अभिषेक अम्बर लेखकों से जुड़े स्थलों पर, उनकी कहानियों के प्रसंगों पर बहुत अच्छा लिखते हैं। उन्होंने अपनी एक शैली विकसित की है। आज महादेवी वर्मा की पुण्यतिथि है। इस अवसर पर अभिषेक ने उत्तराखण्ड के रामगढ़ से जुड़ी महादेवी की स्मृतियों को जोड़कर यह गद्य तैयार किया है। स्मृति वैसे भी महादेवी जी का प्रिय शब्द था। आप यह पढ़िए- मॉडरेटर
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बाँज के पत्तों पर बारिश की आख़िरी बूँदें झूल रही थीं। कई दिनों से बरसात की ऐसी झड़ी लगी कि रुकने का नाम नहीं लिया। आज सवेरे बारिश कम हुई तो सीली-सीली भवाली में धूप खिलने के कुछ आसार नज़र आए। फिर भी घोड़ाखाल के जंगलों के ऊपर बादलों का एक झुंड गश्त लगा रहा था मानो सावन के छोड़े गुंडे हों कि सूरज की किरणें आसमान में दिखाई दें और ये जाकर उनको घेर लें। दोबारा बारिश शुरू होने से पहले हमें रानीखेत के लिए निकलना था। होटल के रेस्ट्राँ में नाश्ते का इंतज़ार करता मैं खिड़की से धूप-छाँव का खेल देख रहा था।
‘मैंने सुना कि आप अभी रानीखेत के लिए निकलेंगे।’ मेरे सामने वाली सीट पर बैठते हुए शारिक बरेलवी ने कहा।
‘जी, इरादा तो यही है।’
‘बारिश ने इस बार आपको भवाली घूमने नहीं दिया।’
‘शायद कुदरत को यही मंज़ूर था।’ मैंने हँसते हुए कहा।
“लेकिन आज तो कुदरत भी मेहरबान है, मौसम सुहावना भी हो गया है। चलिए मैं रानीखेत निकलने से पहले आपको कहीं घुमा लाता हूँ।”
“मैं और मोहित नेगी एक दूसरे की तरफ़ देखने लगे।” मन में चाह तो थी पर रानीखेत भी निकलना था।
शारिक हमारी दुविधा समझ गए। ‘रानीखेत में ज़्यादा ज़रूरी काम है क्या?”
“नहीं, नहीं, कोई इतना ज़रूरी काम भी नहीं।” हम दोनों ने ही एक बात दोहराई।
“तो तय हुआ। आप मेरे साथ रामगढ़ चल रहे हैं सेब बाग़ान घूमने।” शारिक बरेलवी साहब के इस आग्रह को हम न नहीं कह पाए। शारिक बरेलवी उस होटल के मालिक थे जिसमें हम ठहरे थे और एक सच्चे और अच्छे शाइर भी।
क्लब एप्पल ट्री होटल से रामगढ़ के सेब बाग़ान के लिए हम तीन लोग रवाना हुए। भवाली से रामगढ़ की सड़क पर जैसे ही गाड़ी ने चढ़ाई शुरू की वैसे ही शहर दूर होता गया और सब्ज़ीले जंगलों की बाहों में हमने ख़ुद को पाया।
अगर आपने कभी ग़ौर किया हो तो पहाड़ों पर बारिश के बाद कुहरा पंख पसार कर घाटियों को घेर लेता है। जंगलों में, रास्तों पर, नदियों के ऊपर सब जगह कोहरा ही कोहरा नज़र आता है। ठंडी हवाओं में साथ साथ बहता कोहरा मानो अदृश्य हवा को शरीर मिल गया हो। भवाली से रामगढ़ की सड़क पर भी ऐसा ही कोहरा अठखेलियाँ कर रहा था।
“आपको पता है रामगढ़ क्यों प्रसिद्ध है?” शारिक बरेलवी ने सवाल दागा।
“हाँ! रामगढ़ उत्तराखंड की फलों की टोकरी या फ्रूट बास्केट ऑफ उत्तराखंड के नाम से प्रसिद्ध है।” मैंने कहा।
“बिल्कुल सही जवाब! लेकिन कुछ और भी है।”
“और क्या?”
