कृष्ण समिद्ध की दस कविताएँ

आज पढ़िए कृष्ण समिद्ध की दस कविताएँ। ये कविताएँ पिछले बीस वर्षों में लंबे-लंबे अंतराल पर लिखी गई हैं जिन्हें पढ़ते हुए कभी तो अतीत-मोह (नास्टैल्जिया) होता है तो कभी स्वबोध हावी होता है, ऐसी कविताएँ जो मन को थोड़ा ठहराव देती हैं- अनुरंजनी

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1. पहली मुलाकात की कथा

 

तुम से पहली मुलाकात की
स्मृति के
कई संस्करण हैं
मेरे पास।

स्मृति के पहले संस्करण में
कॉलेज के दिन थे
मैं कॉलेज का देवता ,
उस दिन देवता उदास था,
तुम लंच में पास्ता बना कर लाई थी मेरे लिए
जिसे मैंने अपने दोस्तों में बाँट दिया,
तुमने श्राप दिया कि एक दिन सारे दोस्त
मुझे छोड़कर चले जायेंगे,
धीरे-धीरे सब चले गये.
फिर तुमने पूछा कि सिगरेट पीते हो, छिपाते क्यों हो
पहली मुलाकात में
छिन्न-भिन्न हुआ यह देवता।

स्मृति के दूसरे संस्करण में
तुमसे मुलाकात
तुमसे मिलने से पहले से ही जारी थी,
तुम लोकप्रिय कवि थी
और 27 साल से कविता लिखने के बाद भी,
मैं अप्रकाशित कवि,
तुम्हारा पाठक था।

मैं कलकत्ते कविता सुनने आया था
तुम अपनी सबसे सुंदर कविता के साथ आयी थी
और साड़ी में सुंदर कविता से ज्यादा सुंदर लगी तुम मुझे
और पीछे की कतार में सिगरेट पीते
सुनता रहा मैं
कविता के सारे लोक-देवता
तुम्हें घेरे हुए थे,
तुमने मुझे देखा भी नहीं।

स्मृति के तीसरे और आख़िरी संस्करण में
मेरा पहला और आखिरी कविता-संग्रह आ चुका था,
अंतिम कविता लिखे हुए मुझे 20 वर्ष हो चुके थे,
तुमने फिर जीवन में कभी कविता नहीं पढ़ी,
पार्क में बेंच पर तुम अकेले बैठी थी
सामने बेंच पर मैं अकेला बैठा था,
धीरे-धीरे सूरज डूबा
धीरे-धीरे रात हुई
धीरे-धीरे सुबह हुई
तुम चली गयी,
मैं चला गया,
बेंच बैठे रहे।

कैसे कहूँ
कि मैं तुमसे मिला
कैसे कहूँ
कि मैं तुमसे नहीं मिला
स्मृति के इतने असंस्करण
के बाद भी
मैं तुम्हें हर दिन
नयी तरहों से मिलता हूँ।

एक दिन
मेरी मृत्यु होगी
तुमसे पहली मुलाकात की कथाओं के सारे दंत-संस्करण
मेरे साथ गंगा किनारे मसान में जल जायेंगे
कुछ आकाश में धुआं होकर उड़ जायेगा (जायेंगे)
कुछ गंगा में राख बनकर हुगली तक आयेगा (आयेंगे)
अलविदा तब तक।
(2007)

 

2. तुमसे अलग होकर क्या मिला

 

तुमसे अलग होकर क्या मिला
मैं और खाली हो गया
तुम और अंदर तक आ गयी।
हर सुबह रात और कौंधती है
और उगते सूरज के साथ
बहुत कुछ डूब जाता है।
मैं एक चिड़िया होता हूँ
जो महाद्वीप पार उड़ते हुए भी
अपने घोंसले में होती है।
चयनित विरह जहर होता है,
जिससे दिल
बुझा रहता है।
(2009)

 

3. पतित

 

मैं
पतित।

और पतन
और पतित मैं।

और फिर
और पतन।

यह जीवन,
घोर पतित.

