आजकल ‘बिबलियो फ़ार्मेसी’ और ‘पोएट्री फ़ार्मेसी’ की चर्चा है। एक जापानी उपन्यास ‘मोरीसाकी बुकशॉप के ख़ुशनुमा दिन‘ के बारे में पढ़ते हुए ‘हीलिंग फ़िक्शन’ सुना। यह एक नई साहित्यिक प्रवृत्ति है जिसमें यह माना जाता है कि साहित्य आपके जीवन को बेहतर बनाने में मददगार होता है।आइये आज ‘मोरीसाकी बुकशॉप के ख़ुशनुमा दिन’ उपन्यास के बारे में, इन नई प्रवृत्तियों के बारे में कुमारी रोहिणी का लिखा यह लेख पढ़ते हैं। कुमारी रोहिणी कोरियाई भाषा की विशेषज्ञ हैं और अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक प्रवृत्तियों पर अक्सर लिखती रहती हैं। हाँ, इस उपन्यास का अनुवाद मदन सोनी ने किया है और प्रकाशन मंजुल प्रकाशन ने- मॉडरेटर
========================
दो दिन पहले एक पैकेट खोला तो उसके अंदर से एक जापानी उपन्यास का हिन्दी अनुवाद निकला। किताब का टाइटल “मोरीसाकी बुकशॉप के ख़ुशनुमा दिन” पढ़कर लगा मानो कुछ दोहराव लिए हुए है। फिर याद आया कि कुछ दिन पहले ही जापानी बेस्टसेलर ‘What You Are Looking for is in the Library” का हिन्दी अनुवाद मैंने किया था। शायद यही कारण था कि यह किताब मुझे उसी की याद दिला गई। लेकिन यह केवल दो किताबों के एक से होने का संयोग नहीं था, बल्कि एक साहित्यिक प्रवृत्ति का संकेत भी था।
फिर एक सवाल मन में कौंध गया और यह सवाल भी अचानक से नहीं आया था बल्कि कई महीनों से यह दिमाग़ में उथल-पुथल मचा रहा था।
सवाल कि अचानक से ऐसी किताबों की बाढ़ सी क्यों आ गई है। जापान, दक्षिण कोरिया, वियतनाम जैसे दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों में इस तरह के विषयों की लोकप्रियता का कारण आख़िर क्या है?
इस तरह के विषयों पर लिखी जाने वाली किताबों को ‘Healing Fiction’ की श्रेणी में रखा जाता है। इस श्रेणी की तार भी कहीं न कहीं बिबलियो फ़ार्मेसी और पोएट्री फ़ार्मेसी से ही जुड़ती नज़र आती है। दरअसल यह साहित्य ‘ठीक’ करने का वादा नहीं करता, बल्कि ‘साथ’ देने की भाषा गढ़ता है।
इन किताबों को पढ़कर लगता है कि आख़िर क्या कारण है कि इन देशों में किताब की दुकानों की संख्या अचानक इतनी ज़्यादा बढ़ रही है? ऐसे समय में जब हम डिजिटल होते जा रहे हैं, और जापान, दक्षिण कोरिया तो Digitalisation में भारत जैसे देशों से कई दशक आगे है, तब किताब की दुकानों का क्या औचित्य है और न केवल औचित्य है बल्कि इनका महत्व भी इतना ज़्यादा हो गया है कि अब उपन्यासों में भी इनकी अच्छी-ख़ासी उपस्थिति दिखने लगी है।
इतना ही नहीं, हीलिंग फिक्शन की ये किताबें न केवल इन देशों में ही पढ़ी जा रही हैं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी इसके पाठक बड़ी संख्या में हैं और ये किताबें अंतरराष्ट्रीय बेस्टसेलर हो रही हैं।
जापान, दक्षिण कोरिया या वियतनाम जैसे देश तकनीकी रूप से अत्यंत उन्नत हैं। मेट्रो की रफ़्तार, डिजिटल भुगतान की सहजता और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की रोज़मर्रा मौजूदगी ने जीवन को सुविधाजनक तो बनाया है, लेकिन उसी के भीतर एक गहरा और लगभग अनकहा अकेलापन भी पनपा है। स्क्रीन हमारे समय को भर देती है, पर मन को नहीं। ऐसे में किताब की दुकान या लाइब्रेरी केवल एक भौतिक जगह नहीं रह जाती, वह उस तेज, लगातार भागती हुई डिजिटल दुनिया के बीच कुछ पल ठहरने का विकल्प बन जाती है। वहाँ स्क्रॉल नहीं, ठहराव है।
