
फुटबॉल का विश्वकप यानी फ़ीफ़ा शुरू होने वाला है। लेखिका डिप्टी कुशवाह का यह लेख उसी की उत्तेजना, उसी के इतिहास को लेकर है। आप भी पढ़िए- मॉडरेटर
अभी स्टेडियमों की रोशनी पूरी तरह नहीं जली है। दर्शकों की भीड़ ने अपने झंडे खोलकर नहीं लहराए हैं और गेंद ने भी विश्व की सबसे बड़ी प्रतियोगिता की घास को छुआ नहीं है। फिर भी उत्सव किसी अदृश्य स्तर पर शुरू हो चुका है। दूर कहीं मैदानों की साँसें तेज़ होने लगी हैं, ध्वनियाँ अपना काम शुरू कर चुकी हैं।
अब से दो सप्ताह बाद पृथ्वी फिर उन्हीं रोशन रातों में प्रवेश करेगी जहाँ रेफरी की सीटी से पहले उम्मीदें उतरती हैं और गोलों से पहले प्रतीक्षा हमारे भीतर घर बनाने लगती है। पर फुटबॉल का यह महायज्ञ उस आरंभ से बहुत पहले ही संसार में अपनी उपस्थिति दर्ज करा देता है, दृश्य से पहले श्रव्य में। जहाँ अभी खेल की भौतिकता अनुपस्थित है, वहाँ संगीत उस रिक्ति को भर देता है। वह दर्शकों के भीतर एक ऐसा आंतरिक खेलमंच रचता है, जहाँ मैच शुरू होने से पहले ही आशंका-आकांक्षा के पीले-लाल कार्ड लहराने लगते हैं।
इसीलिए फीफा विश्वकप को केवल मैचों से नहीं याद किया जाता। उसकी धुनें भी उसे अमर बनाती हैं। जब हम 1998 को रोनाल्डो और ज़िदान के साथ याद करते हैं, तो उतनी ही तीव्रता से रिकी मार्टिन की आवाज़ भी स्मृति में लौटती है, The Cup of Life की उन्मत्त पुकार के साथ। उसी तरह 2010 केवल स्पेन की जीत का वर्ष नहीं, बल्कि शकीरा के Waka Waka का भी वर्ष है, जिसने दर्शक-दीर्घाओं की सीमाएँ तोड़कर विश्वकप को एक वैश्विक उत्सव में बदल दिया। और फिर Wavin’ Flag जैसा गीत, जो आधिकारिक न होते हुए भी करोड़ों लोगों के भीतर विश्वकप की अनौपचारिक आत्मा बन गया।
अब FIFA World Cup 2026 की धुनें धीरे-धीरे दुनिया की नसों में उतर रही हैं। कहीं Echo की गूँज, कहीं Lighter की चमक और आगामी लयों के बीच शकीरा का Dai Dai फिर याद दिलाता है कि कुछ आवाज़ें विश्वकप की स्मृतियों से कभी पूरी तरह बाहर नहीं जातीं। ये धुनें उस विराट आयोजन के प्रारंभिक मंत्रोच्चार हैं।
एक
फीफा एंथम्स की कथा केवल गीतों की कहानी नहीं है। यह उस प्रक्रिया की कहानी है, जिसमें खेल ध्वनि के माध्यम से संस्कृति बनता है और संस्कृति धीरे-धीरे स्मृति में बदल जाती है। ये गीत न केवल मनोरंजन हैं, न उद्घाटन समारोह की सजावट भर। वे उस जटिल प्रक्रिया का हिस्सा हैं, जिसके माध्यम से एक वैश्विक आयोजन अपने दर्शकों को मानसिक और भावनात्मक रूप से तैयार करता है। धीरे-धीरे, पर बेहद सुनियोजित ढंग से।
इन धुनों के माध्यम से एक ऐसी भावभूमि निर्मित होती है, जहाँ राष्ट्र अपनी पहचान के साथ उपस्थित होते हैं, भीड़ अपने उन्माद के साथ और बाज़ार अपनी सूक्ष्म रणनीतियों के साथ। यहाँ संगीत, संगीत से उठ कर, संकेत बन जाता है। आगामी उत्सव का, आने वाले संघर्ष का और उस सामूहिक भावाकुल विस्फोट का, जिसे हम विश्वकप कहते हैं।
