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  • समीक्षा
  • दूर देश के परिंदे: उजड़ने और बसने के बीच की करुणा का कथानक

    अनामिका का उपन्यास ‘दूर देश के परिंदे’ जैसे आजादी के आसपास के भारत में चलने वाले विमर्शों की कथा है। एक से एक ऐतिहासिक पात्र इस उपन्यास में आवाजाही करते दिखाई देते हैं। राजकमल से प्रकाशित इस  उपन्यास पर यह टिप्पणी लिखी है काशी हिंदू विश्वविद्यालय के शोधार्थी महेश कुमार ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

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    बुद्ध के बारे में एक लोककथा है। बुद्ध रात में किसी गाँव से गुजर रहे थे। उन्होंने देखा कि वहाँ के लोग आपस में बहुत झगड़ते हैं और व्यसनों से ग्रस्त हैं। रात्रि विश्राम के लिए वहीं रुक गए। लोगों को उनके बारे में पता चला। लोग बुद्ध को गालियाँ देने लगे। बुद्ध ने आशीर्वाद देते हुए कहा ‘बसे रहो’। दूसरे दिन किसी और गाँव से गुजरते हुए देखा कि वहाँ के लोग बहुत मेहनती, शांत स्वभाव वाले और सबका सम्मान करने वाले हैं। रात्रि विश्राम के लिए जब रुके तो गाँव के लोग बेहद खुश होकर उनका उपदेश सुनने लगे। बुद्ध ने आशीर्वाद देते हुए कहा ‘उजड़ जाओ’। उनके शिष्यों को ये बात बड़ी अटपटी लगी। उनलोगों ने इसका कारण पूछा। बुद्ध ने कहा ‘अच्छे लोग जहाँ जाएँगे वहाँ शांति और मनुष्यता का वातावरण बनाएँगे’। ऐसे लोगों का उजड़ते रहना जरूरी है।

    यहाँ ‘उजड़ने’ का संदर्भ ऐसे विस्थापन से है जिसमें रचनात्मकता, वैचारिकता और मनुष्यता का विनिमय होता हो।

    इस उपन्यास का कथावस्तु भी यही है। जैसे, ‘दुनिया के मजदूरों एक हो का नारा है’, उसी अर्थ में दुनियाभर के कलाकार और साहित्यकार को एक होकर पश्चिम और पूरब के बीच की दूरियों को कम करने का प्रयास होना चाहिए। इस सुंदर ‘स्वप्न’ के ‘चाहने’ को ‘ऐतिहासिकता’ के माध्यम से लेखिका ने मूर्त रूप दिया है। भारत से टैगोर, गाँधी, निराला, गौहर जान, रानू मुखर्जी और पश्चिम से रोमा रोलां, मीराबेन इतिहास के कालखंड के ऐसे ऐतिहासिक पात्र हैं जिनके माध्यम से पूरब-पश्चिम के बीच रचनात्मक संवाद का लम्बा दौर चला। इसमें साहित्य, संगीत और राजनीति का त्रिकोणीय संवाद है। एक प्रकार से विश्वबंधुता की पेशकश। ‘आईनासाज़’ उपन्यास में भी लेखिका ने यही कोशिश की है। वहाँ अमीर खुसरो के बहाने से ‘मध्यकालीन’ भारत और यूरोप के पुनर्जागरण के बीच एक संवाद है। खुसरो कहते हैं

    “धीरे-धीरे सूफी दुनिया की सभी बोलियों में शायरी करते दिखाई देंगे। इतालवी, फ्रांसीसी, अंग्रेजी, स्पेनिश, फ़ारसी और हिंदवी आदि कुछ भाषाएँ तो खुद के नूर में नहा ही जाएंगी। फरिश्ते किताब की शक्ल में नमूदार होंगे। जहाज भर- भर के किताबें इधर से उधर जाएंगी।” यह उपन्यास ‘आईनासाज’ का अगला संस्करण कह सकते हैं। खुसरो के समय ‘आधुनिकता’ शैशवावस्था में था। ‘दूर देश के परिंदे’ के पात्रों के समय आधुनिकता युवावस्था में था। उसकी सीमाएँ भी गाँधी जैसे लोग पहचानने लगे थे। दोनों उपन्यास लिखने का ढंग भी एक जैसा है। यह ‘एक जैसा’ लगने वाला दो उपन्यास खास बनता है अपनी ‘दृष्टि’ और पात्रों के पुनर्पाठ (विशेष कर स्त्री पात्रों का) के लिए बरतने वाली भाषा के कारण।