जापान में ‘हिकिकोमोरी’ जैसी सामाजिक स्थितियाँ हों या दक्षिण कोरिया की कम्पेटिटिव शैक्षणिक-कॉर्पोरेट संस्कृति, दोनों ही समाजों में आधुनिकता ने सुविधा दी है, लेकिन शांति नहीं।
ऐसे में इन देशों के साहित्य ने एक अलग रास्ता चुना। यह रास्ता उपदेश नहीं देता बल्कि इसके केंद्र में है सांत्वना यानी कंसोलेशन। इस रास्ते में आपको क्रांति नहीं मिलेगी बल्कि यह जीवित प्राणियों के सबसे सबसे गुण कोमलता की याद दिलाता है।
यहीं, इसी बिंदु से ‘Healing Fiction’ जन्म लेती है। इस श्रेणी में ऐसी कहानियाँ लिखी-रची जाती हैं जो पाठक को किसी भी स्तर पर ठीक करने का दावा नहीं करतीं, बस उसके साथ हो लेती हैं, उन्हें अपना बना लेती हैं और उनकी हो जाती हैं।
जापानी उपन्यास ‘Days at the Morisaki Bookshop’ की मुख्य पात्र प्रेम में टूट गए अपने दिल के साथ अपने चाचा की पुरानी किताबों की दुकान में आकर समय बिताने लगती है। उसके चाचा की वह दुकान टोक्यो के जिम्बोचो इलाके में है। यह इलाक़ा किताबों के लिए जाना जाता है। वहाँ किताबें केवल बिक्री की चीज भर नहीं, लोगों की यादों का प्रतीक हैं।
वहीं कोरियाई उपन्यास ‘Welcome to the Hyunam-dong Bookshop’ में दक्षिण कोरिया का ह्यूनाम-दोंग इलाका है, जहाँ एक महिला अपने करियर के शीर्ष पर होती है, लेकिन मानसिक और शारीरिक रूप से थका देने वाले उस कॉर्पोरेट जीवन को छोड़ने का फ़ैसला कर लेती है। और एक दिन वह चुपचाप इस्तीफ़ा दे देती है। कई सालों से जमा होती थकान को एक छोटे-से लिफ़ाफ़े में बंद करके वह दफ़्तर की मेज़ पर रख आती है। फिर शहर के एक शांत, लगभग अनदेखे-से इलाक़े में एक छोटी-सी दुकान खोल लेती है।
शुरुआत में वहाँ बस कुछ लकड़ी की अलमारियाँ हैं, जिन पर करीने से सजी किताबें हैं। एक कोने में कॉफ़ी मशीन, दो-तीन मेज़ें, कुछ कुर्सियाँ, और खिड़की से भीतर आती धूप की एक पतली-सी लकीर। पहले दिन दुकान में ग्राहक कम आते हैं। कभी कोई कॉलेज का छात्र झाँककर देखता है, कभी कोई पड़ोसी महिला भीतर आकर चुपचाप शेल्फ़ पलटती है।
धीरे-धीरे वही जगह लोगों के ठहरने की जगह बन जाती है। कोई वहाँ अपनी अधूरी पांडुलिपि लेकर बैठता है, कोई नौकरी छोड़ने का साहस जुटाता है, कोई बस चुपचाप कॉफ़ी पीते हुए दूसरों की बातचीत सुनता है। बातचीतें शिकायतों से शुरू होती हैं और अनुभवों पर आकर ठहर जाती हैं।
और देखते-देखते वह छोटी-सी किताबों की दुकान एक अनौपचारिक कम्युनिटी सेंटर में बदल जाती है। बिना किसी घोषणा, बिना किसी औपचारिक कार्यक्रम के। बस लोगों के आने और ठहरने और अपना मन हल्का कर लेने भर से।
पढ़ने पर लगता है कि इन उपन्यासों में किताब की दुकान बाज़ार का विस्तार नहीं है। वह एक मानसिक अवस्था है, ऐसा ठौर जहाँ आदमी को उसके टूटे, थके या उलझे रूप में भी स्वीकार कर लिया जाता है। ऐसा ही अनुभव ‘What You Are Looking for is in the Library’ को पढ़ने के बाद भी होता है। इसमें भी लाइब्रेरी स्टेट ऑफ माइंड ही है।
