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  • नीतू गुजराल की पाँच कविताएँ

    आज पढ़िए नीतू गुजराल की कविताएँ। नीतू गुजराल सोशल मीडिया के अलग अलग मंचों पर प्रकाशित हो चुकी हैं, कविताओं के पाठ करती हैं जो लोकप्रिय भी हैं। सिंगापुर और भारत में रहती हैं। जानकी पुल पर पहली बार उनकी कविताएँ आ रही हैं- मॉडरेटर 

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    1
    बेघर सी लड़कियाँ खरपतवार सी खिली रहती हैं

    लड़कियाँ खरपतवार सी खिली रहती हैं,
    आसपास के लोगों की आँखों में जहर सी चुभती हैं,
    फिर भी सजाती-सँवारतीं हैं, घर-आँगन को, तुलसी-गेंदे की महक से,
    पर घर-परिवार के लिए फिर भी खरपतवार ही रहती हैं…

    खाद-घी की जरूरत है उन्हें भी कभी,
    ये एहसास न उन्हें न उनके अपनों को आता है,
    पलती नहीं फूलों की शिखाओं की भाँति,
    बस बढती हैं बेलों की तरह जो घर की दीवारों के हर दाग, हर दरार को ढक देती हैं,
    फिर भी बेघर सी लड़कियाँ खरपतवार सी खिली रहती हैं…

    गमला उनके नाम का होता नहीं कोई,
    क्यारी में इधर-उधर बची हुई धरती में समा के जीती रहती हैं,
    कभी आसमान तो कभी ज़मीन के सीने के पार देख के रोती हैं,
    फिर खुद ही अपने दुखों के आग भरे दरियाओं को हँसते-हँसते पार कर लेती हैं,
    फिर भी बेघर सी लड़कियाँ खरपतवार सी खिली रहती हैं…

    पहला नाम, पहला बढ़ावा , पहला कौर कभी नहीं मिलता उन्हें,
    बचे हुई पर भी, रंगों से भरी तितलियों की तरह रहती हैं,
    फिर भी बेघर सी लड़कियाँ खरपतवार सी खिली रहती हैं…

    प्यार की थपकी, एक कहानी, मीठी लोरी के बिना भी, सपनों से भरी नींदे बना लेती हैं,
    अपने सपनों के महल खुद ही बना खुद के पत्तों से सजा लेती हैं,
    फिर भी बेघर सी लड़कियाँ खरपतवार सी खिली रहती हैं…

    2
    मैं रोज़ थोड़ा सा झड़ जाती हूँ

    जब कभी तुम मेरे शब्दों को अविश्वास से सुनते हो ,
    जब कभी तुम मेरे शब्दों को सुन के भी अनसुना कर देते हो,
    जब कभी तुम मेरी बात को समझ के भी नासमझ बने रहते हो,
    जब तुम मेरे कहे का मोल कम लगाते हो,
    मैं थोड़ा सा झड़ जाती हूँ …

    जब तुम मेरी बात को बीच में ही काट देते हो,
    जब तुम कहते हो रहने दो, बस , मैंने कहा न,
    जब तुम मुझसे मश्वरा करे बिना, बड़े फैसले कर लेते हो,
    जब तुम मेरी बात का मान नहीं रख पाते,
    मैं थोड़ा सा झड़ जाती हूँ …

    जब तुम्हें मेरे कपडे चप्पल और चेहरे में कुछ कमी लगती है,
    मैं मन ही मन उदास हो के, तुम्हें बहुत छोटे दायरे में उलझा हुआ पाती हूँ,
    मैं थोड़ा सा झड़ जाती हूँ …

    जब कभी तुम्हारा चेहरा साथ नहीं देता तुम्हारे शब्दों का,
    और तुम्हारी आँखों और बातों में तालमेल नहीं बैठता,
    मैं थोड़ा सा झड़ जाती हूँ …

    जब मन की बात तुम्हें कहने में, खुद को रुका हुआ सा पाती हूँ,
    तुम्हारी संवेदनशीलता की कमी और अपने अविश्वास की ग्लानि में, खुद को रुझा हुआ पाती हूँ,
    मैं थोड़ा सा झड़ जाती हूँ …

