वरिष्ठ लेखक संतोष दीक्षित से बातचीत प्रस्तुत है। बातचीत की है युवा कवि-आलोचक चन्द्रबिंद ने। आप भी पढ़ सकते हैं। यह बातचीत संतोष दीक्षित के उपन्यास ‘खलल’ को केंद्र में रखकर की गई है- मॉडरेटर
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प्रश्न- आप कहानी और उपन्यास दोनों में समान रूप से सक्रिय और सफल हैं। आप व्यक्तिगत रूप से किस विधा में खुद को ज्यादा सहज पाते हैं?
उत्तर— जहाँ तक सवाल कहानी और उपन्यास का है, दोनों ही विधाओं की जमीन अलग-अलग है। कहानी अपने समय और समाज के टटके यथार्थ से सीधे टकराती है और वर्तमान समय को अक्सर प्रश्नांकित करती है। कहानी एक क्षण विशेष या कहें कि सीमित कालखंड की विधा है , लेकिन इसका प्रभाव तीव्र होता है, जबकि उपन्यास के लिए हमारी स्मृतियाँ और जीवनानुभव धरोहर की तरह हैं। यह एक तरह से पथ प्रदर्शक होते हैं।उपन्यास एक पूरी जिंदगी की हलचल है, जीवन की संपूर्णता का कलात्मक दस्तावेज, जबकि कहानी किसी क्षण विशेष का स्फुरण।
वैसे जो आपका मूल प्रश्न है, इसके जवाब में यही कह सकता हूँ कि चाहे कहानी हो या उपन्यास शुरू करने से पूर्व और प्रथम ड्राफ्ट तैयार होने तक काफी तनाव में रहता हूँ। पता नहीं लोग सहजता से कैसे लिख लेते हैं… मुझसे तो यह हुनर आज तक नहीं सधा। हर रचना शुरू करने से पहले लगता है मानो हाथ पैर फूल रहे हैं और शरीर में जान ही न हो। जैसे-जैसे कलम आगे बढ़ती है और कुछ मनपसंद लिखा जाता है, लेखन के प्रति एक सहज अनुराग उत्पन्न होने लगता है। सच तो यह है कि किसी कथ्य को महसूस करने और उसे लिख पाने के बीच आज भी बहुत फाँक रह जाता है। निरंतर लिखते रहने का एक कारण यह भी है। सहजता और आत्मसंतुष्टि आज भी मुझसे कोसों दूर हैं!
प्रश्न– ‘ख़लल’ उपन्यास की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली? क्या यह उपन्यास आपके व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित है या आपने समाज में कुछ विशेष देखा या अनुभव किया, जिसने आपको इसे लिखने के लिए प्रेरित किया?
उत्तर— सबसे पहले मुझे उपन्यास पर जैनेंद्र कुमार की एक टिप्पणी याद आ रही है–“उपन्यास आत्मा की यात्रा है। यह व्यक्ति के भीतर के सत्य को प्रकट करता है।” ख़लल उपन्यास में वर्णित यथार्थ मेरी आत्मा की यात्रा है। वह आत्मा जो पिछले दस-बारह वर्षों से बदलते सामाजिक यथार्थ और व्यक्तिपरक मूल्यों के चलते निरंतर लहूलुहान होती रही है। देश में हिंदुत्व के विचार के साथ भ्रष्टाचार का विरोध और जन सामान्य के सपने को पूरा करने के वादे के साथ देश में सन 2014 में जो सत्ता परिवर्तन हुआ, इसने आगे चलकर हमारी धर्मनिरपेक्ष एवं परस्पर प्रेम तथा सद्भावना पर आधारित सामाजिक संरचना को एक जोरदार झटका दिया। नफरत, अलगाव एवं राष्ट्रवाद के आक्रामक रवैये ने आम लोगों के मानस को किस तरह झकझोरा और बदला है, एक रचनाकार के रूप में इसे जिस तरह से मैंने अनुभव किया, यह उपन्यास इसी का प्रतिफल है। मशहूर अमेरिकी-ब्रिटिश उपन्यासकार हेनरी जेम्स का कहना है कि उपन्यास जीवन का वह चित्र है जिसे लेखक अपनी दृष्टि से देखता और गढ़ता है। जाहिर है कि इस उपन्यास में भी जो देखा और गढ़ा, दोनों तरह का सच सामने आया है। जो गढ़ा गया है, वह देखे गये का ही आभासी विस्तार है।
प्रश्न- आपका यह उपन्यास ‘ख़लल’ कई सामाजिक मुद्दों को अपने-आप में समेटे हुए है । पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि धर्म और पूँजी का गँठजोड़ हमारे सामाजिक ताने-बाने को तहस-नस कर रहा है। हजारों साल की समेकित संस्कृति में एक सोची-समझी रणनीति के तहत ख़लल पैदा की जा रही है। आपने इन मुद्दों को उठाने का फैसला क्यों किया और आपको क्यों लगता है कि इन मुद्दों पर चर्चा ज़रूरी है?
