौक था कि किताबों के अलावा कुछ नज़र नहीं आता था। जो भी मिला मैंने उसे पढ़ डाला। माँ की किताबों से रानू, चतुरसेन शास्त्री, शिवानी के उपन्यास और धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, सरिता वगैरह पत्रिकाएं। कुछ पढ़ने नहीं मिलता तो ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ (रामचंद्र शुक्ल) की पोथी पढ़ने लग जाती। स्कूल के अंत तक आते-आते लाइब्रेरी में प्रेमचंद की कहानियों के सारे खंड पढ़ लिए थे। कॉलेज के दिनों में सिर्फ़ अंग्रेजी की किताब पढ़ीं। अगाथा क्रिस्टी, शेरलॉक होल्म्स, चेज़, सिडनी शेल्डन से लेकर लियोन यूरी, आर्थर हेली, ऐन रेंड, सॉमरसेट मॉम, टॉल्सटॉय जो मिला, सब पढ़ डाला। लेकिन असली पढ़ना अशोक सेक्सरिया से 24 की उम्र में मिलने के बाद हुआ। सोचती हूँ कि सभी का असर मुझ पर पड़ा होगा।
यतीश कुमार- ‘साहित्य के गांधी’ कहे जाने वाले आपके गुरु अशोक सेकसरिया जी का आपके जीवन और लेखन पर क्या प्रभाव रहा? उनकी संगति और मार्गदर्शन ने आपकी वैचारिक दृष्टि तथा रचनात्मक संवेदना को किस प्रकार आकार दिया?
अलका सरावगी- अशोक जी के प्रभाव को शब्दों में बताना मुश्किल है। अशोक जी एक करुणावान फ़क़ीर और ऐसे साहित्यप्रेमी थे जिनके लिए लिखना ही जीवन का अर्थ था। उनकी चिंताएँ देश-दुनिया से लेकर समाज, संस्कृति और भाषा तक फैली हुई थीं। एक शादीशुदा संयुक्त मारवाड़ी परिवार की स्त्री के रूप में मेरी सीमित दुनिया के लिए अशोक जी का कुटियानुमा कमरा दुनिया को जानने-पहचानने की खिड़की थी। उस कमरे में हिंदी के तमाम बड़े साहित्यकारों कृष्णा सोबती, निर्मल वर्मा से लेकर प्रभाष जोशी जैसे पत्रकारों और वैकल्पिक राजनीति से जुड़े चिंतकों सच्चिदानंद सिन्हा, किशन पटनायक की आवाजाही थी। मैं सबको ध्यान से सुनती थी। मैं जानती थी कि समय लगेगा, पर एक दिन मैं सब समझ लूंगी। अशोकजी या किसी विद्वान से किसी किताब का ज़िक्र सुन जाए, तो मुझे उसे खोजकर पढ़ना ही था।
अशोक जी में ख़ुद को गुरु मानने जैसा ईगो तो था नहीं, कि कुछ समझाकर बताते। अक्सर कहते, “मैं तो कुछ जानता नहीं”, “मेरी समझ बहुत कम है।” बस ऐसे ही उनसे सीखना था। बिना पढ़ाये कोई कैसे पढ़ाता है, यह वही कर सकते थे। किसी बहस में अपने को सही सिद्ध करना आसान था, क्योंकि वे सामनेवाले की बात मान लेते थे। मेरे जैसे तमाम लोग उनके साथ ऐसी मूर्खताएं करते रहते थे। अमेरिकन लेखक सिंगर की कहानी ‘गिम्पल द फ़ूल’ और दोस्तोव्यस्की का उपन्यास ‘द ईडियट’ उनकी प्रिय रचनाएं थीं।
यतीश कुमार- राजस्थान और कोलकाता-दोनों की सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषिक विरासत का आपकी लेखनी पर कैसा प्रभाव रहा है? कृपया इस पर थोड़ा विस्तार से बताइए। साथ ही, आज के तेजी से बदलते समय में आप मारवाड़ी समुदाय के अपनी सांस्कृतिक जड़ों, परंपराओं और मूल्यों से जुड़ाव को किस तरह देखती हैं?
