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मदन पाल सिंह के उपन्यास ‘हरामी’ का एक अंश

युवा लेखक मदन पाल सिंह को हम हिंदी वाले अनेक रूपों में जानते हैं। सबसे पहले उनको हमने फ्रेंच-हिंदी अनुवादक के रूप में जाना। इस क्षेत्र में उनका नाम जाना-माना है। पिछले साल उन्होंने एक उपन्यास लिखा ‘हरामी’। यह उपन्यास पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जीवन का जीवंत दस्तावेज है। आइए इसका एक अंश पढ़ते हैं-

यात्राएँ

भोगा के प्रयाण वाले दिन ही इलाक़े में एक और मौत हुई। लेकिन यह वजह नहीं है कि इस घटना का यहाँ वर्णन किया जाये। कारण यह है कि उन दोनों यानी भोगा और विक्रम विज्ञानी की पेशी आकाश में एक साथ हुई थी।

गंगा के दूसरे पार एक छोटा-सा रेई से भरा गाँव है बादलपुर ख़ुर्द। वहीं गाँव के बाहर सिंचाई के कुलाबे से पहले एक बड़ी और पुरानी परित्यक्त हवेली है, जिसकी छत में बड़ी दरारे हैं। पीपल और बड़ के पेड़ दीवारों और छत को फोड़कर कभी के छितर  चुके थे। चुरचुटा, आँखा, भाँग, बिच्छू और चौलाई घास हवेली के अन्दर और बाहर उगती गयी। पुराने ज़मींदारे में जन्मे ठाकुर विक्रम का यही निवास था। ज्ञान की प्राप्ति होने पर विक्रम ने अपना परिवार त्यागा या परिवार वाले ही उसके ज्ञानाधार से आतंकित हो, उसे यहीं छोड़कर गाँव के बीच में रहने लगे यह पृथक् शोध का विषय है।

उसके बारे में मशहूर था कि वह एक ऐसा ज्ञानी है जो एक शब्द के छह अर्थ बता सकता है। अख़बार और किताबों के ढेर के बीच में वह नरकट की क़लम से कुछ लिखता हुआ दिख जाता था। खद्दर के मलिन वस्त्रा पहने विक्रम के कान और नाक में रूई ठुँसी रहती थी। नाक-कान बन्द रखने के अनेक कारण लोगों ने गिनाये। अधिकांश लोगों का मत था कि सीलन में पलने वाले तिलचट्टे, कानसलाई और मंजीरों के मस्तिष्क प्रवेश को प्रतिबन्धित करने का यह एक देशी उपाय है। कुछ विद्वानों ने इसे हठ योग और ऊर्जा संचयन से जोड़कर देखा। शायद बाह्य सूचना निषेध की यह एक कोशिश रही हो।

बिवाई से भरे नंगे पैर वाले इस प्रोफे़सर के हाथ में क़रीब दस मीटर लम्बा बाँस होता था। गोबर उठाने का तसला उसका तवा था और गन्ने की चीम तथा तराई में उगने वाला फटेरा, झाऊ उसका ईंधन। वहीं बारह ईटों का चूल्हा बन गया। काई और सेवाल से सजा पानी से भरा एक विशाल घड़ा कोने में रखा रहता। घर वाले ठाकुर के लिए यहीं कुछ राशन रख जाते थे।