शायद यही कारण है कि इन देशों में किताब की दुकानों की संख्या घटने के बजाय कई जगहों पर नए रूपों में बढ़ी है, छोटे, स्वतंत्र, विषय-केंद्रित स्टोर के रूप में।
अगर हम साहित्यिक बारीकियों की बात करें तो जापानी कथा परंपरा की आत्मा उसमें मिलने वाला सूक्ष्म एकांत (minute solitude) होती है। यह जापानी संस्कृति का भी एक मुख्य अवयव है। इसलिए Days at the Morisaki Bookshop की भाषा बेहद मितव्ययी है। लेखक ने वाक्य छोटे और भावों को नियंत्रित रखा है। दुख को ज़ाहिर करने का माध्यम भी फुसफुसाहट ही है न कि वह चीख कर या चिल्ला कर व्यक्त किया जा रहा है। यह शैली दरअसल जापान की ‘मा’ (खाली जगह) की सौंदर्यपरंपरा से जुड़ती है। इस परंपरा में मौन का अपना एक स्वतंत्र और महत्वपूर्ण अर्थ होता है।
इसके उलट, कोरियाई उपन्यास Welcome to the Hyunam-dong Bookshop में आपको लंबे-लंबे संवाद मिलेंगे। इसके पात्र एक दूसरे के सामने अपनी दिल की बात सहजता से रखते-बांचते नज़र आते हैं। इस उपन्यास में दक्षिण कोरियाई समाज का वह पहलू खुलकर आता है जो कहता है कि दुख साझा है और इसका उपचार भी सामूहिक स्तर पर ही संभव है। यहाँ कोरियाई संस्कृति के केंद्र में गहरे बैठे हुए ‘हम’ (वूरी)’ का भाव अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में आता दिखाई पड़ता है।
अगर Days at the Morisaki Bookshop आत्मलाप है तो Welcome to the Hyunam-dong Bookshop एक संवाद। पहले की दुनिया भीतर सिमटती है, अपनी पीड़ा को भाषा देने से पहले उसे लंबे समय तक ढोती है। वहाँ शब्दों से ज़्यादा विराम बोलते हैं।अगर एक में मौन का अर्थ है, तो दूसरे में संवाद का साहस। दूसरे की कहानी अपने समय से आँखों में आँखें मिलाकर बात करती है, सवाल पूछती है और जवाब भी माँगती है।
जहाँ एक किताब भीतर की टूटफ़ूट की मरम्मत करती है, वहीं दूसरी, बाहर की दुनिया से अपना रिश्ता फिर से जोड़ती है।
जब मैंने What You Are Looking for Is in the Library का अनुवाद किया था, तब महसूस हुआ था कि जापानी वाक्य रचना में विनम्रता और धैर्य एक साथ चलते हैं। पात्र सीधे अपनी बात नहीं कहते, वे संकेत देते हैं। हिन्दी में उस संकेत को बचाए रखना एक चुनौती जैसा था, क्योंकि हमारी भाषा भावों को थोड़ा अधिक स्पष्ट करती है।
कोरियाई लेखन में भाव तुलनात्मक रूप से अधिक प्रत्यक्ष होते हैं। वहाँ आत्मस्वीकृति अधिक स्पष्ट रूप में आपको मिलती है। इसलिए कोरियाई साहित्य के हिन्दी अनुवाद में भावों का संतुलन अलग ढंग से साधना पड़ता है।
लेकिन दोनों ही भाषाओं में एक साझा तत्व है। घरेलू वस्तुओं का सूक्ष्म वर्णन (minute detailing)। चाय का कप, लकड़ी की अलमारी, पुरानी किताबों की गंध, स्वेटर के पैटर्न या फिर कमरे की अलमारी पर रखा कोई पुराना शोपीस। ये सब कथानक से अधिक उपन्यास का वातावरण रचते हैं।
अगर हम इन उपन्यासों के साहित्यिक प्रभाव की बात करें तो इनके केंद्र में कोई बड़ा घटनाक्रम नहीं मिलता। न कोई थ्रिल, न ही ट्रेजेडी या दुख-सुख का चरम रूप भी नहीं। न किसी तरह का कोई रहस्य न ही टर्निंग पॉइंट ही, फिर भी इन्हें पढ़ने वाले इससे जुड़ जाते हैं। आख़िर क्यों?