उत्तर— आपने प्रश्न में जिन सामाजिक मुद्दों को उठाया है, इस पर चर्चा तो देश के तमाम बुद्धिजीवी और प्रखर पत्रकार आज कर रहे हैं। यह प्रश्न इतने भोले और गैरजरूरी नहीं है कि कोई भी प्रबुद्ध व्यक्ति इससे मुँह मोड़ सके। यह आज के समय के सबसे जरूरी सवाल हैं और इन मुद्दों का व्यवहारिक असर पूरे समाज पर दिखने भी लगा है। ऐसे में एक जागरूक रचनाकार का…जो अपने देश और यहाँ के आम लोगों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को अनुभव करता हो… चुप लगा जाना एक नैतिक अपराध होता मेरी नजर में। आज बहुत सारे रचनाकार इन मुद्दों से स्वयं को किनारे रखते हुए भी रचना-कर्म कर रहे हैं और सम्मानित एवं पुरस्कृत भी हो रहे हैं। सबों के अलग सोच और विचार हैं। सबों के अलग चेहरे हैं। इस उपन्यास के पीछे मेरा चेहरा और मेरे विचार हैं। यह तो देश के आम पाठक और आलोचक तय करेंगे कि इस पर चर्चा होनी चाहिए या नहीं? मैं पाठकों के लिए लिखता हूँ और वह भी भविष्य के पाठकों के लिए, क्योंकि आज शुद्ध पाठकों का नितांत अभाव है। यदि आज इस पर चर्चा नहीं होगी तो भविष्य के हमारे पाठक इस समय के बदलाव की तह तक नहीं जा पाएंगे। हमारा समाज अभी पूंजीवाद के संक्रमण काल से जूझ रहा है, अभी यह इसकी चकाचौंध और तड़क-भड़क से आकर्षित और भौंचक है। कुछ लोग तो इसी मुग्ध भाव से रच भी रहे हैं। लेकिन यह भी सच है कि कुछ मेरी तरह के लोग इस चकाचौंध और तड़क-भड़क के बाहर के अंधेरे को भी देख रहे हैं। उन्हें देश में बढ़ते अरबपतियों की संख्या से कहीं बहुत अधिक संख्या में वंचितों और अभाव से जूझते लोग दिखाई पड़ने लगे हैं| बिना किसी क़ुसूर के केवल धर्म के आधार पर अलगाव और बर्बर हत्याओं से पीड़ित लोग दिखने लगे हैं | मेरे ख्याल से इस पर भी चर्चा जरूरी है |
प्रश्न- उपन्यास के पात्रों को आपने कैसे विकसित किया? क्या वे किसी वास्तविक व्यक्ति पर आधारित हैं या पूरी तरह से आपकी कल्पना की उपज हैं?
