एक पोटली में कितने दाने

 

हाल ही में आलोक कुमार मिश्र का कविता-संग्रह ‘पोटली के दाने’ प्रकाशित हुआ है। आज इस संग्रह की चर्चा कर रहे हैं युवा कवि जावेद आलम ख़ान– अनुरंजनी

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‘पोटली के दाने’ आलोक कुमार मिश्र का नया कविता संग्रह है जो इसी वर्ष सेतु प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है।इस संग्रह का केंद्रीय स्वर जो समझ आया वह है ‘मानवतावाद की पक्षधरता’।आलोक संवेदनशील कवि हैं। उनकी कविताओं में विचार भाव बनकर अभिव्यक्त होते हैं।विचारधारा को संवेदनाओं के साथ व्यक्त करने की कला में आलोक निपुण कवि हैं।वे स्त्रियों, थर्ड जेंडर, अल्पसंख्यकों और दलितों के पक्ष में खड़े होकर सुंदर संसार की कल्पना करते हैं। संग्रह की पहली ही कविता में आलोक उस शहर की कल्पना करते हैं जहाँ किसी तरह का भेदभाव, बदतमीजी, सांप्रदायिक उन्माद, जातीय दंभ और पोंगापंथी न हो।यह ‘नास्टेल्जिया’ की कविता है।अंतिम पंक्ति में जब आलोक पूछते हैं कि “कहां हैं यह शहर?” तब आज की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था के साथ आदमियत पर भी प्रश्न चिन्ह खड़ा कर देते हैं।

उनकी कविताएँ पढ़कर लगता है कि एक स्त्री उनके भीतर निवास करती है और निरंतर उनका संवाद चलता रहता है। स्त्री संवेदना उनकी कविताओं में प्रमुखता से उभरकर आई है।ओलंपिक पोडियम पर खड़ी लड़कियों को देखकर उनके भीतर का नागरिक प्रफुल्लित है और इन लड़कियों में वह आत्मनिर्भर स्त्री की कल्पना कर रहा है। ‘जब प्रेम में हो बेटियां’, ‘मेरी बेटियों’ इसी तरह स्त्री मन – संवेदन की कविताएँ हैं। काम करके घर लौटती स्त्रियों पर लिखी छोटी सी कविता बहुत मारक है।उसका एक अंश यहाँ उद्धरित है – “मैंने देखा है सैकड़ों लोगों को काम पर से लौटते हुए/ लेकिन स्त्रियों को नहीं/ मैंने उन्हें जब भी देखा काम पर लौटते देखा” आर्थिकोपार्जन करने वाली स्त्रियाँ पुरुषों के मुकाबले दोगुना कार्य करती हैं लेकिन सामाजिक हैसियत हमेशा दोयम दर्जे की रहती है। वह बाहर से लौटकर सीधे घर के कामों में लग जाती है।बच्चों की देखभाल भी उन्हीं के जिम्मे रख दी जाती है।यह अलग तरह का शोषण है जिसकी ओर ध्यान कम जा पाता है। यह भी वास्तविकता है कि मजदूर स्त्रियों को पुरुष मजदूरों के मुकाबले कम पैसे दिए जाते हैं।

इस संग्रह में कई कविताएँ आत्मावलोकन और आपबीती की कविताएँ हैं।इस आपबीती में भी प्रेम के अनेक रंग हैं।इन रंगों में नवपल्लवों सा कैशोर्य रोमांच है तो अधूरे छूट गए प्रेम की टीस भी।’प्रेम और मैं’ कविता में बकरियाँ चराने वाली लड़की को दी गई “नवजात बकरी” की उपमा बहुत सुंदर बन पड़ी है और प्रेमपरक कविता में ताजगी भरती है। सरल प्रवाह से बहती इस कविता में पुरुष द्वारा खुलकर एकाधिक प्रेम की स्वतंत्रता के साथ स्त्रियों पर लगे सामाजिक नियंत्रण और उनके संकोच की भी व्यंजना है। यहाँ कवि ने प्रेमिका की याद में रोमांचित और प्रफुल्लित नायक में काव्यशास्त्र वाली मुग्धा नायिका की विशेषताएँ उतार दी हैं। उसकी स्मृति द्वारा रात में चांद को रोप देना, मुस्कान देखकर बादल के टुकड़े सा हल्का हो जाना आदि बिंबों से किशोर मन को कवि खूबसूरती से सामने रख देता है। वे वैयक्तिकता पर सामाजिकता को तरजीह देते हैं।अपने मोक्ष के लिए समाज से कटकर एकान्तिक साधना उन्हें स्वीकार नहीं। वे लिखते हैं – “अकेले के मोक्ष से हमेशा बेहतर लगा मुझे दुखों से घिरे अपने लोगों में जूझते रहना/ बांटने से बँट जाता है दुख/ मिलकर काटो तो कट ही जाता है कुसमय।” मिलकर मनाने से खुशियों का उल्लास भी दोगुना हो जाता है। यही है सामूहिकता का महत्व।

