हाल ही में अशोक कुमार का काव्य संग्रह ‘रिक्तियों में पहाड़’ प्रकाशित हुआ है। इस किताब से हमारा त’आरूफ़ करा रहे हैं जावेद आलम ख़ान। यह देखना सुखद है कि एक लेखक अपने समकालीन अन्य लेखक को किस तरह पढ़ रहा है, उसकी बात कर रहा है। प्रस्तुत है पहाड़ का काव्यात्मक आख्यान- अनुरंजनी
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रिक्तियों में पहाड़ – पहाड़ का काव्यात्मक आख्यान
जिनसे पहाड़ और घरबार छूट गया उनका खालीपन सिर्फ वही जानते हैं लेकिन उन रिक्तियों से सबको रूबरू कराने के लिए कहने का सलीका कुछ ही लोगों में होता है।अशोक कुमार ऐसे ही गिने चुने कवियों में हैं जो अपने अभावों में, रिक्तियों से बने निर्वातों में पहाड़ को समाने की भरसक कोशिश कर रहे हैं।उनके व्यक्तित्व में चंबा इस तरह बसा हुआ है कि उनकी लगभग हर कविता के किसी बिम्ब,किसी प्रतीक,किसी मुहावरे में उसकी झलक मिल ही जाती है।रिक्तियों में पहाड़ शीर्षक में ही पहाड़ के प्रति उनकी फिक्र और संवेदना झलकती है।
अशोक के यहां पहाड़ उस तरह नहीं है जिस तरह सैलानी कवियों की कविताओं में होता है।यहां पहाड़ प्रगतिवादी कवियों के ग्राम चित्रण की तरह है जिसमें झोपड़ियां है,फटकियां है,धूल और धुएं से घुटते लोग हैं और ग्रामीणों का शोषण करते सूदखोर हैं।इनकी कविताओं में पहाड़ अपने मुकम्मल यथार्थवादी स्वरूप में सामने आता है जहां रोजमर्रा का जीवन सरल लेकिन कष्टों से भरा हुआ है।बाहर के लोगों को जो बर्फ खूबसूरत लगती है,पहाड़ के लोगों को वह डराती है।
यह कविताएं पहाड़ के आदमी की नजर से महानगर की रिक्तियों को भी खंगालती हैं।संबंधों का स्खलन, अनाम भय, कुंठा, अकेलापन, संत्रास के साथ-साथ जातिवाद और सांप्रदायिकता के खालिस अभिजात्य और पूंजीवादी चेहरों पर नागरी राष्ट्रवाद के नकाब पहने लोगों की पड़ताल की गई है।
इस किताब को मोटे तौर पर लेखक ने चार खंडों में बांटा है – 1 मैं भीतर से डरा हुआ वह व्यक्ति हूं जो विद्रोह किए बगैर क्रांति चाहता है; 2 मैं लौटना चाहता हूं घिसे हुए साइनबोर्डों पर कोई पुराना पता तलाशते हुए; 3 रोज एक नया निर्वात पनपेगा भीतर तुम रोज उस खालीपन को अपनी उपस्थिति से भर देना; 4 हमने आभूषणों सा पहना है पहाड़ों का धैर्य।
ये सभी शीर्षक उनकी किसी कविता की कोई पंक्ति है।ध्यान से पढ़ने पर पता चलता है कि यह चार खंड उनकी जीवन यात्रा के भी चार पड़ाव हैं और उनके व्यक्तित्व में बन गईं चार परतें भी जिसने दिल्ली में रह रहे चंबाई युवक की संवेदना को कविता का रूप गढ़ने में मदद की है।हर खंड में अलग अलग फ्लेवर की कविताएं हैं।
मोटे तौर पर पहले खंड में प्रतिरोध संबंधी कविताएं हैं।शुरूआती तीन कविताएं शोषण, अन्याय,अत्याचार के बरक्स समाज की कायराना चुप्पी के प्रति विक्षोभ की कविताएं हैं।यहां कवि के भीतर उपस्थित डर दरअसल समाज में पसरा हुआ डर है।कवि व्यक्तित्व की भीतरी परतों में छिपे इस आडंबर को उघाड़कर रख देता है।यह कविताएं आईना दिखाने वाली कविताएं हैं।इसमें भी फासीवाद के बढ़ते प्रभावों की मुखालफत, आम आदमी का डर, कुछ न कर पाने की छटपटाहट और अपने तरीके से आंदोलन की पुकार की गई है।