उत्तर–– उपन्यास की कहानी में कुछ भी वास्तविक नहीं होता, फिर भी यह वास्तविकता के काफी करीब से गुजरता है। मेरे लेखन का एकमात्र उद्देश्य है जनता के जीवन संघर्ष और उनकी आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करना। अपने उपन्यास के पात्र के रूप में मैं हमेशा किसी जीवित चरित्र का ही चयन करता हूँ । इससे उस पात्र को उसके परिवेश की पृष्ठभूमि के साथ विकसित करने में मुझे काफी मदद मिलती है। लेकिन वह पात्र क्या सोचेगा, बोलेगा और उपन्यास में किस प्रकार अपनी भूमिका निर्धारित करेगा, यह सब मैं ही तय करता हूँ। पात्र कठपुतली होते हैं, लेखक उनका नियंता। उसकी डोर रचनाकार के हाथ में होती है। यही कारण है कि कोई पात्र यदि अपनी भूमिका कमजोर ढंग से निभाता है तो आलोचना लेखक की होती है। इस सच से सभी वाकिफ हैं।
प्रश्न- इस उपन्यास में हजारों सालों से चली आ रही हिन्दुओं की धार्मिक व्यवस्था में एक व्यतिक्रम दिखाई देता है । उपन्यास में किए जाने वाले लगभग सभी धार्मिक अनुष्ठान, कार्यक्रम और उत्सवों का संचालन पिछड़ी जाति के लोगों द्वारा किया जा रहा है, उनमें सुनील साव और अनिल साव महत्त्वपूर्ण हैं। ऐसा नहीं है कि वहाँ अर्थात् मुर्गियाचक में ऊँची जातियाँ नहीं हैं । उपन्यास के प्रमुख पात्र सियाराम सिंह राजपूत जाति से आते हैं। पिछड़ी जातियों द्वारा इस धार्मिक नेतृत्व को किस रूप में देखा जाना चाहिए?
उत्तर–– यह केवल संयोग है कि ऐसा हुआ है। यह इस पर भी निर्भर करता है कि आप जिस स्थान को दिखला रहे हैं या जो वर्णित स्थल और इलाका रचनाकार की कल्पना में है, उसकी डेमोग्राफी यानी जनसांख्यिकी क्या है? इस देश में पिछड़ी जातियों की आबादी ही सबसे अधिक है। अतः जब भी कोई रहवास या जनसंख्या संबंधी आंकड़ा आएगा, पिछड़ी जाति के लोग ही ज्यादा नजर आएंगे। देश में सबसे ज्यादा वोटर भी पिछड़ी जाति के हैं और सत्ता परिवर्तन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। उपन्यास में प्रोफेसर महतो जैसे रेडिकल बुद्धिजीवी भी पिछड़ी जाति के ही हैं। सच तो यह है कि मेरे अपने प्रदेश बिहार में सन 1990 से लेकर आज तक पिछड़ी जाति का ही नेतृत्व है। देश में भी कई सारी जगह और केंद्रीय नेतृत्व में भी। राजनीतिक विचार और क्रियाकलापों से प्रभावित लोगों की संख्या में पिछड़े ही अधिक दिखें तो क्या आश्चर्य!
यह स्थिति एक सामाजिक व्यतिक्रम का भी संकेत देती है। इसे मैं सामाजिक चेतना और बदलाव का संकेत भी मानता हूँ। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि धार्मिक- सांस्कृतिक पूँजी पर अब एकाधिकार नहीं रहा। सवर्ण सियाराम सिंह का ढ़ुलक कर कभी इधर तो कभी उधर जाना भी इस सामाजिक परिवर्तन का ही संकेत है या कि उनके भाई जयराम सिंह का चरित्र। सभी पात्र बदलते सामाजिक परिवेश से सीधे प्रभावित लगते हैं।
प्रश्न- प्रसिद्ध मार्क्सवादी विचारक ग्राम्शी अपने सांस्कृतिक आधिपत्य सिद्धांत में यह बताते हैं कि कैसे राज्य, शासक और पूँजीपति वर्ग पूँजीवादी समाजों में धन और शक्ति बनाए रखने के लिए सांस्कृतिक संस्थाओं का उपयोग करते हैं, क्योंकि राजनीतिक नियंत्रण भी सांस्कृतिक नियंत्रण से नियंत्रित होता है। यह पूरा फिनोफेना आपके उपन्यास ‘ख़लल’ में साफ-साफ दिखाई देता है । इस पर आपका क्या कहना है?