अलका सरावगी- विरासत तो एक अदृश्य शक्ति है जो हमें अपनी तरह से गढ़ती है। मैं कलकत्ता में प्रवासी मारवाड़ियों की पाँचवीं पीढ़ी हूँ। अपनी धरोहर को मैंने 1857 के गदर से लेकर आज़ादी की पचासवीं वर्षगाँठ मनाती पीढ़ी तक अपने पहले उपन्यास में ही खंगाला था। उसके बाद भी शेष कादम्बरी, कोई बात नहीं, जानकीदास तेजपाल मेन्शन और कुलभूषण का नाम दर्ज कीजिए में एक सूत्र के रूप में कलकत्ता के मारवाड़ी समाज को अलग-अलग समय और अलग अलग वर्ग के कोण से देखा और लिखा गया। मेरे लिखने के शैली में बंगाल की कहानी बुनने की कलात्मकता का असर न आया हो, यह तो हो ही नहीं सकता। यों भी विमल मित्र, ताराशंकर बंदोपाध्याय, शरतचंद्र के अनुवाद तो हर घर में पढ़ने मिल जाते थे।
किसी भी भारतीय परिवार में शादी का माहौल पुराने जमाने के रीति-रिवाज-गीत-संगीत के मार्फ़त अपनी दुनिया की विरासत को जानने का मौका देता है। वह एक आईना भी होता है जिसमें आप बदलते जीवन-मूल्यों और सरोकारों को समझ पाते हैं। लड़की की शादी किस उम्र में होती है, कितनी आज़ादी के माहौल में उसे पाला गया है, अपना वर चुनने की उसे कितनी आज़ादी है, उसने कितनी पढ़ाई की है और जीवन का कोई उद्देश्य उसे मालूम है या नहीं वगैरह। मैंने देखा कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी मारवाड़ी समाज आधुनिक और शिक्षित होता गया है, किंतु अर्थ-प्रधान मानसिकता शादी में बेहद खर्च, ब्रांड की खरीदारी और खाने-पहनने की आधुनिकता तक सीमित है। इसलिए पुरातन और नए का अजब घालमेल है। पारंपरिक भारी घाघरा पहने हुए काला चश्मा लगाये बम्बइया फ़िल्म की धुन पर वरमाला हाथ में लिए नाचती हुई वधू को देख लीजिए। वैसे उपभोक्तावाद ने अमूमन आज समूचे भारत के मध्यवर्ग को ऐसा ही बना दिया है, मारवाड़ी और नॉन-मारवाड़ी में कहाँ कोई भेद बचा है! मूल्य के तौर पर सहकारिता, वायदे की क़ीमत और ईमानदारी भी ग़ायब हैं, जिनके कारण कभी मारवाड़ियों ने व्यापार की दुनिया में रसूख हासिल किया था। आज किसी को दिया गया रुपया डूबने की संभावना सौ नहीं तो नब्बे प्रतिशत तो होगी।
यतीश कुमार- कोलकाता का ‘कॉस्मोपॉलिटन’ स्वभाव बहुत बौद्धिक और राजनीतिक रहा है। क्या यहाँ के वामपंथी आंदोलनों और ‘अड्डा’ संस्कृति ने आपके किरदारों की सोच या उनके सामाजिक सरोकारों को प्रभावित किया है? अगर हाँ तो कैसे?
अलका सरावगी- अशोक सेक्सरिया का घर किताबों, अख़बारों, पत्रिकाओं और सिगरेट के धुएँ और राख से भरा एक विराट साहित्यिक अड्डा था, जिसमें पुराने नक्सलवादियों, समाजवादियों, ट्रेड यूनियन के लोगों, वैकल्पिक राजनीति से जुड़े तमाम छोटे- बड़े आंदोलनों से जुड़े लोग आते-जाते रहते थे। अशोकजी जैसे रेलवे के प्लेटफार्म पर रहते थे, जिसमें कोई भी बस-ट्राम से उतरकर कभी भी आ-जा सकता था। वह कमरा रात हो या दिन, कभी बंद नहीं होता था।
रघुवीर सहाय पर शोध करते हुए, जो कि जाहिर है मैंने उनकी सलाह से ही किया था, आज़ादी के बाद लोकतंत्र के ह्रास को मैंने गहनता से समझा। लोकतंत्र कैसे क्रोनी कैपिटलिज्म में बदलता गया, भ्रष्टाचार कैसे एक देश का जीवनमूल्य बना, आज़ादी के आदर्शों की खुरचन तक नहीं बची वगैरह वगैरह। अशोकजी का जीवन एक स्यापा था तो इन्हीं वजहों से। मैं शुरू में सोचती थी कि अशोकजी को तो न बीवी-बच्चों का झंझट है, न इन्हें कोई पद-धन-यश चाहिए, फिर ये दुखी क्यों रहते हैं? मेरा लेखन इन्हीं सबका क्रानिकल है।
यतीश कुमार- पुराने कोलकाता के बहुमंजिला शहर में बदलते जाने के साथ उसके कॉस्मोपॉलिटन चरित्र में आप क्या खोता और क्या बनता हुआ देखती हैं? क्या आज का कोलकाता आपके शुरुआती लेखन वाले कोलकाता की तुलना में अधिक स्मृतिहीन होता जा रहा है? यदि संभव हो, ‘कलकत्ता कॉस्मोपॉलिटन : दिल और दरारें’ उपन्यास के परिदृश्य और पात्रों के संदर्भ में भी इस बदलाव को समझाइए।
अलका सरावगी- कॉस्मोपॉलिटन का अर्थ तो यही है न कि विभिन्न धर्म, भाषिक समुदाय, वर्ग और संस्कृति से आए हुए लोग एक जगह रहते हों और एक साझा जीवन चला सकते हों। बहुमंज़िला इमारतों में रहने वाले लोग भी अपने कम्यूनिटी कार्यक्रम चलाते हैं। पर प्राइवेसी की अवधारणा बढ़ने के कारण एक दूसरे से मुहल्लेवाली घनिष्ठता शायद ही रखते हों। स्मृतिहीनता तो नहीं कहूँगी, पर स्मृतियाँ अक्सर किसी सामूहिक दुर्गा पूजा या दीपावली के उत्सव से जुड़ी होती हैं। जीवन में उत्सवधर्मिता बढ़ी है, अपनापन नहीं।