    उपन्यास पढ़ते हुए बार-बार इतिहास लेखन और उपन्यास लेखन के एक तत्व की ओर ध्यान जाता है ‘कल्पना’। इतिहास और उपन्यास दोनों में ‘कल्पना’ का प्रयोग होता है। इस उपन्यास के संदर्भ में यह कहना जरूरी है क्योंकि कई सारे विवरण हूबहू इतिहास की किताबों और आर्काइवल सामग्री से मिलती है। ऐसे में यह लग सकता है कि इसमें ‘औपन्यासिकता’ कहाँ है? इसका जवाब है ‘हिस्टॉरिकल इमेजिनेशन’ और ‘लिटरेरी इमेजिनेशन’ का फर्क। लेखिका की खासियत यह है कि उन्होंने उपन्यास में दोनों का प्रयोग किया है। कॉलिंगवुड ने ‘हिस्टॉरिकल इमेजिनेशन’ के बारे में बताते हुए इतिहास लेखन और उपन्यास में ‘कल्पना’ के प्रयोग में फर्क बताया है। वह कहते हैं इतिहासकार जब कल्पना करता है तब स्थान और समय में ‘लोकलाइज’ होता है। वह सबूतों और घटनाओं को आधार बनाकर खुद को उस स्थिति में रखकर सोचता है (Re-enactment)। इसके बाद वह अलग-अलग विवरणों को एक क्रम में व्यवस्थित करके उसके ‘गैप’ को समझने की कोशिश करता है (interpolating)। जैसे: खास तारीख को एक राजा यहाँ था और दो दिन बाद कहीं और था। ऐसे में इतिहासकार को ‘वाहन के साधन’ के बारे में जो गैप है उसको कल्पना से (जो सबूतों के आधार पर होगा) भरना होगा। उसके बाद वह कई सारे सबूतों के विश्लेषण और छानबीन (इंटेरोगेशन) से उसको भरेगा।

    इसी गैप को जब उपन्यासकार ‘फैंटेसी’ से भर देता है या सबूतों में छूट ले लेता है तो वह इतिहास न होकर उपन्यास हो जाता है। जैसे- इतिहास का एक तथ्य है कि अज्ञेय ने लेख लिखा था ‘निराला इज डेड’। बाद में अज्ञेय को इसका अफसोस भी हुआ जो ‘वसंत के अग्रदूत’ के रूप में आया। इन दो लेखों के बीच जो गैप है उससे अनामिका जी ने तत्कालीन हिन्दी साहित्य के परिवेश को ‘क्रमबद्धता’ और ‘साहित्यिक कल्पना’ से भर दिया है। दूसरा प्रसंग गौहर जान और अकबर इलाहाबादी का। अकबर इलाहाबादी ने गौहर जान को यह कहकर अपमानित किया कि उनका कोई ‘शौहर’ नहीं है। इसे शायरी के नाम पर किया गया। यह तथ्य विक्रम संपत की किताब ‘माय नेम इज गौहर जान’ में भी है। उसके बाद गौहर कहती हैं, “मत पूछो कि कैसी दुनिया देखी मैंने। घरेलू औरतें रहती भी हैं तो एक भेड़िए के साथ घर में रहती हैं, हम जैसी तो हर तरफ भेड़ियों से ही घिरी पाती हैं खुद को! कहने को इतने आशिक, हर जगह सजदे में झुके, पर सब बातों के शेर ही थे सच्चा प्रेमी कोई नहीं।” यह साहित्यिक कल्पना है जिससे उपन्यास में किस्सागोई और विमर्श आकार लेता रहता है। यह पूरा उपन्यास इन्हीं दो शब्दावलियों से बना है। ऐसा लगता है कि लेखिका उस समय के साहित्यिक-सांस्कृतिक परिवेश का इतिहास लिखना चाहती हैं। यहाँ ‘परिवेश’ का अर्थ तत्कालीन रचनात्मकता और उससे उपजी कुछ छवियों से है।

