• बातचीत
  • जयशंकर से प्रज्ञा विश्नोई की बातचीत

    आज पढ़िए वरिष्ठ कथाकार जयशंकर से बातचीत। यह लंबी बातचीत की है युवा कथाकार प्रज्ञा विश्नोई ने। पढ़िए यह बातचीत प्रज्ञा की भूमिका के साथ- मॉडरेटर 

    =================

    कथाकार जयशंकर जी से मेरा परिचय बहुत ही सहज एवं अनायास ढंग से हुआ था। पुस्तक मेले में मैंने पहली बार जयशंकर जी का कहानी संकलन देखा था — बारिश, ईश्वर और मृत्यु। साहित्य में इन तीन शब्दों को अलग अलग तो बहुधा देखा है, पर इनको एक साथ शीर्षक में देखने का यह मेरा पहला अनुभव था। तो जयशंकर जी का संकलन मैंने एक तरह से जिसे आप Blindly कह सकते हैं, केवल शीर्षक के आधार पर मैंने ले लिया। ज्यों ही मैंने संकलन की कहानियाँ पढ़नी शुरू कीं, उनकी कहानियों में मुझे एक नैसर्गिक मानवोन्मुखी ओल्ड स्कूल चार्म और सहज साहित्यिक ईमानदारी जो मुझे चेखव, बुनिन, गोर्की, तुर्गनेव की उन्नीसवीं शताब्दी की रूसी कहानियों के पश्चात एक दुर्लभ गुण प्रतीत होने लगी थी, वह मुझे जयशंकर जी की कहानियों में बहुतायत में मिली। इंटरनेट पर जयशंकर जी के बारे में ढूंढ़ने का प्रयास किया तो कुछ एक कहानियों को छोड़कर आभासी संसार में जयशंकर जी की उपस्थिति उस समय बहुत ही कम थी। फिर कुछ महीनों बाद, किंडल से जयशंकर जी का अगला संकलन सर्दियों का नीला आकाश लेकर पढ़ा। उस संकलन को पढ़ने के पश्चात मुझे एक गलतफहमी हुई कि शायद अब मैंने जयशंकर जी के लेखन का सर्वोच्च उत्कर्ष पढ़ लिया है क्योंकि उस समय मेरी दृष्टि में सर्दियों का नीला आकाश की कहानियों से बेहतर लिख पाना स्वयं जयशंकर जी के लिए भी लगभग असंभव ही था (एक तरीके से आप इसे मेरा ऐलिस मुनरो -रनअवे सिंड्रोम कह सकते हैं क्योंकि ऐलिस मुनरो का संकलन रनअवे पढ़ने के बाद उस संकलन का तिलिस्म मेरे लिए उनके अन्य संकलन भी नहीं तोड़ पाए)।  सो उनके तृतीय संकलन मरुस्थल को जब मैंने लगभग एक वर्ष पश्चात पढ़ा तो मैं अचरज से भर गयी कि कोई भी लेखक अपनी हर कहानी को उसी साहित्यिक उच्चता की कसौटी पर खरा रखते हुए लगातार दशकों तक कैसे लिख सकता है। सो २०२५ जनवरी में मैंने जयशंकर जी की पुस्तक से उनका ईमेल खोजकर उनको एक पत्र लिखा जिसका उत्तर मिलने की उम्मीद मुझे न के बराबर थी क्योंकि मुझे लगता था इतने बड़े कहानीकार क्यों ही मेरा ईमेल पढ़ेंगे और उत्तर देंगे। परन्तु जयशंकर जी ने बड़ी ही सादगी और निश्छलता से उसका उत्तर दिया। उसके बाद हमारी फ़ोन पर बातें होने लगीं जिसमें मुझे विश्व साहित्य, विश्व सिनेमा, शास्त्रीय संगीत के बारे में बहुत कुछ जानने को मिला। सो जब प्रभात रंजन सर ने मुझे जयशंकर जी से बातचीत करने का प्रस्ताव दिया, तो यह अवसर मेरे लिए अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण था। सो यहाँ मैं जयशंकर जी से अपनी बातचीत के कुछ अंश उद्धृत कर रही हूँ जो हमने टेलीफोन एवं उनकी दिल्ली यात्रा के समय की थीं। चूंकि यह सारी बातें ऑडियो एक्सटेम्पोर फॉर्मेट में हुई थीं सो इन्हें transcribe करने में यदि कोई त्रुटि रह गयी हो तो मैं उसकी क्षमाप्रार्थी हूँ- प्रज्ञा।

    ==================

    प्रश्न: दक्षिण भारत में आपकी जो जड़ें थीं, विदर्भ में जो बचपन बीता, और मध्य प्रदेश के कस्बों में जो आपका सेवाकाल और रचनाकर्म गढ़ा गया — इन सारी चीजों ने आपके आत्म और रचनाकर्म को गढ़ने में क्या भूमिका निभाई?

    जयशंकर जी: इसे सीधे और स्पष्ट रूप से कह पाना तो मुश्किल है, लेकिन जितना धुंधला-धुंधला सा मैं सोच सकता हूँ — मेरा जन्म नागपुर में हुआ और जन्म के समय भारत को आज़ाद हुए लगभग बारह वर्ष होने को थे। नेहरू हमारे प्रधानमंत्री थे। तो जब मेरी आँखें खुलीं, मैं एक आज़ाद हिंदुस्तान में था और नेहरू-युग में मेरा जन्म हुआ।

    नागपुर — जहाँ मेरा जन्म हुआ — वह भारत के केंद्रीय स्थल पर है। कलकत्ता, बम्बई, मद्रास को जोड़ने वाली रेल-लाइनें यहाँ से गुज़रती थीं। इसी कारण दूसरे इलाकों से बहुत सारे लोग आये। एक लम्बे समय तक मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र एक ही थे, और तब तक नागपुर मध्य भारत के उस सेंट्रल प्रोविंस की राजधानी हुआ करता था। इसलिए नागपुर में विभिन्न धर्मों, जातियों और वर्गों के लोगों का एक बहुत ही संयोजित और संतुलित जीवन बन रहा था।

    मुझे यह चेतना उस समय तो नहीं थी जब मैंने कहानियाँ लिखना शुरू किया। लेकिन जब मैं 20-21 वर्ष की उम्र में नौकरी के लिए शहर छोड़कर दूसरी जगह गया, तो अपने शहर की याद बहुत आती रही। अपनी कहानियों में अपने शहर में रहने का एक ही रास्ता था — उसे याद करना। तो मैंने अपनी सड़कें, अपना मोहल्ला, गिरजाघर, पेड़-पौधे — वह सब जो उस शहर का लैंडस्केप था — उसे कहानियों में उतारा।

    प्राकृतिक और शहरी लैंडस्केप के अलावा, वहाँ के लोगों का जनजीवन — वहाँ के अनुष्ठान, प्रार्थनाओं के तरीके, मंदिर, वारकरी सम्प्रदाय, मुसलमान, ईसाई — यह सब भी उन कहानियों में आया। जब 1990 के आसपास मेरा संग्रह आया, तो जिन्होंने पढ़ा, उन्होंने बताया कि मेरी कहानियाँ एक ऐसे शहर की तस्वीर पेश करती हैं जैसा एक भारतीय शहर को होना चाहिए — विभिन्न धर्मों, जातियों और भाषाओं के लोगों के साथ, एक बहुत ही समावेशी समाज।

    उन्नीस-बीस वर्ष के उस जीवन ने लेखक के रूप में तो क्या किया, यह मैं नहीं जानता — लेकिन मनुष्य के रूप में मुझे जरूर बनाया। मुझे इस देश की विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों, धर्मों और जातियों के लोगों के प्रति एक गहरी आत्मीयता और करुणा मिली — यह बात मुझे अपने शहर ने दी।

    मध्य प्रदेश में नौकरी की स्थिति में जब गया, तो पहले छोटे कस्बों में और फिर विदिशा में रहा। विदिशा ऐतिहासिक था — बहुत पुराना किला था, जिसके अंदर एक बरसाती में रहा करता था। इससे मुझे इतिहास का एक अलग अहसास हुआ — कि एक व्यक्ति का अपने इतिहास के साथ, अपने पुरखों के साथ सम्बन्ध जरूर होना चाहिए। बिना इतिहास की समझ के, बिना विवेक के निर्माण के, हम अपनी प्रज्ञा का निर्माण नहीं कर पाते।

    फिर मैं आमला में रहा। वहाँ पहली बार मुझे प्रकृति में होने का वास्तविक अर्थ समझ में आया। पहाड़, जल और जंगल — ये तीनों वहाँ बहुत गहरे रूप में थे। सतपुड़ा के घने जंगल वहाँ से शुरू होते थे। और वह आदिवासियों का इलाका था। वहाँ जाकर मुझे पहली बार समझ में आया कि हमें आदिवासियों से कितना कुछ सीखना चाहिए।

