
आज पढ़िए ज्योति की कविताएँ। ज्योति शोधार्थी हैं और कविताएँ लिखती हैं। उनकी कविताओं के केंद्र में स्त्री जीवन के दुख हैं, पीड़ा है। आप भी पढ़िए- मॉडरेटर
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- द्रौपदी
पट्टी बंधी आंखों ने,
नही देखी थी तुम्हारी दशा,
वो नही महसूस पायी,
तुम्हारी आत्मा से रिसते
दर्द के सैलाब को
बस यही कारण था
के रोका तुम्हें त्राहिमाम से,
गांधारी ने….
पर द्रौपदी,
गर तुम तभी कर देती ख़ाक,
पूरी की पूरी कुरु सभा को
अपने नेत्रों की अग्नि से
जैसे जलाया था हाथ
कीचक का अनचाहे स्पर्श के कारण
अपनी देह के ताप से,
यक़ीन मानो
आज कोई द्रौपदी नही तरसती
लम्बे समय तक,
इंसाफ़ को ,
वे भी नही भुगतती,
तुम्हारी तरह ,
वन में वर्षों का इंतज़ार,
जयद्रथ की धृष्टता,
और समाज का बनाया
पीड़िता के लिए
अज्ञातवास ….
©️ज्योति
- वो स्त्री
वो हांड़-मांस का पुतला मात्र थी
जब तक देखती रही दुनिया को
तुम्हारी नज़र से
जब परखना शुरू किया उसने
सही और गलत अपनी नज़र से
यक़ीन मानो
उसी दिन स्त्री का जन्म हुआ था …..
वो तुम्हारे हाथों की कठपुतली मात्र थी
जब तक सुनती रही दुनिया को
तुम्हारी ही आवाज़ से
पर जब सुना उसने
अपने अनुसार हर भाव की नाद को
यक़ीन मानो उसी दिन
स्त्री में प्राण का संचार हुआ था ….
वो तुम्हारे जीवन में एक नर्तकी मात्र थी
जब तक चलाते रहे तुम उसे अपनी उंगलियों के इशारे पर
पर जब उठ खड़ी हुई वो
अपने अस्तित्व के लिए
यक़ीन मानो उसी दिन
स्त्री भी इंसान कहलाई थी ….
वो तुम्हारी एक शार्गिद ही तो थी
रटती रही जब तक
तुम्हारे बनाए सभ्यता के नियम
पर जब उसने तोड़ा पहली बार
इन नियमों के साथ तुम्हारा घमंड
यक़ीन मानो उसी दिन
स्त्री पहली बार स्वतंत्रता का स्वाद चख पाई थी…
यूँ कहना गलत तो नही होगा
के तुम शिकारी मात्र थे
उसके ज़िस्म के
पर जब उसने भरी पहली हुंकार
यक़ीन मानो उसी दिन,
तुम्हें तुम्हारी हद याद आयी थी ….
©️ज्योति
- कुछ इंच
जब खोए हुए थे,
तुम मेरे पंखुड़ी-से होठों के
सौन्दर्यपान के ख़्वाब में
तुम भूल गए देखना
कुछ इंच ऊपर-
मेरी आँखों में,
जिनमें तुम्हारे प्रति घृणा तैर रही थी….
जब नाप रहे थे तुम
अपनी निगाहों से
मेरे वक्षो की ऊंचाई,
तुम भूल गए देखना ,
कुछ इंच ऊपर –
मेरे चेहरे को,
जिस पर तुम्हारे प्रति क्रोध का भाव था ..
जब नाप रहे थे तुम
अपनी उंगलियों से
मेरे नाभि का क्षेत्रफ़ल ,
तुम भूल गए झांकना,
कुछ इंच ऊपर-
मेरे हृदय में ,
जिसमें तुम्हारे प्रति प्रतिशोध का भाव था…
जब पहुँच गए तुम
अपने पुरुषत्व के ज़रिए
मेरी योनि तक,
तुम भूल गए देखना ,
कुछ इंच ऊपर,
मेरी कोख को,
जिसमें पुरुष पैदा करने का- पछतावा था।
कभी गौर किया तुमने ?
मेरे भीतर के वो भाव ,
जो तुम्हारे अरमानों से
हमेशा कुछ इंच ऊपर रहते हैं,
क्योंकि तुम्हारी हर सोच-अरमान,
हमेशा नीचे -नीचे..
बस कुछ इंच नीचे जाकर।
बस वही नीचे अटक जाती है ।
©️ज्योति
- कुछ औरतें
कुछ औरतें
होती हैं आँखों की किरकिरी
वे जब तब चुभने लगती हैं
जब हिलने लगता है
उनके प्रश्नों से
सिंहासन पितृसत्ता का ….
ये औरतें
गड़ती है आँखों में
किसी नुकीले तिनके-सी
जब ये देखने लगती हैं
दुनिया सही-गलत के चश्मे से …
ये औरतें
गिरती हैं कानों में
पिघलते शीशे की तरह
जब इनकी जुबां
नहीं करती जी-हुज़ूरी
और कहने लगती है
सही को सही
और गलत को गलत ….
ये औरतें
अटक जाती है हलक में
जब ये नहीं निगलती
ज़हर किसी के दिमाग का
और कर देती हैं
दरकिनार डसीले समाज को ….
यक़ीन मानिये
ये औरतें
रह जाएँगी भले अकेले
जीवन के महाभारत में
पर स्वयं सारथि बन
लड़ जाएँगी युद्ध अर्जुन-सा ….
ये औरतें
होती है शंका त्यागी शंकर समान
जो जानती है
पौरुष का ज़हर
घाटी से नीचे उतरा तो
निश्चित है मृत्यु उसके अस्तित्व की ….
बस यही है वज़ह
ये औरतें
रहती है भले भरे-पूरे समाज में
पर बसाती है
अपनी अलग दुनिया
जिसका भूमिपूजन ये करती हैं
अपने स्त्रीत्व से ….
©️ज्योति
- बंधन नहीं आज़ादी
हवा संग उड़ती हुई अलकों को
जब समेट लेती हो तुम जुड़े में,
मेरी मानो, वहीं से चुन लेती हो
अपने जीवन में
बंधनो का श्रृंगार ….
किसी नन्हे से बच्चे की भांति
इधर-उधर कौतुहल से मटकती आंखों को
जब झुका लेती हो तुम देख हवसी नज़र
मेरी मानो, वहीं कर लेती हो कैद
अपनी ही उड़ान ….
अपने पसंदीदा काले रंग को
जब जोड़ने लगती हो तुम
शकुन-अपशकुन से
मेरी मानो, वहीं कर देती हो रामभरोसे
अपनी ही किस्मत….
भूलने लगती हो जब तुम स्वाद अपना
बढ़ती जिम्मेदारियों के साथ
मेरी मानो, वहीं कर देती हो ख़त्म
अपने भीतर उम्र भर से सँजोई हुई
बाबा की दाना चुगती चिरइया ….
मेरी मानो, मत चुनो बन्धन
न करो कैद अपनी उड़ान
लिखो अपनी किस्मत खुद से
दे दो पर अपने भीतर की चिरइया को
और कहो खुल कर के
कहानी अभी बाकी है ……
©️ज्योति
परिचय :
नाम : ज्योति
शिक्षा : शोधार्थी, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय
सम्पर्क :
ई-मेल :
पता: ए-८३ गली संख्या-४, कौशिक एन्क्लेव, बुराड़ी, नई दिल्ली-११००८४