मेरे शुरुआती लेखन में चौक के मकान थे जहाँ कमरों के दरवाज़ों पर पड़े पर्दों के पीछे का कोई राज़ छुपता नहीं था। अब तो ख़ैर लोग मोबाइल में खोए हुए बॉलीवुड टाइप की गॉसिप में डूबे रहते हैं। पड़ोसियों में रुचि ही नहीं रही। फ्लैटों के दरवाज़ों पर पर्दे नहीं, मज़बूत लकड़ी और लॉक होते हैं। कोई आवाज़ बाहर टहलने नहीं जा सकती। ‘कलकत्ता कॉस्मोपॉलिटन: दिल और दरारें निम्न- मध्यवर्गीय मुसलमानों के परिवेश की कथा है जिसमें जीवन का संघर्ष इतना है कि स्मृति-विस्मृति का कोई मूल्य नहीं है। हर आदमी बस किसी तरह ज़िन्दगी का जुगाड़ जमाने में लगा है। पलंग के ऊपर सोते हुए लोगों के ठीक नीचे सोनेवाले लोगों के जीवन में कोई चाहे भी तो कुछ छुप नहीं सकता। यहाँ सब कुछ सार्वजनिक है। ग़रीबी में जीने की जद्दोजहद के आगे सोचने की कोई बात नहीं होती।
यतीश कुमार- विस्थापन आपके उपन्यासों का एक केंद्रीय बीज-शब्द प्रतीत होता है। यह केवल भौगोलिक स्थानांतरण नहीं, बल्कि एक गहन सांस्कृतिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अनुभव भी है। आपकी रचनाओं में विस्थापन की यह बहुआयामी अवधारणा किस प्रकार अभिव्यक्त होती है?
अलका सरावगी- ‘कलिकथा वाया बाइपास’ के किशोर बाबू की पीढ़ियों का विस्थापन और ‘कुलभूषण का नाम दर्ज कीजिए’ के कुलभूषण का विस्थापन बहुत अलग है। एक में स्वेच्छा से अपनी धरती को छोड़कर आर्थिक समृद्धि की तलाश है तो दूसरे में ऐतिहासिक-राजनीतिक बदलाव के कारण मजबूरन विस्थापन है।
किशोर बाबू के परदादा ने पहले विश्व महायुद्ध के दौरान धन कमाकर राजस्थान में हवेली बनवाई। निर्वासन का कष्ट और परिवार से विछोह का कष्ट अगली पीढ़ियों में धीरे-धीरे कम होता गया। सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक कष्ट अगली पीढ़ियों ने ज़्यादा महसूस किया क्योंकि वे बंगालियों के बरक्स बहुत पिछड़े थे। बहुत से आंदोलन मारवाड़ी समाज में हुए जिनमें विधवा-विवाह, पर्दा-मुक्ति, बेमेल विवाह और स्त्री-शिक्षा से जुड़े मुद्दे थे।
आज़ादी के बाद का दौर सामाजिक और पारिवारिक मूल्यों के स्खलन का दौर था। किशोर बाबू का बेटा हैसियत न होते हुए भी ज़ीरो इंटरेस्ट पर बड़ी गाड़ी खरीदता है। घूस न देने की सलाह देने पर पिता को पागल करार कर देता है। लोग अपने पिछले इतिहास को धो-पोंछकर उसे चमकदार बनाते हैं। कहानियाँ आसपास की दुनिया को दर्ज कर समाज की नब्ज़ पकड़ती हैं।
यतीश कुमार- आपके उपन्यासों के पात्र अक्सर भीड़-भरे परिवारों और घनिष्ठ रिश्तों के बीच रहते हुए भी गहरे अकेलेपन और विस्थापन का अनुभव करते दिखाई देते हैं। क्या आधुनिक समाज में ‘घर के भीतर का विस्थापन’ बाहरी या भौगोलिक विस्थापन से अधिक जटिल अनुभव बन गया है?
अलका सरावगी- दरअसल हमारे समाज के डीएनए में है कि वह लगातार लोगों को हाशिए पर धकेलता रहता है। शायद यह हिंदू समाज की वर्ण-व्यवस्था का एक्सटेंशन है। हम ऐसा मानते हैं कि हमारी संस्कृति में करुणा हमें विरासत में मिली है। लेकिन हकीकत में आप देखें कि परिवार में अगर कोई लड़की (और लड़का भी) अगर साँवला या कम सुंदर है तो वह कई तरह के उपहास को सहते हुए हीन भावना से ग्रस्त कर दिया जाता है। विदेशों में बूढ़े तो बूढ़े, जवान विकलांग लोग मज़े में बाहर घूमते नज़र आते हैं, हमारे समाज में ऐसा शख़्स भीड़ में भी अकेला कोने में बैठा मिलेगा: यदि वह किसी तरह घर से निकला हो। अंग्रेजी न जाननेवाले विद्वान को लोग अक्सर मूर्ख मान लेते हैं। अंग्रेज़ी ने भी एक वर्ण व्यवस्था बना डाली है। मेरे पात्र किसी न किसी हाशिए से पाठक को आवाज़ देते हैं कि वह उनकी ओर देखे।
यतीश कुमार- आपके लिए एकांत क्या है- सृजन और आत्मबोध का स्रोत या आंतरिक रिक्तता का कारण? आपकी रचनाओं में एक गहरा आंतरिक अकेलापन बार-बार उभरकर सामने आता है। क्या आपकी रचनाओं का अकेलापन इसी संवेदना से उपजता है?
