अभी हाल में ही सुषमा गुप्ता का उपन्यास आया है ‘तलब’। स्मृतियों के रेशे से बुने गए इस उपन्यास पर…
Category: समीक्षा
बचपन की ओर खुलता एक दरवाज़ा
लेखिका रेखा झा के उपन्यास ‘बिना मुरदों वाला दीया’ बचपन की स्मृतियों की अल्हड़ कहानी है। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित…
मेरी माँ, मेरी गैंगस्टर: निजी इतिहास में छिपा सामाजिक इतिहास
अरुंधति रे की किताब प्रभात सिंह के अनुवाद में ‘मेरी माँ, मेरी गैंगस्टर’ जब से प्रकाशित हुई है लगातार चर्चा…
ख़ालिद जावेद का उपन्यास: यतीश कुमार की टिप्पणी
ख़ालिद जावेद उर्दू के ऐसे लेखक हैं जिनको हिन्दी में खूब पढ़ा जाता है। हाल में उनका उपन्यास रेख्ता से…
आचार संहिताओं का मूल्यांकन करती कविताएँ: हज़ारों निशान
पिछले जून जानकीपुल पर शिवांगी गोयल की कुछ कविताएँ प्रकाशित हुई थीं। और ठीक एक साल बाद शिवांगी अपने पहले…
‘विचार और वजूद’ लोक की जड़ों में रोपी गई जमीन की हकीकत
प्रसिद्ध लेखिका नूर ज़हीर के 2008 में प्रकाशित उपन्यास ‘बड़ उरैये’ के बहाने वैचारिकता के संघर्ष पर यह टिप्पणी लिखी…
एक पोटली में कितने दाने
हाल ही में आलोक कुमार मिश्र का कविता-संग्रह ‘पोटली के दाने’ प्रकाशित हुआ है। आज इस संग्रह की चर्चा…
अभय के का ‘नालंदा’
प्रसिद्ध लेखक और राजनयिक अभय के की किताब ‘नालंदा: विश्व चेतना का उद्गम स्थल’ नालंदा को लेकर लिखी गई एक…
अचीन्हे विषयों से पहचान कराती कविताएँ
अमेय कान्त के हालिया प्रकाशित काव्य-संग्रह ‘किसी छूटे हुए दिन में’ पर यह टिप्पणी लिखी है वरिष्ठ कवि राजेश सक्सेना…
सर्जनात्मक शिक्षा: समय की माँग
सृजनशीलता मानवीय व्यक्तित्व का सर्वोच्च और मूलभूत क्षमता है, जो व्यक्ति को जीवन एवं जगत् के बहुआयामी यथार्थ के बने-बनाए…