    जब मैं वहाँ के गाँवों में जाता था, तो देखता था कि हर आदिवासी के मकान के पड़ोस में दूसरा मकान नहीं, बल्कि पेड़ होता था। दो मकानों के बीच पेड़ होते थे, उन पेड़ों के पास उनकी गायें, उनकी मुर्गियाँ — जो भी उनके पालतू जानवर थे, वे अपने पास रखते थे। तो मुझे समझ में आया कि आदिवासी कितने पहले यह जान पाये कि मनुष्य के केंद्र में सिर्फ मनुष्य का होना पाप है — क्योंकि सृष्टि के केंद्र में सबको होना है, पशुजगत को, प्राणीजगत को, पेड़-पौधों को।

    यह जो पश्चिम का Hegelian विचार है कि मनुष्य ‘सेंटर ऑफ यूनिवर्स’ है — उसको एक बहुत ही मामूली सा समाज, जो विश्वविद्यालयी शिक्षा से दूर था, प्रश्न कर रहा था। यह मैंने वहाँ जाकर जाना। वहाँ के जीवन से मुझे प्रकृति के रहस्यों का, उसके सौंदर्य का, और यह समझने का अहसास हुआ कि कैसे प्रकृति से जुड़कर ही मनुष्य अपने को एक ऐसे इंसान में बदल सकता है जिसकी कोई भूमिका हो, जिसकी कोई सर्जनात्मकता हो।

    प्रश्न: आपके उत्तर से आपके लेखन की जड़ों को समझने का बहुत अच्छा मौका मिला। इन्हीं से जुड़ा एक और प्रश्न — आपने ऐतिहासिक चेतना की बात की। मध्य प्रदेश में तो चंदेल, राजा भोज, विक्रम, गुप्त राजवंश, सम्राट अशोक — इन सबका इतिहास रहा है। क्या कभी इन पर कुछ लिखने, कोई कहानी बनाने का विचार आया?

    जयशंकर जी: ऐसा नहीं है। जिक्र जरूर आये, क्योंकि इन सब चीजों पर बहुत गहरा चिंतन-मनन करने जैसी प्रतिभा मुझमें नहीं थी। और न ही मैं उस तरह का इतिहास का छात्र था। लेकिन इतिहास मेरे लिए एक बहुत ही अनिवार्य तत्व रहा है — मनुष्यता के इतिहास में इसने बहुत ही निर्णायक भूमिका निभाई है — यह एक बोध मेरे भीतर बना रहा।

    पश्चिम का साहित्य पढ़ते हुए, सिनेमा देखते हुए — खासकर प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का सिनेमा और साहित्य — मुझे यह जरूर समझ में आया कि वहाँ के सजग मनुष्यों के मन में मनुष्य होने के प्रति बहुत गहरा बोध है। मनुष्य का होना अपने आप में एक चमत्कार है — यह उनके लेखन और सिनेमा में बार-बार दिखता है।

    इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि बीसवीं सदी में बहुत निर्दोष लोगों का खून बहा — चाहे वो दो महायुद्ध हों, या हिरोशिमा-नागासाकी।

    इससे मुझे एक बात समझ में आती थी — हमारे देश के लेखकों और लोगों का अपने इतिहास से रिश्ता बहुत आलोचनात्मक नहीं बन पाया। क्यों? क्योंकि हमने इतिहास के बोझ को उस तरह नहीं सहा जैसे पश्चिम के मनुष्य ने सहा। उसने दो महायुद्ध देखे, हॉलोकॉस्ट देखा, अलग-अलग तरह की त्रासदियाँ देखीं।

    भारत में भी बहुत बड़ी घटनाएँ हुईं — जो किसी बड़े उपन्यास का केंद्र बन सकती थीं। जैसे गाँधी जी की हत्या, इंदिरा गाँधी की हत्या। लेकिन इन घटनाओं को केंद्र में रखकर हिंदी में कोई ऐसी प्रसिद्ध रचना नहीं है जो बहुत पहचानी जाती हो।

    तो मैं समझता हूँ कि भारतीय लोग अपने इतिहास से उतना गहरा सम्बन्ध नहीं बना पाये। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि इतिहास की अवधारणा भारतीय समाज में बहुत देर से आई। हम समय को सर्कुलर समझते हैं, पश्चिम में समय को लीनियर समझा जाता है — तो समय का यह भिन्न बोध भी शायद इतिहास के प्रति हमारे अलग रिश्ते का कारण रहा होगा।

    प्रश्न: इन्हीं प्रश्नों से जुड़ा एक और सवाल — आपने कमला देवी चट्टोपाध्याय के बारे में, निर्मल जी के बारे में, और दोस्तोयेव्स्की के ब्रदर्स कारामाज़ोव के आध्यात्मिक प्रसंगों के बारे में अपनी श्रद्धा व्यक्त की है। तो मेटाफिजिकल, आध्यात्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से आप किन विषयों, किन हस्तियों, किन पुस्तकों को अपने बेहद निकट पाते हैं?

    जयशंकर जी: यह थोड़ा मुश्किल प्रश्न है — क्योंकि ऐसे बहुत सारे लोग हैं, अलग-अलग क्षेत्रों के। लेकिन यह मेरा एक अवचेतन से उपजा विश्वास रहा है कि यदि मनुष्यता को अच्छी तरह समझना है, या खुद को समझना है, तो अपनी समझ को ‘अनलिमिटेड’ बनाने की कोशिश करनी चाहिए। किसी एक जगह या एक देश-काल से जुड़े रहकर, जिसे हम ‘प्रोविंशियलिज्म’ कहते हैं, उससे काम नहीं चलेगा।

    यदि हम साहित्य के हैं तो हमें सोचना चाहिए कि सिनेमा में भी कुछ हो रहा है, यदि सिनेमा के हैं तो देखना चाहिए कि संगीत में क्या हो रहा है, यदि नाटक के हैं तो कविता और कहानी को भी समझना चाहिए। इस तरह कला की पूरी समग्रता से अपने को जोड़ना चाहिए।

    मनुष्यता के पिछले सात-आठ सौ वर्षों के इतिहास में — अपने देश में भी और दूसरे देशों में भी — इतने श्रेष्ठ लेखक और कलाकार हुए हैं कि उनकी सूची बहुत लम्बी बनेगी। लेखन की दुनिया में दोस्तोयेव्स्की, निर्मल वर्मा जैसे लोग — इन सबसे मैंने बहुत जाना और सीखा है।

    कमला देवी चट्टोपाध्याय के बारे में मुझे हमेशा ऐसा लगता है कि आजादी के आंदोलन में उनकी बहुत निर्णायक भूमिका रही। आज का भारत जिस तरह का बना, उसमें उनकी बड़ी भूमिका है। उन्होंने महिलाओं को सम्मान दिलाया, लोक कलाकारों और लोक नर्तकों को सम्मान दिलाया। आपको शायद पता होगा कि मधुबनी के कलाकार एक समय पत्थर तोड़ने को मजबूर हो गये थे। जब उनकी स्थितियों का पता चला और उनके लिए सरकार से संवाद हुआ, तो हमारे यहाँ उनके लिए प्रदर्शनियाँ हुईं, अलग-अलग देशों में महोत्सव हुए, लोक नर्तकों और गायकों को भेजा गया — और इस तरह मधुबनी चित्रकला को मध्यवर्गीय घरों में एक महत्वपूर्ण स्थान मिला। इसमें कमला देवी जैसे लोगों का बड़ा काम रहा।

    ऐसे लोगों ने मुझे हमेशा प्रभावित किया है जो अपने ‘सेल्फ-ट्रांसफॉर्मेशन’ पर विश्वास करते हैं और उसे निरंतर करते रहते हैं — जो यह नहीं मानते कि आत्म एक ठहरी हुई चीज है। आत्म पर काम करते रहना पड़ता है — वह रोज़ बनती है, बिखरती है, टूटती भी है। प्रकृति ने हमें जो इन्द्रियाँ दी हैं, वो अपने आत्म के निर्माण के लिए ही दी हैं। हमें अपनी आँखों, कानों जैसी इंद्रियों का उपयोग से अपने विवेक का ऐसा निर्माण करना है जो हमें दूसरों से जोड़ सके।

    प्रश्न: आपने फॉकनर, कार्सन McCullers, ट्रूमेन कपोट, फ्लैनरी ओ’कॉनर — इन सब लेखकों की बात की। इनमें जो आध्यात्मिक समानुभूति थी — यही गुण शायद आपको उनसे जोड़ता है? और इसी गुण ने आपको दक्षिण अमेरिकी साहित्य से भी जोड़ा?