ये गीत घोषणा करते हैं, निर्माण भी। वे दर्शकों के भीतर एक ऐसी लय स्थापित करते हैं, जिसमें खेल शुरू होने से पहले ही शरीर और मन दोनों शामिल हो जाते हैं। यही लय आगे चलकर मैदानों की गूँज, सड़कों के जश्न और डिजिटल स्क्रीन की चमक में फैल जाती है। इस अर्थ में फीफा के एंथम्स खेल के बाद की स्मृति नहीं, बल्कि खेल से पहले की तैयारी हैं। एक प्रकार का संवेदनात्मक पूर्वाभ्यास।
“एंथम” शब्द स्वयं अपने भीतर एक विशेष भार लिए होता है। यह एक ऐसी ध्वनि है जिसमें संस्था का स्वर, व्यवस्था की लय और सामूहिक अनुशासन का भाव छिपा रहता है। फीफा का आधिकारिक एंथम इसी अर्थ में एक विशिष्ट रचना है। वह शब्दों से कम, वाद्य ध्वनियों से अधिक निर्मित होता है। उसकी ध्वनि किसी उत्सव की चंचलता को सीमित कर एक औपचारिक उद्घोष का वातावरण रचती है। खिलाड़ी जब मैदान में उतरते हैं और दर्शक अपनी जगहों पर खड़े होते हैं, तब यह एंथम उस क्षण को मर्यादा प्रदान करता है। मानो यह घोषित करता है कि अब जो होने जा रहा है, वह केवल खेल नहीं, बल्कि वैश्विक प्रतिष्ठा का आयोजन है। फीफा के एंथम्स को सुनना पर्याप्त नहीं, उन्हें समझना भी पड़ता है। वे ऐसा अनुभव रचते हैं जिसमें औपचारिकता और उत्सव, अनुशासन और उन्माद, संस्था और भीड़… सब एक साथ उपस्थित होते हैं।
इसके समानांतर वे गीत चलते हैं, जिन्हें हम विश्वकप के आधिकारिक गानों के रूप में पहचानते हैं। यही वह क्षेत्र है जहाँ संगीत अपना दूसरा चेहरा दिखाता है। यहाँ शब्द आते हैं, लय में तीव्रता आती है और ध्वनि सीधे दर्शकों के शरीर और मन पर असर डालती है। जहाँ एंथम स्थिरता और गरिमा का प्रतीक है, वहीं गीत गति और उत्साह का। एंथम व्यवस्था की ध्वनि है, गीत भीड़ की। एंथम में ऊर्ध्वता है, गीत में फैलाव। एंथम का निर्माण एक प्रकार की शास्त्रीय संरचना का अनुसरण करता है, जबकि विश्वकप गीतों में तात्कालिकता अधिक होती है। वे तुरंत प्रभाव उत्पन्न करते हैं। उनके बीट्स शरीर को गतिमान करते हैं और उनके शब्द स्मृति में जल्दी उतर जाते हैं। एक में दीर्घकालिक प्रतिष्ठा का भाव है, दूसरे में त्वरित लोकप्रियता का।
दो
यही द्वंद्व फीफा के संगीत को रोचक बनाता है। एक ओर वह संस्था है जो अपने अस्तित्व को औपचारिक ध्वनि के माध्यम से स्थापित करती है, दूसरी ओर वही संस्था ऐसे गीतों को जन्म देती है जो नियंत्रण से बाहर जाकर जनता के बीच अपनी अलग पहचान बना लेते हैं। कई बार यही गीत एंथम से अधिक लोकप्रिय हो जाते हैं और दर्शकों की स्मृति में स्थायी रूप से बस जाते हैं। तब एक दिलचस्प प्रश्न उभरता है- क्या असली एंथम वह है जिसे संस्था निर्धारित करती है, या वह जिसे जनता अपने भीतर जगह देती है?