विक्रम विरचित शब्दों के पर्याय से भी अधिक उसकी प्रतिभा यान्त्रिक संशयवाद से जुड़ी थी। इस मूल सिद्धान्त का सृजनकर्ता राहगीर, किसान और घसियारियों को निरुत्तरित करने लगा था। अनेक जिज्ञासाओं की गुत्थी के बीच उसका एक प्रश्न होता : ‘‘यदि धातु की एक जंजीर को दो अनन्त शक्ति विपरीत दिशा में निरन्तर खींचे और ऐसी अवस्था में धातु में ताप-ऊर्जा का क्षय भी न हो, जंजीर भी टूटे नहीं तो तीसरी अवस्था क्या होगी? …यदि एक उड़ती चीलगाड़ी का ईंधन कभी ख़तम न हो, न ही वह स्थिर हो और गमन भी न करे तो वह किस स्थिति में होगी?’’ लोग भला क्या उत्तर देते! एक क्षण प्रश्न समझने की कोशिश में समाप्त हो जाता। फिर विक्रम के ज्ञान तथा आकृति से भयभीत होकर अज्ञानी भाग खड़े होते। कुछ लोगों को उसने अपने बाँस से कोंचकर घायल भी कर दिया था।

दूर से आये विज्ञान के कुछ अध्यापकों तथा छात्रों ने शास्त्रार्थ करने की कोशिश भी की। लेकिन कोई उसकी जिज्ञासा को शान्त नहीं कर सका। इस तरह तार्किक भी बचने लगे। इक्का-दुक्का ग्रामीणों ने उधर से निकलना बन्द कर दिया। कोई काम होता तो समूह में जाते थे। विक्रम टोली के सामने अपनी जिज्ञासा की पोटली को बन्द ही रखता था। इस स्थिति में नेवले की तरह हवेली से झाँककर वह अपना पोथी-पत्रा खोलकर बैठ जाता।

विक्रम की हालत देखकर पुरोहित मुरारीलाल ने अगति और गति के अन्तर्गत इसकी व्याख्या करनी चाही। फिर उर्ध्व गति, स्थिर और अधोगति तक पहुँचने पर उन्हें भी कुछ विडम्बनाएँ दिखायी दीं तो रौरव, कृच्छु व शृवभोजन इत्यादि नरक भोगने के कारण व विक्रम के लक्षणों पर इस तरह विचार करने लगे जैसे होम्योपैथी में रोगी के व्यवहार को औषधि के सन्दर्भ में बारीकी से परखा जाता है।

भोगा को प्रवेशद्वार पर एक खूँटी से बाँधकर यमदूत चले गये। विक्रम विज्ञानी वहीं उर्ध्वमुख हो किसी से संवादरत था। वहाँ कुछ और भी आत्मन थे। बिना पट्टे के और खूँटियों से बँधे पट्टेदार भी। डण्डा और डण्डी के मानकीकरण की प्रक्रिया चल रही थी। सम्भवतः उसी के प्रभाव में आकर वे स्वतः ही सम भाषा में बात करने लगेµ

विक्रम :  ‘‘कैसे आना हुआ?’’

भोगा : ‘‘भाई मेरी पत्नी खाट के पाहे पर दोनों हाथों में अपना सिर रखे सोती थी या ऊँघ रही थी। मुझे नहीं पता। मैं दर्द से बिलबिला रहा था कि मुझे यमदूत दिखे। असहनीय पीड़ा और अवश्यमेव के सिद्धान्त के बावजूद अन्त समय निकट जानकर मैं बहुत क्रोधित हुआ। दूतों ने मेरी खाट की परिक्रमा की। एक ने मुझे तर्जनी पकड़कर उठा लिया। और दूसरा मेरे कर्मों का थैला लिए मेरे पीछे चलने लगा। रास्ते में जो भी आया डाल-पात, मकान-मीनार मैं गोह की तरह उससे चिपकने की कोशिश करता था। साथ ही अपनी अतृप्त इच्छाओं के बारे में उन्हें बताने लगा। मुझे पता नहीं था कि यमदूतों के पास सिर्फ़ आँख और मुँह होता है। वे देख और बोल सकते हैं। सुनने का काम शायद उनकी ज़िम्मेदारियों में शामिल नहीं हैं। फिर मेरी कैसे सुनते! आख़िर परेशान होकर उन्होंने मेरे गले में यह पट्टा डाल दिया और एक ने रस्सी कसकर थाम ली। मैं उछलकर उसके कन्धे पर जा बैठा। ध्यान से देखा, कान के स्थान पर दो गूलर जैसे भद्दी गाँठ थीं। मैंने उन्हें कसकर पकड़ लिया। लगता है उनके पास पहले कान रहे होंगे पर अब भर दिये गये हैं। अब तुम्हारे सामने हूँ। ख़ैर, तुम अपनी बताओ?’’

