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  • लुगदी रसोई: हिंदी में जर्मन क्राइम-फ़िक्शन

    जर्मनी के क्राइम फ़िक्शन की किताब आई है ‘लुगदी रसोई’। मूल जर्मन भाषा से अनूदित और वाणी प्रकाशन से प्रकाशित तथा नमिता खरे द्वारा संपादित इस कथा-संग्रह की समीक्षा पढ़िए। लिखा है युवा कथाकार शहादत ने- मॉडरेटर 

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    अपने सौ वर्ष के इतिहास में हिंदी में साहित्य की लगभग हर विधा में लिखा गया है। उपन्यास के क्षेत्र में हमारे पास ‘उपन्यास सम्राट’ की उपाधि वाले मुंशी प्रेमचंद हैं तो नाटक विधा में जयशंकर प्रसाद। इसी तरह कहानियों में प्रेमचंद से लेकर कमलेश्वर, मोहन राकेश और मंटो जैसे लोग हैं। यात्रा विधा में राहुल सांस्कृत्यायन और संस्मरण विधा में महादेवी वर्मा, रामवृक्ष बेनीपुरी और पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी का नाम उल्लेखनीय है। कविता के बारे में तो बात करनी ही बेमानी होगी। इसकी वजह यह है कि हिंदी का हर पाठक/विद्यार्थी अपने ‘मन’ से कवि है।

    साहित्य की दृष्टि से हर विधा में इतनी संपन्न होने के बावजूद हिंदी की मुख्यधारा में क्राइम-फ़िक्शन पर किसी अच्छी किताब का मिल पाना आज भी मुश्किल से मुश्किलतर बना हुआ है। हिंदी में क्राइम-फ़िक्शन लगभग न के बराबर लिखा गया है। अगर किन्हीं लोगों ने इस विधा में लिखने की कोशिश भी की तो उन्हें हम जैसे पाठकों ने ‘पल्प फ़िक्शन’ अर्थात् ‘लुगदी साहित्य’ की श्रेणी में डाल दिया। शायद इसीलिए 200 से अधिक जासूसी उपन्यास लिखने वाले ‘गोपाल राम गहमरी’ जैसे लेखकों को भी साहित्य की मुख्यधारा ख़ातिर में नहीं लाती। इब्ने सफी और सुरेंद्र मोहन पाठक को तो आप भूल ही जाइए। भले ही उन लोगों ने हिंदी-उर्दू के कथित ‘मुख्यधारा’ के साहित्य के लिए एक बड़ा पाठक वर्ग तैयार ही क्यों न किया हो!

    हिंदी साहित्य में क्राइम-फिक्शन की इस खाली जगह को भरने का हाल ही में एक छोटा-सा प्रयास वाणी प्रकाशन से आये कथा-संकलन ‘लुगदी रसोई’ ने कुछ हद किया है। इस संग्रह में दो दर्जन से ज़्यादा संकलित है और सभी कहानियां मुख्य जर्मन-भाषा भूमि यानी जर्मनी पर केंद्रित न होकर पूरे जर्मन-भाषी से ली गई हैं। इन क्षेत्रों में मुख्य-भूमि जर्मनी के साथ ऑस्ट्रिया, स्वीट्ज़रलैंड और स्लाव प्रदेश तक शामिल शायद है। शायद इसीलिए कहानियों में मानक जर्मन-भाषा के साथ-साथ उसकी क्षेत्रीय बोलियों का अक्स भी नज़र आता है। हालांकि, हिंदी अनुवाद में वह अक्सर एक तरह से नदारद दिखाई देता है और सभी कहानियों को उस क्षेत्रीय पुट के बिना मानक हिंदी-भाषा में अनुदित कर दिया है। इसके बावजूद क्राइम-फ़िक्शन के क्षेत्र में यह संग्रह दिलचस्प होने-होने के साथ-साथ हिंदी में अपनी तरह का इकलौता संग्रह है। इसकी कारण संग्रह के कवर पर ‘लुगदी रसोई’ के दिए गए परिचय से जान सकते हैं, जो कुछ इस प्रकार है,