अलका सरावगी- मेरा जीवन निरंतर परिवार की भीड़ से घिरा रहा है। बचपन से अब तक। उसमें एकांत बस उतना ही है जितना समय लिखने-पढ़ने में लगता है। लेकिन मेरे सृजन का स्रोत यह भीड़ ही है जो मुझे जीवन से जोड़े रहती है। उसके बिना मेरा अस्तित्व कहीं मँझधार में फँस जाएगा। तमाम शिकायतों, दुखों, असहमतियों की रस्साकशी के बीच जीवन के रस का संधान हर मनुष्य करता है। उसे करना ही होता है। बचपन से मेरी परवरिश जैसे हुई उसने मुझे जीवन से जूझने के रास्ते और हिम्मत सिखाई थी। ख़ुद को बचाए रखने और अपने परिवेश को सुधारने के तरीके भी। जीवन में समन्वय ही सब कुछ है – अपने होने और दूसरे के होने के बीच, एकांत की इच्छा और अकेलेपन के बीच, मुक्ति और माया के बीच। देह धरे का दंड तो है ही ।
यतीश कुमार- आपने एक जगह ‘Voluntary Amnesia’ यानी ‘स्वैच्छिक विस्मृति’ की बात कही है। क्या समाज और इतिहास सुविधानुसार कुछ स्मृतियों को सहेजते और कुछ को भुला देते हैं? आपकी रचनाओं में स्मृति और विस्मृति का यह द्वंद्व कैसे काम करता है?
अलका सरावगी- मनुष्य की यह सामान्य वृत्ति है कि वह अपने जीवन के रजिस्टर को पलटते हुए उन पन्नों को देखना नहीं चाहता जो उसे असहज करते हों। इसलिए अक्सर वह एक झूठ गढ़ने लगता है जो बाद में उसे ख़ुद को भी सच लगने लगता है। परिवारों में ऐसे लोग आपको आसानी से दिख जाएँगे। यही वृत्ति जब एक समाज में दिखने लगती है तो वह इतिहास को भी बदलना चाहता है। आज़ादी की लड़ाई के आदर्श, गांधी की राजनीति क्या कहीं बची है? आपको गांधी को नकारनेवाले, गाली देने वाले लोग भी आसानी से मिल जाएँगे। वर्तमान में पूरा विश्व अपनी सुविधानुसार झूठ गढ़ने में लगा है। वरना एआई की मदद से डीपफेक बनाने की क्या ज़रूरत होती? यह अब नया ही दौर है। इसमें सच को खोज निकालना मुश्किल है। voluntary amnesia तो इसके सामने कुछ नहीं। भूलने की बजाय यह तो नया सच गढ़ने की कोशिश है।
यतीश कुमार- ‘कलिकथा: वाया बाइपास’ से लेकर ‘कुलभूषण का नाम दर्ज कीजिए’ तक आपकी रचनाओं में साधारण दिखने वाली वस्तुएँ और स्मृतियाँ जैसे ‘एक घिसी हुई चप्पल’ वर्षों बाद भी पाठकों के मन में बनी रहती हैं। आपके लिए ऐसी स्मृतियों और प्रतीकों का रचनात्मक महत्व क्या है?
अलका सरावगी- कुछ वस्तुएं या स्मृतियाँ एक मोटिफ की तरह आपकी रचनाओं में जाने-अनजाने धंस जाती हैं। बाइपास के दौरान सिर में चोट लगने से बहकता आदमी, डेढ़ चप्पल में शहर में घूमता आदमी, रूबी गुप्ता की विरासत में मिली ग्रैंडफ़ादर्स क्लॉक, जानकीदास तेजपाल यानी एक झुका हुआ मकान- ऐसे ही मोटिफ हैं। शायद इन्हीं की ऊर्जा से कथा आगे बनती जाती है।
यतीश कुमार- आपकी रचनाओं को पढ़ते हुए अक्सर लगता है कि पात्र कथानक से भी अधिक जीवंत और प्रभावशाली होकर उभरते हैं। किशोर बाबू, कुलभूषण या सुनील बोस जैसे चरित्र पाठकों की स्मृति में कहानी से आगे तक बने रहते हैं। आपके लेखन में कहानी अधिक महत्वपूर्ण है या किरदार? क्या पात्र कहानी को गढ़ते हैं, या कहानी पात्रों को? क्या आपके पात्र उपन्यास पूरा हो जाने के बाद भी आपका पीछा करते रहते हैं? कभी ऐसा महसूस होता है कि कोई किरदार आपसे पूरी तरह विदा नहीं हुआ, बल्कि वह किसी न किसी रूप में लगातार आपके भीतर संवाद करता रहता है? क्या कुलभूषण इसलिए कलिकथा से निकलकर अपना नाम दर्ज कराने चला आया।
अलका सरावगी- पात्र और कथानक siamese twins की तरह जुड़े रहते हैं। एक के बिना दूसरे का कहाँ अस्तित्व है? इसलिए कौन ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है, कहना मुश्किल है। यह सच है कि उपन्यास के पात्र पूरा हो जाने के बाद भी आपके साथ रहते हैं। समय बदलता रहता है और यह ख़याल आ ही जाता है कि वह पात्र ज़िंदा है या होता तो अभी क्या करता । कुलभूषण का डेढ़ चप्पल वाला पात्र शायद इसी वजह से एक पूरे उपन्यास का मुख्य किरदार बनकर आ गया।
यतीश कुमार- आपकी रचनाओं के शीर्षक हमेशा ध्यान आकर्षित करते हैं और अपने भीतर एक अलग अर्थ-संसार समेटे रहते हैं। शीर्षक आप चुनती हैं या फिर शीर्षक स्वयं आपकी रचना-प्रक्रिया के दौरान आपको खोज लेते हैं?