    जयशंकर जी: जहाँ तक मुझे याद आता है, मैंने कॉलेज के दिनों में विलियम फॉकनर का Light in August पढ़ा था। 2-3 बार पढ़ने के बावजूद भी मैं उस उपन्यास को उसकी समग्रता में समझ पाया हूँ — ऐसा मैं नहीं कह सकता। लेकिन उस उपन्यास को पढ़ने का अनुभव मेरे लिए बहुत उपयोगी और गहरा रहा।

    बाद में फॉकनर के बाद हार्पर ली को, ट्रूमेन कपोट को, कार्सन मैकुलर को और फ्लैनरी ओ’कॉनर को पढ़ा। तब मुझे समझ में आया कि वह क्या चीज थी जो विलियम फॉकनर के उपन्यासों में मुझे खींचती रही। बहुत ही सरलीकरण के तहत कहूँगा — वो एक तरह की ‘सेंस ऑफ नेटिविटी’ थी। अपनी जड़ों के करीब रहना, अपने लोगों के जीवन को जानना, जिस परिवेश में पात्र पल-बढ़ रहे हैं उनके जीने के ढंग को समझना — न केवल उनके सुख-दुख को जानना, बल्कि यह भी जानना कि वो कौन सी चीज़ें हैं जो उन्हें दुखी करती हैं और कौन सी जिनसे वे सुखी होते हैं। यह एक ‘सेंस’ है जो संकीर्णता से बिल्कुल अलग है।

    हमारे यहाँ बाद के वर्षों में हमने फणीश्वरनाथ रेणु को इसी तरह की चीज़ के लिए सराहा। उनसे हमें पता चला कि बिहार के लोग कैसे सोचते हैं, बिहार का किसान या मामूली आदमी किस तरह से अपने को सुखी करता है, सौंदर्य से उसके कैसे रिश्ते हैं, कौन से ऐसे नैतिक मूल्य हैं जिनसे वो अपने को करीब पाता है। तो फणीश्वरनाथ रेणु भी विलियम फॉकनर और कार्सन मैकुलर की तरह अपने लोगों की सभ्यता को, जिस संस्कृति में उनके पात्रों का पालन-पोषण हो रहा था, उन्हें जानने-समझने और उन्हीं की भाषा में व्यक्त करने का काम कर रहे थे।

    ये सारे लोग वैचारिक स्तर पर नहीं, बल्कि भावनात्मक रूप से बहुत चौकन्ने थे। जब इन्हें पढ़ते हैं तो समझ में आता है कि बहुत गहरी संवेदनशीलता, गहरी समानुभूति और गहरी करुणा के रहते हुए ही एक लेखक इस तरह के पात्रों और परिवेश को रच सकता है।

    आपके प्रश्न का दूसरा भाग — दक्षिण अमेरिकी साहित्य का सम्बन्ध — उस पर मैं कहूँगा कि इसके लिए मैं निर्मल वर्मा का बहुत ऋणी हूँ। एक दोपहर जब मैं उनके यहाँ पहुँचा, तो उनसे बातचीत में The Member of the Wedding — कार्सन मैकुलर के उपन्यास — का जिक्र हुआ। उन्होंने कहा कि इस उपन्यास का पढ़ा जाना उनके लेखकीय जीवन की एक बड़ी उपलब्धि रही।

    उन दिनों जिन किताबों के प्रति निर्मल जी की आसक्ति होती थी, उन्हें मैं अपनी अनिवार्य पठन-सूची में रख लेता था। उसी दिन उन्हीं के रैक से मैंने कार्सन की The Member of the Wedding, Ballad of the Sad Cafe, और Reflections in a Golden Eye — ये तीन उपन्यास ले आया।

    तब मुझे समझ में आया कि ये लेखक बहुत गहरे तौर पर अपनी ज़मीन से जुड़े हैं — अपने गाँव, अपनी सड़कें, वहाँ के पेड़-पौधे, वहाँ के लोग — यही उनके लेखन का केंद्र है। इसके बाद मैंने उनका उपन्यास The Heart is a Lonely Hunter पढ़ा। मुझे लगता है कि जिस तरह दोस्तोयेव्स्की के सारे उपन्यासों का एक साझा शीर्षक Crime and Punishment हो सकता है, उसी तरह मैकुलर के सारे काम का एक उचित शीर्षक The Heart is a Lonely Hunter होगा।

    फिर उनके समकालीनों को भी पढ़ा — फ्लैनरी ओ’कॉनर और दूसरे दक्षिण अमेरिकी लेखकों को। इनको पढ़ने से सीखा कि एक लेखक को अपनी मिट्टी से, अपने लोगों से, अपने आस-पास से कितना सच्चा और घना रिश्ता बनाना चाहिए। क्योंकि यदि जिन तनावों को आप अपने लेखन में जगह दे रहे हैं, उनसे आपका सच्चा और गहरा रिश्ता है, तो बहुत सारी चीज़ें अपने आप हो जाती हैं। आपको बहुत ज्यादा प्रयत्न नहीं करने पड़ते।

    और यह जो ‘नेटिविटी’ की बात है — यह ‘नेटिव’ होना और ‘सेक्टेरियन’ या संकीर्ण होना — दो बिल्कुल अलग-अलग चीजें हैं। मैकुलर पहले दक्षिण अमेरिका की सच्ची और अच्छी लेखक बनीं — और इसी वजह से पूरे विश्व की भी लेखक बनीं। यदि दक्षिण अमेरिका की लेखक नहीं बन पाती, तो शायद वैश्विक स्तर पर अपनी पकड़ नहीं बना पाती।

    यह बात नादिन गॉर्डिमर को पढ़ते हुए भी और ज्यादा स्पष्ट होती है — जो साउथ अफ्रीका के जीवन के एथॉस को, उसके आनंद और दुःख को अपने ढंग से व्यक्त करती हैं। और कोएत्ज़ी में भी यही बात बहुत गहरे स्तर पर दिखती है।

    फॉकनर का एक उपन्यास है —जिसमें एक शव को दफनाने के लिए उस स्थान पर ले जाया जा रहा है जहाँ उसका जन्म हुआ था। और कोएत्ज़ी के उपन्यास The Life and Times of Michael K में भी यही बात है कि माँ को उनकी जन्मभूमि पर ही ले जाना है। कैसे इंसान अपनी जड़ों की तरफ लौटना चाहता है — यह चाहे चेतन स्तर पर न हो, अवचेतन स्तर पर हर मनुष्य के साथ रहा होगा। आदमी जहाँ से शुरू करता है, चाहे वो कितना भी मामूली क्यों न हो, वो उसी जगह लौटना चाहता है।

    फॉकनर के पात्रों के बारे में भी यही कहना होगा — वे लोग जिस तरह की समय की अवधारणा में जीते थे, वो बहुत ‘आधुनिक पश्चिमी’ नहीं थी। वे एक तरह की ‘पेगन’ आदिमता में जीते थे, जहाँ बहुत सारे सभ्यतागत तत्व अपने प्रारंभिक या बुनियादी दौर में थे। फॉकनर और कार्सन McCullers के उपन्यासों में काले लोग बहुत गरिमा और आत्म-स्वाभिमान के साथ आते हैं। और ये जो ‘श्वेत’ लेखक हैं, वे इस बात को समझने की चेष्टा कर रहे हैं कि जिसे हम मानवीय मूल्य कहते हैं, जिसे हम मनुष्यता कहते हैं — वो तो इन लोगों में पहले से ही है। इनके मानवीकरण के लिए अलग से कुछ करने की जरूरत नहीं — ये अपने आप में पूर्ण मनुष्य हैं।

    यही बात हम आज आदिवासियों के समाज में महसूस करते हैं। आज की तारीख में भी आदिवासी जब घर बनाते हैं तो पड़ोस में पेड़ होता है, या जानवर बंधे होते हैं। दो घरों के बीच प्रकृति हमेशा बनी रहती है। उनका यह सेंस — कि हमारे साथ जानवरों को भी रहना है, पेड़-पौधों को भी रहना है — यह जो ‘आदिमता’ है उनके सोचने की, वो हमने खो दी है। बिना टेक्नोलॉजी और समृद्धि के भी आदिवासी के जीवन में वह खोखलापन नहीं है जो हमारे तथाकथित समृद्ध जीवन में है।

    प्रश्न: बहुत सुंदर! अब एक और प्रश्न — किसी भी कहानी या किताब का शीर्षक देने के पीछे आपकी प्रक्रिया क्या होती है?