उत्तर– यह सही है कि ग्राम्शी का विचार मेरे उपन्यास से प्रतिध्वनित होता है। आप इसे पकड़ पाये, इस नाते आपका इस्तकबाल करता हूँ। इसका एकमात्र कारण यही है कि देश में जो कुछ भी हो रहा है अभी… यह बिल्कुल नया या कोई अजूबा नहीं घटित हो रहा। इतिहास स्वयं को दोहरा रहा है और इस नाते काफ्का के शब्दों में यह प्रहसन अधिक लग रहा है। राज्य और पूँजीपति वर्ग केवल राजनीति से शासन नहीं करते। वे सांस्कृतिक संस्थाओं के जरिए समाज की चेतना पर भी कब्जा करते हैं।’ख़लल’ में यही दिखाने की कोशिश है कि कैसे धार्मिक आस्थाएँ और सांस्कृतिक प्रतीक पूँजी के हाथों में औजार बन जाते हैं।
प्रश्न- आपके इस उपन्यास में सुभान चाचा, प्रोफेसर महतो एवं सियाराम सिंह क्या ग्राम्शी के शब्दों में ‘जैविक बुद्धिजीवी’ हैं, जो पारंपरिक बुद्धिजीवियों के विपरीत प्रगतिशील चेतना और संगठन का विकास करते हैं, ताकि पीड़ित समाज को राजनीतिक रूप से सशक्त और जागरूक बनाया जा सके?
उत्तर- मैंने ऐसा कुछ सोचकर नहीं लिखा। उपन्यास किसी ‘थ्योरी’ को ध्यान में रखकर लिखा भी नहीं जा सकता। कोई रचनाकार ऐसा कर सकता हो, यह संभव नहीं। टॉलस्टॉय का कहना है कि उपन्यास जीवन का वह सत्य है जिसे इतिहास भी नहीं पकड़ पाता। इस नाते यह सारे सत्य से ऊपर उठकर अपने समय का मानुष सत्य बन जाता है। एक उदाहरण देता हूँ अपने पेशे से ही–जब एक डॉक्टर तमाम थ्यूरी पढ़ ‘डॉक्टर’ बन जाता है और जब उसकी ‘प्रैक्टिस’ चल निकलती है, तब उसे कोई भी थ्यूरी याद नहीं रहती सिवाए इसके कि मरीज के लक्षण क्या हैं और इस लक्षण के उपचार हेतु उपयुक्त दवाओं की सूची क्या होगी? यही हाल एक रचनाकार का भी हो जाता है। यदि समाज में किसी रोग के लक्षण उसके पात्रों को दिखते हैं तो उसके उपचार हेतु सतत प्रयत्नशील भी हो सकता है। यह ढेर सारे मनुष्यों का निजी चरित्र भी रहा है हमारे समाज में, जो किसी भी सत्ता और पूँजी के साथ कभी खड़े नहीं रहे। जिन्होंने इस समाज को अपनी कल्पनाशीलता के अनुसार बनाने, संवारने में अपनी जान तक की परवाह नहीं की।
उपन्यास के पात्र भी निजी जीवन में ऐसे ऐतिहासिक या आस-पास के जीवित चरित्रों से प्रेरित हो सकते हैं।
प्रश्न- उपन्यास में कॉरिडोर और मंदिर निर्माण से विस्थापित लोगों के पक्ष में सियाराम सिंह द्वारा एक बड़ा आंदोलन खड़ा किया जाता है। इस कार्य में कुछ दूर तक उन्हें सफलता भी मिलती है, पर अंत तक आते-आते पूँजी की ताकत के सामने वे विवश होकर बिकने पर मजबूर हो जाते हैं। इस संदर्भ में आज की परिस्थितियों में आप एक बुद्धिजीवी की भूमिका को किस रूप में देखते हैं?