    जब सोचती हूँ क्यूँ मैं छोटे बड़े अनादर और अपमान के कांटे चुन के सहेज लेती हूँ,
    अपनी ही नज़रों में थोड़ा सा और गिर जाती हूँ,

    रात को आँखें मूंदने से पहले खुद का सामना नहीं कर पाती,
    तमाचा बन के, अपनी गाल पे, खुद को छपा हुआ पाती हूँ ,
    मैं थोड़ा सा झड़ जाती हूँ …

    हाँ मैं रोज़ थोड़ा सा झड़ जाती हूँ…

     

    3
    मैं तुम्हें हर रोज़ खोती हूँ

    मैं तुम्हें हर रोज़ खोती हूँ,
    रात को जब आँखें मूँदती हूँ, तुम खो जाते हो,
    सुबह आँख खुलते ही, सपनों के साथ फिर कहीं चले जाते हो।

    मैं तुम्हें हर रोज़ खोती हूँ,
    दिन भर, धूप की सेंक में,
    ओस की बूंदों में, चाय के भरे प्याले में,
    तुम्हारी खाली कुर्सी में, कोने में रखे तुम्हारे जूतों में।

    मैं तुम्हें हर रोज़ खोती हूँ,
    ढलते सूरज में, शाम के सुनहरे रंग में,
    घर जाती चिड़ियों के झुरमुट में, शाम की बत्ती की रोशनी में,
    रात के अँधेरे में, तारों की भीड़ में, नींद की लोरियों में, सपनों की दौड़ में।

    मैं तुम्हें हर रोज़ खोती हूँ,
    दिवाली की पूजा में, दीवार पर सजे हर दीपक की लौ में,
    मिठाई की मिठास में , मठियों की खुशबू में,
    बैसाखी की खिचड़ी में, गन्ने मूली तिल में,
    हर जन्मदिन पे, हर परब, हर शादी , हर संस्कार,
    हर सैर सपाटे , हर दिन, प्रतिदिन।

    मैं तुम्हें हर रोज़ खोती हूँ,
    मंदिर के पास पीपल के पेड़ के नीचे,
    गुरूद्वारे के पाठ शब्द कीर्तन में,
    सत्संग की आवाज़ में,
    हनुमान चालीसा के पाठ में,
    सुन्दर काण्ड की धुन में ,
    सुखमनी साहिब के वाको में।

    मैं तुम्हें हर रोज़ खोती हूँ,
    तुम्हारे प्रिय गीत को सुनते हुए,
    तुम्हारे पसंदीदा फूलों की भीनी भीनी महक में,
    तुम्हारी पसंद की सब्जी और सलाद में,
    तुम्हारी उन बातों में जो बाकी रह गयी करनी,
    तुम्हारे हर अनकहे वाक्य में।

    मैं तुम्हें हर रोज़ खोती हूँ,
    हर जगह जहां तुम मेरे साथ आये थे,
    हर जगह जो तुम्हें पसंद थी,
    हर जगह जहां हमें अभी जाना था,
    सब कुछ जो अभी होना था,
    बहुत कुछ जो अभी हमें करना, पाना, देना, लेना, चढाना था,
    हरे भरे सपनों में।

    मैं तुम्हें हर रोज़ खोती हूँ,
    शरद के ढलते पत्तों से हेमंत की मीठी हवाओं में,
    फिर शिशिर की ठंडी रातों से वसंत की खिलती बहारों में,
    फिर गर्मी की कड़कती धूप, गरम दोपहरों से बारिश की चमकती शामों में,
    हर मौसम में,
    हाँ में तुम्हें रोज़ खोती हूँ,
    बार बार, दिन पर दिन, हर महीने, साल दर साल।

    मैं तुम्हें हर रोज़ खोती हूँ,
    जिंदगी के बिखरे टुकड़ों को समेटने में,
    जीवन की नयी उमंग नयी सुबह में,
    तुम्हारी कभी न वापिस आने वाली नयी असलियत में,
    तुम्हारी कभी न खत्म होने वाली याद में,
    हर दिन हर पल की प्रार्थनाओं में,
    तुम अब कभी नहीं मिलोगे,
    इस सच के साथ जीने की क्रूरता में।