आलोक इस कविता में इसी जरूरत की तरफ संकेत करते प्रतीत होते हैं। अंततः इंसानियत का तकाजा भी यही है कि इंसान इंसान के काम आए। कविता हमें बेहतर मनुष्य बनाती है। आलोक जगह जगह-इसकी तस्दीक करते दिखाई देते हैं। ‘बहिर्गमन’ उनकी सशक्त कविता है।यहाँ कवि पूरी ईमानदारी से निर्भय होकर श्रेष्ठता का दंभ पाले बहुसंख्यकों, मनुवादियों और पुरुषों से कहता है – “मनुष्यता की चौहद्दी से दूर तुम्हारी आरामगाहों में पसरी अय्याश मूर्खताओं का शोर मेरी नसों में दौड़ रहा है बनकर जहर” वह उनकी आरामगाहों से यह कहते हुए निकल आना चाहता है – “मैं चाहता हूं कि तुम पहचानो मुझे/ अपनों सा नहीं बल्कि ऐसे जैसे पहचानते हो भीड़ में किसी मुसलमान को/ ऑफिस में अपने हो सहकर्मी दलित को विकास के राजपथ पर कांटे की तरह चुभते आदिवासी को/ अपनी हवस भरी आंखों से किसी स्त्री को/ जानता हूं मारा जाऊंगा पर क्या ये कम है कि तुममें से एक न कहाऊँगा” यह बहुत साहसिक कविता है। जाति,धर्म और लिंग संबंधी अपनी ही पहचानों को इस तरह से ललकारना किसी के लिए आसान नहीं होता। ऐसी साफ़गोई और पक्षधरता आलोक को अलग पहचान देती है। एक और बात आलोक की कविताओं को खास बनाती है, वह है उनकी कविताओं में ग्रामांचल का सजीव चित्रण।आलोक के पास सहज ग्रामीण जीवन की सुखद स्मृतियाँ हैं और ये स्मृतियाँ उनकी कविताओं के तरल प्रवाह में बहती हैं।उनके बिम्ब और प्रतीक उनके इसी क्षेत्र से आते हैं।रिश्तों पर उनकी कुछ प्यारी कविताएँ इस संग्रह में मौजूद हैं। खर्राटे लेती माँ को देखकर कवि संतुष्ट है कि वह गहरी नींद में सो रही है जबकि अन्य सदस्य उन खर्राटों से परेशान हैं।यह गहरी संवेदना की कविता है और कवि ने इसे घर की चहारदीवारी में रखते हुए भी व्यापक संदर्भों से जोड़ दिया है – “मां के खर्राटे अनवरत घूम रही धरती की सुस्ताहट हैं” लेकिन कई बार वे अतिरिक्त संवेदनशील होते जाते हैं और लगता है जैसे कविताओं को आदर्श का अतिरिक्त डोज पिलाते हैं। इसी कारण कई बार यथार्थ उनसे छूटा हुआ दिखाई देता है।