अलका सरावगी- शीर्षक हमेशा रचना पूरी होने के बाद ही आते हैं। पहले नहीं। कलिकथा वाया बाइपास के शीर्षक में एक कौतुक था जो मुझे आकर्षित करता है। बाकी के चुनाव में भी यह तत्व रहता है। मेरा मानना है कि यह भी अशोकजी के कारण है! उनमें किसी भी कौतुक की बात एक बालसुलभ आश्चर्य दिखता था।
यतीश कुमार- उपन्यास-लेखन की आपकी अपनी एक विशिष्ट प्रक्रिया रही है । लेखन के दौरान वह कौन-सा प्रबल या केंद्रीय पक्ष है, जिस पर आप सबसे अधिक भरोसा करती हैं- शोध, स्मृति, अनुभव, कल्पना, पात्रों की आंतरिक दुनिया या कुछ और?
अलका सरावगी- सबसे अधिक भरोसा तो पात्र की अंदर-बाहर की दुनिया पर ही होता है। बाक़ी सब बाद में अपने आप जुड़ता चला जाता है। कलिकथा वाया बाइपास की शुरुआत ‘बीचवाला कमरा कहाँ है’ से हुई थी। उसके बाद आया शोध; लोगों की स्मृतियों और अनुभवों में उतरना जिन्होंने उस कालखंड को जिया था। कल्पना इन सब के बीच लेखक के लिए अपनी तरह के चमत्कार करती रहती है। लगभग ऐसा ही दूसरे उपन्यासों के साथ हुआ। जिसे आप शैली कहते हैं, वह लेखक के लिए भी अजूबा होता है। पर उस पल वही एकमात्र रास्ता दिखता है। लेखक कुछ चकित, कुछ भरमाया सा उसी रास्ते चल पड़ता है।
यतीश कुमार- आपके उपन्यासों में प्रेम अनेक रूपों में उपस्थित दिखाई देता है। कहीं प्रत्यक्ष, कहीं स्मृति के रूप में, तो कहीं संबंधों की जटिल परतों में छिपा हुआ। एक रचनाकार के रूप में आप अपने उपन्यासों में प्रेम को कितना महत्व देती हैं? दीबा का प्रेम और सरला का प्रेम कितना अलग है?
अलका सरावगी- प्रेम तो एक अंतरधारा है जो जीवन के भीतर कभी दिखती तो कभी ओझल होती चलती है। प्रेम में धोखा भी है, अपना वर्चस्व जमाने की इच्छा भी है। इसी धूप-छाँव में प्रेम का खेल चलता है।
दीबा का प्रेम सतत है। वह धोखा खाकर भी कम नहीं होता। लेकिन सरलादेवी का गांधी के प्रति प्रेम सरल नहीं हो सकता था। उसमें समाज की बंदिशें, गांधी की अपेक्षाएँ और अपने कुछ ख़ास होने का अहंकार – सब तरह की बाधाएं हैं। वह परकीया प्रेम है, वह भी एक ब्रह्मचर्य की क़सम खाये हुए व्यक्ति के संग। उसका आयतन सिर्फ़ व्यक्तिगत नहीं था, देश की आज़ादी के साथ जुड़ा था। दीबा का प्रेम नितांत व्यक्तिगत है, अलबत्ता उसमें प्रेम के प्रति एक सूफी भाव है।
यतीश कुमार- आपके उपन्यासों में प्रेम प्रायः एक ‘खामोश उपस्थिति’ की तरह दिखाई देता है। वह शोर मचाकर या नाटकीय ढंग से अपनी मौजूदगी दर्ज नहीं कराता, बल्कि पात्रों के जीवन, स्मृतियों और संबंधों की भीतरी परतों में धीरे-धीरे आकार लेता है। क्या प्रेम की पूर्णता उसकी तीव्रता को कम कर देती है?
अलका सरावगी- प्रेम पूर्ण होता ही कहाँ है—और तीव्रता तो हर चीज़ की कम होना प्राकृतिक है। प्रेम का स्वप्न होता है और फिर जीवन भर उसकी तलाश रहती है। असल में प्रेम का अनुभव जीवन भर मिलता रहता है। बस उसे किसी पूर्व धारणा से तौलना नहीं चाहिए। मेरे पात्रों से मैंने यही जाना है।
यतीश कुमार- सरला देवी और रूबी गुप्ता, दोनों स्त्री पात्र अपने-अपने संदर्भों, अनुभवों और जीवन-दृष्टियों के कारण विशिष्ट पहचान रखती हैं। आप इन दोनों के बीच समानताओं और भिन्नताओं को किस रूप में देखती हैं? साथ ही, क्या स्त्री- अनुभव का कोई ऐसा विशेष पक्ष है जिसे आप अपनी रचनाओं में प्रमुखता से अभिव्यक्त करना चाहती हैं?