यहाँ एक बात और ध्यान में रखें- फीफा के संगीत की दुनिया केवल आधिकारिक गीतों तक सीमित नहीं रहती। उसके समानांतर भीड़ अपनी अलग ध्वनियाँ रचती है। एरीना से उठते सामूहिक चैंट्स, ड्रमों की लगातार थाप, अचानक एक स्वर में फूट पड़ती हजारों आवाज़ें और कभी-कभी किसी एक ध्वनि का पूरे विश्वकप पर छा जाना… ये सब उस अनौपचारिक संगीत का हिस्सा हैं, जिसे कोई संस्था नियंत्रित नहीं करती। 2010 के दक्षिण अफ्रीका विश्वकप में वुवुज़ेला की तीखी गूँज इसका सबसे बड़ा उदाहरण थी। वह ध्वनि कई लोगों को कर्कश लगी, कई लोगों को उत्सवधर्मी, पर धीरे-धीरे वही पूरे टूर्नामेंट की श्रव्य पहचान बन गई। दिलचस्प यह है कि विश्वकप समाप्त होने के बाद भी लोग केवल मैचों को नहीं, उस लगातार बजती ध्वनि को भी याद रखते हैं। मानो फुटबॉल का वास्तविक संगीत कहीं आधिकारिक मंच और जनता की स्वस्फूर्त लयों के बीच जन्म लेता हो।
तीन
फीफा के संगीत की इस यात्रा को समझने के लिए हमें उस समय की ओर लौटना होगा, जब संगीत अभी इस विराट आयोजन का अनिवार्य हिस्सा नहीं बना था, बल्कि धीरे-धीरे अपनी जगह बना रहा था।
1990 का इटली विश्वकप इस खोज का एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव बनकर उभरता है। Un’estate Italiana में एक प्रकार की सौम्यता है। एक ग्रीष्मकालीन विस्तार जो यूरोपीय संवेदना को अपने भीतर समेटे हुए है। इसकी धुन में उतावलापन नहीं, बल्कि धीमा और भावुक प्रवाह है। यहाँ संगीत अभी भी एक सांस्कृतिक छवि रच रहा है, वैश्विक उन्माद नहीं।
चार वर्ष बाद 1994 में, अमेरिका विश्वकप के साथ यह ध्वनि कुछ बदलती है। Gloryland में गॉस्पेल और सोल का गहरा असर दिखाई देता है, हालाँकि उसका सांस्कृतिक प्रभाव बाद के विश्वकप गीतों जितना व्यापक नहीं था। यह गीत मनोरंजन के साथ, सामूहिकता का भाव जगाता है। इसकी कोरस संरचना और उठती हुई लय एक प्रकार की आध्यात्मिकता रचती है। संगीत यहाँ भीड़ को जोड़ने का माध्यम बनता है, उसे एक साझा लय में बाँधता है।
इन दोनों गीतों को साथ रखकर देखें तो एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है। 1990 में जहाँ धुन अधिक स्थानीय और भावुक है, वहीं 1994 में वह सामूहिक और विस्तारशील हो जाती है। पर दोनों में एक समानता भी है। दोनों अभी उस तीव्रता तक नहीं पहुँचे हैं, जिसे हम आज के विश्वकप गीतों से जोड़ते हैं। इनमें न तेज़ इलेक्ट्रॉनिक बीट्स हैं, न वह आक्रामक ऊर्जा जो बाद के वर्षों में दिखाई देती है। ये गीत एक संक्रमण का संकेत हैं, जहाँ संगीत धीरे-धीरे खेल के साथ अपना संबंध गहरा कर रहा है।
और फिर आता है 1998, जहाँ यह खोज अचानक एक स्पष्ट दिशा पा लेती है। Ricky Martin की आवाज़ में आया The Cup of Life एक धड़ाके की तरह सामने आता है। उस समय रिकी मार्टिन केवल एक पॉप गायक नहीं रह जाते, बल्कि विश्वकप की उन्मत्त ऊर्जा, सामूहिक उत्तेजना का चेहरा बनकर उभरते हैं। Go go go ale ale ale के कोरस में वैश्विक उत्सव की धड़कन को हमारे भीतर उतार देने की काबिलियत है। यह गीत विश्वकप का पर्याय बन गया था। उन्माद, रंग, गति और एक ऐसी ऊर्जा, जो मैच शुरू होने से बहुत पहले ही नसों में दौड़ने लगती थी। इसमें, लातिनी संगीत की देहात्मक लय, मंचीय आक्रामकता और उत्सवधर्मी उछाल एक साथ दिखाई देती है। यही कारण था कि यह गीत फुटबॉल-अखाड़ों से निकलकर क्लबों, सड़कों और टेलीविज़न स्क्रीन तक फैल गया।
