केदार कानन: फूल बाबू का बंगला

आज आज हिन्दी-मैथिली के बड़े विजन वाले लेखक राजकमल चौधरी की पुण्यतिथि है। राजकमल के निधन के 59 साल हो गये। लेकिन उनका लेखन आज भी प्रासंगिक बना हुआ है। हाल में ही उनके उपन्यास ‘मछली मरी हुई’ का अंग्रेज़ी अनुवाद आया है, जो बेहद चर्चा में है। अनुवाद महुआ सेन ने किया है। आज पढ़िए उनके ऊपर यह टिप्पणी जिसे लिखा है मैथिली के प्रसिद्ध लेखक केदार कानन ने। राजकमल चौधरी को प्यार से फूल बाबू कहा जाता था। केदार कानन ने बहुत प्यार से फूल बाबू को याद किया है- मॉडरेटर 

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1980 में अपने मित्र तारानन्द वियोगी के साथ मैं फूलबाबू के बंगले के सामने खड़ा था, हतप्रभ । जतन से बनाया गया वह बंगला खंडहरनुमा बन चुका था। रंग–रोगन समय के क्रूर प्रवाह में धूसर हो गए थे। एकाध बांस से बने फूल कहीं–कहीं लटके हुए थे और बेहद उदास दिख रहे थे। समय ने उसकी खूबसूरती छीन ली थी। पता नहीं बंगाल के किस मजदूर का श्रम और जादुई स्पर्श होगा इस फूल में…

उस बंगले पर एक बोर्ड टंगा हुआ था – कृत्रिम गर्भाधान केन्द्र । कवि महाप्रकाश ने अपनी एक कविता में इसका उल्लेख किया है। वह बंगला 1972-73 से ही मवेशी अस्पताल के रूप में परिवर्तित हो गया था। तीन महीने पर 180 रुपये बतौर भाड़े पर वह बंगला लग चुका था । जिस राजकमल ने 1967 में कांग्रेस के कद्दावर नेता ललितनारायण मिश्र को महिषी गांव में घुसने नहीं दिया और प्रखर समाजवादी नेता परमेश्वर कुंवर को अपने बंगले से दुत्कार कर भगा दिया था, उस राजकमल के उजड़े– मैं बिखड़े बंगले के सामने, 1980 की किसी दोपहर तारानन्द के साथ खड़ा बहुत आहत और छोटा महसूस कर रहा था। तारानन्द का तो गांव था। वह तो पहले से ही बंगले की सच्चाई से वाकिफ था। लेकिन मैं… मैं तो ठगा–सा रह गया था उस दिन । फूलबाबू के बंगले को इस रूप में देखूंगा, इसकी कल्पना नहीं थी।

कलकत्ता के पूर्वी पुतियारी से राजकमल लौट चुके थे। कुछ दिनों तक कामायनी, भिखना पहाड़ी, पटना में रहते हुए वे भारत मेल का सम्पादन करते रहे! लेकिन बार–बार उनका मन उचट जाता। वे गांव लौटना चाहते थे। गांव में एक बंगला बनाना चाहते थे। उन्हें लगता कि महिषी की उग्रतारा उन्हें बुला रही है। यह 1966 का समय था । राजकमल को उग्रतारा की बार– बार याद आती।

वैसे 1966 का साल उन्हें रास नहीं आया। वे बार–बार बीमार पड़ते। अस्पताल के लम्बे चक्करों से घिरे थे। फिर उसी साल पटने में उनका आपरेशन भी हुआ। ठीक उन्हीं दिनों जब वे अस्पताल में जीवन और मृत्यु के बीच जूझ रहे थे, गांव से खबर आई कि उनके सौतेले भाई की शादी हो रही है। पिता के प्रति उनका मन और भी विरक्त हो उठा। मतान्तर तो पहले से था ही, वह और गहरा हो गया। स्वाभाविक था वे अस्पताल के बेड से उठकर भाई की शादी में नहीं जा सके। पिता के इस असंवेदनशील रवैये के प्रति वे घृणा से भर उठे थे।