‘संग्रह’ में तुकबंदी वाली कविताएँ कमजोर हैं। यहां न तो छंद के नियमों का पालन किया गया है, न ही इन कविताओं में गेयता है। आलोक को छंद के मोह से निकल आना चाहिए। आलोक अच्छे कहानीकार भी है इसलिए उनकी कविताएँ संवाद करती प्रतीत होती हैं।चरित्रों को खूबसूरती से गढ़ते हैं आलोक। लेकिन दिक्कत यहाँ यह है कि यह कहानीकार उनकी कविताओं में न सिर्फ मौजूद है बल्कि उनके कवि को भी नियंत्रण में लिए हुए है।वे कविताओं में कहानी कहते हैं।उनकी कविताएँ संकेतों में कम बात करती हैं यहाँ तक उनकी शैली पर भी किस्सागोई का असर है।अधिकांश कविताओं में उपदेशात्मकता की प्रवृत्ति दिखाई देती है। इधर बेरोजगारी पर पराग पावन की कविताओं को खूब मकबूलियत हासिल हुई।वह पूरी सीरीज बहुत शानदार है।आलोक करीब पाँच साल पहले ‘बेरोजगार पिता के बच्चे’ शीर्षक कविता लिखकर इस संवेदना को पकड़ चुके थे।इस विषय पर उन्होंने ‘बेरोजगार संतानों के बूढ़े पिता’ लिखकर दोनों पीढ़ियों के मनोभाव को पकड़ने का प्रयास किया है।इन कविताओं में बेरोजगारी का अभिशाप झेलते व्यक्ति की बेबसी और परिवार के बाकी लोगों पर उसके प्रभाव का सशक्त अंकन किया गया है।यह मानीखेज कविताएँ हैं।

आलोक प्रकृति प्रेमी कवि हैं। उनके यहाँ प्रकृति-चित्रण पारंपरिक रूप में आया है। सूर्य, चंद्रमा, तारे, बादल , बारिश, खेत खलिहान, नदी, चिरई – चिरगुन का वर्णन नागार्जुन,केदारनाथ अग्रवाल आदि प्रगतिवादी कवियों की याद दिलाता है। अधिकांश जगह प्रकृति का आलम्बन रूप ही दिखाई पड़ता है।इन्हें पढ़ते हुए लगता है कि बचपन की स्मृतियों का असर कवि पर इतना ज्यादा है कि अतिशय भावुकता में स्थान,समय और कार्य की एकता दर्शाने में कई बार चूक जाता है। कवि की भाषा में सहजता और प्रवाह दिखता है। चित्रात्मकता उनकी कविताओं का खास गुण है। संग्रह की कई कविताओं में सुंदर रूपकों का प्रयोग किया गया है। उनके संग्रह का शीर्षक ‘पोटली के दाने’ भी रूपक ही है जो संग्रह के प्रति पाठकों की जिज्ञासा को बढ़ाता है। बिम्ब विधान प्रभावशाली है। आम बोलचाल की शब्दावली का प्रयोग कविताओं को सर्वग्राही बनाता है। उनके पास गंवई गंध लिए स्मृतियों का उजला और भरा पूरा संसार है।उनका कवि इसी परिवेश से कविता के लिए जरूरी बीज और खाद पानी ग्रहण करता है।इसी कारण उनकी कविताएँ मन का सहज स्पर्श करती हैं और पठनीय हैं।

उनकी कविताएँ पारिवारिक फिल्मों की तरह हैं जिन्हें एक साथ बैठकर सुना और पढ़ा जा सकता है।यहाँ त्याज्य भाषा,अश्लीलता,हिंसा के दृश्य अचानक से आने का कोई खतरा नहीं।साफ़ सुथरे दृश्य, सुखद स्मृतियाँ, आदर्श राज्य की अवधारणा की ओर उन्मुखता और कविताओं की सुखांत परिणति उन्हें अजातशत्रु कवि बनाती है। हालाँकि ‘बहिर्गमन’ जैसी आक्रामक और स्टैंड लेने वाली कविताओं से सांप्रदायिकों, जातिवादियों और यौन कुंठाग्रस्त लोगों को आलोक खटकते हैं लेकिन सार्वजनिक मर्यादा उन्हें भी निभानी पड़ती है। यह कहना समीचीन होगा कि आलोक की इस पोटली में बहुत दाने है। और हाँ किताब का कवर पृष्ठ बहुत सुंदर और चित्ताकर्षक है।

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