अलका सरावगी- इस प्रश्न को लेकर कभी सोचा नहीं। समानता इतनी तो है कि दोनों एक तरह के विशिष्ट समाज से हैं जहाँ शिक्षा और आत्मविकास के अवसर बहुत थे। दोनों ने अपने जीवन में अपनी राह निकाली। लेकिन भिन्नता भी बहुत है क्योंकि सरलादेवी का जीवन देश की आज़ादी जैसे एक महान लक्ष्य से प्रेरित था। रूबी गुप्ता उस अर्थ में एक पढ़ी-लिखी महिला भर हैं जो स्त्रियों की मदद के लिए एक संस्था चलाती हैं। स्त्री-अनुभव के पक्ष तो आते ही हैं दोनों उपन्यासों में।
यतीश कुमार- सरला देवी जैसे विशिष्ट पात्र को एक ओर रखकर यदि आपके समग्र स्त्री-पात्रों की बात करें, तो वे केवल निजी संघर्षों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि समाज में समानता, स्वायत्तता, प्रतिनिधित्व और अपनी अस्मिता के प्रश्न भी उठाते हैं। आप अपने स्त्री- पात्रों की इस वैचारिक और सामाजिक भूमिका को किस रूप में देखती हैं?
अलका सरावगी- कहानी जिस डगर चलती है, उसमें जैसी स्त्रियां आती हैं—दब्बू घरेलू औरत, सड़क पर खड़ी वेश्या, सामाजिक कार्यकर्ता, समाज के नियमों की मारी विधवा, इंजीनियर पढ़ी हुई विचारवान औरत—उनका अपना रेंज है कि वे किन प्रश्नों को उठायें!
मेरा यह भी मानना है कि किशोर बाबू की पत्नी जैसी औरत, जो ज़िंदगी भर मुँह सिलकर रहती है, उसका किरदार में आना समाज में समानता और स्त्री की पहचान का प्रश्न उठाना है। नामवर सिंह ने कहा था कि किशोर बाबू की पत्नी का मौन हज़ार वाक्यों से ज़्यादा बोलता है। रघुवीर सहाय ने एक जगह लिखा है कि यदि हमारे पात्र ही रचना में क्रांति कर लेंगे तो पाठक में क्रांति करने की भावना नहीं जागेगी।
यतीश कुमार- आपके उपन्यास में देह और प्रणय को बहुत स्थान नहीं दिया गया दिखता है। यह कोई कॉन्शस डिसीजन है क्या? या ये भी कहिए कि आपके उपन्यासों में मारवाड़ी समाज के बंद अनुशासन का चित्रण है । वहाँ ‘देह’ अक्सर लज्जा और पर्दे के पीछे छिपी रहती है। एक लेखिका के तौर पर, इस ‘पर्दे’ को हटाकर देह की आकांक्षाओं को शब्दों में ढालना आपके लिए कितना चुनौतीपूर्ण रहा है?
अलका सरावगी- दरअसल मेरे लिए देश और समाज से जुड़े राजनैतिक, सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक मुद्दे इतने महत्वपूर्ण रहे कि मैं ख़ुद को स्त्रीदेह या स्त्रीमन तक सीमित नहीं कर पाई। कहानी की ज़रूरत के अनुसार वे आए या आने से रह गए। ‘एक ब्रेक के बाद’ उपन्यास में प्रेम का एक चतुर्भुज है जिसमें चार लोग जुड़े हैं। वहाँ देह का सवाल है, पर उसकी ओर इंगित भर है। ‘कलकत्ता कॉस्मोपॉलिटन’ में भी एक जगह ज़िक्र आता है देह की ज़रूरतों का। मुझे कभी ज़रूरी नहीं लगा कि मैं उसके वर्णन में लग जाऊँ। मुझे यह भी अक्सर लगा है कि औरतों की देह और सेक्सुअलिटी का वर्णन कहीं लेखन के बाज़ार की माँग बनकर न रह जाए। एक ब्रिटिश लेखिका जेन रोजर्स ने मुझे कहा था कि उसके उपन्यास के कवर पर छपी बिकिनी पहनी हुई औरत का किताब के कंटेंट से कोई मेल नहीं था। उसने प्रकाशक से पूछा तो जवाब मिला कि उन्हें किताब बेचनी भी तो है। औरत की देह तरह-तरह से बाज़ार की वस्तु रही है; कहीं लेखन में भी वही न बन जाए।
यतीश कुमार- आपकी रचनाओं की स्त्रियाँ केवल ‘विद्रोह’ का स्वर नहीं बनतीं, बल्कि वे ‘खामोश गरिमा’ के साथ अपनी जगह निर्मित करती हैं। उनका प्रतिरोध अक्सर सूक्ष्म, आत्मसजग और भीतर से संचालित दिखाई देता है। क्या आपको लगता है कि स्त्री-विमर्श को केवल नारों और प्रत्यक्ष प्रतिरोध की सीमाओं में नहीं, बल्कि ऐसे ही सूक्ष्म अनुभवों, मौन संघर्षों और आत्मसम्मान की अभिव्यक्तियों के धरातल पर भी समझे जाने की आवश्यकता है?