(2013)

 

4. मैं अपनी मौत मरना चाहता हूँ

 

मैं अपनी मौत मरना चाहता हूँ

मैं नहीं मरना चाहता विज्ञापनों के दबाव से
मैं नहीं मरना चाहता राजनीतिक प्रयोग से
मैं नहीं मरना चाहता ज़रूरत से ज़्यादा खुशी से
मैं नहीं मरना चाहता अपने हिस्से से अधिक दुख से

आदमी हूँ उपनिवेश नहीं,
मैं मरना चाहता हूँ अपनी मौत
जैसे हंस रहा हूँ दोस्तों के मजाक पर और मर जाऊं
जैसे दौड़ रहा हूँ प्रपौत्र के साथ हरे पेड़ तक और मर जाऊं
जैसे देर रात रिल्के पढ़ रहा हूँ और मर जाऊं

मैं मरना चाहता हूँ अपनी मौत
अपने आप।
(2014)

 

5. मृत्यु शोक

 

मेरी मृत्यु पर सबको हो मृत्यु शोक
मेरे दुःख पर सबको हो दुःख
और मेरे सुख में सबको हो सुख
थोड़ा तो ही मांगता हुं प्रभु
वर दो।

दो मुझे रात भर की उम्र
जिसमें हरश्रृंगार खिलें
जिसमें पलाश झरें
एक ही ऋतु में
थोड़ा तो ही मांगता हूँ प्रभु
वर दो।

मृत्यु शय्या पर
मेरे हाथ को कोई पकड़े हो हाथ
और मेरा कमरा धुला हो आंसुओं से
कि विदा होते कदमों को धूल न लगे
थोड़ा तो ही मांगता हूँ प्रभु
वर दो।
(2016)

 

6. उत्तर- ध्रुव

 

हर स्त्री के हृदय में
एक पुरुष होता है,
और शेष
उत्तर-ध्रुव होता है,

प्राचीन पेड़
अनगिनत चिड़ियों की बीट-सा गंधाता
अनगिनत चिड़ियों के लौटने का सबब होता है,

और सबसे भयानक हिंसा
सबसे शांत हत्या होती है।

(2018)

 

7. पाशविक प्रेम

 

ये सही है कि
मैंने तुम्हारे शरीर को चाहा,
पर मैंने प्रेम भी किया।

पशु हूँ,
और मेरा प्रेम भी है पाशविक
असभ्य.
निर्दोष नहीं है,
पर प्रेम है.

(2021 )

 

8. NSD के लड़के

 

NSD का परित्यक्त हॉस्टल
कोई कमरा पंकज कपूर का
कोई नसीर का
कोई इरफान का
कोई रैना का
इतने सूरज एक ही सौर मंडल में
और अनजाने अनगिनत तारे.

औेर उन कमरों में
कौन देखता होगा दिन में सपने.

कितनी आत्माएं छूट आयी हैं
NSD के परित्यक्त हॉस्टल में.

अब भी उन कमरों का सपना देखते हैं
NSD के लड़के.
(2023)

 

9. अदृश्य 2

न के बराबर देखी गई
स्मिता पाटिल वाली फ़िल्म की
अदृश्य अभिनेत्री सी वह,
स्वयं से घिरी,
बिना किसी नायक के
अपनी कहानियाँ बुनती जाती है ।

दुनिया में,
जहाँ हर दृश्य को एक नायक चाहिए,
वह बस एक प्रतिमा बनकर
अँधेरे में खड़ी रही।

उसने अपने भीतर
एक साम्राज्य खड़ा किया,
जहाँ वह खुद रानी थी,
और खुद गुलाम।

उसने देखी थी ,
हर सत्ता के पीछे छिपी
कमज़ोरियाँ।
उसने सुनी थी,
हर ताकतवर आवाज़ के भीतर
छुपी हुई फुसफुसाहटें।