अस्पताल में रहते ही उन्होंने मैथिली के प्रसिद्ध आलोचक आचार्य रमानाथ झा से तंत्र की दीक्षा लेनी चाही थी। रमानाथ बाबू उनकी आतुरता देख अस्पताल पहुँचे थे। तब राजकमल ने थरथराते शब्दों में उनसे याचना की थी, लेकिन रमानाथ बाबू ने दो टूक कहा था, आप उग्रतारा की शरण में जाइए। वहीं आपको मंत्र के दर्शन होंगे। और रमानाथ बाबू विदा हो गए।

यह वही 1966 था जब राजकमल चौधरी ने अस्पताल के बेड पर रहते हुए मुक्तिप्रसंग की रचना की थी। पुस्तक जब छप कर आई तो बिहार सरकार के मंत्री कर्पूरी ठाकुर को उन्होंने किताब की खरीद के लिए एक लंबा पत्र भी लिखा था। बिक्री से मिलने वाली राशि को वे अपने इलाज में खर्च करना चाहते थे। पर ऐसा हुआ नहीं। वह पत्र सरकारी महकमे में झूलता रहा। मुक्तिप्रसंग के तीसरे कवर पर वह पत्र छाप दिया गया था।

अस्पताल से छुट्टी मिली तो वे गांव लौट आए। एक बंगले का सपना उनकी आँखों में था। लेकिन वे पूरी तौर पर स्वस्थ नहीं थे। कमजोरी थी, पेट में रह–रह कर टीसता हुआ दर्द था, लेकिन गांव के प्रति आसक्ति उन्हें बांधे हुई थी। उन्होंने अपने किसी मित्र के सहयोग से किशनगंज और बंगाल के कुछ मजदूरों से संपर्क किया। मजदूरों का एक जत्था महिषी पहुँच गया। मजदूरों ने करीने और नफ्फासी से बंगला बनाना शुरू किया। बंगले के निर्माण में लगभग एक महीने लगे थे। यह राजकमल के सपनों का घर था, जिसे मजदूरों ने साकार किया था।

फूस का चौखड़ा घर। बांस की खपच्चियों से तैयार किये गये रंग–बिरंगे फूल जो घर के चारों ओर करीने से सजाये गये थे। हिन्दी के कहानीकार शालिग्राम को उन्होंने पत्र लिखा। सहरसा में दस बोरी सिमेंट की व्यवस्था हुई और एक बैलगाड़ी पर उसे लादकर महिषी के लिए रवाना किया गया। वह मिट्टी और बांस से तैयार किया हुआ बंगला था, जिसके चारों ओर ईंट–सिमेंट से नींव दी गई थी।

बंगला तैयार हुआ। लोग देखते तो विस्मय– विमुग्ध होकर देखते ही रह जाते। बंगले की शानदार नक्कासी पर चकित होते। इतनी नक्कासी, इतनी महीनी कि दिल बाग–बाग हो उठता। पूरे इलाके में ऐसा कोई बंगला नहीं था। रंग–बिरंगे फूलों से सजा–संवरा बंगला। बांस की खपच्चियों को अनेक रंगों से रंग कर तरह–तरह के फूल और फूदने बंगले के चारों ओर लटके थे। देखने में बड़ा ही खूबसूरत था वह बंगला। आँखों में सीधे उतर जाने वाला।

मैथिली के दो प्रसिद्ध रचनाकारों ने बहुत शिद्दत से उस बंगले के बारे में लिख है। सबसे पहले आलोचक रामानुग्रह झा और फिर कवि कथाकार रमानन्द रेणु ने। जब बंगला बन कर तैयार हुआ तो लोगों ने उसे ‘फूल बाबू का बंगला‘ कहना शुरू किया । फूल बाबू राजकमल का घरेलू नाम था। गांव के लोग इसी नाम से उन्हें बुलाते ।

राजकमल ने बड़ी आतुरता से हिन्दी के बड़े कवि अज्ञेय को इस बंगले बड़ी के उद्घाटन के लिए आमंत्रित किया था । अज्ञेय ने इसकी स्वीकृति भी दी थी लेकिन कुछ अपरिहार्य कारणों से वे महिषी नहीं आ सके। अब वे गांव में ही स्थायी रूप से रहेंगे, यह उन्होंने तय कर लिया था। शहरों की अंधी गलियों से वे ऊब चुके थे, थक चुके थे। उनका मन अब गांव के प्रकृति सौन्दर्य में रम रहा था। दो-तीन कोठलियों वाले उस बंगले में राजकमल किसी राजकुमार की तरह रहते। उन्हीं दिनों गांव में रहते हुए उन्होंने अपने गांव को, ग्रामीण समाज और संस्कृति के अलावा, कोसी नदी पर बेहद गंभीर और मर्मस्पर्शी कविताएं लिखीं। कुछ यादगार कहानियां भी लिखीं। कई योजनाओं को क्रियान्वित करने का प्रण लिया।