    जयशंकर जी: इसके पीछे कोई एक निश्चित नियम नहीं होता। यह सब बहुत ही आंतरिक स्तर पर और अनुभूति के स्तर पर होता है।

    जब एक बार कहानी लिख लेते हैं, दोबारा पढ़ते हैं, तो लगता है — क्या इसमें कोई केंद्रीय बात है? कोई ऐसा तत्व जो अपना सा है, जो पाठकों के लिए भी अनिवार्य होगा? तो कई-कई तरह के तनाव शीर्षक की तरफ ले जाते हैं। और यह हर कहानी के साथ बदलता है।

    एक बात और — शीर्षक की जगह कहानी में वैसे ही होनी चाहिए जैसे मकान में खिड़की। खिड़की से न पूरा मकान देखा जा सके, न खिड़की पूरी कहानी को बताए। कुछ लेखकों ने कहा है कि शीर्षक स्कर्ट की तरह होना चाहिए — न शरीर को पूरी तरह ढक दे, न पूरी तरह उघाड़ दे।

    अपने संदर्भ में कहूँगा — कहानी लिखने के बाद उसके अधूरेपन का और ठीक से न बन पाने का इतना तनाव होता है, इतनी निराशा और हताशा होती है, कि उस समय जो पहला काम होता है वह होता है — शीर्षक देना। तब तक हम थके हुए होते हैं।

    साहित्य के संसार में परम्परा का एक बड़ा इतिहास रहा है। कई बार शीर्षक देते हुए उन किताबों को याद करते हैं जिनके प्रति हम आसक्त रहे हैं, उन लेखकों को याद करते हैं जिनके शीर्षकों ने हमें प्रभावित किया।

    जैसे मेरे नये कहानी संग्रह का नाम मैंने इस बारिश में रखा — इसके पीछे कहीं बहुत अचेतन में निर्मल वर्मा की किताब हर बारिश में रही होगी, जिसने मुझे बहुत प्रभावित किया था। मुझे ऐसा लगता है — और शायद मैंने इस किताब की भूमिका में इसका जिक्र भी किया है।

    मुझे साहित्य में यह बात बहुत प्रभावित करती है कि कोई भी रचनाकार, कोई भी कलाकार, अपने समाज, अपने मित्रों, अपने परिवार, अपने देश के प्रति एक गहरी कृतज्ञता से भरा होता है। यह कभी मूर्त होती है, कभी अमूर्त।

    मुझे To Kill a Mockingbird की हार्पर ली याद आती हैं। वो एक एयरोड्रम में काम करती थीं और सारा समय नौकरी में चला जाता था। उपन्यास के बारे में वर्षों पहले सोचना शुरू किया था। उनके कुछ मित्रों ने घर में एक पैकेट रख दिया — साल भर के खाने-पीने की व्यवस्था के साथ। उन्होंने कहा — छुट्टी लो और उपन्यास पूरा करो। जब उन्होंने उपन्यास पूरा किया तो उन मित्रों के प्रति उनकी बहुत गहरी कृतज्ञता थी।

    और अल्बेयर कामू — जब उन्हें नोबल पुरस्कार मिला तो उन्होंने सबसे पहले अपने स्कूल के शिक्षक को पत्र लिखा, जिसमें कहा: आज जो कुछ भी मेरे साथ अनुभव हो रहा है, उसके लिए मैं आपके प्रति बहुत गहरी कृतज्ञता महसूस करता हूँ। आपने मुझे वह वातावरण और प्रेरणा न दी होती, तो शायद मैं लेखक होने की बात भी नहीं सोच सकता था।

    तो मुझे लगता है कि जब हम शीर्षक देते हैं, वहाँ आंतरिकता के अलावा एक तरह की बाहरी कृतज्ञता भी प्रकट होती है। कहानी की बाकी बातें आंतरिक स्तर पर होती हैं, शीर्षक में थोड़ी छूट मिल जाती है।

    अपने संदर्भ की दो-तीन बातें और कहूँ — मेरी एक कहानी का नाम लाल दीवारों का मकान है। यह एक ऐसा मकान था जिसके पास से बचपन में गुज़रा करता था और हमेशा हसरत बनी रहती थी कि उसके अंदर जाऊँगा। लेकिन जा नहीं सका — और बाद में वो पुराना घर टूट गया। लेकिन उस घर की वजह से अपने शहर के एक खास लैंडस्केप को महसूस करता था। इसीलिए उस कहानी का शीर्षक लाल दीवारों का मकान रखा।

    और एक कहानी का शीर्षक बूढ़े गुलमोहर का पड़ोसी — जब बैंक में काम करता था तो उसके पड़ोस में गुलमोहर का पेड़ था। तो इस तरह की कृतज्ञता, इस तरह के कर्तव्यबोध भी शायद ऐसे शीर्षक देने में हमारी मदद करते हैं।

    प्रश्न: आपकी कहानियों एवं कथेतर लेखन में भारतीय एवं पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत — और किशोरी अमोणकर जी के गायन, बाख की सिम्फनी आदि का उल्लेख कई बार आया है। आपके रचनाकर्म में संगीत की क्या भूमिका रही है?

    जयशंकर जी: इसमें यह स्पष्ट कर दूँ कि मैंने बीथोवेन का उल्लेख बार-बार किया है. लेकिन मैंने मोत्सार्ट और बीथोवन — इन दोनों मास्टर्स को अच्छे से सुना है।

    जहाँ तक मुझे याद आता है, अपने किशोर जीवन से ही हर तरह का संगीत सुनना मुझे अच्छा लगता रहा है। मेरे स्कूली दिनों में — जब मैं लगभग 13-14 वर्ष का रहा होऊंगा — आकाशवाणी मैं नियमित रूप से सुना करता था। उसमें भारतीय शास्त्रीय संगीत के भी कार्यक्रम होते थे और सिनेमा संगीत के भी। हिंदी सिनेमा का जिसे हम गोल्डन एरा कहते हैं — जिसमें नौशाद, ओपी नैयर, एसडी बर्मन, मदन मोहन, शंकर-जयकिशन — इनकी जो रचनाएँ हैं जो अब तक अविस्मरणीय बनी हुई हैं — उनके अलावा मैं शास्त्रीय संगीत भी सुनता ही था।

    उसके अलावा, मैं संगीत सरिता का नियमित श्रोता रहा — चौदह-पन्द्रह वर्ष की उम्र से। उसमें पन्द्रह मिनट के कार्यक्रमों में हमारे बड़े संगीतकार आया करते थे और रागों के बारे में, उनके प्रयोगों के बारे में बताया करते थे। उसमें पंडित रविशंकर, अली अकबर खान, बड़े गुलाम अली खान, केसरबाई केरकर, हीराबाई बड़ोदेकर — जितने भी उस समय के बड़े कलाकार थे — वे आया करते थे। वे शास्त्रीय संगीत के इतिहास को, उसकी आकांक्षाओं को, उसके अंदर जो प्रयोगशीलता है उसको, और दूसरे संगीत से वह कैसे अलग है — ये सब स्पष्ट किया करते थे।

    और एक कार्यक्रम था — अनुरंजिनी — जिसमें पूरे आधे घंटे तक या तो किसी का सितार होता था, या किसी का सरोद, या पूरा राग, पूरा ख़याल, या ध्रुपद — इस तरह की चीजें आया करती थीं। तो मैं उसको नियमित रूप से सुनता रहा।

    इसका लिखने से क्या सम्बन्ध रहा, यह तो मैं नहीं जानता। लेकिन संगीत से — शुरुआती दिनों से ही — एक लगाव रहा। फिर जब कॉलेज में आया तो अलग-अलग तरह के लोग, अलग-अलग तरह के संसाधन — तब मैंने जॉन बायज का बहुत संगीत सुना, बॉब डिलन के बहुत गाने सुने, पिंक फ्लॉयड को बहुत ज्यादा सुना करते थे उस समय के युवा। और कार्पेंटर्स ग्रुप का गाना बहुत प्रसिद्ध हुआ करता था, बीटल्स भी थे, जैज़ भी था।

    लेकिन आज जब पलट कर सोचता हूँ तो जॉन बायज का, क्रिस चैपमैन का, फेयर पोर्टर का — यह संगीत मेरे साथ ज्यादा दिन तक नहीं बना रहा। उन दिनों में जो संगीत सुना, जिनका आकर्षण आज भी बना हुआ है — वो है बेगम अख्तर, और मेहदी हसन। इनको सुनना अच्छा लगता है। सेमी-क्लासिकल के लिए गिरिजा देवी या नैना देवी — इनको सुनना अच्छा लगता है। बेगम अख्तर और मेहदी हसन — यह ठुमरी और ग़ज़ल का संगीत भी आकर्षित करता है।

    लेकिन इतना जरूर है कि मैं इन सारे संगीत की जो शास्त्रीयता है, उसको इतना जानने तक ही सीमित रहा हूँ। उसका शास्त्रीय आधार — कि वो कौन-सा राग है, वो मारवा राग है कि वो चारुकेशी है — इस तरह से जानना तो मुझे आज भी नहीं आता, और न तो मैंने इसके लिए कोई बहुत गहरा प्रयास किया है।

    लेकिन मैं सोचता हूँ कि जैसे एक अच्छी कविता या अच्छी कहानी को हम बिना पूरा समझे भी — उसमें इतनी शक्ति होती है कि वो अपना कुछ संप्रेषित कर जाती है — यही बात शायद संगीत के साथ भी होती है। विवाल्दी की, या Tchaikovsky की, या Brahms की रचनाओं को पूरी तरह समझे बिना भी वे हमको भावनात्मक रूप से कुछ गहरा संप्रेषित कर जाती हैं। हम उसे बहुत सुस्पष्ट रूप से बता नहीं सकते कि Mahler की इस रचना को सुनकर हमने क्या जाना, क्या महसूस किया — लेकिन हम उससे किसी न किसी रूप में जुड़ते जरूर हैं।