इस गीत की संरचना पर ध्यान दें तो उसमें निरंतर गति है। बीट्स लगातार आगे बढ़ते रहते हैं, मानो किसी भीड़ को गतिशील बनाए रखना चाहते हों। कोरस में एक सामूहिक पुकार है, जो दर्शकों को केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि उसमें शामिल होने के लिए आमंत्रित करती है। यहीं संगीत और खेल का संबंध प्रतीकात्मकता से आगे बढ़कर शारीरिक और भावनात्मक अनुभव में बदल जाता है।
1998 के बाद फीफा के गीतों ने एक नया रूप लेना शुरू किया। अब वे केवल मेज़बान देश की सांस्कृतिक झलक नहीं रहे, बल्कि एक वैश्विक ध्वनि बनने लगे। 2002 के जापान–दक्षिण कोरिया विश्वकप का Boom इस बदलाव का संकेत था। इसकी तेज़ इलेक्ट्रॉनिक लय और पॉप संरचना ने स्पष्ट कर दिया कि संगीत अब खेलगाँवों से निकलकर वैश्विक श्रोताओं तक पहुँचने के लिए रचा जा रहा है।
पर 2006 में The Time of Our Lives ने एक अलग दिशा दिखाई। उसमें भव्यता थी, धीमी विस्तारशीलता थी और लगभग ओपेरा जैसी गंभीरता भी। यह केवल उत्साह का नहीं, बल्कि अनुभव का गीत था। खेल को भावनात्मक ऊँचाई पर ले जाने का प्रयास।
इन उदाहरणों के बीच फीफा एंथम्स की यात्रा का सार छिपा है। एक ओर तेज़, तात्कालिक और लोकप्रिय ध्वनियाँ, दूसरी ओर गहरी, संरचनात्मक और भावनात्मक प्रस्तुतियाँ। इसी द्वंद्व में आगे के विश्वकप गीतों की दिशा तय होती है, जहाँ संगीत केवल पृष्ठभूमि नहीं रहता, बल्कि स्वयं एक वैश्विक स्मृति बन जाता है।
2010 का दक्षिण अफ्रीका विश्वकप इस द्वंद्व का सबसे जीवंत उदाहरण है। Waka Waka केवल एक आधिकारिक गीत नहीं था। वह विश्वकप की सामूहिक स्मृति में बदल गया। और इसके केंद्र में थीं शकीरा। उन्होंने इस गीत को गाय, साथ ही, उसे एक वैश्विक उत्सव की देहभाषा दे दी। अफ्रीकी लयों, सामूहिक कोरस और उनके विशिष्ट नृत्य ने इस गीत को स्टेडियम से निकालकर दुनिया की सड़कों तक पहुँचा दिया। यह उन दुर्लभ क्षणों में से था, जब कोई विश्वकप-गीत, आयोजन से बड़ा दिखाई देने लगता है।
इसी समय Wavin’ Flag भी गूँजता है। हालाँकि यह फीफा का आधिकारिक गीत नहीं था, बल्कि एक ब्रांड-प्रचार अभियान का हिस्सा था, फिर भी उसकी पंक्तियाँ लोगों के भीतर कहीं अधिक गहराई से उतरती हैं- Give me freedom, give me fire, उसमें केवल उत्सव नहीं था, संघर्ष और आकांक्षा का स्वर भी था।
दिलचस्प यह है कि 2010 के बाद भी यह गीत लोगों की स्मृति से गया नहीं। 2014 तक आते-आते भी उसकी धुन विश्वकप के भावलोक में जीवित बनी रही। कई लोगों के लिए वह एक प्रकार का अनौपचारिक विश्वकप-गान बन चुका था।
2014 का ब्राज़ील विश्वकप इस प्रश्न को और तीखा कर देता है कि असली विजेता कौन होता है? संस्था द्वारा चुना गया गीत या जनता द्वारा चुनी गई धुन। आधिकारिक रूप से We Are One (Ole Ola) को बड़े मंचों पर प्रस्तुत किया गया। उसमें भव्यता थी, वैश्विक पॉप का चमकदार संयोजन था। पर उसके समानांतर Shakira का La La La (Brazil 2014) भीड़ की अपनी पसंद बनकर उभरा।
