
आज इम्तियाज़ अली की फ़िल्म ‘मैं वापस आऊँगा’ रिलीज़ हुई है। विभाजन की त्रासदी और इटरनल प्रेम की थीम को इस फ़िल्म में बहुत कुशलता से पिरोया गया है। इस फ़िल्म पर पढ़िए कुमारी रोहिणी की टिप्पणी- मॉडरेटर
==================================
इतिहास कहता है कि पीछे मत देखो, लेकिन यादें कहाँ किसी की बंदिश सुनती हैं।
सेलेक्ट सिटीवॉक गए लगभग सात साल तो हो ही गए होंगे। एक समय था जब सड़क के ठीक पार मेरा दफ़्तर हुआ करता था। तब यह मॉल ऑफिस की दुनिया का ही हिस्सा लगता था। लंच ब्रेक में हाथ में कॉफी लेकर इसके कॉरिडोर्स में निकल जाना और कुछ देर के लिए काम की भागदौड़ को भूल जाना रोज़मर्रा की बात थी। फिर ज़िंदगी अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ गई। जॉब बदली, रूटीन बदला और वह रास्ता भी धीरे-धीरे छूट गया।
लेकिन कुछ जगहें पूरी तरह नहीं छूटतीं। वे हमारे भीतर कहीं बनी रहती हैं और फिर किसी दिन कोई बहाना हमें वापस वहाँ ले आता है।
मेरे लिए इस बार वह बहाना इम्तियाज़ अली की नई फिल्म मैं वापस आऊँगा थी, जिसका स्पेशल प्रीमियर देखने मैं साकेत पहुँची थी। दिलचस्प बात यह है कि यह फिल्म भी एक तरह से लौटने की ही कहानी है।
बंटवारे के ज़ख्मों के बीच बुनी गई यह कहानी एक ऐसे पोते के सफ़र का पीछा करती है, जो पाकिस्तान जाकर उस स्त्री की तलाश करता है जिससे उसके दादा ने जीवन भर प्रेम किया था। लेकिन बहुत जल्दी यह सिर्फ़ एक प्रेम कहानी नहीं रह जाती। यह उन लोगों की कहानी बन जाती है जो अपना घर, अपने लोग और अपनी दुनिया पीछे छोड़ आए थे, लेकिन उन्हें अपने भीतर कभी छोड़ नहीं पाए।
मैं थिएटर में एक ऐसी प्रेम कहानी देखने गई थी जिसका आधार देश का विभाजन है। लेकिन बाहर निकली तो साथ था बीते हुए समय का एक धुंधलका, पुरखों से विरासत में मिला कोई अनकहा दुख। और इन सबके बीच थी बची रह गई ज़िद्दी मोहब्बत जो जाने कितनी तबाहियों के बाद भी हार नहीं मानती।
लौटने का भरोसा और पीछे छूटे समय की परतें
फिल्म की शुरुआत से पहले ही इसका टाइटल ‘मैं वापस आऊंगा’ मेरे भीतर कहीं अटक गया था। ये नाम बार-बार अमृता प्रीतम की उन मशहूर पंक्तियों की याद दिलाता रहा,‘मै तैनू फिर मिलांगी‘। शायद ये पंजाब की उस खिंचने वाली साझी मिट्टी का असर हो। या फिर बिछड़कर दोबारा मिलने की वो तड़प जो इन दोनों ही रचनाओं की आत्मा में दौड़ती है। पूरी फिल्म देखते हुए ये ख़याल मेरे साथ साये की तरह चलता रहा। दोनों ही जगह एक अटूट भरोसा है। भरोसा इस बात का कि जुदाई कभी भी आख़िरी सच नहीं हो सकती। जिसे आपने पूरी शिद्दत से चाहा है, वो वक्त के तंग रास्तों से गुज़रकर कभी न कभी वापस आने का रास्ता ढूंढ ही लेता है, हाँ उसके आने-मिलने के रूप-स्वरूप अलग होते हैं।