    और आपका जो सवाल है कि इन सब चीज़ों का मेरे लेखन से क्या सम्बन्ध रहा — मुझे तो नहीं लगता कि संगीत ने मेरे लेखन को सीधे प्रभावित किया है। संगीत तो मैंने असाधारण सुना है, बड़े-बड़े कलाकारों को सुना है। लेकिन यदि मेरे लेखन में इसका उस स्तर का प्रभाव होता, या यदि उसका मेरी कथा-कहानियों के लिखे जाने पर कोई असर होता, तो मैं इतनी मामूली किस्म की और बहुत साधारण-सी अधपकी कहानियाँ नहीं लिखता। तो यह तो मैं नहीं कहूँगा कि संगीत ने मेरी कहानियों के लिखे जाने में कोई बड़ी भूमिका निभाई — लेकिन संगीत ने मुझे जीवन में जो दिया, वो दिया। वो एक अलग बात है।

    साक्षात्कारकर्ता: आपकी कहानियों में मध्यवर्ग — जैसे अध्यापक, सरकारी इंजीनियर, लाइब्रेरियन, स्थानीय पत्रकार — इनके बौद्धिक अंतर्जीवन पर सूक्ष्म दृष्टि दिखाई देती है। सामान्यतः साहित्य में बौद्धिकता को केवल अभिजात वर्ग तक सीमित कर दिया जाता है, एवं मध्यवर्ग को आर्थिक एवं सामाजिक संघर्ष तक। आपने इस परम्परा को अपने लेखन से तोड़ा है — यह आपका सचेत चुनाव था या यह आपकी कहानियों में स्वतः ही आया?

    जयशंकर जी: यह सब बहुत सहज रूप से आया होगा, और अवचेतन के स्तर पर आया होगा। मेरी अपनी कोई ऐसी चेतना — कि ऐसा होना चाहिए — या कोई आत्मचेतना, इन सब चीज़ों के पीछे नहीं है। शायद ही रही हो। और यदि रही भी हो, तो उसे बहुत रेखांकित करके, उस पर अँगुली रख सकूँ — ऐसा तो मुझे नहीं समझ में आता।

    इतना जरूर समझ में आता है कि मेरा खुद का बचपन और किशोर जीवन बहुत ही गरीबी में और तरह-तरह के अभाव के बीच बीता। हमारा घर बहुत छोटा था, लेकिन उसमें हमारे चाचा-चाची समेत पाँच परिवार रहते थे। तो उस घर में हमेशा ही अपने लिए कोई जगह कभी भी नहीं होती थी। वहाँ एक भी कोना नहीं था जहाँ कोई अपनी किताब लेकर या अपना संगीत का कोई उपकरण लेकर अपने एकांत को रच सकता था।

    शायद यही कारण रहा कि मेरा ज्यादातर — तेरह-चौदह वर्ष के बाद का जो भी पढ़ने-लिखने का जीवन है — वो पुस्तकालयों में, गिरजाघरों में, म्यूज़ियमों में, या तरह-तरह के पार्कों में हुआ। मेरे शहर में काफी सारे पार्क थे — वहीं पर हुआ मेरा ज्यादातर अभ्यास, चाहे वो औपचारिक हो या अनौपचारिक।

    मेरे अपने घर में संगीत, साहित्य, कला और सिनेमा का कोई बड़ा वातावरण नहीं था। लेकिन जिस बस्ती में मैं रहता था, वहाँ संगीत का तो कम से कम बहुत ही अच्छा वातावरण था। वहाँ लोग पढ़ते थे। वो इलाका ईसाइयों और पारसियों का या दक्षिण भारत से आये मध्यवर्गी लोगों का था। तो वहाँ घरों में किताबें होती थीं, किताबों के लिए जगह होती थी। और मेरे शहर में शास्त्रीय संगीत का बड़ा माहौल था। वहाँ तरह-तरह की संगीत सभाएं हुआ करती थीं।

    उस समय के — भीमसेन जोशी हों, या रोशन कुमारी हों, या सितारा देवी जैसे बड़े-बड़े कलाकार, निखिल बैनर्जी जी — इनकी संगीत सभाएं नियमित रूप से हुआ करती थीं। क्योंकि वे मैदानों में हुआ करती थीं, हमारे पास भले ही टिकट के लिए पैसे नहीं होते थे — हम फेंस के आसपास खड़े होकर जैसे फुटबॉल या हॉकी के मैच देखा करते थे, उसी तरह रात के समय में शिवकुमार शर्मा का संतूर, हरिप्रसाद चौरसिया की बाँसुरी, विलायत खान का सितार, अमीर खान का गायन — ये सब सुना करते थे।

    तो मेरा अपना घर भले ही उतना संस्कृति और सभ्यता की तरफ बढ़ने वाला नहीं था, लेकिन आसपास का वातावरण ऐसा था। और यह सब मैंने जो किया है, बहुत ही अनायास रूप से किया है। जिस तरह के सांस्कृतिक संवादों में मैं रह रहा था, उसको शायद मैंने अपने पात्रों के जीवन में भी रखा होगा — लेकिन यह कोई बहुत सचेत निर्णय नहीं था, बहुत ही अनायास रूप से आया होगा।

    इतना जरूर है कि मेरी यह आकांक्षा शुरुआत के दिनों से रही है — कॉलेज के दिनों से ही — और यह आकांक्षा मेरे भीतर बहुत गहरे स्तर पर रची-बसी रही कि मामूली लोगों के जीवन में भी कुछ अर्थपूर्ण साहित्य हो, कोई सुंदर कविता हो, एक अच्छा सिनेमा हो, अच्छा संगीत हो, चित्रकला हो, नाटक हो — यह मेरी आकांक्षा है और आज भी इस लालसा को अपने भीतर पाता हूँ।

    हमारे मामूली से मामूली, साधारण से साधारण आदमी को — हमें कविता से, संगीत से, चित्रकला से, सिनेमा से जोड़ना चाहिए। क्योंकि तभी वो अपना जीवन पूरी समग्रता में देख सकता है, जी सकता है, अपनी सृष्टि में होने को महसूस कर सकता है। यदि हमारा मामूली आदमी सिर्फ आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक जीवन से ही घिरा रहा और उसके सांस्कृतिक जीवन में जो गति या जो धारा है, वो उसके जीवन में बहुत शिथिल या धीमी रहे — तो वो कम से कम एक समग्र मनुष्यता का जो सपना है, जो मनुष्यता की समग्रता का जो हासिल है, जो वर्षों-वर्षों से संसार में आता रहा है — उसे जी नहीं सकता।

    और मुझे ऐसा लगता है कि यदि एक सभ्य समाज हो, या कोई ऐसी सामाजिक व्यवस्था हो, राजनीतिक व्यवस्था हो — उसे अपने संकल्पों में यह बात रखनी चाहिए कि वे अपने नागरिकों के जीवन में एक सांस्कृतिक सौंदर्य लाने के लिए कितनी सक्रिय भूमिका निभाती हैं, या कितना कुछ ऐसा करती हैं — ताकि उस व्यवस्था में रहने वाला जो नागरिक है, वो संगीत, साहित्य, कला और सिनेमा के जादुई जीवन के करीब रह सके। मुझे ऐसा लगता है कि यदि हमारी राजनीतिक व्यवस्थाएं, सामाजिक व्यवस्थाएं, या शैक्षणिक संस्थान — चाहे वो औपचारिक हों या अनौपचारिक — यदि ये चाहें, तो साहित्य, कला, संगीत, कविता जैसी चीज़ों का उपयोग करके साधारण लोगों के जीवन में गहरी संवेदनाओं को, गहरी सजगता को ला सकते हैं।

    प्रश्न: आपकी अनेक जिम्मेदारियाँ एवं व्यस्तताएं रही हैं — उनके बीच में आप स्वयं को रचनात्मक रूप से कैसे पोषित करते रहे?