उन्हीं दिनों सुपौल में मैथिली नई कविता के पुरोधा रामकृष्ण झा किसुन ने नवकविता पर सेमिनार का आयोजन किया था। यह आयोजन 5 और 6 फरवरी 1967 को सम्पन्न हुआ था। राजकमल इस सांस्कृतिक आयोजन में आमंत्रित थे। राजकमल को लाने के लिए सुपौल से रामानुग्रह झा महिषी पहुँचे थे। वह 5 फरवरी 1967 था।

रामानुग्रह का कई लोगों से पूछते पाछते फूलबाबू के बंगले पर पहुँचे थे। बंगले पर पहुँच कर वे चकित रह गए थे। ऐसा सजा–संवरा और नक्काशीदार बँगला उन्होंने पहले कभी न देखा था। उसी समय उनकी नजर एक बूढ़ी महिला पर गई जो ओसारे को मिट्टी से लीप रही थी। बूढ़ी महिला ने जब अपना काम खत्म किया तो फूल बाबू के पास जाकर मजदूरी मांगी। राजकमल ने कहा शाम को आओ तो मजदूरी मिलेगी। बूढ़ी ने सहज होकर पूछा, शाम को क्यों? राजकमल ने तपाक से कहा, शाम को आओगी तो एक चुम्मा (चुंबन) भी तो दोगी। बुढ़िया लजा गई और धत् कह कर हँसती हुई चली गई। यह राजकमल थे। रामानुग्रह का उनके इस मजाक पर हतप्रभ हो उठे थे। उस दोपहर राजकमल और रामानुग्रह झा की जो लंबी बातचीत हुई, उसका किस्सा अलग ही है। यह पहला और आखिरी साक्षात्कार है राजकमल चौधरी का, जो उस दोपहर रामानुग्रह झा ने उनसे लिया था ।

फिर वे उसी दिन सुपौल आए। सुपौल के कार्यक्रम समापन के दूसरे दिन वे गांव लौटे। साथ में मैथिली के लेखक रमानन्द रेणु, कीर्तिनारायण मिश्र और जीवकान्त आदि भी थे। वे राजकमल का गांव देखना चाहते थे। कोसी बांध देखना चाहते थे। महिषी की उग्रतारा को देखना चाहते थे। फूल बाबू का बंगला देखना चाहते थे । ताराचरण मिश्र उर्फ बंगट गवैया के गीत सुनना चाहते थे। रमानन्द रेणु ने महिषी और फूल बाबू के बंगले के बारे में अपने अनुभवों को बहुत जहीनी से एक संस्मरण में साझा किया है।

सुपौल, राजकमल चौधरी का अंतिम साहित्यिक मंच रहा। इसके बाद वे किसी आयोजन में शिरकत नहीं कर पाए। वे बीमार होते गए और एक दिन उन्हें जैसे–तैसे उठा कर पटना लाया गया और अस्पताल में भर्ती कराया गया। ठीक चार महीने बाद 19 जून 1967 को उन्होंने अंतिम सांस ली।

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4 thoughts on “केदार कानन: फूल बाबू का बंगला”

  1. बहुत सुंदर रचना लेकिन पढ़ कर मन दुखित हो गया। विदेशों में एक एक रचयिता के घरों का जो साज सम्भाल किया गया है कि नई पीढ़ी उसे देख कर प्रेरणा लेती है और फूल जैसे नाजुक हृदय के यशस्वी लेखक के बंगले की यह दुर्दशा। अत्यंत दुखद।

  2. बहुत ही जीवंत वर्णन!आँखों के सामने एक बार सारा दृश्य गुज़र गया! बधाई केदारजी और प्रभात रंजनजी!

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