एक नज़र में देखने पर यह कहानी एक ऐसे बूढ़े की लगती है जो अतीत के साये में जी रहा है, (शायद उम्र की वजह से, क्योंकि उम्र के सबसे क्रूर दौर में आप उसी अतीत में चले जाते हैं, जहां आपकी आत्मा अटकी होती है।) लेकिन इसकी तह में इतिहास के वे क्रूर थपेड़े हैं जो हमसे हमारा सब कुछ छीन लेते हैं। वो लोग जो पलक झपकते बिछड़ गए, वे जगहें जो कभी घर थे, और जिन्हें रातों-रात छोड़ना पड़ा। वे अधूरी बातें जो कहनी-सुननी रह गई, और उनसे उपजा वह खालीपन जिसको भरने में इंसान की पूरी उम्र छोटी पड़ जाती है।
जब इतिहास किताबों से निकलकर इंसान की रूह में बस जाता है
इम्तियाज़ अली की इस फ़िल्म की सबसे बड़ी ख़ूबी मुझे यही लगी कि इसमें उन्होंने देश के विभाजन को इतिहास की किसी सूखी, धूल जमी किताब के पन्ने की तरह नहीं देखा है।
हमारे यहाँ इतिहास को आंकड़ों, तारीखों और राजनीतिक नफ़े-नुकसान की बहसों में इस तरह उलझा दिया जाता है कि उसमें धड़कता हुआ इंसानी दर्द कहीं गुम हो जाता है। इम्तियाज़ ने उसी खोए हुए दर्द को परदे पर लाने की कोशिश की है। वे याद दिलाते हैं कि इतिहास सिर्फ नक्शे पर खिंची लाइंस का नाम नहीं है। इतिहास नाम है पीछे छूट गई मांओं का, कभी न मिल सकी बहनों का, खौफ की भेंट चढ़ गई पुरानी यारियों का और उन ज़िंदगियों का जो एक झटके में ‘पहले’ और ‘बाद’ के दो बेगाने हिस्सों में कट गईं। ऐसी त्रासदियां उस वक्त ख़त्म नहीं होतीं जब भयावह मंजर कुछ थम जाता है। ये तो पीढ़ियों तक लोगों के भीतर चुपचाप सांस लेती रहती हैं।
फिल्म का एक हिस्सा बहुत भावुक कर देने वाला है, जहाँ बंटवारे की उस भयानक आग के बीच एक मुस्लिम परिवार अपने ही पड़ोस के एक पंजाबी परिवार के लिए ढाल बनकर खड़ा हो जाता है।
आज के दौर में जब विभाजन की बातें सिर्फ मजहबी कड़वाहट और देशों की दुश्मनी के बाइनरी में ही की जाती हैं, तब यह फिल्म याद दिलाती है कि उस दौर में भी अगर इंसानियत बची रही, तो इसलिए क्योंकि कुछ आम लोगों ने अपने पड़ोसियों को दुश्मन मानने से साफ़ इनकार कर दिया था।
अपनी इस सोच और भावनाओं की उन्हें बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ी, लेकिन उनके ये कदम भरोसा देते हैं कि इतिहास के सबसे घने अंधेरे वक्त में भी इंसानियत की रोशनी टिमटिमा रही थी।
इम्तियाज़ पार्टिशन की हिंसा को भी बहुत संयम से दिखाते हैं। फिल्म चीख़ती नहीं, बल्कि धीरे-धीरे भीतर उतरती है। खून-खराबे के बड़े दृश्यों के बजाय वह उन चेहरों पर ठहरती है, जिनकी दुनिया अचानक बदल गई है। शायद इसी वजह से फिल्म का दुख और भी गहरा महसूस होता है।
फिल्म का हर एक फ्रेम इम्तियाज़ अली के सिग्नेचर स्टाइल की गवाही देता है। आज के निर्देशकों में लैंडस्केप्स की ऐसी नब्ज़ पकड़ने वाला कोई दूसरा नहीं है।