    जयशंकर जी: यदि सच कहूँ तो मेरी ज़िंदगी के शुरुआती जो 20 वर्ष रहे, उनमें ही थोड़ा-बहुत कुछ आर्थिक कष्ट रहा होगा — आर्थिक कठिनाई या पिता के छोटी उम्र में चले जाने की वजह से जो परिवार का बिखराव है, परिवार की अभाव और आर्थिक परेशानी रही। लेकिन जब मैंने 20 वर्ष की उम्र में नौकरी करनी शुरू की, तो उसके बाद का मेरा जीवन बहुत कठिन नहीं रहा — क्योंकि जो आर्थिक आधार था, वो बन गया था।

    और मैं चूँकि घर में सबसे छोटा था, इसलिए मेरी जिम्मेदारियाँ भी कम थीं। सिवाय माँ की — उनकी आर्थिक जिम्मेदारियाँ और बीमारी के समय में उनकी देखभाल करनी पड़ती थी। लेकिन उनकी सारी जीवन भर की देखभाल — जो ज्यादा बड़ी ज़िम्मेदारी थी — वो मेरे बड़े भाई और उनके परिवार ने की।

    नौकरी भी — बैंक की छोटी-सी नौकरी थी, मैंने प्रमोशन नहीं लिये — इसके चलते मेरी नौकरी भी काफी सरल रही। जहाँ पोस्टिंग थी, वो छोटा-सा कस्बा था। बहुत मिलनसार लोग थे, मदद करने वाले लोग थे — ज्यादातर ग्रामीण इलाकों से आने वाले थे, किसानों और आदिवासियों का इलाका था। बैंकिंग का काम भी आज की तरह उतना जटिल नहीं था।

    तो मैं नहीं सोचता कि मेरे जीवन में बहुत जिम्मेदारियों वाला कोई कठिन दौर रहा। लिखने का सवाल तो — मैं सोचता हूँ कि मुझे जितने अवसर मिले, और जितना मैं कर सकता था — उसका मैंने दस प्रतिशत भी शायद नहीं किया। एक तरह के आलस के कारण या एक तरह की आत्ममुग्धता के कारण। यदि मैं ठीक ढंग से परिश्रम करता रहा होता और मैंने अपनी प्रतिभा को — जो भी मेरे पास थी — ठीक ढंग से साधा या माँजा होता, तो शायद मैं कुछ अच्छा या कोई जरूरी सा काम अपने लिखने में कर सकता था।

    और मुझे यह सोचकर और ज्यादा दुख होता है कि मैं जिस देश में रहा, जिस समय में रहा — उन परिस्थितियों की यदि विश्व के दूसरे लेखकों के जीवन की कठिन परिस्थितियों से तुलना की जाए तो मेरा जीवन तो बहुत ही सरल-सा था। उसमें किसी भी तरह की कोई जटिलता नहीं थी।

    इतिहास के किसी भी बोझ को मुझे सहना नहीं पड़ा। राजनैतिक रूप से मुझे कभी भी कोई ऐसी स्थितियाँ नहीं आईं कि मेरे लिखने पर कोई प्रतिबंध लगा हो। जबकि जिस समय मैं बड़ा हो रहा था — द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के 20-25 साल का समय है — तब लिखने वालों की दुनिया में बहुत संकट थे। रूस जैसा देश था जहाँ बोरिस पास्तरनाक का जीवन कितना कठिन रहा। मैंने पढ़ा है कि सर्दियों में लकड़ियाँ जलाने के लिए उन्हें अपनी किताबें बेचनी पड़ती थीं। और वे नोबल पुरस्कार लेने के लिए स्वीडेन नहीं जा पाये — क्योंकि उनकी सरकार का कहना था कि यदि आप गये तो वापस नहीं आ सकेंगे।

    उसी देश में मारीना त्स्वेतायेवा — मैंने पढ़ा है कि जिस Frock में वो घर में रहती थीं, कपड़े धोना, बर्तन माँजना, खाना बनाना करती थीं — उन्हीं कपड़ों में वो दूसरी जगहों पर जाकर कविता-पाठ किया करती थीं — क्योंकि उनके पास पर्याप्त कपड़े ही नहीं थे। उन्होंने भी बहुत कष्ट सहा और जीवन के आखिरी दिनों में उन्होंने आत्महत्या की।

    तो पूरी बीसवीं सदी के लेखकों का — लिखने वालों के जीवन की तरफ देखें तो — इतनी जटिल राजनैतिक परिस्थितियों में लोग रहे, इतनी सेंसरशिप रही, इतना कष्ट भोगना पड़ा। और अपने ही देश के संदर्भ में सोचूँ तो — मुक्तिबोध का जीवन कितना कठिन रहा, उन्हें छोटी-छोटी नौकरियाँ करनी पड़ीं, और उन्होंने अपना एक भी संग्रह प्रकाशित होते हुए नहीं देखा।

    तो इन सब परिस्थितियों से तुलना में जब मैं अपने संदर्भ में सोचता हूँ, तो मुझे लगता है कि मैंने तो जरा भी कष्ट नहीं उठाया — न मेरा किसी विपदा से, किसी त्रासदी से कोई पाला पड़ा।

    प्रश्न:  यथार्थवादी कहानियों एवं कथेतर गद्य के अलावा, आपके मन में कभी उपन्यास लिखने का विचार आया? और साथ ही — महात्मा गाँधी, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, तुर्गनेव, चेखव, इज़राइल ज़ंगविल आदि पर आपको अच्छी जानकारी है — कभी इन हस्तियों अथवा ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर कहानी लिखने का विचार आया?

    जयशंकर जी: आपके पहले सवाल का जवाब — मुझे हमेशा से लगता रहा — देखिए, कहानियाँ लिखते लगभग मेरे जीवन के 45-46 वर्ष हो चुके हैं। यदि मेरी पहली प्रकाशित कहानी के हिसाब से देखें तो वो 1977 में एक साहित्यिक पत्रिका में छपी थी, तब मेरी उम्र रही होगी 18 वर्ष। लेकिन यदि उसे न भी मानूँ — जो कि मैं नहीं मानता — और अपनी शुरुआत 1983 में प्रकाशित कहानी अम्मा का खेल से भी करूँ, जो साक्षात्कार में छपी थी, तो भी इतने वर्ष होते आए हैं।

    कहानियाँ लिखते-लिखते, मुझे यह नहीं लगता कि मैंने कोई एक ऐसी ठीक तरह की कहानी लिखी है — जिसे हम एक मुकम्मल कहानी कह सकें, या जिसे मैं कहूँ कि थोड़ी कम नाकाम कहानी है। यदि थोड़ा सोचूँ तो शायद दो-तीन कहानियाँ ऐसी हो सकती हैं — और वो भी संभावना के रूप में कह रहा हूँ — कि यदि मैं उन्हें पढ़ूँ तो लगे कि इनमें मैंने कम नाकामियाँ हासिल की हैं।

    लेकिन यह तो कहानी है, जो कम समय लेती है और कम माँगती है। उपन्यास तो आपसे बहुत परिश्रम माँगता है, बहुत पैशन माँगता है। एक अलग तरह की साधना, एक अलग तरह की तपस्या की जरूरत उपन्यास माँगता है।

    जो मैंने की भी — आज से लगभग 2003-04 के आसपास में मैंने एक छोटा उपन्यास लिखकर समाप्त किया था — कम से कम उसका एक ड्राफ्ट मैंने जरूर पूरा किया था। लेकिन तब भी ड्राफ्ट पूरा करने के बाद दुबारा पढ़ने पर मुझे लगा था कि उसमें बहुत सारी कमियाँ हैं, बहुत सारी कमज़ोरियाँ हैं। वो कहीं से भी अपने होने में उपन्यास नहीं है — यदि है भी तो कुछ कहानियों का एक समुच्चय है, जैसे कहानियों का एक सिलसिला बना है। लेकिन एक स्वतंत्र रूप से जिसे उपन्यास कहा जा सके, एक जीवंत ऑर्गेनिज्म के रूप में — वो ऐसा बना नहीं था।

    फिर मैंने 5-6-7 साल बाद फिर से प्रयत्न किया। लेकिन तब भी मैंने वही पाया — जैसी कमज़ोरियाँ मुझे लिखने के बाद महसूस हो रही थीं, लगभग वो वैसी ही लगती रहीं।

    फिर 2016-17 में — स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद — मैंने उस पर थोड़ा काम करना शुरू किया और किया भी। लेकिन काम करने के बाद भी उसमें एक तरह की बेतरतीबी, एक तरह की आकारहीनता, एक किस्म की अराजकता— एक तरह का ढीलापन बना ही रहता था। मैंने उसे 2018 के आसपास — क्योंकि मुझे लगा कि अब जब मैं इस पर काम भी नहीं कर रहा हूँ और इसके प्रेत मेरे साथ घूमते रहते हैं — अपने उपन्यास के जो पन्ने थे, उन्हें मैंने नष्ट कर दिया।

    तो कुल मिलाकर मैं यह कहना चाह रहा हूँ कि जिस चीज़ पर मैंने इतने वर्षों तक काम किया, थोड़ा-बहुत पढ़ता भी रहा, सोचता भी रहा — मैं अपनी उस विधा में अपने को कोई बहुत दूर तक नहीं पाता। अब मेरे मन में उपन्यास लिखने का ख्याल भी नहीं आता। दस-आठ साल पहले तक कम से कम सोचा करता था कि किसी दिन उपन्यास लिखूँगा — लेकिन अब धीरे-धीरे यह उपन्यास लिखने का ख्याल एक तरह का ख्याल और ख़्वाब ही बना रह गया।

    आपके दूसरे प्रश्न का जवाब — कि ऐतिहासिक हस्तियों या पृष्ठभूमि पर कहानी लिखने का विचार — इस पर हम बाद में लौटेंगे।

    प्रश्न: स्त्री के देह की स्वतंत्रता पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है, स्त्री के कानूनी अधिकारों पर भी काफी कुछ लिखा जा चुका है, स्त्री के प्रेम, विवाह, करियर आदि पर कई चर्चाएं हो चुकी हैं। पर आपकी कहानियों में स्त्री की बौद्धिक संप्रभुता, आध्यात्मिक दुविधाओं, अस्तित्वगत कशमकश का संघर्ष देखने को मिलता है। स्त्री पात्रों को ऐसे समझने एवं लिखने की प्रेरणा आपको कैसे मिलती है?