“रामगढ़ में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कुछ समय व्यतीत किया था इसलिए।” मोहित नेगी जवाब दिया।
“हाँ, आपने बिल्कुल दुरुस्त फरमाया जनाब।”
“रामगढ़ में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने केवल कुछ समय नहीं अपने जीवन का काफ़ी समय व्यतीत किया। वह 1903 ई. में पहली बार रामगढ़ आये थे।” शारिक बरेलवी ने नया तथ्य उजागर किया।
“तब तो रामगढ़ बहुत दुर्गम क्षेत्र रहा होगा?” मेरे मन में जिज्ञासा जागी।
“हाँ! तब तक तो सड़कों का विकास भी ठीक से नहीं हुआ था। पैदल ही इस क्षेत्र की यात्रा करनी पड़ती थी। फिर भी गुरुदेव अपने जीवन में कई बार रामगढ़ आए।” शारिक बरेलवी ने बताया।
“रामगढ़ में फिर तो उनका घर भी होगा?” मैंने पूछा।
“हाँ! लेकिन अब जर्जर अवस्था में पहुँच चुका है। सरकार या किसी संस्था ने सुध नहीं ली। रामगढ़ में जिस पहाड़ी पर टैगोर का घर था। आज उसे ‘टैगोर टॉप’ के नाम से ही तो जाना जाता है।” शारिक बरेलवी हमें नई-नई जानकारियाँ दे रहे थे।
“मैंने सुना है, गुरुदेव ने यहाँ रहकर गीतांजलि के भी कुछ भागों की रचना की है?” मोहित नेगी ने बात को आगे बढ़ाया।
“सुना तो यही है।” शारिक ने हामी भरी।
“क्या उनके यहाँ आने की कोई ख़ास वजह थी या सिर्फ़ घूमने के लिए ही आए थे।” मैंने पूछा।
अम्बर जी, पहले भवाली या रामगढ़ घूमने के लिए कोई नहीं आता था? भवाली में तो लोग रुकना भी पसंद नहीं करते थे। गुरुदेव भी यहाँ घूमने नहीं आए थे। 1902 में उनकी अर्धांगिनी मृणालिनी देवी का निधन हुआ। यह उनके लिए बहुत बड़ा आघात था। उनको दूसरा आघात तब मिला जब उनकी मंझली बेटी रेणुका को टीबी की बीमारी ने घेर लिया।
एक साथ दो-दो सदमे। उस समय टीबी का कोई इलाज तो था नहीं। भवाली की हवा उस समय टीबी के उपचार के लिए उपयोगी मानी जाती थी। गुरुदेव पुत्री को साथ लिए रामगढ़ आ गए। रामगढ़ में ही उन्होंने एक आवास बनाया। बीमारी में पुत्री का मन बहलाने के लिए वह रोज़ उसके लिए कविताएँ लिखते। जो बाद में ‘शिशु’ संग्रह के नाम से प्रकाशित हुईं।
बातों बातों में पता नहीं चला हम कब रामगढ़ पहुँच गए। दूर-दूर तक फैली खुली वादियाँ। धानों से भरे सीढ़ीदार खेत। छोटा सा बाज़ार। बाज़ार को पार करके पेड़ों पर लटके लाल लाल रामगढ़ के सेबों के बाग़ान। हमने टिकट लिए। जी हाँ सेब के दरख़्त देखने के लिए टिकट। ख़ैर उसमें यह छूट भी थी कि आप अंदर जितने मर्ज़ी उतने सेब खाएँ।
छोटे-छोटी पगडंडियों पर चलते हुए हमने सेब के बगीचे में प्रवेश किया। पेड़ों पर पत्ते कम और सेब ज़्यादा नज़र आ रहे थे। सेब अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुए थे फिर भी इतना बड़ा आकार तो था जो सामान्य आकार में अक्सर बाज़ार में देखने को मिलते हैं। हमने न सिर्फ़ सेबों के साथ फोटो लिए बल्कि ख़ूब खाए भी। ख़ूब से अब यह मतलब न समझें कि एक दो किलो खा लिए। इतना तो ख़ैर हमें मालूम था कि सेब पराया है किंतु पेट तो अपना है।
बहरहाल कुछ लोग ऐसे भी दिखे जो इस बात पर बिल्कुल यकीन नहीं लाते। वह हर पेड़ से सेब तोड़ कर खा रहे थे पसंद आ जाये तो थोड़ा खाया वरना वहीं फेंक दिया। बहरहाल यह तो हम भारतीयों का जन्मजात गुण है।