यहाँ पंजाब महज़ एक लोकेशन या बैकग्राउंड नहीं है, वो खुद यादों का एक जीता-जागता गवाह है। वहाँ के खेत, धूल भरी सड़कें और सूनी सरहदें, जैसे सब कुछ याद रखती हैं।
सिनेमैटोग्राफी का लहजा बेहद नरम। इससे लगता है कि इम्तियाज़ शब्दों से ज़्यादा खामोशी पर भरोसा करते हैं और इसलिए इंटेंस सीन में डायलॉग नहीं बल्कि केवल एक्सप्रेशन से काम लेते हैं। होराइज़न में कहीं दूर खोती हुई सड़क, दशकों का दर्द समेटे कोई बूढ़ा चेहरा, या दो वाक्यों के बीच का वो छोटा सा ठहराव, ये वो लम्हे हैं जो बिना कुछ बोले आपको परेशान कर देते हैं।
फिल्म की एक और खूबी इसका नैरेटिव स्ट्रक्चर है। यह कहानी सीधी रेखा में आगे नहीं बढ़ती। अतीत और वर्तमान बार-बार एक-दूसरे में घुलते रहते हैं। कई बार ऐसा लगता है जैसे किरदार किसी जगह नहीं, अपनी ही यादों के भीतर सफ़र कर रहे हों।
फ्लैशबैक यहाँ सिर्फ़ बीते हुए समय की जानकारी देने का टूल नहीं हैं, बल्कि वे उस भावनात्मक दुनिया का हिस्सा हैं जिसमें फिल्म के किरदार आज भी रह रहे हैं। इसलिए पार्टिशन फिल्म में किसी इतिहास की घटना की तरह नहीं, बल्कि लगातार मौजूद एक अनुभव की तरह महसूस होता है।
पाकिस्तान वाले हिस्से भी इसी वजह से असर छोड़ते हैं। इम्तियाज़ उन्हें किसी अनजानी या रहस्यमयी जगह की तरह नहीं दिखाते। वहाँ की गलियाँ, घर, लोग और बोलचाल बार-बार इस बात का एहसास कराते हैं कि सरहदें भले बदल गई हों, लेकिन साझा संस्कृति और साझा यादों की दुनिया अब भी पूरी तरह बंटी नहीं है।
शायद यही वजह है कि फिल्म देखते हुए कई बार यह महसूस होता है कि कहानी दो देशों के बीच नहीं, एक बिखरे हुए घर के दो कमरों के बीच चल रही है।
संगीत की रूहानियत और सधा हुआ अभिनय
और जहाँ इम्तियाज़ अली और ए.आर. रहमान का साथ हो, वहाँ उम्मीदें सातवें आसमान पर होना लाज़मी है। रहमान का स्कोर इस कहानी के ताने-बाने में इस कदर रचा-बसा है कि वो सिर्फ गानों का एल्बम नहीं लगता। फ़िल्म का संगीत तड़प और उम्मीद की अपनी एक मुकम्मल ज़ुबान बन जाता है। लेकिन जो चीज़ सबसे ज़्यादा भीतर तक छूती है, वो है इम्तियाज़ का अपनी रूहानी दुनिया की तरफ लौटना। कबीर की साखियाँ, सूफी विचार और हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की चौखट का रूहानी अहसास।
जब वी मेट से लेकर हाईवे और रॉकस्टार तक, इम्तियाज़ के किरदार हमेशा अपने भीतर एक अजीब सी बेचैनी लिए कुछ न कुछ ढूंढते रहे हैं। उन्हें कुछ ऐसा चाहिए था जो मिल नहीं रहा था, वे बस अपनी एक ठौर ढूंढ रहे थे।
इम्तियाज़ के प्रोटागोनिस्ट्स हमेशा किसी न किसी खोज में भटकते हुए किरदार रहे हैं। वे प्यार, पहचान और अपने वजूद की तलाश में निकलते हैं। जब रोज़मर्रा के आम शब्द छोटे पड़ जाते हैं, तो वे मस्ताने सूफियों से उनकी भाषा उधर ले लेते हैं।