विक्रम : ‘‘यह अधूरा उत्तर है। क्या करते रहे वहाँ?’’

भोगा : ‘‘संलिप्त और निर्लिप्त में भेद किये बिना द्रव और द्रव्य का अनुवीक्षण।’’

विक्रम : ‘‘बड़े अजीब आदमी मालूम देते हो। नाम क्या है तुम्हारा? और यह सब कैसे हुआ?’’

भोगा : ‘‘असली नाम ठाकुर फलस्वरूप सिंह है लेकिन जब पता लगा कि नमी के प्रति आभ्यासिक हूँ तो लोग मुझे भोगा कहने लगे। संदीप्त कामाग्नि के माध्यम से मैंने अपनी पात्राता सिद्ध की है। यह भी बताना चाहूँगा कि अग्नि-वायु ही मेरी यात्रा के वाहक बने।’’

विक्रम : ‘‘जो भी तुमने बताया उसके अनुसार भोगा ही सही है। न कम न ज़्यादा। अन्दर भी वही बताना।’’

भोगा :  ‘‘ठीक है भैया। कुछ अपने बारे में भी बताओ।’’

विक्रम :  ‘‘शब्दों का सन्धान। ऊर्जा और निरन्तरता पर भी कुछ प्रश्न थे।’’

भोगा : ‘‘अच्छी बात है। इस यात्रा में बड़ी लगन और अपने आप से संवाद की ज़रूरत होती होगी?’’

विक्रम : ‘‘एक बाँस से अपने ही आसमान में छिद्र करने की कोशिश समझो। यह भी एक कहानी ही रही…’’

इन दोनों महानुभावों के बीच गूढ़ चर्चा का विस्तार होने ही वाला था कि उन्हें अन्दर बुला लिया गया। अपनी बौद्धिक कर्मठता से किंचित गर्वित विक्रम ने दरवाज़े से जैसे ही जल्दबाज़ी में अन्दर झाँका अधिशासी अधिकारी चिल्लायाµ ‘‘वज्र मूर्ख हो तुम! क्या तुम्हे इसलिए भेजा गया था कि बाँस से आकाश में छिद्र करने की कोशिश में ही अपना समय नष्ट कर दो? हमारे कार्य अधिकार का ही प्रतिनियोजन! …रूई के गोलों से नाक और कान के आयतन में वृद्धि करो, क्या यही अभिप्राय था? और तुम्हारे समीकरण, ब्रह्माण्ड को पाताल में लाने पर तुले हैं। …चले जाओ यहाँ से। जो वंचक स्वर्ग का सशरीर आनन्द लेने के लिए भूल-भुलैया के ग्रास बने, उनके शवों की देखभाल करो। मूँगिया कृमियों से भरी पितलाई शव पेटिका ही तुम्हारे जड़ कर्म का केन्द्र बिन्दु हैं और रहेंगे। और तुम, भोगा! परिसीमन ही न कर सके। ख़ैर यही इस कर्म का प्रारम्भ और शेष है जब तक तरल न हो जाओ… अपने कार्य जारी रखो।’’

अपने ख़ास अनुशासन और इच्छाओं के लिए समर्पित कर्मयोगी भोगा का स्वर्ग में भरपूर स्वागत हुआ। साधुवाद के साथ उसपर पुष्प-वर्षा होने लगी।