आधा घंटा मुश्किल से लगा और हम सेब बाग़ान घूम लिए। जितना सोचा था उससे काफ़ी कम समय लगा। हम सड़क किनारे चाय की टपरी पर बैठे चाय की चुस्कियों के साथ मौसम का आनंद ले रहे थे।
“अभी तो हमारे पास पर्याप्त समय बचा है। जब इतनी दूर आए हैं तो क्यों न रामगढ़ में और घूम लिया जाए?” मोहित ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा।
“ठीक है लेकिन कहाँ?” शारिक बोले।
“क्यों न ऐसा करें गुरुदेव का घर ही देख आएँ। रास्ते भर बातें करते आये हैं। उसे देखने की चाह मन में बार-बार आ रही है।” मोहित ने कहा।
“देख तो आएँ। लेकिन वह टैगोर टॉप पर स्थित है। वहाँ जाने के लिए हमें 1-2 किलोमीटर पैदल चलना होगा।”
“तो क्या दिक्कत है चल लेंगे” मैंने सहसा कहा।
“चल तो लेंगे जनाब, लेकिन आजकल बरसात का मौसम है। और इस मौसम में रास्ता और टैगोर भवन दोनों जोंकों से भरे होंगे। घूमें या न घूमें, हम ख़ून ज़रूर चुसवा आएँगे। और फिर रामगढ़ में सेब बाग़ान और टैगोर भवन के बाद ऐसी कोई ख़ास चीज़ नहीं जो घूमी जा सके।” शारिक ने अपनी बात रखी।
“एक चीज़ है शारिक साहब, सोचिए सोचिए अब आपकी परीक्षा का समय है? मैंने हँसते हुए कहा।
“अमाँ यार! मुझे तो याद नहीं आ रहा। आप ही बताइए।”
“रामगढ़ में टैगोर भवन के अलावा मीरा कुटीर भी तो है।”
“मीरा कुटीर?? क्या मीराबाई भी रामगढ़ आई थीं?”
“हाँ! आईं थीं और अपना घर भी बनाया। लेकिन वो मीरा नहीं जिन्हें आप समझ रहे हैं। मैं आधुनिक युग की मीरा की बात कर रहा हूँ।”
“आधुनिक युग की मीरा??”
“हाँ, आधुनिक युग की मीरा यानी हिंदी की प्रख्यात कवयित्री महादेवी वर्मा।”
“महादेवी वर्मा!! अच्छा वही जिन्हें हम स्कूल की किताबों में पढ़ते थे।”
“हाँ वही।”
महादेवी वर्मा से हम सभी का परिचय सर्वप्रथम स्कूल की किताबों से ही होता है। स्कूल में हर दूसरी कक्षा में उनकी कोई न कोई कविता रहती है। लेकिन उस समय बुद्धि इतनी कहाँ विकसित होती है कि कविताओं का मर्म समझ सकें। अध्यापक ने समझाया, हमने हाँ में सर हिला दिया। परीक्षा के समय सप्रसंग व्याख्या कर दी। बस इतना ही तो संबंध होता था कविताओं से। याद आता है मुझे वह दिन जब पहली बार महादेवी की कविता को मैंने कविता की तरह पढ़ा था। उस दिन शब्दों के जो अर्थ खुले वह आज तक नए नए मानी पा रहे हैं। आज भी मुझे वह गीत कंठस्थ है।
चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना!
जाग तुझको दूर जाना!
अचल हिमगिरि के हॄदय में आज चाहे कम्प हो ले!
या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्योम रो ले;
आज पी आलोक को ड़ोले तिमिर की घोर छाया
जाग या विद्युत शिखाओं में निठुर तूफान बोले!
पर तुझे है नाश पथ पर चिन्ह अपने छोड़ आना!
जाग तुझको दूर जाना!
जीवन के नाश-पथ पर चिन्ह छोड़ने के प्रयास में जब जब निराशा हाथ लगती है मुझे यह कविता याद आती है। और मन ऊर्जा से भर जाता है। यह कविता मेरे लिए किसी शक्तिकाव्य से कम नहीं।
शारिक साहब ने गाड़ी को तल्ला रामगढ़ से मल्ला रामगढ़ की तरफ़ मोड़ लिया। रास्ते में सड़क के दोनों तरफ़ देवदार, बाँज और चीड़ के दरख़्त धुंद में लिपटे थे। आसमान में काले मेघ उमड़ने लगे थे मानो किसी भी वक़्त पानी बरसाने लगेंगे। महादेवी का एक गीत याद आया।
कहाँ से आये बादल काले
कजरारे मतवाले?