    जयशंकर जी: यह जानकर मुझे थोड़ा आश्वस्त जरूर हुआ है कि एक लेखक और पाठक होने की हैसियत से आपने ऐसा कुछ महसूस किया है। लेकिन यदि ऐसा कुछ हो पाया है, तो यह अनायास हो गया होगा — मैंने बहुत सोच-समझकर यह नहीं किया है।

    क्योंकि मैं आपसे शायद पहले भी बता चुका हूँ कि मैं लिखना शुरू करने के पहले या लिखने की प्रक्रिया में बहुत अधिक योजना से बहुत सारा काम नहीं करता। मैं कोशिश करता हूँ कि जितनी चीज़ें सहजता से, अवचेतन के स्तर से खुल सकें — वो ही आएँ तो बेहतर है।

    मैंने कभी भी किसी कहानी को लिखते समय पहले से हल्का-सा भी अंदाज़ा नहीं लगाया कि यह अब कहाँ जाने वाली है, इसमें क्या होने वाला है। किसी एक ऐसे बिंदु से, या इमेज से, या याद से वो खुलने लगती है। और वो सहजता से खुलती है।

    तो मैं यह कहूँगा कि यदि किसी पाठक को — और खासतौर पर आपके जैसे सजग और संवेदनशील पाठक को — इस बात का एहसास मिला है, तो यह मेरे लिए काफी आश्वस्त करने वाली बात है, मुझे काफी तसल्ली देने वाली बात है।

    लेकिन मैं यह भी कहना चाहूँगा — कहानी लिखने की प्रक्रिया से अलग — एक व्यक्ति या नागरिक की हैसियत से सोचूँ तो मुझे जरूर लगता है कि कोई भी स्त्री — स्त्री होने के पहले एक व्यक्ति होती है। और हमें हर मनुष्य को — चाहे वो स्त्री हो या पुरुष — इस तरह से सोचना शुरू करना चाहिए कि वो सृष्टि में आया हुआ एक व्यक्ति है। और अब उसकी अपनी तरह की — चाहे स्त्री हो या पुरुष हो — बौद्धिक और भावनात्मक जिज्ञासाएं होती हैं। और किसी की भी भावनात्मक, बौद्धिक या आध्यात्मिक जिज्ञासाओं का उसके जाति, धर्म, वर्ण, वर्ग अथवा लिंग से निर्णायक और निश्चित सम्बन्ध नहीं होता।

    जो भी मनुष्य इस सृष्टि में आया है — यदि उसका अपना एक दिमाग है, अपनी तरह की बुद्धि है — तो उसके अपने सवाल भी होंगे जो विशुद्ध निजी और उसी के होंगे, और उसके उत्तर भी विशुद्ध निजी और उसी के होंगे — चाहे स्त्री हो या पुरुष।

    मैं इस बात पर जोर देना चाहता हूँ कि जो भी सृष्टि में आता है — चाहे स्त्री हो या पुरुष — उसकी सृष्टि और संसार को पढ़ने की अपनी एक दृष्टि होती है, अपना एक खास नज़रिया होता है — जिसका उस व्यक्ति के धर्म, लिंग, जाति या वर्ण से कोई सम्बन्ध नहीं होता। क्योंकि वो जब पूछ रहा होता है, वो एक व्यक्ति की हैसियत से पूछ रहा होता है।

    और मुझे यह भी लगता है कि जब तक हमारा समाज, दुनिया — स्त्री को सिर्फ देह समझने के पूर्वग्रह से देखते रहेंगी — यह पूर्वग्रह बना और बचा रहेगा — जब तक हमारा समाज इस बात को स्वीकार नहीं करेगा कि स्त्री बुद्धि भी है और स्त्री आत्मा भी। जब तक हम स्त्री को — या पुरुष को — देह, बुद्धि और आत्मा की समग्रता में नहीं देखेंगे, तब तक हमारे समाज में, हमारी दुनिया में, स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में सहजता नहीं आएगी।

    और मुझे बड़ा दुर्भाग्य लगता है कि इतनी मनुष्यता की यात्रा के बाद भी — आज की तारीख में — चाहे विकासशील देश हो या विकसित देश — स्त्री और पुरुषों के रिश्तों में एक सहजता नहीं है, परस्पर प्रेम और विश्वास का आधार नहीं है।

    और जब तक यह स्थिति बनी रहेगी — स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में असहजता बनी रहेगी — तब तक मुझे नहीं लगता कि मनुष्य एक सुखी प्राणी की तरह इस स्थिति को स्वीकार कर पायेगा।

    मैं सोचता हूँ कि अवचेतन के स्तर पर अपनी कहानियों में मैंने स्त्री-पुरुष के रिश्तों में जो अँधेरे गलियारे हैं, उनमें ठहरने और ठिठकने का एक विनम्र-सा, बहुत थोड़ा-सा प्रयास जरूर किया है। लेकिन यह नहीं जानता — इसके बारे में बहुत आश्वस्ति के साथ नहीं कह सकता — कि इस प्रयास में मैं कितना सफल या असफल हुआ हूँ। इस सफलता और विफलता दोनों के संदर्भ में मैं खामोश रहूँगा।

    प्रश्न: आपकी रचनात्मक यात्रा के अनुभव से आप अन्य लेखकों के साथ कौन सी सीखें साझा करना चाहेंगे?

    जयशंकर जी: मुझे नहीं लगता कि मेरी कोई समृद्ध रचनात्मक यात्रा रही है। मेरी लिखने में — जितना मैंने परिश्रम किया, उससे ज्यादा करता — या कम लापरवाह होता, ज्यादा जिम्मेदार होता — तब शायद मेरा इतने समय तक कहानियाँ लिखते रहना, मेरे लिए भी और दूसरों के लिए भी, कुछ महत्वपूर्ण और गहरी बात हो सकता।

    लेकिन अब जब मैं अपनी उम्र के 65 वर्ष पार कर चुका हूँ, तो बहुत ईमानदारी के साथ मुझे लगता है कि अपने काम को — कहानी लिखने के अपने काम को — मैं उतने अच्छे तरीके से नहीं कर पाया। मैं उतना जिम्मेदार नहीं रहा और मैंने बहुत लापरवाही के साथ अपने लिखने का काम किया। इसका मुझे दुख है जो सालता रहता है।

    लेकिन मैं सिर्फ दुख और दुविधा की छाँव में ही नहीं बना रहता — मैं कोशिश भी करता हूँ कि अब अपने लिखने के प्रति थोड़ा ज्यादा जिम्मेदार रहूँ, जो विश्वास मुझे पढ़ने वालों से मिला है उसे कायम रख सकूँ, और अपने लिखने में ज्यादा परिश्रम करूँ, ज्यादा समर्पण और ज्यादा गंभीरता के साथ।

    किसी को भी कोई सलाह देने के लिए जो जरूरी काबिलियत चाहिए, उसका मैं अपने भीतर बहुत गहरा अभाव पाता हूँ। इतना जरूर महसूस करता हूँ — और इस महसूस करने पर भी संशय होता है — कि अच्छा लिखने के लिए साहित्य और संसार दोनों को ही अच्छी तरह से पढ़ने की कोशिशें जरूर होनी चाहिए।

    प्रश्न: देश-विदेश के कौन से लेखक एवं अन्य विधाओं के कलाकार अथवा रचनाकार आपको पसंद हैं?

    जयशंकर जी: पिछले 50 वर्षों में मैंने कितने ही देशी-विदेशी लेखकों की कृतियों को पढ़ा है। और मैं सोचता हूँ कि इन सारी कृतियों में, इन सारे लेखकों में — मुझे कितना कुछ दिया है, बहुत कुछ सिखाया है, बहुत कुछ समझाया है। उन सब लेखकों और उन सारी कृतियों को याद करना — मुश्किल ही नहीं, असंभव भी रहेगा। जिन लेखकों को और जिन कृतियों को छोड़ दूँगा, उनके लिए मन में अपराधबोध बना रहेगा। बड़ी से बड़ी कृति में भी सब कुछ हमारे मानस और चेतना को छूता भी नहीं है — किसी कृति का कोई अंश, कोई दृश्य, कोई पात्र या कोई वाक्य भर याद जाता है।

    इतना जरूर कहना चाहूँगा कि साहित्यिक कृतियों को पढ़ते रहने के मेरे प्रयासों ने मेरे अब तक के जीवन को सहनीय बनाया है — और एक हद तक सुखी भी। यदि पढ़ते रहने का अभ्यास न होता, तो न मैं ठीक से जी पाता और न थोड़ा-सा ही कुछ ठीकठाक लिख पाता।

    अब लगता है कि साहित्यिक कृतियों के साथ मेरे संवादों ने मेरे जीवन के अकेलेपन को, मेरे जीवन के अधूरेपन को, और इस तरह से मेरी जीवन में आई विडम्बनाओं और विसंगतियों को कम करने में बहुत मदद की है।