कितने युग बीत गये हैं पर अभी तक स्वर्ग और नर्क के तन्त्रा पर किये गये भाष्य और टीका-टिप्पणी पुराने चलन की लकीर का पर्याय ही हैं। ये चलचित्रा की तरह हमारे सामने से गुज़रती रहीं। सम्मोहित होने के कारण इनके पार्श्व में हमारा ध्यान नहीं गया। ढीठ भाष्यकार और यान्त्रिक कैलेण्डर छापने वाले वहाँ होने वाले नव परिवर्तन या चलन से अनभिज्ञ होने का ढोंग ही करते रहे। बिलकुल सटीक वर्णन तो सम्भव नहीं पर एक समय इस व्यवस्था में भी अनेक बदलाव हुए थे। जहाँ कान के स्थान पर गुमड़ हों वहाँ यह परिवर्तन अनेक विद्रोहों और आन्दोलनों के कारण सम्भव हुआ। एक-दो लोगों की प्रार्थनाओं का भला क्या असर हुआ होगा।

स्वर्ग के सारे उत्तम महल पुण्यात्माओं से भरे हुए थे। जिन लोगों को नरक में धकेला गया था उन्होंने आरोप लगाया कि नियति की तराजू ऐसे धूर्त के हाथ में है जो डण्डे से कोंचता है और डण्डी भी मारता है। संघ की उच्च परिषद् में अल्पकालिक तुच्छ जन समिति के पदेन सदस्य चीख़ते रहते हैं कि पाप बढ़ रहे हैं। लेकिन महल पुण्यात्माओं से भरे जा रहे हैं। जिन पातकियों ने यह शिकायत सुनी उन्होंने उच्च स्थान से ही मल-मूत्रा एवं उच्छिष्ट की वर्षा शुरू कर दी। नीचे से कुछ अधमों ने महल के परकोटे लाँघ, पापित नींव खोदनी चाही। वहीं जिस पर स्वर्ग का सिंहासन भी शोभा पाता था। कुल मिलाकर, तथाकथित पुण्यात्माओं और अधम पापियों के मध्य बड़ा बखेड़ा हुआ। चाहे वे स्वर्ग में थे या नर्क में। कुछ ने इसे आरोप माना और दूसरों ने अन्याय। अब कोई भीरु नहीं रहा।

अवहेलना और प्रतिकार स्वरूप शोर से जो कम्पन हुआ, उससे स्नायु तन्त्रा कुछ काँपा। पर कभी-कभी क्रान्तिकारियों को उनके ही उज्ज्वल पताका चिह्नित रथों में जुते घोड़ां की टापों से कुचल दिया जाता है। इसके भी कम उदाहरण नहीं मिलते। यही हुआ। पिण्ड छुड़ाने के लिए नियन्ता के आदेश पर केन्द्रीय समिति ने उन्हें सुना। समय बीता।

जब और भी शोरगुल बढ़ा तो तमाम तरह के आरोपों को अपने से कुछ दूर ठेलने के लिए एक कमेटी बना दी गयी। फिर उधर से एक अनुपम सुझाव आया कि नयी व्यवस्था लागू होने तक पापी चाहें तो अपने कर्म अनुसार यहाँ स्थान ग्रहण करें या धरती पर अशरीर-प्रतिच्छाया रूप में जाकर, खण्डित वांछा नामक उच्च कोटि की विद्या का पुनः अनुगामी बनकर अपना लोक-परलोक सुधारें। इस अभूतपूर्व व्यवस्था का सबने स्वागत किया। तात्कालिक संकट से सबको मुक्ति मिल गयी। इस तरह चुनाव का आधार, सिद्धान्त व बारम्बारता पर टिप्पणी न कर उन्होंने सावधानीपूर्वक अन्तरीय को अंगवस्त्रा से बाहर नहीं झाँकने दिया।