अलका सरावगी- कहानी-उपन्यास सब तरह के लिखे जाने चाहिए। वैरायटी से परहेज़ क्यों हो । हर लेखक के पात्र और उनके संघर्ष अलग होते हैं। मेरे स्त्री पात्र यदि विद्रोह करते नहीं दिखते तो इसलिए क्योंकि वे अपने जिए हुए समय या इतिहास के प्रतिनिधि होते हैं। किशोर बाबू की पत्नी ने जैसा जीवन बिताया- चुप रखकर, बिना कुछ बोले—वह उनके समय में औरतों की स्थिति को बोलता है। हम उनके हाथ में फेमिनिस्ट झंडा अगर थमा दें तो वह नक़ली झंडा होगा। जानकीदास तेजपाल मेंशन में जयगोविंद की पत्नी इंजीनियर है पर वह भी कोई नौकरी नहीं करती। सत्तर के दशक में किसी औरत के लिए नौकरी मिलना इतना आसान नहीं था यदि उसे परिवार से ऐसी छूट मिल भी जाती ।
कलकत्ता कॉस्मोपॉलिटन: दिल और दरारें की दीबा अपने पैरों पर खड़ी औरत है पर वह प्रेम की उस ऊँचाई को समझती है जहाँ हार और जीत दोनों एक होते हैं। आप कह सकते हैं कि उसका प्रतिरोध बहुत गहरा और सूक्ष्म है।
मुझे लगता है कि आज भी तमाम आज़ादी की बातों और पाई हुई आज़ादी के बावजूद औरत यदि बहुत तोड़-फोड़कर के समाज के माने हुए दायरे से निकल जाती है तो उसका जीवन बहुत अधिक संघर्षपूर्ण होता है। यह औरत कहानी में एक पाठक को लुभा सकती है किंतु वास्तविक ज़िंदगी में उसे अपनी आज़ादी की क़ीमत चुकाते देखना कष्टकर होता है। बेशक यह संभावना बनी हुई है कि मेरे किसी उपन्यास में एक ऐसी औरत आए ।
यतीश कुमार- आपकी रचनाओं के अनेक पुरुष पात्र चाहे ‘ब्रेक के बाद’ के किरदार हों, किशोर बाबू, कुलभूषण या सुनील, अक्सर किसी अनकहे अपराधबोध, स्मृतियों और अतीत की छायाओं के साथ जीते दिखाई देते हैं। क्या आपको लगता है कि हिंदी साहित्य में पुरुष मन की जटिलताओं को अभी और गहराई से समझे जाने की आवश्यकता है?
अलका सरावगी- पुरुष-मन की जटिलताओं को समझने जैसी बात तो अब तक किसी ने सोची न होगी! मेरे ये सारे पुरुष पात्र अपनी ख़ास परिस्थितियों की उपज हैं। यही बताने के लिए वे पात्र बनकर आए हैं। सुनील बोस और कुलभूषण दो अस्मिताओं और नामों की रस्साकशी में जी रहे हैं। जीने का यह तरीका उनकी मजबूरी है जो उनके जीवन और समय की मुठभेड़ के कारण है। किशोर बाबू आज़ादी के खो गए आदर्शों की खोज करते- करते पागल करार कर दिए जाते हैं। उनका नया अवतार वर्तमान समय की आदर्शहीनता बताने के लिए है। पुरुषवादी समाज में यदि किसी समय की गाथा लिखनी हो तो पुरुष पात्र ही काम आता है। स्त्रियों की भूमिका तो सार्वजनिक क्षेत्र में बहुत कम रही है।
यतीश कुमार- आपने कहानी, बाल साहित्य और उपन्यास तीनों विधाओं में लेखन किया है। एक समय के बाद आपका झुकाव लगभग पूरी तरह उपन्यास की ओर दिखाई देता है। ऐसा क्या है जो आपको उपन्यास की विधा में अधिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति का अवसर देता है?
अलका सरावगी- कलि कथा लिखने के बाद से मुझे लगा कि उपन्यास आपको जीवन और इतिहास के तमाम रंग-रूपों में प्रवेश करने और कहीं से भी निकल आने देता है। कोई ज़रूरी नहीं कि हर पात्र पूरे उपन्यास में बना रहे। उपन्यास में कथाओं का संजाल बुना जा सकता है। यह किसी और विधा में संभव नहीं है। कहानी जीवन का पूरा भार नहीं संभाल सकती। वह एक झलक भर दे सकती है। उपन्यास आपको अनंत आज़ादी देता है।
यतीश कुमार- पहली किताब पर ही आपको साहित्य अकादमी सम्मान मिला। अक्सर माना जाता है कि बड़े पुरस्कार लेखक पर अपेक्षाओं का दबाव भी बढ़ा देते हैं। आपके अनुभव में पुरस्कार किसी लेखक की रचनात्मक यात्रा को किस प्रकार प्रभावित करते हैं। अकादमी पुरस्कार प्राप्त करने के सुखद और कटु या चुनौतीपूर्ण अनुभव दोनों साझा करें।
अलका सरावगी- मेरे अनुभव सुखद रहे। घर पर लोगों ने जाना कि सिर्फ़ काग़ज़ पर काले अक्षर ही नहीं रंग रही हूँ। रास्ता आसान हुआ कुछ। अशोक सेक्सरिया दुखी थे कि मैं आगे लिख नहीं पाऊँगी। पर मुझे ख़ुद पर भरोसा था।
और तो क्या? कोई सम्मान दे तो क्या और न दे तो क्या । लिख पाना ही सबसे बड़ा सम्मान है जो आप ख़ुद को देते हैं।
यतीश कुमार- आपकी अनेक रचनाएँ विदेशी भाषाओं में अनूदित हुई हैं और विभिन्न देशों के पाठकों तक पहुँची हैं। विभिन्न सांस्कृतिक परिवेशों में अपने पात्रों को पढ़े जाते देखना कैसा अनुभव रहा? क्या इससे अपने लेखन को देखने की आपकी दृष्टि बदली है?