इसका सीधा कारण यह है कि ये किताबें हमें ‘देखे जाने’ और ‘सुने जाने’ दोनों का अनुभव करवाती हैं। शायद इसलिए ही ऐसे तमाम उपन्यासों के मुख्य पात्र असाधारण नहीं बल्कि साधारण लोग होते हैं।
दरअसल, आजकल के जीवन में हर इंसान लगातार किसी न किसी तरह के प्रेजेंटेशन के मोड में ही रहता है, सोशल मीडिया पर, ऑफिस में, परिवार में, दोस्तों के बीच, हर जगह। पर इन उपन्यासों में सभी पात्र अपने असफल रूप में हमारे सामने उपस्थित हैं, इसलिए पढ़ते हुए पाठक को अपने अधूरेपन की याद आती है जिसे वह कहीं न कहीं मन के किसी कोने में छुपाए रहता है।
शायद यही कारण है कि ‘Healing Fiction’ अंतरराष्ट्रीय बेस्टसेलर हो रही है। यह केवल जापान या दक्षिण कोरिया की कहानी नहीं रह गई, यह वैश्विक शहरी अकेलेपन की कहानी बन गई है।
संभव है कि कुछ सालों बाद प्रकाशन उद्योग कोई नया ट्रेंड खोज ले। लेकिन जिस सामाजिक-मनोवैज्ञानिक ज़मीन से यह साहित्य जन्मा है वह इतनी जल्दी बदलने वाली नहीं।
शायद आने वाले समय में हीलिंग फिक्शन और अधिक स्थानीय रूप ले ले। भारत में भी छोटे शहरों की किताबों की दुकानों, बुककैफ़े-लाइब्रेरी या कम्युनिटी रीडिंग सर्कल्स पर आधारित कथाएँ सामने आ सकती हैं क्योंकि यहाँ भी कॉस्मोपॉलिटन शहरों में अब बुक-कैफ़े, वीवर्क का कल्चर बढ़ रहा है।
अंततः सवाल किताबों की दुकानों के औचित्य का नहीं है। सवाल उन जगहों का है जहाँ मनुष्य अपने भीतर के शोर के साथ बैठ सके। शायद इसीलिए, डिजिटल दुनिया के बीच, किताब की दुकान अब भी एक धीमी और स्थिर रोशनी की तरह बची हुई है।
हाल ही में Days at the Morisaki Bookshop का हिन्दी अनुवाद ‘मोरीसाकी बुकशॉप के ख़ुशनुमा दिन’ शीर्षक से पाठकों के सामने आया है। इसका अनुवाद मदन सोनी ने किया है और यह मंजुल प्रकाशन आई है।
इसी तरह What You Are Looking for Is in the Library का हिन्दी ‘आप जो ढूँढ रहे हैं वह मिलेगा लाइब्रेरी में’ शीर्षक से पेंग्विन स्वदेश द्वारा प्रकाशित किया गया है। इस अनुवाद को करते हुए मैंने महसूस किया था कि जापानी कथाभाषा की वह शांत लय हिन्दी में लाना केवल भाषाई नहीं, भावात्मक चुनौती भी है।
और जहाँ तक Welcome to the Hyunam-dong Bookshop की बात है, तो उसका मूल कोरियाई शीर्षक 어서 오세요, 휴남동 서점입니다 है। अभी तक उसका हिन्दी अनुवाद सामने नहीं आया है, लेकिन जिस तरह इन किताबों को यहाँ पाठक मिल रहे हैं, लगता है वह दिन दूर नहीं जब इसका हिन्दी अनुवाद भी हमारे बीच होगा।
क्योंकि आख़िरकार, चाहे वह टोक्यो का जिम्बोचो हो, सऊल का ह्यूनाम-दोंग, या हमारे अपने शहरों की कोई छोटी-सी गली, किताब की दुकान वहाँ केवल किताबें नहीं बेचती, वह मनुष्यता का एक छोटा-सा आश्रय बचाए रखती है।