जब इस आदेश की घोषणा हुई तब व्याभिचारिणी के रूप में सम्मानित कुछ मातृ-शक्तियाँ वहीं धरती पर लोटकर ख़ुशी से मचलने लगीं। सन्तानों के रक्त से चिपचिपाते हाथ रेत पर रंगोली बनाने लगे। कुछ माता विचार प्रकट करती थीं कि गर्भधारण काल की अवधि नौ माह के स्थान पर बमुश्किल दो या तीन महीने होनी चाहिए। बच्चों के कंचे अंगों को लथेड़ने वाले वृद्ध लम्पटों को नवजात शिशुओं के रूप में नयी आशा दिखने लगी। ‘‘क्यों न हम चिर निद्रा में सोये मृत बच्चों को जगाकर क्रीत दास बना उन्हें भोगें।’’ उनमें से कुछ चिल्लाये।

दूसरी तरफ़ कुछ क्रान्तिकारी दिखे। ख़ूनी कोल्हू और दूसरी यातनाप्रद मशीनों से उन्होंने लोहे की बड़ी सलाखें निकाली हुई थीं। उनपर अपने सुर्ख़ लंगोट बाँधकर वे उन्हें पताका की तरह लहरा रहे थे। तुरंत ही उन्होंने एक स्वतःस्फ़ूर्त जनकविता की रचना की। जिसका सार था  हम स्त्रा के रक्त से स्वछन्दता का घोषणापत्रा तैयार करेंगे, कितबिया लिखेंगे और दुनिया को बताएँगे : पाषाण, ताम्र और लोहा कहाँ से आया है, कहाँ जाता है… कुछ बटमार छुरे के स्थान पर अपने नाख़ून पैने करते दिखे लेकिन जो ज़्यादा अक़्लमन्द और घातक गर्दनमार थे उन्होंने शब्दपाश से मति बाँधकर, अपनी जिह्वा से लोगों का लहू पीने की योजनाएँ बनायीं।

इस घोषणा पर आधारित एक नियामक पुस्तिका बना दी गयी, जिसमें नियम और उपबन्ध सैद्धान्तिक थे। स्वजातीय और स्वधर्म के सन्दर्भ में कुछ क्रिया-कलापों पर आपत्तियों का अंकन प्रमुख था। अणु गुणधर्म के प्रकाश में काया एवं आकारिकी पर उन्होंने अपने शोध का सार ही इस पुस्तिका में भर दिया। यदि अणु का अस्तित्व है तो आकार का भी एक उद्देश्य एवं प्रयोजन है, चाहे वह छायामात्रा ही सही –उन्होंने सोचा होगा।

दीनता, कौतुक, औत्सुक्य, तृष्णा, विलास प्रियता जैसे आदिम लक्षणों पर कोई टिप्पणी नहीं थी। सम्भवतः यही स्थिति भविष्य में स्वतन्त्राता का प्रवेशद्वार सिद्ध हुई।

पंजीयन कार्यालय के दफ़्तरी और पेशकारों ने पुस्तिका पर हर एक के लिए अबूझ-सा सन्दर्भ लिखा। कर्म के लेखा-जोखा से भरा थैला वहीं जमा करवाने के बाद एक छोटे से खीसा में पुस्तिका रखकर इसे शोरगुल मचाते पुण्यात्माओं को थमा दिया गया। उनका सिर छूट गया था। सब अपने स्वर्ग-नरक की राह लेने के लिए उद्धत दिखे। अचानक जैसे यवनिका उठते ही भूचाल आ गया हो!

जयन्ती नर्क में प्रयुक्त लोहे की बड़ी व भारी चट्टान की निरर्थकता को समझकर परस्त्रागामी उपहास करने लगे। शाल्मलि दण्ड की भागी सुदक्षनाएँ अवरुद्ध पीड़ा से सीत्कार करती हुई उपरोक्त पुरुषों को केलि आनन्द हेतु अपनी तरफ़ खींचकर मचलने लगीं। और इस समूह के पुरुष नग्न हो, अनजानों से भी विनोदी स्वर में प्रश्न करते किµ ‘‘अहो, आदि व प्रगतिशील का विभेद क्या है! और क्या हो!’’ लार बहाते, लसलसे मुर्दे और झाग छोड़ते कीड़ों के बीच कुलबुलाते महावट नर्कवासी संयुक्त रूप से नूतन कार्यशाला या उद्यम के लिए अनुदान पर विचार निमग्न हुए, जिससे यह उद्योग संरक्षित श्रेणी में आ जाये।