इस खंड की आंदोलन और डरा हुआ व्यक्ति उनकी प्रतिनिधि कविताएं हैं।आंदोलन कविता अपने कथ्य,व्यंजना,शिल्प और लघु आकार में मारक कविता है।डरा हुआ व्यक्ति कुंठा ,अपमान, अवज्ञा के धुंधुआते कड़वे तम में स्वयं की विसर्जना की कामना लिए अज्ञेय के लघु मानव की पुनर्व्याख्या है।इस खंड की कविताओं में समकालीन परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में मानवीय व्यवहार एवं कार्य व्यापार को गहन यथार्थबोध से देखा गया है। कविताओं में तीखे व्यंग्य हैं,गहरे सवाल हैं,मरती संवेदनाएं हैं,छीजते रिश्ते हैं और इन सबके साथ मानवता बचाने की फिक्र।खास बात है कि कवि अपनी वैचारिकी को आसानी से पाठक को समझाने में सफल हुआ है।सरल भाषा में चुभते हुए सवाल महानगरीय पीढ़ी को सोचने पर मजबूर करते है।
दूसरे खंड में उनके अपने पहाड़ी शहर चंबा की स्मृतियां हैं।इसमें मिंजर मेला है,चौगान का मैदान है,राजभवन में बना चंबा का कॉलेज है,प्राइमरी स्कूल में कवि का बचपन है,निश्छल स्त्रियां हैं, मां की ममता है और है एक लंबी प्रतीक्षा।’वो एक शहर’ में कवि का अपने मातृ ग्राम के पड़ोसी शहर का चित्रण है जहां कवि ने घर से निकलकर दुनियादारी को समझना शुरू किया।जिस तरह यहां जीवन धीमी चाल में चलता है उसी धीमी रफ्तार से यह शहर लोकतंत्र को अख्तियार कर रहा था।सामंतवादी प्रतीक किस तरह लोक कल्याण के प्रतीकों में बदल गए,यह पंक्तियां उसकी बानगी हैं –
“किंतु अच्छी बात यह थी
कि राजसी खंडहर अब उच्च शिक्षा का केंद्र था।”
इसके झरोखों से झांककर जंगलों की खूबसूरती निहारना दरअसल प्रकृति और विज्ञान का समन्वय है,जनचेतना और लोकाधिकार का स्वीकार है।
अपने गांव से पैदल इस शहर में पढ़ने आए विद्यार्थी के लिए जंगल से शहर की दूरी सभ्यता भर की दूरी है।अशोक इसे अपनी नजर से देखते हैं –
“सारे अवरोधों के बावजूद /इस शहर ने इतना चेतस तो किया ही/कि हमने दीवारों पर नाम नहीं,नारे लिखे।”
सर्दियों के बहाने कवि अपने गांव के कार्य व्यापार को याद करता है।यह कविता हिमाचल की ग्राम संस्कृति को बेहद सलीके से सामने रखती है।यहां प्राकृतिक सौंदर्य है साथ ही कुछ दुश्वारियां भी हैं; इसके बावजूद गांव अपनी सीमाओं के साथ खुश है और कहता है वहां से बहुत दूर है दिल्ली।कवि सर्दियों को इसलिए पसंद करता है कि उसकी मां सर्दियों में ही उसके पास आ जाती हैं।
खूबसूरत औरतें कविता समस्त पहाड़ी स्त्रियों की चेतना का प्रतिबिंब है।कवि उनका चित्रण करने में सफल हुआ है।उनके मनोविज्ञान,अभावों में खुश रहने वाला व्यक्तित्व,उनकी अनकही पीड़ा, प्रेम, उदासी उनके श्रमबिंदुओं में टपकता हुआ प्रतीत होता है।संवेदनशील कवि की व्यक्ति चेतना समष्टि चेतना में बदल रही है इसीलिए इन औरतों का चेहरा उसे अपनी मां के चेहरे जैसा लगने लगा है।इस खंड में ‘इस बार’ शीर्षक कविता भी बहुत मजबूत है। मां के द्वारा स्वेटर को संदूक से निकालकर धूप में डालना और वापिस रख देने का बिंब अपने आप में एक पूरी कहानी है।जिन बुजुर्गों के बच्चे उनसे दूर हैं उनकी पीड़ा के लिए इससे बढ़कर बिंब क्या होगा ?