अलका सरावगी- मैंने पहली बार पेरिस यात्रा में किताब की दुकान देखकर सोचा कि क्या कभी मेरी किताब यहाँ हो सकती है? आश्चर्य कि उसी यात्रा में निमंत्रण आया कि मुझे तीन महीने बाद प्रकाशक से मिलने पेरिस जाना है। सपने कभी ऐसे भी सच होते हैं। मेरे लिखने पर कोई असर नहीं पड़ा क्योंकि मेरे ध्यान में सिर्फ हिंदी के पाठक होते हैं। मैं सिर्फ़ अंग्रेज़ी के अनुवाद पढ़ सकती हूँ और तब मैं एक अलग पाठकवर्ग की निगाह से अपनी रचना को देख पाती हूँ। रचना की जो बारीकियाँ हिंदी का पाठक बिना बताए समझ लेता है, उन्हें अनुवाद में कुछ विस्तार देना पड़ता है। शायद इसीलिए अंग्रेज़ी में लिखनेवाले लेखक बहुत ब्योरे में नहीं जाते होंगे। पर मुझ पर ऐसा कोई दवाब नहीं होता।
यतीश कुमार- नए लेखकों के लिए, जो समाज के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामुदायिक आयामों को अपनी रचनाओं का विषय बनाना चाहते हैं, आप क्या सलाह देना चाहेंगी? विशेष रूप से शोध और सृजनात्मकता के बीच संतुलन स्थापित करने की प्रक्रिया को आप किस प्रकार देखती हैं, ताकि रचना तथ्यात्मक रूप से विश्वसनीय होने के साथ-साथ साहित्यिक रूप से भी जीवंत बनी रहे?
अलका सरावगी- क़िरदार जीवंत होगा तो संतुलन अपने-आप बन जाएगा। शोध की सहूलियत अब गूगल वगैरह की दुनिया में अपार है, किंतु ज़ाहिर है कि उससे रचना पर बोझ डालने से रचना की पाठक के हृदय में पैठ कम हो जाएगी। आप जब एक किस्सा पढ़ते हैं तो उसके प्रवाह में होते हैं। कोई जानकारी या ज्ञान का बखान उस प्रवाह में बाधा न डाले, यह तो बहुत ज़रूरी है। तथ्य अगर आयें तो रचना को दिलचस्प बनाने के लिए। उनका कोई और मकसद न हो।
यतीश कुमार- लेखन में साहित्य से बाहर के आपके करीबियों का कितना योगदान रहा है। अगर आप कुछ साझा कर पाएं। खासकर आपके पति महेश जी और परिवार के करीबी लोगों के संदर्भ में।
अलका सरावगी- सबने मुझे और मेरे दोनों बच्चों को पाला-पोसा। सास-पति-दोनों देवरानियों ने खासकर। चौका–चूल्हा, ख़रीदारी, पूजा-पाठ, रिश्तेदारियाँ निभाने से मुक्त रखा। वरना कैसे लिख पाती? पति की भूमिका तो सबसे अधिक होती है क्योंकि अपने पात्रों की दुनिया में गुम पत्नी अक्सर सामने होते हुई भी नहीं होती है। बच्चों को भी ऐसी माँ के साथ अपनी जिम्मेदारियों को ख़ुद संभालने की आदत डालनी होती है।
यतीश कुमार- इतनी लंबी और समृद्ध रचनात्मक यात्रा के बाद आज जब आप पीछे मुड़कर अपनी लेखकीय दुनिया को देखती हैं, तो आपको क्या लगता है कि आपकी रचनाओं का वह केंद्रीय प्रश्न क्या है, जिसका उत्तर आप अब भी खोज रही हैं? और पाठक आपकी आने वाली रचनाओं से क्या अपेक्षा कर सकते हैं?
अलका सरावगी- नौ उपन्यासों का एक केंद्रीय प्रश्न बताना मुश्किल है। फिर भी कह सकती हूँ–विस्थापन और उससे जुड़े अस्मिता के संघर्ष। किसी आदत या जीवनशैली को छोड़ना-पकड़ना, स्वीकार करना या अड़े रहना, बदलना या नहीं बदलने का कष्ट उठाना, स्मृति और विस्मृति से जूझना। अगला उपन्यास भी इसी पर होगा।