उनके किरदारों की वह भटकन दरअसल हम मिलेनियल्स की अपनी उम्र की भटकन थी। आज जब हमारी यह पूरी पीढ़ी चालीस की सरहद को छू रही है, तो इस फिल्म तक आते-आते खुद इम्तियाज़ जैसे हमें बता रहे हैं कि अब वह तलाश ख़त्म हो रही है। इस फिल्म में उन्होंने हमारी उस बरसों पुरानी बेचैनी को आखिरकार एक ठौर दे दिया है।
इस फिल्म में कबीर और निज़ामुद्दीन औलिया की गूंज सरहदों की बंदिशों को बौना कर देती है। यहाँ कबीर हैं, जो सबके थे और किसी एक के नहीं। औलिया, जिन्होंने बिना किसी शर्त के सिर्फ और सिर्फ मोहब्बत का कलमा पढ़ा। ये सब हमें याद दिलाता है कि सियासत की खींची लकीरों के बहुत नीचे एक साझी संस्कृति बहती है, जिसे कोई सरहद कभी बांट नहीं सकी। (शायद वही गंगा-जमना तहज़ीब)
इतने भारी इमोशन्स को परदे पर निभाना आसान नहीं रहा होगा, पर फ़िल्म के सारे किरदारों ने मिलकर कमाल का काम किया है। नसीरुद्दीन शाह को स्क्रीन पर देखना ही अपने आप में एक सुकून है, वे कुछ न भी बोलें, तो भी सीन मुकम्मल होता है।
दिलजीत दोसांझ तो जैसे इस फिल्म की जान हैं, उनकी वो जानी-पहचानी मासूमियत और सादगी सीधे दिल को छूती है। वहीं वेदांग रैना ने भी अपने हिस्से के भोलेपन और बेबसी को बहुत ईमानदारी से निभाया है। शरवरी जब भी फ्रेम में आती हैं, अपनी मौजूदगी से उसे चमका देती हैं।
इन सबने मिलकर परदे पर जो दुनिया बनाई है, वो कहीं से भी बनावटी नहीं लगती, एकदम सच्ची और अपनी सी लगती है।
इस जज्बाती सफ़र को आगे बढ़ाते हुए यह फिल्म पंजाब से निकलकर सीधे आज के ग्लोबल दुख-दर्द से जुड़ जाती है। ‘मैं वापस आऊंगा’ सिर्फ 1947 के दायरे में बंद नहीं रहती, और यही बात इसे आज के इस दौर में बेहद प्रासंगिक बना देती है।
विस्थापन, देश निकाला और अपने ही घर को खो देने का जो दर्द पंजाब ने झेला, वही आज गाजा और फिलिस्तीन की सड़कों पर बिखरा पड़ा है। फिल्म के अंत में दिलजीत दोसांझ की बोल में गाए गीत के बैकग्राउंड में जब गाजा का ज़िक्र आता है, तो वो कोई राजनीतिक कमेंट्री नहीं लगती। बल्कि इस बात का अहसास कराती है कि अपनी मिट्टी, अपना परिवार और अपना इतिहास छिन जाने की तड़प किसी एक भूगोल या राजनीतिक रेखाओं तक सीमित नहीं रह जाती।
चाहे 1947 का पंजाब हो या आज का गाजा, अपनों से बिछड़ने, अपने देश से पलायन को मजबूर होने और सब कुछ खो देने का दर्द, सबकी तासीर एक ही है। हेडलाइंस के पीछे हमेशा आम लोग होते हैं जो एक पहाड़ जैसा दुख ढो रहे होते हैं। हर कनफ्लिक्ट के पीछे कुछ मासूम आँखें होती हैं जिनमें घर लौटने का ख़्वाब हमेशा के लिए बस जाता है।
सब कुछ ढह जाने के बाद जो बचा रह जाता है