    मैं तुम्हें हर रोज़ खोती हूँ,
    समय की चाल में,
    निच्छल बहते पानी में,
    मिलने बिछड़ने वालों में,
    बच्चों के हँसने रोने में,
    अपने बालों की सफेदी में,
    जोड़ों के दर्द में,ढलती याददाश्त में,
    पुरानी तस्वीरों में,
    नए पुराने, जाने अनजाने चेहरों में।

    मैं तुम्हें हर रोज़ खोती हूँ,
    हमारे गहरे पुराने प्यार में ,जब मैं टुकड़ों में बँटी नहीं थी,
    उस ज़माने में ,मेरी पूर्णता की याद में,
    तुम्हें भी तो लगता होगा कि मैंने तुम्हें खो दिया उस दिन,

    नहीं, मैं तुम्हें हर रोज़ खोती हूँ…

    ** गुरूद्वारे

    4

    चाँद से मिली थी आज

    चाँद से मिली थी आज, नूरानी सा, प्यारा सा
    दूर तो नहीं, पास ही लगता है
    दाग तो मुझे दिखा नहीं कोई
    दाग तो मुझे दिखा नहीं कोई
    सम्भला सा, मुझ जैसा, धरती पे ही लगता है

    शब्दों से मन मोहता है,
    कभी कहता है, कभी सुनता है
    शब्दों से मन मोहता है,
    कभी कहता है, कभी सुनता है

    थोड़ा बरहम, तल्खी लगता है
    थोड़ा बरहम, तल्खी लगता है
    फिर भी, माँ से जितना प्यार है करता ,
    सोचूँ, तो फिर, कुछ कुछ, मुझ जैसा ही लगता है …

    5
    ये चाहते तुम भी नहीं हो

    सिर्फ फ़ासलों से दूरियां बन सकती,
    सिर्फ फ़ासलों से दूरियां बन सकती,
    तो फिर हम मिले ही न होते,
    दूरी भी बढ़ा के देख लो, ये चाहते तुम भी नहीं हो …

    आँखों से ओझल होने पे ,यादें न सताती,
    आँखों से ओझल होने पे ,यादें न सताती,
    तो तुम इस कदर परेशान न होते
    यादों से मिटा के देख लो, ये चाहते तुम भी नहीं हो…

    भूलने से कभी मन के धागे नहीं मुड़ते,
    भूलने से कभी मन के धागे नहीं मुड़ते,
    खींच के उलझने कम तो नहीं होती,
    मेरे मोह को भूल जाने की कोशिश भी कर के देख लो, ये चाहते तुम भी नहीं हो…

    दूर जा के मुझसे नींदें, राहतें, सुकून आएगा, तुम्हें लगता है
    दूर जा के मुझसे नींदें, राहतें, सुकून आएगा, तुम्हें लगता है
    मेरे कहीं और जाने पे सुकून मिले तुमको, ये चाहते तुम भी नहीं हो…

    रास्ते बदल के, रास्ते बदल के, हमसफ़र की तमन्ना न रहे,
    रास्ते बदल के, हमसफ़र की तमन्ना न रहे,
    ये आरज़ू है तुम्हारी,
    रास्ते चाहे बढ़ा के देख लो, दूरी चाहते तुम भी नहीं हो…

    न मिलो, तो भी दिल का मकान पक्का है, ये पता है तुम्हें,
    न मिलो, तो भी दिल का मकान पक्का है, ये पता है तुम्हें,
    अब दूर जाने की कोशिश भी कर के देख लो , ये चाहते तुम भी नहीं हो…

    सिर्फ फ़ासलों से दूरियां बन सकती,
    सिर्फ फ़ासलों से दूरियां बन सकती,
    तो फिर हम मिले ही न होते,
    दूरी भी बढ़ा के देख लो, ये चाहते तुम भी नहीं हो…

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