यूट्यूब और सोशल मीडिया पर उसकी उपस्थिति कहीं अधिक व्यापक दिखाई दी। दरअसल 2014 में केवल एक नया गीत नहीं बज रहा था, बल्कि 2010 की स्मृति भी साथ चल रही थी। Waka Waka ने जो सांस्कृतिक प्रभाव रचा था, उसकी प्रतिध्वनि अब भी बनी हुई थी। इसलिए जब शकीरा फिर लौटीं, तो दर्शकों ने उन्हें एक गायिका की तरह ही नहीं, विश्वकप-संगीत की स्थापित स्मृति की तरह भी स्वीकार किया।
यहीं फीफा का एक दिलचस्प सत्य सामने आता है। कभी-कभी आधिकारिक मंच किसी और के पास होता है लेकिन उत्सव की आत्मा किसी और के हिस्से चली जाती है।
जैसे-जैसे विश्वकप वर्तमान के करीब आता है, उसके गीतों में भी समय की बेचैनी और विस्तार सुनाई देने लगता है। 2018 और 2022 के गीत इस बदलाव के साक्षी हैं। Live It Up में पॉप, रैप और इलेक्ट्रॉनिक ध्वनियों का मिश्रण है। एक ऐसी लय जो युवाओं की दुनिया से संवाद करती है। यह गीत उत्सव को बनाए रखता है, पर उसमें परंपरा की जगह गति और तात्कालिकता अधिक है।
2022 में Hayya Hayya (Better Together) एक बहुरंगी स्वर लेकर आता है। उसमें कई आवाज़ें हैं, कई सांस्कृतिक संकेत। मानो विश्वकप अब किसी एक देश का नहीं, बल्कि साझा मंच का अनुभव हो। गीत में साथ रहने और साथ गाने का आग्रह है, जो आज की वैश्विक दुनिया के तनावों के बीच एक प्रतीक की तरह उभरता है।
चार
विश्वकप गीतों की लोकप्रियता का स्वरूप अब पहले जैसा नहीं रहा। एक समय था जब कोई धुन रेडियो, टेलीविज़न और खेल-प्रांगणों के माध्यम से लोगों तक पहुँचती थी। आज उसकी यात्रा एल्गोरिद्म तय करते हैं। टिकटॉक की छोटे वीडियोज़, इन्स्टाग्राम रीलें, यूट्यूब शॉर्ट्स और स्पॉटिफाय प्लेलिस्ट्स यह निर्धारित करने लगे हैं कि कौन-सा गीत दर्शकों की स्मृति में टिकेगा। कई बार कोई एक छोटा-सा हुक, कोई नृत्य-चाल या कुछ सेकंड की धुन पूरे विश्वकप की सांस्कृतिक पहचान बन जाती है। अब गीत केवल सुने नहीं जाते, वे लगातार साझा किए जाते हैं, काटे-जोड़े जाते हैं और डिजिटल भीड़ के भीतर नए अर्थ ग्रहण करते हैं। इस अर्थ में आधुनिक फीफा एंथम्स स्टेडियमों से अधिक स्क्रीन पर जीवित रहते हैं। पहले संगीत भीड़ को प्रतियोगिता-स्थल तक लाता था, अब डिजिटल संसार स्वयं एक विशाल खेलमंच में बदल चुका है।
पाँच
इसी क्रम में 2026 की तैयारियाँ एक नए तरह के संगीत की ओर संकेत करती हैं। FIFA अब केवल एक गीत पर निर्भर रहने के बजाय ध्वनियों का एक पूरा परिदृश्य रच रहा है। “Sonic IDs” के रूप में हर मेज़बान शहर के लिए अलग ध्वनि-चिह्न बनाए जा रहे हैं। मानो विश्वकप अब एकल धुन नहीं, अनेक स्वरों का समुच्चय बनता जा रहा हो।
हालिया महीनों में जो नए ट्रैक सामने आए हैं, चाहे वे थीम के रूप में हों या प्रचारात्मक गीतों के रूप में; संकेत देते हैं कि 2026 का एंथम अब सिर्फ एक गाना नहीं होगा। वह एक बहुस्तरीय अनुभव होगा। ऐसा अनुभव, जो स्टेडियम, स्क्रीन और डिजिटल संसार- तीनों में एक साथ घटित होगा।