    और मुझे लगता है कि मैं अपनी आखिरी साँस तक उन लेखकों का, उन कृतियों का — जो एक लम्बे देशकाल में फैली हैं — जिनकी शुरुआत उन्नीसवीं सदी के रूसी लेखकों से होते-होते आज तक के जो लेखक हैं — जिनमें मैं टोनी मॉरिसन, नादिन गॉर्डिमर जैसे लेखकों को भी शामिल करना चाहूँगा — इन्होंने मुझे बहुत कुछ दिया है।

    इन सारे लेखकों में — चाहे वो दूसरे देशों के हों या अपने देश के — न केवल लेखक, बल्कि इसमें कई ऐसे निबंधकार रहे, कई ऐसे public intellectuals रहे, कई ऐसे समाजशास्त्री रहे, कई ऐसे नृवंशविज्ञानी रहे — जिनको पढ़ने से मेरे अपने जीवन की बहुत सारी पहेलियों को, मेरी अपनी बौद्धिक और भावनात्मक जिज्ञासाओं को जीने में, एक हद तक पूरा करने में — इन सारे लेखकों और इन सारी कृतियों ने मेरी बहुत मदद की।

    प्रश्न: आप नागपुर की फिल्म सोसायटी में भी वर्षों से सक्रिय रहे हैं। किन फिल्मकारों एवं फिल्मों ने आपको प्रभावित किया है?

    जयशंकर जी: मैं 1978 में — 19 वर्ष का रहा होऊंगा — तब हमारे शहर में ‘सिनेक्लब’ नाम से एक फिल्म सोसायटी की शुरुआत हुई थी। और यह वो समय था जब मैं कॉलेज में जाने की शुरुआत के ही समय में था — बारहवीं पास करके पहले वर्ष में दाखिला हो रहा था।

    उन दिनों से मैंने फिल्म सोसायटी के माध्यम से दुनिया भर की फिल्में देखनी शुरू कीं। जैसे-जैसे हम बड़े होते गये, फिल्में बदलती गईं, निर्देशक बदलते गये, समय बदलता गया — और एक सिलसिला-सा शुरू रहा। जो सिलसिला हिचकॉक, चार्ली चैपलिन या Jean Renoir की फिल्मों से शुरू हुआ था, वो सिलसिला अब तक चलता आ रहा है — जहाँ मैं नूरी बिल्ज़ श्यालान की फिल्में देखता हूँ, या माइकल हानेके की फिल्म देखता हूँ।

    तो एक लम्बा कालखंड है — शायद 45-46 वर्षों से — मैं जो दुनिया भर का, अलग-अलग देशों का, अलग-अलग कालखंडों का, लम्बी परम्परा का सिनेमा देखता रहा हूँ। उन कृतियों को या उन निर्देशकों को चुनना भी एक मुश्किल-सा काम होगा — क्योंकि वो बहुत सारे हैं, अलग-अलग समय के हैं। जो निर्देशक पहले भाते थे, अब नहीं भाते; जो नहीं भाते थे, अब भाने लगे हैं।

    इसलिए यह कहना बेमानी होगा कि किस एक निर्देशक ने मुझे बहुत प्रभावित किया।

    लेकिन एक उदाहरण देना चाहूँगा — जैसे 1992 के आसपास ईरान में भूकम्प आया। एक पूरी की पूरी सभ्यता जैसे पूरी तरह से खंडित हो गई, हज़ारों लोगों की मृत्यु हुई। उसके बाद जो ईरानी सिनेमा आया — जिसमें Mazid Majidi थे, मोहसेन मखमलबाफ थे, किआरोस्तमी थे — यह सिनेमा उस समय में बहुत छू गया। आपको लगा कि इतने ध्वस्त देश में, जहाँ इतनी आर्थिक बरबादी हुई है, जहाँ पूरी-पूरी बस्तियाँ खंडित हुई हैं — वहाँ से कैसे इतना अच्छा सिनेमा आता है, जो इतने कम बजट का था। अब्बास किआरोस्तमी ने बहुत छोटी राशि में अपने समय की कुछ महत्तम फिल्मों को जन्म दिया — जैसे Taste of Cherry को देखना एक बहुत अलग तरह का अनुभव था, Where is the Friend’s Home? को देखना एक अलग अनुभव।

    तो एक बात मैं कहूँगा कि इतने लम्बे कालखंड में दुनिया में बहुत सारे बदलाव आये हैं। इतिहास की अपनी उतार-चढ़ाव हैं, धर्म, राजनीति और समाज की अपनी उतार-चढ़ाव हैं, विज्ञान और तकनीकी और बाजार की अपने बदलाव हैं — उन सबको जो हमारा आधुनिक सिनेमा है, वो संबोधित करता रहा है। इसलिए यह बहुत मुश्किल होगा कि जिस लम्बे असे के, जिस सिनेमा ने मनुष्य और प्रकृति के अलग-अलग तरह के आयामों से मुझे मुखातिब करवाया है, उसके बारे में बहुत संक्षिप्त रूप से कुछ कह सकूँ।

    साहित्य के बाद सिनेमा मेरा दूसरा प्रेम जैसा रहा है। सिनेमा के प्रति इस अनुराग ने भी मुझे अपनी भावनात्मक और बौद्धिक जिज्ञासाओं के साथ जीने में बहुत ज्यादा मदद की है। साहित्य और संगीत की तरह मैं सिनेमा के संसार का भी आजीवन ऋणी हूँ।

    प्रश्न: आपका नया कहानी संग्रह इस बारिश में — यह आपके पूर्व कहानी संग्रहों से कैसे भिन्न है?

    जयशंकर जी: आपको बताना चाहता हूँ कि पिछले दिसम्बर में आधार प्रकाशन ने अपना सालाना पुरस्कार मुझे दिया — पुरस्कार की घोषणा जून-जुलाई में हुई थी और दिसम्बर में यह पुरस्कार दिया गया।

    दो-तीन ऐसी कहानियाँ जरूर थीं जिनको मैं नये संग्रह के योग्य समझता था — लेकिन दो-तीन कहानियों से संग्रह बनाना मुश्किल था। मैंने फिर पिछले बारह वर्षों में ऐसी कुछ कहानियाँ खोजीं जो लिखी तो जा चुकी थीं, जो मुझे थोड़ी ठीक भी लगी थीं — लेकिन उन कहानियों का एक अधूरापन, उनका अधपका होना, मुझे अखरता था। इसलिए मैंने सोच रखा था कि बाद में जब अवकाश मिलेगा तो उन्हें देखूँगा।

    तब मैंने सोचा — क्यों न यह समय है जब मुझे संग्रह तैयार करना है — तो मैंने अपनी जो सात आठ कहानियाँ थीं, जो वैसे तो पूरी लिखी जा चुकी थीं लेकिन उनमें कहीं-कहीं कुछ रह जाता था — उनमें और ज्यादा काम किया। किसी तरह से जब वो हो गया, तो यह संग्रह पिछले दिसम्बर में प्रकाशित हुआ।

    यह तो नहीं कह सकता कि यह संग्रह पिछले संग्रहों से कितना अलग है — क्योंकि अपनी ही लिखी हुई चीज़ों के बारे में एक तरह की निःसंगता – निर्ममता संभव नहीं हो पाती — न अपनी बड़ी-बड़ी कमज़ोरियों और दोषों को देख सकते हैं, न अपनी कमियों को ठीक से।

    लेकिन यह जरूर बता सकता हूँ कि यह पहला संग्रह है जो इतनी कम अवधि में मैंने तैयार किया है। सामान्यतः मैं पाँच-छह सालों में एक संग्रह तैयार करता था — और मैंने लिखा भी उस तरह से कम ही है, क्योंकि बैंक की नौकरी के दौरान इतना अवकाश मिल नहीं पाता था। इसलिए एक संग्रह की कहानियाँ लिखने के लिए मुझे पाँच-छह साल लग जाते रहे हैं — और मेरे पिछले सारे संग्रहों में यह अंतराल आपको नज़र भी आएगा।

    यह पहला संग्रह है — इसलिए मैं यह भी कहूँगा कि हो सकता है कि पर्याप्त परिश्रम करके या पर्याप्त समय देकर इन कहानियों को और बेहतर बनाया जा सकता था।

    और अब मैं इंतज़ार कर रहा हूँ — इस संग्रह के आने के बाद — कि जो थोड़े-बहुत लोग संग्रह को पढ़ने का साहस दिखाएंगे या पढ़ने का प्रयास करेंगे, वो इन कहानियों की कमज़ोरियों के बारे में मुझे अवगत कराएंगे — ताकि मैं आने वाली कहानियों में उन भूलों को सुधार सकूँ, और उन कमज़ोरियों को दूर सकूँ।

    [नोट: यह साक्षात्कार रिकॉर्डेड वार्तालाप से संपादित किया गया है।]

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    2 mins