शायद फिल्म का सबसे ख़ूबसूरत मैसेज यहीं छिपा है। जिस इंसान ने अपनी आँखों के सामने एक दुनिया टूटते देखी हो, उसके भीतर अगर आख़िर तक कुछ बचा रह जाए और वह प्रेम हो, तो शायद यही इस फिल्म की सबसे बड़ी बात है। नफ़रत सुर्खियाँ बनाती है, पॉलिटिक्स सरहदें बदलती है, लेकिन इंसान को आख़िर तक जो चीज़ थामे रखती है, वह प्रेम ही है।
आज के इस दौर में, जहाँ चारों तरफ बेमतलब की नाराज़गी और दूरियां पसरी हैं, यह फिल्म बेहद खामोशी से एक सच हमारे सामने रख देती है। वह बताती है कि नफ़रत, हिंसा, लूट-खसोट, मार-काट सब कुछ अख़बार के पहले पन्ने की सुर्ख़ी बन सकती हैं, पॉलिटिक्स सरहदें बदल सकती है, लेकिन आख़िरी फैसला उनका नहीं होता।
आख़िर में वही चीज़ बचती है जिसे हम प्रेम, लगाव या अपनेपन के किसी भी नाम से पुकार लें। यही प्यार की वो ताकत है जो कभी ख़त्म नहीं होती, वही बचता है, वही ठहरता है, और वही वापस लौटता है।
यह बात फिल्म के आख़िरी मोमेंट्स में दिलजीत दोसांझ के क्लोजिंग सॉन्ग में पूरी तरह उभर कर आती है। जब थिएटर से निकलने के बाद फिल्म के सीन्स धीरे-धीरे धुंधले पड़ने लगेंगे, तब भी यह गाना आपके भीतर लगातार गूंजता रहेगा।
यह महज़ एक ट्रैक नहीं, बल्कि उन तमाम लोगों के नाम लिखा गया एक विदाई का ख़त है जिन्होंने कभी न कभी अपना घर, अपना कोई बेहद अज़ीज़ या शायद खुद का ही कोई हिस्सा हमेशा के लिए खो दिया हो। न कोई सवाल है और न ही मलाल है।
एक पुराने सवाल का सादा सा जवाब
जब हॉल की लाइटें जलीं और स्क्रीन पर क्रेडिट्स चलने लगे, तो मेरे ज़हन में फिल्म का वो एक संवाद बार-बार गूंज रहा था: “वीर जी ने कहा था, पीछे मुड़कर मत देखना, वहां कुछ नहीं है।”
लेकिन कहानी के किरदार इस इंस्ट्रक्शन को कभी मान नहीं पाते। और सच कहें तो, हममें से कौन ही मान पाता है? इतिहास कहता है कि पीछे मत देखो, लेकिन यादें कहाँ किसी की बंदिश सुनती हैं। शायद इसीलिए यह फिल्म मेरे भीतर कहीं ठहर गई। क्योंकि यह सिर्फ बंटवारे की कहानी नहीं है, न ही यह सिर्फ एक लव स्टोरी है।
यह उस अंतहीन बातचीत का हिस्सा है जो हम अपने बीते हुए कल के साथ ताउम्र करते रहते हैं। वे तमाम लोग जो चले तो गए, लेकिन हमारे भीतर से कभी गए नहीं। वो इतिहास जो हमें विरासत में मिला है, और हमारे अपने भीतर वह अनसुलझा -तड़पता एहसास जो आज भी अपने असली ठौर की तलाश में है।
इस फिल्म को सिर्फ इसलिए मत देखिए कि इसे इम्तियाज़ अली ने डायरेक्ट किया है या इसमें नसीरुद्दीन शाह और दिलजीत दोसांझ जैसे उम्दा कलाकार हैं।
इसे इसलिए देखिए क्योंकि यह हममें से हर इंसान से वो बुनियादी सवाल पूछती है जिससे एक न एक दिन सबका सामना होना तय है। सवाल कि जब सब कुछ लूट जाता है, सब कुछ खो जाता है, तब वह कौन सी चीज है जो हमारे भीतर आख़िर तक बची रह जाती है?
ख़ुद फिल्म ही इस सवाल का जवाब बेहद सादे और रूह को सुकून देने वाले अन्दाज़ में दे देती है, लेकिन इसके लिए फ़िल्म देखिए, मैं नहीं बताऊँगी।