वह जड़ता हीरों से डाली,
यह भरती मोती से थाली,
नभ कहता नयनों में बस
रज कहती प्राण समा ले
कहाँ से आये बादल काले
कजरारे मतवाले?
रामगढ़ के इन्हीं बादलों के किसी पूर्वज को देखकर महादेवी के हृदय से यह शब्द-जल-धार बही होगी। मेघों का उमड़ना, गरजना, बरसना जितना मनोरम मनभावन यहाँ होता है क्या कहीं और देखने को मिलता होगा?
“अम्बर जी, हमने तो आपको बता दिया टैगोर रामगढ़ क्यों बसे। आपने हमें नहीं बताया महादेवी जी यहाँ क्यों बसीं? क्या उन्हें भी कोई रोग..??” शारिक अपनी बात पूरी करते उससे पहले ही मैं बोल पड़ा।
“नहीं! नहीं! कोई रोग नहीं। महादेवी के रामगढ़ बसने के पीछे भी आपके टैगोर जी ही हैं।” 1933 ई. में महादेवी ने शांति निकेतन की यात्रा की। वहाँ टैगोर ने उन्हें रामगढ़ के असीम सौंदर्य के बारे में बताया। उसके कुछ समय बाद ही महादेवी ने बद्रीनाथ धाम की यात्रा की। बद्रीनाथ से वापस लौटते समय उन्होंने कुछ समय रामगढ़ में बिताया। यह स्थान उन्हें इतना भाया की यहीं बसने का मन बना लिया। और अगर महादेवी के एक गीत की पंक्तियाँ उधार लेकर कहूँ –
पाथेय-हीन जब छोड़ गए सब सपने
आख्यानशेष रह गये अंक ही अपने,
तब उस अंचल ने दे संकेत बुलाया!
“वाह वाह! क्या बात है। लेकिन मैं तो यह सोच कर आश्चर्यचकित हूँ कि महादेवी ने उस समय बद्रीनाथ की यात्रा कैसे की होगी? यह यात्रा आज भी इतनी कठिन मानी जाती है। उस समय तो ढंग की सड़क भी नहीं थीं। गाड़ियों की तो बात ही दूर है।” मोहित नेगी ने विस्मित होते हुए कहा।
“बेशक! उस समय सड़क और गाड़ियाँ नहीं थीं लेकिन पगडंडियाँ और घोड़े-खच्चर तो थे।” फिर भी महादेवी ने सम्पूर्ण यात्रा पैदल ही की। ‘स्मृति की रेखाएँ’ में एक रेखाचित्र है जिसमें जंग बहादुर के ज़रिए वे अपनी बद्रीनाथ यात्रा का भी वर्णन करती थीं। इस रेखाचित्र में कुली जंग बहादुर और उसके भाई धनसिंह के प्रति महादेवी की करुणा और ममता दर्शनीय है। हो भी क्यों न आख़िर महादेवी उनकी माँ जी जो थीं। आज भी जब मैं बद्रीनाथ, रुद्रप्रयाग, आदिबद्री, नैनीताल तथा श्रीनगर कहीं भी जाऊँ महादेवी को ज़रूर याद करता हूँ।
एक और प्रश्न शारिक साहब! “बताइए बरसात के दिनों में वह एकमात्र हरी सब्ज़ी कौन-सी है जिसे पहाड़ में बड़े चाव से खाया जाता है?”
“हरी सब्ज़ी तो बहुत सी होती हैं, कोई हिंट मिले तो बताऊँ।”
“चलिए एक हिंट देता हूँ! वह गाढ़-गदेरों के किनारे होती है।”
“यार मुझे तो कुछ ध्यान नहीं आ रहा।”
“मैं बताऊँ, वह लिंगड़ा/ लिंगूणा है।” मोहित नेगी ने एक पल में सही जवाब दे दिया।
“वैसे आपको अचानक से ये लिंगूणा कैसे याद आ गया?”
