• फिल्म समीक्षा
  • बॉर्डर 2- आप देखें और कहें- जय हिंद!

    पिछले महीने फ़िल्म आई ‘बॉर्डर 2’. इस फ़िल्म पर रोचक शैली में यह टिप्पणी लिखी है जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के शोध छात्र मुशर्रफ परवेज़ ने- मॉडरेटर 

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    “राम- राम, यह भी कोई लड़ाई है। दिन- रात खंदकों में बैठे हड्डियां अकड़ गईं।”
    साल 1915 की चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ की कहानी ‘उसने कहा था’ की इस पंक्ति से जब कुछ शुरू हो रहा हो तो आप समझ लें कि युद्व की त्रासदी की बातें होने जा रही हैं।

    जी हां, गणतंत्र दिवस से 3 दिन पूर्व अनुराग सिंह निर्देशित बॉर्डर-2 भारत के तमाम सिनेमाघरों में रिलीज़ कर दी गई। महज़ 21 दिनों में फ़िल्म ने 434 करोड़ रुपए की कमाई कर ली। हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां अर्थ की बड़ी महत्ता है। बंबईया भाषा में कहें तो उसी फ़िल्म को सफ़ल माना जाता है जो 500 करोड़ का आंकड़ा छू ले।

    फ़िल्म की कहानी के बारे में आप जानते ही होंगे। यदि नहीं जानते हैं तो याद कर लीजिए सन् 1971 का भारत-पाकिस्तान का भीषण युद्ध। जिसमें जल, थल और वायु सेना ने एक साथ मिलकर दुश्मनों का छक्का छुड़ाया था। जिस लड़ाई में भारतीय सेना के जांबाजों ने एक साथ मिलकर ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का बिम्ब बनाया था। फ़िल्म का एक संवाद है जो वसुधैव कुटुंबकम् को बखूबी प्रदर्शित करता है। जब होशियार सिंह कहते हैं- “जब आर्मी, नेवी और एयर फोर्स एक साथ हो जाता तो हमें कोई हरा नहीं सकता।”

    फ़िल्म के कुछ एक किरदारों से रूबरू करा देना लाज़िम बन पड़ता है ताकि आगे की बातें समझने में आसानी हो। सन्नी देओल फतेह सिंह, वरुण धवन होशियार सिंह, दिलजीत दोसांझ निर्मलजीत सिंह और अहान शेट्टी जोसफ नोरोन्हा की भूमिका निभा रहे हैं।
    एक बात स्पष्ट करता चलूं साहब यदि आप इसको ‘बॉर्डर’ के नज़रिए से देखना शुरू करेंगे तो आपको देखने में बिल्कुल भी मज़ा नहीं आएगा। क्योंकि बॉर्डर का युग ढाई दशक पहले का है। जबकि बोर्डर-2 का परिवेश 2026 का है।
    यदि आप इस फिल्म को अभी का समझकर देखेंगे तो आपको एकदम नई कहानी लगेगी।

    दूसरी महत्वपूर्ण बात, यदि आप अहान शेट्टी में सुनील शेट्टी को देखना चाहेंगे तो आपको अहान शेट्टी का असली किरदार नहीं दिखेगा। समझना ये है कि सुनील शेट्टी एक अलग मनुष्य हैं और अहान शेट्टी अलग। ये अलग बात हैं कि अहान उनके बेटे हैं।
    निर्देशक अनुराग सिंह ने वाकई में अच्छा काम किया है। पर्दे पर जो कुछ दिख रहा होता है वो उपज तो निर्देशक का ही होता है। बतौर निर्देशक अनुराग सिंह ने शानदार ढंग से कहानी को बुना। एक दर्शक के अंदर किसी नायक का जो लोप होता है वास्तव में उसके पीछे निर्देशक का कुशल निर्देशन होता है।

    खैर, इंटरवल के बाद का एक-एक सीन मन में उत्सुकता भरता चला जाता है। आगे क्या होगा? आगे क्या होगा?
    नानी-दादी गांवों में जब खटिया पर बैठकर बच्चों को कहानी सुनाया करतीं थीं। जैसे ही थोड़े समय के लिए वो रुकती थीं कि बीच से कोई बोल उठता कि अब आगे क्या हुआ? फ़िल्म के दूसरे हिस्से को देखते समय ठीक वैसा ही दृश्य आंखों में बनता जाता है।

    बॉर्डर-2 में बॉर्डर का एक डिट्टो गीत रखा गया है। गीत के बोल हैं- संदेशे आते हैं, हमें तड़पाते हैं…
    ये गीत हमें उस दौर में ले जाता है जब कभी चिट्ठियों का ज़माना हुआ करता था। विचार-विनिमय का एक मात्र साधन चिट्ठियां ही हुआ करतीं थीं। जब चिट्ठी की बात छिड़ ही गई है तो फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ की सन् 1959 की कहानी ‘तीसरी कसम’ का वो गीत याद दिला ही देता हूँ। जिसमें हीरामन बैलगाड़ी हांकते समय हीराबाई को छोकरा-नाच गीत सुनाता है। गीत यूँ है-
    “सजनवा बैरी हो गय हमारो…  चिट्ठिया हो तो सब कोई बांचे”
    “तो चलूं…” गीत का ज़िक्र भी महत्वपूर्ण है। क्योंकि इसमें एक पिता व पुत्री का संवाद आँखों से आंसू निकाल देता है। जब जोसफ नोरोन्हा घर से जंग के लिए निकल रहे होते हैं। उस समय उनकी बेटी एक पेपर पर चित्र बनाकर देती हैं। तब जोसेफ की पत्नी कहती हैं अपनी बेटी की बातें-
    “पापा बॉर्डर की रक्षा करेंगे और दुर्गा मां पापा की”

    फतेह सिंह का किरदार हमारे कस्बे की कई बातों को दिखाता है। एक पिता के लिए पुत्र की कितनी अहमियत होती है उसको फतेह सिंह का चरित्र बखूबी दर्शाता है। क्योंकि एक पिता के लिए दुनिया का सबसे भारी काम होता है अपने कंधे पर अपने ही पुत्र की अर्थी उठाना।
    अपने पुत्र के शहीद होने के बाद फतेह सिंह गुरुद्वारा जाना छोड़ देते हैं। जबकि उनकी पत्नी बार-बार उनको माथा टेकने को कहती हैं। इस संदर्भ में उनके और उनकी पत्नी सम्मी का संवाद बड़ा मार्मिक है।
    सम्मी कहती हैं- “मैं जिस फतेह सिंह से प्यार करती हूँ न वो कभी कोई जंग नहीं हारा। इस बार जब लौटोगे न सरदार जी तो इस जंग को भी और अपने अंदर के जंग को भी जीत कर आना।”

    चलते-चलते इतना कहूंगा कि ये फ़िल्म उस समय की है जब मनोरंजन के नाम पर कुछ भी परोसा जा रहा है। इसीलिए आप इस फ़िल्म को देख सकते हैं। क्योंकि जब आप देखेंगे तो आपको अपने सैनिकों पर गर्व करने का मौक़ा मिलेगा।
    यदि आप और हम अपने घरों में परिवार वालों के साथ डाइनिंग टेबल पर बैठकर खाना खा पाते हैं या टीवी देखते समय गप्पे लड़ाते हैं तो किसी मां का बेटा, किसी बहन का भाई और किसी पत्नी का पति दुश्मनों के सामने सीना ताने खड़ा होता है।

    सब मैं ही बता दूंगा तो आप क्या ही फ़िल्म देखेंगे?
    इसीलिए बस इतना ही बाक़ी आप देखें और कहें- जय हिंद!

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