    उपन्यास में स्त्री-पुरुषों के तीन युग्म बनते हैं गाँधी-मीराबेन, गौहरजान-अमृत केशव और टैगोर-रानू। तीनों स्त्रियाँ विदुषी थीं और कला पारखी। तीनों ने कई बड़े त्याग किए और राष्ट्रनिर्माण में झोंक दिया। लेकिन, तत्कालीन परिवेश ने उन्हें ‘प्रेम संबंधों’ और अफवाहों तक सीमित करके खास छवि में कैद (बदनाम) कर दिया। इस उपन्यास में इन स्त्रियों की रचनात्मक ऊँचाई को प्रस्तुत करके रूढ़ हो गयी छवियों से मुक्त करने का प्रयास है। स्त्री-पुरुष के नजदीकियों को सख्य भाव से देखा जाना चाहिए। यह विचार इस उपन्यास का एक प्रमुख उद्देश्य है। यह उपन्यास स्त्रियों के संवाद और विचार के बहाने ‘आधुनिक’ हो रहे भारतीय परिवेश के भीतर पुरुषवादी घेराबंदी में स्त्रियों के लिए ‘अपना परिवेश’ बनाने और गढ़ने की कहानी कहता है। तत्कालीन भारत की साहित्यिक और राजनीतिक हलचलों की सभी जानकारियाँ इन्हीं स्त्रियों के माध्यम से उपन्यास में आता है। उस समय के हिसाब से ‘वॉइसलेस’ कहा जाना वाला समूह इस उपन्यास की वाचिकाएँ (वॉइस) हैं। मीराबेन जब आती हैं तब उनके साथ बा, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, सरोजिनी नायडू, प्रभावती, राजकुमारी अमृत कौर के साथ ग्रामीण स्त्रियों की दुनिया उपस्थित होती है। गाँधी के ब्रह्मचर्य प्रयोग से जब सब सशंकित थे तब मीरा और बा के बीच कोई दुराव नहीं था। दोनों के आपसी संवाद से स्त्रियों के गृहस्थी, व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन की चिंताओं का जो विवरण है उसका समाधान पुरुषों के पास नहीं है। ये उनका आपसी बहनापा है कि वे व्यक्तिगत और सार्वजनिक के बीच संतुलन बनाते हुए अपने सहयोगी पुरुषों को ‘महापुरुष’ बनाते हैं और अपने लिए कोई राजनीतिक पहचान की माँग तक नहीं करती हैं। तत्कालीन पुरुषों में यह बात नहीं देखने को मिलती है। गाँधी और नेहरू के बीच में जब सुभाष चंद्र बोस के संबंध में संवाद होता है तब सुभाष की काबिलियत और गाँधी का उनके प्रति झुकाव से नेहरू असुरक्षित महसूस करते हैं। मीराबेन एक स्त्री हुई जिसने गाँधी द्वारा प्रस्तावित किए गए हरेक काम को ‘राष्ट्र’ का काम मानकर किया। अपनी समूची विदेशी पहचान और शौक को त्यागकर अपने सभी कौशल (संगीत, भाषा और संवाद कला) को भारत भूमि के लिए उत्सर्ग किया। बदले में कोई राजनीतिक लाभ की इच्छा नहीं रखी। गाँधी के मृत्यु के बाद भी गुमनामी में प्रकृति और पशुसेवा में लीन रहीं। अनामिका ने गाँधी-मीराबेन दृश्यबंधों के बहाने उन अफवाहों का प्रतिकार प्रस्तुत करती हैं जिनमें सख्य भाव की जगह कोई और संबोधन दिया गया हो।

    गौहर जान का व्यक्तित्व में तीन तत्व ऐसा है जो उन्हें संवेदनशील कलाकार और संवादधर्मी बनाता है। स्वाभिमान, गलतियों से सीख और विरोधियों के साथ संवाद। गाँधी जी ने जब चंदा के लिए शौकत अली को भेजा तो उन्होंने आधी रकम दी। गाँधी ने वादा किया था कि वो स्वयं आएँगे। वे नहीं आए। उनके कलाकार मन को धक्का लगा। उनको महसूस हुआ कि गाँधी अपनी ‘छवि’ (image consiousness) के प्रति अत्यधिक सतर्कता के कारण एक ‘बाई’ के कार्यक्रम में आना न चुन सके। यहाँ उसकी कला पर समाज में ‘अच्छी न समझे जाने वाली स्त्री’ की ‘छवि’ ज्यादा भारी पड़ गया। जबकि यह ‘नामकरण’ भी पुरूष समाज की देन है। गौहर जान ने इसका जवाब अपनी पूरी ठसक से एक कलाकार के तौर पर दिया। स्वाभिमानी व्यक्ति और वह भी उच्च दर्जे की कलाकार की खासियत होती है ‘अपनी गलतियों से सीखना’। जब दतिया महाराज से गौहर जान ने अनर्गल माँग की जिसे महाराज ने मान लिया। बदले में गौहर जान को गाने का मौका नहीं दिया। एक कलाकार को जब अपनी कला प्रदर्शन का मौका न मिले तो यह बड़ा अपमान है। उन्होंने अपनी गलती के लिए क्षमा माँगी। यह आगामी कलाकारों के लिए एक मिशाल था कि कलाकारों को विनम्र होना चाहिए। गौहर जान जिस कालखंड में थीं वह समय स्वतंत्रता आंदोलन का था। देशी रियासतों का पतन का भी दौर था। ऐसे में कलाओं का संरक्षण और कलाकारों के लिए आश्रय दोनों का संकट था। गौहर जान को एक तरफ जीविका की मुश्किलें सुलझानी थीं और दूसरी तरफ देश के प्रति कर्तव्य खींचता था। उन्होंने ‘बहिष्कार’ और ‘संवाद’ में संवाद चुना। कलाकार को एक साथ प्रतिरोध और संवाद दोनों के लिए तत्पर रहना चाहिए। इस सिद्धांत के साथ उनको जहाँ बुलाया गया गईं। अँग्रेजों के लिए भी प्रस्तुति दी। उससे अर्जित धन का जीविका और देशहित दोनों के लिए उपयोग किया। यह उनका ‘सर्वाइवल तकनीक’ भी था और अपनी कला का प्रचार-प्रसार भी।