उत्तर- सियाराम सिंह का आंदोलन वस्तुतः न्याय से वंचित और दुत्कार दिए जाने वालों के पक्ष में है। यह सत्ता के दोहरे चरित्र और मानदंड के खिलाफ एक बगावत है। इसमें शुरुआती जीत के बाद अंततः वह अकेले पड़ जाते हैं। यह इस समय का सबसे वीभत्स सत्य है। सत्ता और पूंजी के गठजोड़ के आगे सभी विवश हैं। जो प्रलोभन में नहीं आते उन्हें इस तरह प्रताड़ित और अपमानित कर जेल में सड़ने को डाल दिया जा रहा है कि किसी भी आंदोलन की कमर ही टूट जा रही है। इस उपन्यास में ले देकर भरोसा एकमात्र न्यायालय पर जतलाया गया है। यद्यपि तमाम भरोसेमंद संस्थाओं पर भी सरकार का शिकंजा कसता जा रहा है…।
ऐसे समय में एक बुद्धिजीवी की भूमिका अत्यंत जटिल, संवेदनशील और निर्णायक भी हो गई है। आज एक बुद्धिजीवी का अस्तित्व ही दांव पर लगा है, क्योंकि व्यक्ति स्वतंत्रता पर ही सबसे बड़ा अघोषित खतरा आज प्रच्छन्न दिखाई दे रहा है।
ऐसे में एक बुद्धिजीवी का पहला दायित्व है, सच को पहचानना और उसे सामने लाने की कोशिश करना। आज जब मीडिया से लेकर सोशल प्लेटफॉर्म तक झूठ, अफवाह और प्रोपेगेंडा से भरे पड़े हैं, तब एक स्वतंत्र और आलोचनात्मक दृष्टि पैदा करना ही असली बौद्धिक हस्तक्षेप है। आज बुद्धिजीवियों के लिए सबसे बड़ा संकट सत्ता और संस्थाओं से दूरी बनाए रखने की है। ऐसा नहीं कर पाने पर उनकी नैतिक शक्ति में ह्रास देखा जा रहा है। यह अत्यंत दुखद है। आज होना यह चाहिए कि बुद्धिजीवी केवल अकादमी की दीवारों में कैद विचारक बन कर न रह जाए।उसे जन चेतना के निर्माण में एक सक्रिय भूमिका निभानी होगी। जैसा कि उपन्यास के कुछ किरदारों के माध्यम से मैंने यह संदेश देने की कोशिश की है।
प्रश्न- पढ़ते हुए हमें उपन्यास में वर्णित माता कल्कि मंदिर एवं कॉरिडोर की निर्माण-प्रक्रिया धीरे- धीरे विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर और अयोध्या मंदिर कॉरिडोर की निर्माण-प्रक्रिया में रुपांतरित होती प्रतीत होने लगती है। ऐसा लगता है मानो उसी बात को कहने के लिए कथाकार द्वारा यहाँ कल्कि मंदिर निर्माण का एक मेटाफर निर्मित किया है। इस संदर्भ में आप क्या कहना चाहेंगे?