    साहित्य में जब जुर्म, धोखे और बदले के मसालों को मिलाकर साहित्यिक पकवान तैयार होते हैं तो लुगदी रसोईजैसी कहानियां अस्तित्व में आती हैं।

    ‘लुगदी रसोई’ में मुख्यरूप से शामिल सभी कहानियां जर्मनी पृष्ठभूमि की है और इन्हें जर्मन भाषा में ही लिखा गया है। इसके बावजूद जिस ख़ूबसूरती और स्थानीय शब्दों और वाक्यों को प्रयोग करके इन्हें हिंदी में पेश किया गया है, उससे एकबारगी तो यही महसूस ही नहीं होता है कि ये कहानियां किसी विदेशी भाषा में लिखी गई हैं।

    ‘लुगदी रसोई’ संग्रह को हमारे समय की प्रमुख जर्मन भाषा जानकार और जर्मन-हिंदी क्षेत्र में कई उल्लेखनीय कार्य कर चुकी नमिता खरे ने संपादित किया है। हालांकि, संग्रह में शामिल सभी कहानियों के अनुवादक अलग-अलग। किसी-किसी अनुवादक ने दो कहानियां भी अनुवाद की है। इससे यह भी मालूम होता है कि धीमी रफ़्तार से ही सही हिंदी में अंग्रेज़ी, स्पेशनिश और उर्दू के अलावा भी अन्य भाषाओं में लोगों का रुझान बढ़ रहा है। अन्यथा, हिन्दी में होने वाले विश्व साहित्य का अधिकांश हिस्सा अंग्रेज़ी से आता है, भले वह किसी भी अन्य भाषा लिखा गया हो।

    ‘लुगदी रसोई’ में शामिल कहानियां पारंपरिक रूप से असहाय दर्शाई गईं महिलाओं को सशक्त और निर्णायक पात्रों के रूप में प्रस्तुत करती हैं। इसके अलावा, ये कहानियां समाज की जटिलताओं और मानव स्वभाव की सार्वभौमिक सच्चाइयों को भी बयान करती हैं। यह हमें पति-पत्नी के संबंध, प्रेम कहानियों में आने वाले उतार-चढ़ा और शादीशुदा पुरुष के जीवन में आने वाली अन्य महिला से प्रभावित होने वाले पूर्ववर्ती रिश्तों को दुखद अंजाम से रू-ब-रू भी कराती हैं।

    शायद इसीलिए ये कहानियां हिंदी में अपनी तरह की अनोखी और अभूतपूर्व कहानियां बन पढ़ी हैं, जो पाठकों को एक नया अनुभव देती हैं।

    व्यापक रूप से देखा जाए तो ‘लुगदी रसोई’ कथा-संकलन क्राइम-फिक्शन में महिलाओं की सक्रिय और निर्णायक भूमिका को उजागर करता है। जर्मन-भाषी महिला लेखकों द्वारा लिखी गयी ये कहानियां पारम्परिक भूमिकाओं से परे जाकर वैकल्पिक विमर्श प्रस्तुत करती हैं। इसमें महिलाएं केवल पीड़िता नहीं, बल्कि अपराध और न्याय की दिशा तय करने वाली पात्र हैं। कहानियां सामाजिक, नैतिक और सांस्कृतिक जटिलताओं को अपराध कथा के रोमांच से जोड़ती हैं।

    शायद इसीलिए यह संग्रह हिन्दी साहित्य में महिला लेखन की अनुपस्थिति को चुनौती देता है। साथ ही यह हिंदी साहित्य में क्राइम-फिक्शन विधा में लंबे समय से चली आ रही उस कमी को भी पूरा करती है, जिसकी ओर शायद ही किसी न ध्यान दिया हो।

    समीक्षक- शहादत युवा कथाकार और अनुवादक हैं। उनका पहला उपन्यास ‘मुहल्ले का आख़िरी हिंदू घर’ शीघ्र प्रकाशय है। ‘लुगदी रसोई’ वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है।

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