यहाँ पहुँचकर फीफा एंथम्स की यात्रा एक रोचक मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। पहले वे केवल धुन थे। फिर वे गीत बने और अब वे एक संपूर्ण ध्वनि-परिस्थिति में बदलते जा रहे हैं। शायद 2026 में हम किसी एक गाने को नहीं, बल्कि एक पूरे संगीत-विश्व को याद रखेंगे… जहाँ हर शहर, हर दर्शक और हर क्षण अपनी अलग लय में शामिल होगा।
फीफा के एंथम्स मनोरंजन से आगे की चीज हैं। वे अपने समय की दुनिया का एक सांकेतिक नक्शा भी बनाते हैं। हर गीत अपने भीतर यह छुपाए रहता है कि दुनिया किस ओर जा रही है, किस तरह के सुर लोकप्रिय हैं, किस तरह की छवियाँ बिकती हैं और किस तरह की भावनाएँ साझा की जा रही हैं।
जब Waka Waka पूरी दुनिया में गूँजता है, तो वह केवल अफ्रीका का उत्सव नहीं रहता, वह वैश्विक बाज़ार का भी हिस्सा बन जाता है। उसकी धुन, उसका वीडियो और उसका नृत्य… सब कुछ सांस्कृतिक प्रसार के माध्यम बन जाते हैं। Live It Up या Hayya Hayya में जो बहुरंगीपन है, उसमें मात्र विविधता नहीं है; एक सजग प्रस्तुति भी है, जिसमें हर क्षेत्र और हर पहचान को शामिल करने की कोशिश की जाती है।
यहाँ संगीत और बाज़ार का संबंध स्पष्ट दिखाई देता है। विश्वकप अब एक विशाल सांस्कृतिक उद्योग है। गीत उसके सबसे प्रभावशाली माध्यमों में से एक हैं। वे विज्ञापन, ब्रांडिंग और डिजिटल प्रसार के साथ मिलकर ऐसा वातावरण रचते हैं, जहाँ उत्सव और उपभोग साथ-साथ चलते हैं।
लेकिन इसी के भीतर एक दूसरी परत भी है। जनता की। हम-आप तय करते हैं कि कौन सा गीत टिकेगा और कौन सा भुला दिया जाएगा। आधिकारिकता यहाँ अंतिम सत्य नहीं रह जाती। 2014 में We Are One के मुकाबले La La La का अधिक लोकप्रिय होना केवल संयोग नहीं था। यह संकेत था कि दर्शक अपनी पसंद स्वयं चुनते हैं। इसी तरह Wavin’ Flag का अनौपचारिक होते हुए भी स्मृति में बने रहना बताता है कि संगीत का वास्तविक जीवन मंच पर नहीं, लोगों के भीतर होता है। इस तरह फीफा के एंथम्स गहरे समीकरण बनाते हैं,
सत्ता और संवेदना का
बाज़ार और स्मृति का
आधिकारिकता और लोकप्रियता का।
और इन्हीं के बीच उनकी वास्तविक शक्ति जन्म लेती है।
फिर भी, इस पूरे विस्तार के बीच एक बात स्थिर रहती है। फीफा के एंथम्स हमें सिखाते हैं कि खेल केवल खेल नहीं होता। अंततः वह एक साझा अनुभव है, जिसे हम सुनते भी हैं, गुनगुनाते भी हैं और वर्षों बाद अचानक किसी मोड़ पर फिर याद कर लेते हैं। हर विश्वकप के बाद कुछ धुनें बची रह जाती हैं जो हाई-मास्ट लाइट्स बुझ जाने के बाद भी भीतर कहीं देर तक बजती रहती हैं। जिनके साथ कोई गोल लौटता है, किसी गर्म रात की बेचैन खुशी लौटती है, किसी कमरे में अपनों के साथ बैठकर मैच हारने-जीतने का दृश्य लौटता है। किसी का साथ न होना भी लौटता है।
कभी वे हमें उस उम्र में वापस ले जाती हैं, जब रात भर जागना थकान नहीं, उत्सव हुआ करता था। जब किसी एक खिलाड़ी के लिए पूरा मोहल्ला दो हिस्सों में बँट जाता था। जब टीवी स्क्रीन के सामने बैठा एक बच्चा यह मानने लगता था कि दुनिया सचमुच गेंद के साथ घूम रही है। शायद यही फीफा एंथम्स की सबसे बड़ी शक्ति है। वे हमारे भीतर स्मृति के स्टेडियम को जगाए रखते हैं।
दीप्ति कुशवाह
पुणे
9270322263