वो इसलिए क्योंकि महादेवी ने बद्रीनाथ यात्रा के वर्णन में इसका ज़िक्र किया है। उस यात्रा के मार्ग पर होटल या खाने के इतने विकल्प उपलब्ध होते नहीं थे। हरी सब्ज़ी के नाम पर आलू ही खाने को मिलते थे। लेकिन उनका कुली जंग बहादुर बड़े चाव से लिंगूणे की सब्ज़ी बनाता और खाता। और कोई लिंगूणे की तरह देखता भी नहीं। शहरी तीर्थयात्रियों इसे जंगली और विषैला मानते थे। महादेवी भी इसको नहीं खाती थीं लेकिन एक बार जंगबहादुर ने आग्रह करके उन्हें सब्ज़ी खिलाई। महादेवी ऊपरी मन से खाने को तैयार हुईं। लिंगूणे की सब्ज़ी उनको इतनी पसंद आई कि जंगबहादुर की हरी सब्ज़ी में उनका भी बराबर हिस्सा रहने लगा।
“हम सब ठहाका मार के हँसे।” देखिए ना शारिक साहब कैसे फ़रिश्ता सीरत लोग थे यह। जो नौकर और मालिक का भेद ही नहीं मानते थे। उनके लिए एकमात्र मानवता ही धर्म था।
रास्ते भर महादेवी का ज़िक्र करते हुए ऊंची-नीची घुमावदार सड़कों से हम मीरा कुटीर के मुख्य द्वार के सामने जा खड़े हुए। मीरा कुटीर को आजकल ‘महादेवी वर्मा सृजन पीठ’ के नाम से जाना जाता है। मुख्य द्वार से देखने पर जगह कुछ ख़ास नहीं लगती। पतली सी पगडंडी से होते हुए थोड़ा ऊपर चढ़ने के बाद मीरा कुटीर का द्वार दिखाई दिया। अंदर गए तो एकदम नीरवता पसरी थी। पेड़-पत्तों की सांय-सांय एवं पंछियों की आवाज़ भी नहीं। इसी नीरवता के दर्शन महादेवी के असंख्य गीतों में होते हैं।
यह मंदिर का दीप इसे नीरव जलने दो!
रजत शंख-घड़ियाल स्वर्ण वंशी-वीणा-स्वर,
गए आरती वेला को शत-शत लय से भर,
जब था कल कंठों का मेला,
विहँसे उपल तिमिर था खेला,
अब मंदिर में इष्ट अकेला,
इसे अजिर का शून्य गलाने को गलने दो!
यह मंदिर का दीप इसे नीरव जलने दो!
आप सोच रहे होंगे मुझे नीरवता पर महादेवी का यह गीत क्यों याद आया? वो इसलिए क्योंकि जिस मंदिर में महादेवी ने यह दीप जलाया था मैं आज उसी मंदिर में खड़ा था। महादेवी ने इस गीत की रचना रामगढ़ में रहकर ही की थी। इस गीत की ही क्या “दीपशिखा” संग्रह में जितने भी गीत मिलते हैं वह महादेवी ने 1936 से 1942 तक रामगढ़ में ही रचे थे।
हम आँगन में घूम चुकने के बाद परिसर की मुख्य इमारत में दाखिल हुए ताकि कोई व्यक्ति मिल जाये जो हमें परिसर अच्छे से घुमा सके और इससे जुड़ी जानकारियाँ भी दे सके।दरवाज़े तक पहुँचे ही थे तभी एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति बाहर निकले। मध्यम कद, उजला रंग, पतली आँखें और हमें देखते ही चेहरे पर मुस्कान सजाए उन्होंने हमारा स्वागत किया। उन्होंने मुझे पहचान लिया था और मैंने उनको। वह इस मीरा कुटीर के समन्वयक मोहन सिंह रावत थे।
हम दोनों की यह प्रथम भेंट थी किन्तु हम फेसबुक पर काफ़ी समय से जुड़े थे। मुझे देखते ही उन्होंने पहला सवाल यही पूछा। “अम्बर जी, आज किस जगह की खोज करने निकले हैं?”