उत्तर- समाज में जो कुछ बहुत विवादास्पद हो और सरेआम घटित हो रहा हो, उसका प्रभाव हम सभी की चेतना पर बहुत गहराई से पड़ता है। उपन्यास दरअसल अपने समय और समाज का ही मेटाफर है।आप वास्तविकता को उपन्यास में लिख नहीं सकते। कला पक्ष के लिए भी यह मान्य नहीं है। इस नाते रूपक का सहारा लेकर अपनी कल्पनाशीलता के साथ बात कहनी पड़ती है। कुछ ऐसी बातें होती हैं जिन्हें कहना भी जरूरी है और थोड़ा छुपाना भी।
प्रश्न- यह उपन्यास दोहरे विस्थापन की दास्तान पेश करता है । आपसी सौहार्द के साथ-साथ मुर्गियाचक लोग जमीन-जायदाद भी गँवा बैठते हैं। इस पूरे घटनाक्रम के पीछे पूँजी की बड़ी भूमिका है, जो पर्दे के पीछे रहकर अपना घिनौना खेल खेलती रहती है । पर मुझे लगता है कि आज के संदर्भ में मीडिया की भूमिका और ज़्यादा खतरनाक है, जो समाज में ज़हर घोलने का काम लगातार कर रही है। इस पर मैं आपकी राय जानना चाहूंगा।
उत्तर- आपके सवाल लगातार खतरनाक होते जा रहे हैं। आज पूँजी का सबसे शिष्ट और खतरनाक हथियार मीडिया ही है। तमाम बड़े मीडिया हाउस बड़े पूँजीपतियों के कब्जे में हैं। “खलल” में जो कुछ भी मैं दिखला सका हूँ, यह दरअसल जो वास्तविकता है, उससे बहुत ही कम है। न्यूनतम।आज हिंदी के किसी भी लेखक में किसी खतरनाक सत्य के तह तक पहुँच पाने की न हिकमत है न सामर्थ्य। सुविधा और क्षमता भी नहीं ।सच तो यह है कि जो सत्य है, वह किसी कल्पित से अधिक चौंकाने वाला और अजनबीयत से भरा है। वह किसी कीमती मणि की तरह किसी अंधेरी गुफा में कैद है और इस पर कड़ी पहरेदारी है। वहाँ तक पहुँचने से बहुत पहले ही जान गंवानी पड़ सकती है। कुछ लोग गंवा भी रहे हैं… बहुत मामूली बातों की तह तक पहुँचने पर भी। यह इस समय का सबसे भयावह सच है।
प्रश्न- आपके अनुसार आज के समय में कथा साहित्य की भूमिका क्या होनी चाहिए, खासकर जब समाज में तेजी से बदलते मूल्यों और तकनीकी प्रगति के कारण लोगों की सोच और जीवनशैली में बदलाव आ रहा है?
उत्तर- कथा साहित्य की भूमिका शुरू से ही प्रतिरोध की रही है। हिंदी की पहली कहानी जिसे माना जाता है– एक टोकरी भर मिट्टी, यह प्रतिरोध की ही कथा है। कथा साहित्य को केवल मनोरंजन की भूमिका में नहीं रखा जाना चाहिए। प्रेमचंद,जैनेंद्र, भीष्म साहनी, अमरकांत, रेणु, यशपाल, स्वयं प्रकाश, शेखर जोशी, दूधनाथ सिंह जैसे दर्जनों महान कहानीकार-उपन्यासकार रहे हैं, जिन्होंने प्रतिरोध की परंपरा को कायम रखा। आज भी जो लेखक रचनारत हैं, उनमें सैकड़ों नाम, मैं ले सकता हूँ जो प्रतिरोध की कहानी लगातार लिख रहे हैं। मैं समझता हूं कि कथा साहित्य की आज भी सबसे सार्थक भूमिका यही हो सकती है कि वह सवाल उठाए, चेतना जगाए और मानवीय मूल्यों की रक्षा के प्रति प्रतिबद्ध हो।
प्रश्न- हिंदी साहित्य के एक ऐसे कथाकार का उल्लेख कीजिए जिनकी रचनाओं ने आपको गहराई से प्रभावित किया है और उनके लेखन की वे कौन सी विशेषताएँ हैं जिससे आप सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं?