वे कहते थे,
“तुम स्वतंत्र हो,”
पर उन्होंने उसे
कभी अकेलेपन की परिभाषा नहीं बतायी ।
अदालतों में
सिर्फ उसकी आवाज़ को
एक दस्तावेज़ की तरह दर्ज किया गया।

नायक का महत्त्व था,
वह नायक नहीं थी,
वह सिर्फ एक प्रतीक थी,
जिसे हर बार बदल दिया जाता था,
किसी नए सिद्धांत के अनुसार।

उसके हर कमरे में
एक दरवाज़ा था,
जो पुरुषों के लिए खुलता,
और एक दीवार थी,
जिस पर उसका नाम लिखा था।
उसने अपने नाम को मिटाने की कोशिश की,
पर हर बार,
वह दीवार और ऊँची हो जाती।

उसके घाव,
जैसे मौखिक इतिहास,
वह अपने रक्त में,
एक नई परिभाषा ढूंढ रही थी।

एक स्त्री ने ही उसे समझाया था
स्त्री की सीमाएं,
उसके बालों में गूंथे गए
संस्कारों के फूल,
हर फूल में छिपा था
एक चुभता हुआ कांटा।

उसका जीवन,
एक चीथड़े की कढ़ाई की तरह था,
जहाँ हर धागा
टूटा हुआ।

कहानी यहाँ खत्म नहीं होती,
बाधित होती हैं।

हर गली में एक औरत का नाम खो चुका है,
हर घर में दफन हैं कई औरतें।

स्त्रीत्व, एक व्याकरण की तरह,
जिसे पढ़ा तो गया,
इस्तेमाल नहीं किया गया कभी।
(2024)

 

10. चाँद मुझे उदास करता है

 

चाँद
किसकी राख लिए
मेरी खिड़की तक चला आया?

मुझे मत देख
अपनी ही आँखों से
मैं बुझ चुका हूँ।

तेरी रोशनी ने
भीतर के शब्दों को
अपाहिज बना दिया।

राख
मेरे फेफड़ों तक आ गई है।

मैं साँस लेता हूँ ,
और एक मृत कविता
मेरे भीतर जन्म लेती है।

तू समय की बंद आँख है,
जिसे कोई सपना खोल नहीं सकता।

चाँद मुझे उदास करता है
मैं तेरे नीचे मरता हूँ
हर रात।

(2025)

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परिचय- 

कृष्ण समिद्ध (जन्म-1986) 2004 से आलोचना, कविता और फ़िल्म-नाटकनिर्देशन के क्षेत्र में सक्रिय। वर्ष 2013 में लघु फ़िल्म ‘सिटी ऑफ़ ड्रीम्स’ का निर्देशन। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, भारंगम 2025 और मिनर्वा 2025 में चयनित नाटक ‘स्माल टाउन ज़िंदगी’ का निर्देशन एवं नाट्य रूपांतरण लेखन। रज़ा युवा 2026 में रेणु का पुर्णिया पर लेखन, अंधेरे में नामवर सिंह, असाध्य अज्ञेय: छुपा हुआ राजनीतिक कवि ,भागी हुई लड़कियाँ: एक पुरुष फैंटेसी और लघुपरक लंबी कविता आदि आलोचना का लेखन। वर्ष 2015 में राष्ट्रीय फ़िल्म विकास निगम लिमिटेड (एनएफ़डीसी), मुंबई द्वारा उत्कृष्टता के लिए सम्मानित। नाटकों में ‘चातक’, ‘तन-बदन’ और ‘शेक्सपियर एट स्कूल’ का लेखन। समालोचन, वागर्थ, द वायर, प्रभात खबर आदि में प्रकाशित। वर्तमान में अपने पहले फिल्म के निर्माण में संलग्न।

निवास- पटना, बिहार।

संपर्क – 9934687527

ईमेल – beyondsamiddha@gmail.com

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