“जगह की खोज करने नहीं आज मैं महादेवी की स्मृतियों को ताज़ा करने आया हूँ आपकी मीरा कुटीर में।”
उनके चेहरे पर मंद मुस्कान फैल गई, वह बोले -“आइए! आप सभी का बहुत बहुत स्वागत है।” मोहन जी हमें कुटीर के अंदर ले जाकर कुटीर दिखाने लगे।
एक छोटे से हॉल-नुमा कमरे में चारों तरफ़ महादेवी के दैनिक प्रयोग की वस्तुएँ, कलम-दवात, टेबल, कप-प्लेट सब करीने से सजाए और संजोए गए थे। हमारे लिए विशेष आश्चर्य की बात थी महादेवी के बनाए चित्र। शब्दों से काग़ज़ पर रेखाचित्र खींचने वाली पेंटर, रेखाओं से काग़ज़ पर शब्द-चित्र भी उसी कुशलता के साथ खींच सकती थीं। यह अविश्वसनीय सा था।
“मोहन जी, जब से आया हूँ मेरे मन में एक सवाल कौंध रहा है। अगर आप बुरा न माने तो पूछूँ?” शारिक ने कहा।
“ज़रूर पूछिए।”
“अम्बर जी, हमें रास्ते भर कहते आए कि हम मीरा कुटीर जा रहे हैं लेकिन यहाँ मुख्य द्वार पर तो ‘महादेवी वर्मा सृजन पीठ लिखा है। यह क्या माजरा है?”
हम मंद-मंद मुस्कुराए। इसके पीछे एक पूरी कहानी है। महादेवी ने इस घर को मीरा कुटीर नाम दिया था। जब तक वह जीवित रहीं यह मीरा कुटीर के नाम से ही जाना जाता रहा। उनकी मृत्यु के बाद इस जगह को लेकर कुछ विवाद हुए।
“कैसे विवाद?” शारिक ने जानना चाहा।
“संक्षेप में बताता हूँ। महादेवी को यह कुटीर बनाने के लिए भूमि गाँव के लोगों ने लीज़ पर दी थी। महादेवी के जाने के बाद इसके मालिकाना हक़ को लेकर विवाद हुआ। गाँव वाले इस को अपना बता रहे थे। वहीं वरिष्ठ साहित्यकार लक्ष्मण सिंह बिष्ट बटरोही इसे महादेवी की स्मृति में संग्रहालय बनाना चाहते थे। उन्होंने इस को लेकर काफ़ी कानूनी लड़ाई लड़ी और अंत में इसे कुमाऊँ विश्वविद्यालय को सौंप दिया जहाँ वह हिन्दी के प्रोफ़ेसर थे। इस मीरा कुटीर को महादेवी वर्मा सृजन पीठ बना दिया गया और बटरोही जी उसके निदेशक रहे। हाल में शिरीष कुमार मौर्य इसके निदेशक हैं। शारिक की जिज्ञासा शांत हुई और अब वह इतिहास जानने के बाद ध्यान से प्रत्येक वस्तु का अवलोकन करने लगे।
मुख्य हॉल के अलावा कुटीर में 2-3 छोटे-बड़े कमरे और थे जिनमें सामान रखा था तो कोई ऑफ़िस के रूप में प्रयोग में लाया जा रहा था। कुटीर का सबसे बेहतरीन स्थान था यह हॉल जिसमें दरवाज़े की बाईं तरफ़ महादेवी वर्मा का लिखने का स्थान था। लड़की के एक तख़्त पर छोटा सा टेबल जिसको मैंने तो पुरानी फिल्मों में ही देखा है मुंशी या मुनीमों को इस पर हिसाब-किताब करते हुए।
सामने की पूरी दीवार पर शीशे की खिड़कियाँ थीं, जिससे छनकर सूर्य का प्रकाश आता था एवं कुटीर के बाहर का मनोरम दृश्य दिखाई देता है। यहाँ बैठ कर लिखना कितना सुखद होता होगा। इस तख्त और टेबल पर महादेवी ने न जाने कितनी रचनाएँ लिखी होंगी।
“दीपशिखा के अलावा महादेवी ने यहाँ कौन-कौन सी रचनाएँ लिखी थीं?” मैंने मोहन जी से पूछा।
“दीपशिखा संग्रह के सभी गीतों के अलावा ‘अतीत के चलचित्र’ एवं ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ के कई रेखाचित्र महादेवी ने यहीं निवास करते हुए लिखे। महादेवी क्या हिन्दी के कुछ अन्य महान साहित्यकारों ने भी उनके सानिध्य में रह कर यहाँ रचनाएँ लिखी हैं। इलाचंद्र जोशी ने अपना उपन्यास ‘ऋतुचक्र’, सुमित्रानंदन पंत ने प्रकृति संबंधी कविताएं तथा धर्मवीर भारती ने अपने कुछ यात्रा-संस्मरण यहीं रहकर लिखे हैं।” मोहन जी ने बताया।