उत्तर – केवल एक का उल्लेख करना हो तो वह निश्चित ही प्रेमचंद होंगे। उनकी रचनाएँ पढ़ते हुए ही शरीर पर रोएं आए और अब जब रोयें झड़ने लगे हैं, तब भी प्रेमचंद ही सबसे बड़े प्रेरणास्रोत हैं। समाज की तमाम विसंगतियों पर चौतरफा प्रहार किया। उनके लेखन में किसानों, मजदूरों और समाज के अंतिम पायदान पर खड़े आदमी की जो पीड़ा और संघर्ष दिखाई देता है, आज के समय में उसकी प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है।आज का समय किसान, मजदूर और अंतिम आदमी के जीवन संघर्ष को कुचलने वाला विरोधी समय है। पूंजीपतियों का बोलबाला है। उनकी ही सत्ता है। इनके खिलाफ प्रेमचंद के ही औजार काम आ सकते हैं। इनका लेखन ऊपर से जितना सरल है विचारों की गहराई उतनी ही अधिक है। उनका यह कहा आज भी आकर्षित करता है कि हमें अपने सौंदर्य के मयार बदलने होंगे।
प्रश्न- अपने उपन्यास के प्रारंभ में अस्वीकरण-कथन’ दिया गया है:
“तो यह उसी देश के एक छोटे से नगर की कथा है। मैं तो यही कहूँगा कि पूरी तरह से काल्पनिक कथा है। यदि कहीं से भी इसमें सत्य का कोई कण नज़र आ जाए तो यह सरासर आपका भ्रम होगा और मेरे फ़न की असफलता।”
आप आगे लिखते हैं “असफलता तो ख़ैर मेरी तक़दीर में है। लेकिन आप लोगों को भी आज साफ-साफ कह दूँ कि आप लोग लगातार इस भ्रम में जीने लगे हैं। किसी आभासी सत्य को ज़मीनी यथार्थ मान लेने को अभिशप्त हो चुके हैं। इसे इस कलाकार की कल्पना जान यदि चुटकी भर भक्ति इस नाचीज़ के खाते में डाल, इस कथा का आनंद लें तो संभव है आप सबों को अपने बहुत करीब से गुज़रती महसूस हो यह कथा।”
आपको ‘अस्वीकरण-कथन’ की ज़रूरत क्यों महसूस हुई? ‘ख़लल’ उपन्यास को आए कुछ माह गुज़र चुके हैं। क्या अब आप यह बताने की स्थिति में है कि आप कितना सफल रहे हैं?
उत्तर- अस्वीकरण इसलिए भी है, क्योंकि मुझे मालूम है कि बहुत सारे पाठक इसमें अपने शहर और आस-पास के समाज की बहुत सारी छवियां तलाशने लगेंगे।यह कई तरह के आगे आने वाले झंझटों से मुक्ति के लिए भी है।
जहाँ तक सफलता की बात है यह उपन्यास कुछ लोगों को बहुत अच्छा लग सकता है तो कुछ लोगों को बेहद खराब। यह ऐसा लेखन है जो कई सारे लेखन की तरह सर्वस्वीकृत नहीं हो सकता। ऐसे लेखन से दोस्त और दुश्मन दोनों बनते हैं। दोस्त आपकी प्रशंसा करेंगे नहीं, दुश्मन गाली देना छोड़ेंगे नहीं! तो इन दोनों स्थितियों को स्वीकारते हुए चुपचाप आगे की राह तजबीज़ करनी पड़ती है।
सफल होने के कई सारे मानदंड भी हैं। मैं कभी इस चक्कर में पड़ा ही नहीं। चुपचाप अपना काम करता रहा। आज भी अपनी बात कहने का, अपना काम कर पाने का जो संतोष होता है, वह हमेशा मेरे साथ रहा है और वही इस पथ का पाथेय है मेरे लिए।
प्रश्न- अब अंतिम प्रश्न । उपन्यास में संतोष दीक्षित कौन है? प्रोफेसर महतो, सुभान चाचा या फिर सियाराम सिंह या कोई और?
उत्तर- इस संदर्भ में मुझे महान फ्रेंच उपन्यासकार गुस्ताव फ्लावेयर याद आ रहे हैं। उनका कहना है कि उपन्यासकार को अपने उपन्यास में सर्वत्र उपस्थित रहना चाहिए,परंतु दिखाई कहीं नहीं देना चाहिए तो इसी उदाहरण के साथ यह कहूंगा कि ‘खलल’ में प्रत्येक संवेदनशील पात्र में मेरा ही अंश है। लेकिन उन सभी पात्रों का अपना एक स्वतंत्र अस्तित्व भी है। कई बार लेखक के पात्र उसकी निजी जिंदगी से ज्यादा मशहूर हो जाते हैं। मेरी भी दिली कामना है कि मेरे साथ भी कुछ ऐसा घटित हो। इस सुखद संयोग का मैं तहे दिल से इस्तकबाल करूंगा।