गुड़पाक के भागी कहने लगे कि क्योंकर सामाजिक समरसता के लिए किये गये उपाय पाप की श्रेणी में आयें! काल सूत्रा नर्क में ताड़ना मिलती ही नहीं थी। दुष्चक्र में फँसकर मुद्दई सुस्त थे। महापायी सज़ा के पात्रों ने इसका दण्डाधिकारी ख़ुद को नियुक्त कर रखा था और वे सावधानीपूर्वक समाज से अपना लक्ष्य चुनने के अधिकार नियंता होने के कारण मन्द-मन्द मुस्कुराने लगे। पीब, मूत्रा और रक्त वमन से बजबजाते अप्रतिष्ठ नामक नर्क में इसी से रंग खेलकर सार्थकता सिद्ध हुई। वज्रमहापीड़ भोगी चिल्लाते थे कि इस भयानक दण्ड का नाम निरर्थक साध्य होना चाहिए था।

अतिशीत नरक में आलिंगन की बाध्यता न रही। जमा हुआ तामस पिघलने लगा। स्त्रा-पुरुष हतप्रभ होकर अपनी इन्द्रियों को देख रहे थे। महारौरव के पातकियों का हाहाकार शान्त पड़ने लगा था। पर अब वहाँ बगुला, काक, गिद्ध, उलूक, भेड़िया अपनी मर्मान्तक आवाज में क्रन्दन करने लगे।

तीखे आरे, खौलते तेल से भरे कड़ाहे, तेज़ाब की वर्षा करने वाले यन्त्रा, शीतल मरीचिका का भ्रम पैदा करते गर्म बालू के टीले, भारी छेनी-हथोड़ियाँ, मुगदर सब निष्प्रभावी सिद्ध हुए। व्याध की आँखों से सज्जित कँटीले चाबुक और चपटे कोड़ों का क्षय होने लगा। साथ ही योनियों व पापाचार के गणना यन्त्रों का चक्का थम गया।

लम्बे समय से रुक-रुककर चले आ रहे संघर्ष का सुफल भोगा के हिस्से में आया। उसने अपनी कर्मभूमि का पथ लिया। वहाँ पहुँचकर वह अजीब उधेड़बुन के कारण उदासी में डूबा अपने घर पर मँडराने लगा। उसे सब कुछ सूना और नीरस लगा। हाथ में एक टेढ़ी लकड़ी थामे क़रीब-क़रीब अन्धी हो चुकी घरवाली थिगड़ी जैसी गाय पर हाथ फेरती दिखी। पशु और अपनी पत्नी की हालत उसे एक जैसी लगी –पिचके हुआ पेट वाली पराधीन और मोहताज मशीन। बहू खाना बनाने में जुटी थी। बीच-बीच में अपने बच्चे को घूँसा जड़कर वह अपने पति को निकम्मा, नीच और बेईमान की गालियाँ दे रही थी। बूढ़ी चूल्हे के पास आकर ठिठकी, घई में रोटी सिंकते देखकर बच्चे को लेने की कोशिश करने लगी। पर बहू की झिड़की खाकर चौखट पर जा बैठी। बैठक में माँ, बाबा और माई को उनकी अमरबेल जैसी ज़िन्दगी के लिए कोसती हुई काम में जुटी थी। भोगा का जबड़ा आँसुओं से तर होने लगा। पर वह कुछ कर नहीं सकता था। दण्ड विधान की बुनावट और दण्डाधिकारी की भीषण सक्षमता का उसे बोध हो चुका था।

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