मैं आज सोच कर ही रोमांचित हो रहा हूँ कि हिन्दी के जब दिग्गज साहित्यकार यहाँ एकत्रित होते होंगे तो क्या माहौल होता होगा। छायावाद के दो मुख्य स्तंभ महादेवी वर्मा और सुमित्रानंदन पंत यहाँ क्या बातें किया करते होंगे। क्या एक दूसरे को अपनी लिखी नई कविताएँ सुनाते होंगे। क्या दोनों कवियों को सुनने ले लिए आस-पास के गाँव के लोग भी एकत्रित हो जाते होंगे? आँगन में जहाँ आज महादेवी की मूर्ति स्थापित है कभी वहाँ महफ़िलें जमती होंगी।
“इस गाँव के लोग कितने खुशनसीब हैं ना, उन्हें हिन्दी की इतनी महान कवयित्री का सान्निध्य पाया।” मेरे मन के भाव अनायास ही मुँह से फूटे।
“बिल्कुल, बहुत भाग्यशाली थे। उन्होंने महादेवी की बहुत सेवा भी की। और बदले में महादेवी ने उन्हें अमर कर दिया।”
“महादेवी देवी ने अमर कर दिया, वो कैसे?” हम सब आश्चर्य से मोहन जी का चेहरा देखने लगे।
“हा हा हा! अरे मेरे कहने का मतलब है महादेवी ने अपनी लेखनी में उन्हें स्थान देकर अमर कर दिया। अब आप लछमा को ही ले लीजिए। ऐसा कौन है जिसने महादेवी वर्मा को पढ़ा हो लेकिन लछमा को न जानता हो?”
“क्या लछमा भी इसी गाँव की थीं?” मोहित ने पूछा।
“जी हाँ, लछमा इसी गाँव की बेटी थी।” मोहन जी ने पुष्टि की।
मेरी आँखों के सामने लछमा की आकृति उभर आई। धुल-धुल कर धूमिल हो चुके लहंगे को पहने, फटी मटमैली ओढ़नी कमर से लपेटे और हाथ में घास काटने की हँसिया थामे लछमा। जीवन में मिले सैकड़ों दुखों से भी हार न मान कर खिलखिलाने वाली लछमा। अन्याय सह कर भी घर की मरजाद के लिए चुप रह जाने वाली लछमा। छत्ते के मोमी टुकड़ों से निकाला शहद पत्ते पर लेकर, महादेवी से तुरंत खा लेने की ज़िद करती लछमा। मानो मन से निकल साक्षात आँखों के सामने आकर खड़ी हो गई हो।
इसी तख़्त पर श्वेत साड़ी में कलम थामे बैठी महादेवी और मटमैले कपड़ों में फ़र्श पर बैठी शहद के पत्ते को थामे लछमा। कभी लिखने-पढ़ने में व्याघात से खिन्न हो पहाड़ की सुनसान चोटी पर कुटी बनाकर रहने का प्रण लेती महादेवी, वहीं अपनी भैंस के दूध से प्रतिदिन एक सेर दूध, दही, दो-चार आलू पहुँचा देने और महादेवी की साधना में व्यवधान डाले बिना पहाड़ की चोटी से चुपचाप लौट आने की बात करती भोली-भाली लछमा। कैसा निश्छल रिश्ता था दोनों का।
“अम्बर जी, किन ख़यालों में खो गए?” शारिक साहब की आवाज़ की आहट से यह तिलिस्म टूटा।
“कुछ नहीं, बस लछमा के बारे में सोच रहा था। बिना किसी रक्त संबंध के दोनों के मध्य कितना अटूट नाता एवं प्रेम था।”
आपको पता है, एक बार महादेवी ने लछमा को प्रयाग लाकर पढ़ाने-लिखाने का विचार बनाया। बेचारी लछमा अपनी पारिवारिक ज़िम्मेदारियों से मजबूर थी, वह प्रयाग चली जाती तो उसके बूढ़े माँ-बाप एवं भतीजे का पालन-पोषण करने वाला कोई न था। उसने महादेवी से कहा कि अगले जन्म में वह ज़रूर उनके पास रह कर पढ़ाई लिखाई करेगी। ईश्वर जाने लछमा को दूसरे जन्म में महादेवी का सानिध्य मिला या नहीं?