    टैगोर और रानू मुखर्जी का जीवन कला की समझ, रचनात्मकता की उम्र और दैहिक उम्र के फासले और सामाजिक नैतिकता की सीमा के बहस को केन्द्र में लाता है। रानू कम उम्र से ही टैगोर की पाठक थीं। उनकी साहित्यिक समझ उनकी दैहिक उम्र से की तुलना में ज्यादा परिपक्व हो गई। इसमें निश्चित रूप से टैगोर के स्त्री पात्रों की बड़ी भूमिका रही होगी। उनकी कहानियों के स्त्री पात्र प्रेम, विद्रोह और समाज सुधार के लिए व्याकुल पात्र हैं। तब ‘समाज की नैतिकता’ यह कहती थी कि अकेले में कहानी और विशेषकर उपन्यास पढ़ने वाली स्त्रियाँ बिगड़ जाती हैं। जैसा कि आशुतोष भारद्वाज अपने लेख ‘उपन्यास के भारत की स्त्री’ में लिखते हैं कि “उपन्यास पढ़ती स्त्री की छवि उसके परिवार को बेचैन करने के लिए काफ़ी थी”। यह आश्चर्यजनक बात है कि एक तरफ गद्य में स्त्री पात्रों की भरमार थी और दूसरी तरफ समाज स्त्रियों को यह सब पढ़ता देख ‘बिगड़’ जाना मान रहा था। रानू बिगड़ी हुई किशोरी थी। समय से पहले उसकी रचनात्मक उम्र टैगोर के नजदीक ले जाती है जिसे ‘म्यूज’ कहा जाने लगा। समाज रानू के कलात्मक भूख को न समझ सका और दो रचनात्मक लोगों के संबंध को अपनी सीमित नैतिकता के कारण ‘प्रेम संबंध’ से जोड़ने लगा। ऐसा इसलिए हुआ कि रानू एक ‘स्त्री’ थी। एक तरफ बंगाल में स्त्रियों के लिए समाज सुधार के आंदोलन चल रहे थे दूसरी तरफ स्वतंत्रत चेतना वाली स्त्रियाँ लाँछन झेल रही थीं। यह ‘नवजागरण’ का अंतर्विरोध ही कहा जाएगा। अनामिका जी  यह प्रसंग उपन्यास में इसलिए भी रखी हैं ताकी यह इंगित किया जा सके कि उस समय की मेधावी स्त्रियों ने अपनी कला और समाज सेवा के लिए समाज का विस्थापन झेला।

    दैहिक उम्र के फासले के कारण इन स्त्रियों ने जो कुबोल सहे सिर्फ इसलिए कि वे स्त्रियाँ थीं और अपने से बड़े पुरुषों से रचनात्मक कार्यों के लिए जुड़ी हुई थीं। फिर भी अपनी ‘करुणा’ से इन स्त्रियों ने तत्कालीन भारतीय समाज को अपना सर्वश्रेष्ठ दिया।