“इधर आइए मैं आपको कुछ दिखाता हूँ” मोहन जी हमें कुटीर के बराबर में बनी एक इमारत में ले गए। वह एक स्कूल था।
“यह देखिए, रामगढ़ की लछमाएँ बिना अपनी पारिवारिक ज़िम्मेदारियों को त्यागे शिक्षा प्राप्त कर रही हैं। और वो भी महादेवी (मीरा कुटीर) के सान्निध्य में।” मोहन जी घूम घूम कर हमें विद्यालय दिखाने लगे।
महादेवी ने अपने रहते ही मीरा कुटीर के बराबर में बालिकाओं को पढ़ाने का कार्य प्रारंभ कर दिया था। लछमा न सही लेकिन उसकी बेटियाँ यहाँ से शिक्षा ग्रहण कर नाम रौशन कर रही हैं। आज यहाँ सैंकड़ों बालिकाएं पढ़ती हैं।
महादेवी के लेखन के अलावा जब उनके सामाजिक सुधार के कार्य की तरफ़ देखो तो श्रद्धा से मन भर-भर आता है। वह केवल एक कवि नहीं बल्कि मनुष्य होने के दायित्वों का भी बख़ूबी निर्वाह करती हैं। ऐसी असंख्य कहानियाँ हैं महादेवी के जीवन की, लछमा जिनमें से सिर्फ एक है।
महादेवी के प्रति प्रेम एवं श्रद्धा से भरा मन लिए हम कुटीर के द्वार के सामने प्रांगण में बिछी बेंच पर बैठे थे। आसमान में फैले श्वेत मेघों में शाम अपने रंग छोड़ने लगी थी। दोपहर के नीरव आँगन में अब पेड़-पौधों हवा की धुन पर हौले-हौले नाच रहे थे। पंछियों का कलरव हर-सू गूँज उठा था। महादेवी की प्रस्तर-मूर्ति चिर साधना में लीन थी और द्वार पर तिमिर अपने पाँव जमाने लगा था।
मन में महादेवी के एक गीत ने तान उठाई। घोर अंधकार से घिरे वीराने में प्रकाश करने हेतु मीरा कुटीर की देहरी पर जलाए किसी दीप को निहारते हुए मानव कल्याण की प्रेरणा से ओत-प्रोत हो महादेवी ने कभी कहा होगा।
दीप मेरे जल अकम्पित
घुल अचंचल!
पथ न भूले एक पग भी
घर न खोए लघु विहग भी
स्निग्ध लौ की तूलिका से
आँक सबकी छाँह उज्ज्वल!
दीप मेरे जल अकम्पित
घुल अचंचल!
पथिकों को राह दिखाने वाली पंक्तियों से ध्यान आया हम भी पथिक ही हैं हमारी मंज़िल अभी दूर है। महादेवी से विदा ले हम कुटीर की सीढ़ियाँ उतरने लगे। दरवाज़े पर ही एक पेड़ आलूबुखारे से लदा था। थोड़ी भूख लगने लगी थी और फिर हम बच्चे अपनी माँ के आँगन से खाली पेट कैसे जाते। दो-चार आलूबुखारे खाए और कुछ रास्ते के लिए मुट्ठियों में हमने भर लिए।
गाड़ी जब मुख्य द्वार से मुड़ने लगी तो कुटीर की ओर निहारा। एक बार को लगा कि महादेवी और लछमा हमें विदा करने के लिए द्वार पर खड़ी हैं। क्या लछमा आज हमारे पीछे भी 1-2 मील तक पैदल आएगी जैसे वह महादेवी के वापस प्रयाग जाते समय आती थी। लछमा आई या नहीं यह नहीं पता पर उसके शब्द कानों में ज़रूर गूँज रहे थे।
“सँभाल के जाना– जल्दी लौटना– अच्छा-अच्छा–“
फिर लौटने की यह बात हमारा मीरा कुटीर से एक रिश्ता जुड़ने की निशानी थी। और महादेवी की यह पंक्ति पुनः लौटने का निमंत्रण!
झिप चली पलकें तुम्हारी पर कथा है शेष!