    इस उपन्यास के केंद्र में है ‘ज्यां क्रिस्तोफ’। उनके जरिए ही साहित्य और राजनीति के सारे पात्र पाठक से रूबरू होते हैं। शांतिनिकेतन से कहानी शुरू होती है। हिंदी की तत्कालीन उठापटक से परिचित होते हैं। हिंदी साहित्य के संस्थानों के निर्माण (कला भवन) के साथ आलोचना के नाम पर होने वाले छीछालेदर से भी परिचित होते हैं। हिंदी में नई बहसों और सिद्धांतों के जरिए बनने वाले साहित्यिक समूहों को जानते हैं। मजेदार बात है कि इन बहसों के अतिवाद में कहीं भी स्त्रियाँ नहीं हैं। सारे निर्णय लेने-देने वाले पुरूष हैं। बहरहाल, क्रिस्तोफ एक विदेशी हैं , एक विस्थापित हैं।  उपन्यास लिखने की जिम्मेदारी देते हैं विद्योत्तमा मुखर्जी (स्त्रियाँ तो स्थायी विस्थापित होती हैं)। इस तरह उपन्यास के भीतर उपन्यास लिखे जाने की पूरी परिघटना विस्थापित द्वारा, विस्थापितों के लिए, विस्थापितों का हो जाता है। सभी विस्थापित पात्र बेहद रचनात्मक हैं जो मिलकर भौगोलिक सीमाओं से परे जाकर ‘करुणा की दुनिया’ रचना चाहते हैं। ‘करुणा की दुनिया’ के लिए जो इच्छाशक्ति चाहिए वह राजनीति से आएगी। राजनीति को जो नैतिकता और संवेदनशीलता चाहिए वह साहित्य ही दे सकेगा। इन दोनों के बीच का परस्पर संवाद से ही करुणामय दुनिया का निर्माण हो सकेगा। क्रिस्तोफ ने इसलिए एक तरफ टैगोर, हजारी प्रसाद द्विवेदी, निराला, रोमा रोलां, रामविलास शर्मा को समझने की कोशिश करते हैं दूसरी तरफ गाँधी, नेहरू, अम्बेडकर, बोस आदि पर नजर बनाए रखते हैं। साहित्य और राजनीति का निरंतर संवाद की अहमियत उनके लिए बनी रहती है। जिस दुनिया का सपना क्रिस्तोफ देखते हैं उसकी यात्रा लम्बी है। इतनी लंबी कि उस पर एक उपन्यास लिखने में दो पीढ़ी खत्म हो जाती है। विद्योत्तमा को उपन्यास की सामग्री साड़ी की कथरी सिलकर बचानी पड़ती है। स्त्रियों के पास रचनात्मक कार्यों के लिए अपने एकांत की इतनी कमी है कि एक उपन्यास को पूरा करने के लिए माँ-बेटी दोनों को लगना पड़ता है। ‘करुणा की दुनिया’ की वैचारिक समझ प्रस्तुत करने के लिए दो पीढ़ी खप जाती है और तीसरी पीढ़ी उसे प्रचार करने की स्थिति में आ पाती है। ऐसे में विचार को राजनीतिक हकीकत बनाने में कई पीढ़ियों का श्रम लगेगा।

    ऐसे में ‘दूर देश के परिंदों’ की कई पीढ़ियों की झुंड की जरूरत है।

    डायरी,कविता, चिट्ठियाँ और कई सारे पात्र अनामिका जी के उपन्यासों में रूढ़ हो गए हैं। उनका कवि रूप छूटता नहीं है। लेकिन, कविता की लंबी-लंबी पँक्तियाँ और उसके संदर्भ कई बार बस आकार बढ़ाने के लिए हैं जिससे कथानक का प्रवाह भी बाधित होती है। चिट्ठियाँ जरूर भाव और विचार के संतुलन के साथ लिखी गई है। इस उपन्यास को पढ़कर चिट्ठी लिखने की कला खासकर संबोधन की कला सीखी जा सकती है। गौहर जान का वसुंधरा को लिखी चिट्ठी भावनात्मक और वैचारिक ऊँचाई का बेजोड़ मिश्रण है।

    संदर्भ:-

    1.Historical Imagination,http://www.quasar.ualberta.ca/css

    1. गाँधी-मीराबेन प्रसंग के लिए MKGandhi.org
    2. गौहरजान के लिए विक्रम संपत की किताब ‘माई नेम इज गौहर जान’ पढ़ें।
    3. टैगोर-रानू के लिए सुनील गंगोपाध्याय का उपन्यास ‘रानू और भानू’
    4. आशुतोष भारद्वाज का लेख ‘पितृवध’ किताब से, राजकमल प्रकाशन

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