महानगरीय अजनबीपन उसे बार बार अपने गांव की पगडंडियों पर ले जाता है।सहजता से कहीं उनकी व्यंग्योक्ति कमाल की होती है –
“गांव का हरिया /सड़क पर घास उगाना चाहता है/हरी हरी घास/उसके भेड़ों के हिस्से की वह नरम घास/जिसे इंसानों ने चरा है।कवि के लिए विस्मृति भी सुख है क्योंकि यह विस्मृति उसे सुखद स्मृतियों से मिली है।”
कहानी कविता में विधवा स्त्री का यह कथन कितना मारक है कि विधवा स्त्री को समाज के सभ्य पुरुष सांझी संपत्ति समझने लगते हैं।फेमिनिज्म को लेकर कवि की दृष्टि एकदम साफ है यह उनकी कई कविताओं को पढ़कर स्पष्ट होता है।
तीसरे खंड में प्रेम और दाम्पत्य की कविताएं हैं।वर्जना कविता में कवि अपनी प्रेयसी को लेकर आदिम सभ्यता में लौटना चाहता है जहां प्रेम को लेकर कोई वर्जना न हो यहां तक कि ईश्वर गढ़े जाने के क्रम में हो।यहां फैंटेसी के साथ स्वच्छंद मानवता और धार्मिक वर्जनाओं पर मारक सवाल भी है।कवि मानता है कि प्रेम भरे सहज संवाद से नई भाषाएं जन्म लेंगी।
इस खंड की कविताओं में प्रकृति चित्रण भरपूर है।यहां पहाड़ अपने रमणीय रूप में प्रेम को उद्दीप्त करता हुआ प्रतीत होता है।गंगटोक में डलहौजी को देखना और प्रिय को याद करना,प्रेमिका के सौंदर्य में अपनी पुरखिनियों को याद करना,लोकधुनों की मीठी तान पर विरह के सर्द गीत से उपजी खालीपन की प्रिया की उपस्थिति से भरने की कामना हो।सभी कविताओं में प्रेम और प्रकृति गलबहियां करते दृष्टिगत होते हैं।अनुपस्थिति कविता में स्वयं को रेगिस्तान में खड़ा पाता है और प्रेमिका से आग्रह करता है कि वह हवा या बादल का टुकड़ा,पानी की लहर बनकर आ जाए।कवि स्मृतियों में जीता है।जब वह प्रिया के साथ होता तब प्रकृति को याद करता है और प्रकृति के साथ होने पर प्रिया को।प्रेम कहीं उसका साथ नहीं छोड़ता दरअसल प्रेम उसके लिए आखिरी उम्मीद की तरह है। अपनी एक कविता ‘एनी फ्रैंक की डायरी पढ़ते हुए’ में पीटर द्वारा एनी के गालों के गड्ढों की प्रशंसा के प्रसंग में कवि लिखता है –
“मैं विभीषिका को पढ़ते हुए कुछ देर
इस प्रेम के प्रसंग पर ठहर जाना चाहता हूं
कवि बारिश,फूल,जंगल,रंग और पत्थरों को बचाना चाहता है क्योंकि प्रेम के लिए उम्मीद,उम्र और जमीन बहुत कम बची है।”
‘द्वंद्व’ कविता में पूजा में आंख बंद किए लीन पत्नी को देखकर कवि के अनीश्वरवादी मन में द्वंद्व चल रहा है।वह यकीन दिलाना चाहता है कि यह वैचारिक द्वंद्व मेरे और तुम्हारे बीच बिल्कुल नहीं है।
अंतिम खंड में गद्दी जनजाति जो कवि की अपनी पहचान है पर सुंदर कविताएं हैं।शिवजी के साथ मणिमहेश से आगमन, इनके बिना छत और मूर्तियों वाले देवता, भाषा और लोकगाथाएं, खानाबदोश जीवन, मवेशी, भोजन, यात्राएं, चरवाही प्रेम कहानियां, संस्कार, अंधविश्वास, बसोआ का पर्व, वेशभूषा, पोशाक, साटा गाटा का रिवाज जिनमें बिना बहनों वाले ताउम्र कुंवारे रहे पुरुष का मरने के बाद देवता मान लिया जाना और वैवाहिक अवसर पर पहला दूध, घी, अनाज उन्हीं को चढ़ाया जाना।इन कविताओं में गद्दी जनजाति का लगभग एक संक्षिप्त इतिहास अशोक कविताओं में रच आए हैं।ऐसी विषय वस्तु को कविता में ढालना निश्चित ही उनके जैसा कवि ही कर सकता है।गद्दी जनजाति से साहित्य में व्यापक परिचय अशोक के लिए महती उपलब्धि है।इस खंड में गद्दी औरतों पर कुछ बेहतरीन कविताएं हैं। भेड़ और ऊन उनकी जीवनचर्या का अंग है और जिंदा रहने के लिए कितना उपयोगी था यह इन कविताओं को पढ़ते हुए समझ आता है।उनके घर सपनो के नहीं,जरूरतों के घर थे।
इन कविताओं को भाषा के नजरिए से भी देखा जाना जरूरी है।आम तौर पर अशोक की सभी कविताएं सहज और सरल भाषा में बात करती हैं।भाषा में कहीं बनावट नजर नहीं आती।शब्दों का अजायबघर उनके पास नहीं है।रोजमर्रा की बोलचाल की शब्दावली में संप्रेषित भाषा है जो आम से लेकर खास हर पाठक को सहज ही आकर्षित करती है।अशोक ने इस भाषा में अपनी बोली बानी के शब्दों को भी बड़ी खूबसूरती से पिरो दिया है।अंतिम खंड में गद्दी जनजाति की जीवनचर्या से जुड़ी शब्दावली का प्रयोग कविताओं को प्रभावी बनाता है।एंचालियां, नाटियां, पट्टू, दोडू, जामें, लुआचड़ियां, लूढें, रोट, घासनियां, साटा गाटा,घर जमातरी, पूहल, खिन्द, लुच्चियां, दराट,पेडू, जलावन, नगाल, भत्तोरे, किरड़, डल्ल, खारू, टोबकियां, घुरेइयां, जैसे देशज शब्दों ने उनकी भाषा को समृद्ध किया है।पृष्ठ के नीचे इन शब्दों के अर्थ भी कवि ने दिए हैं।
लेखक ने डरने की वजहें गिनाते हुए एकाधिक कविताएं लिखी हैं।मैं डरता हूं, सोचते सोचते जैसी कुछ कविताओं में इनके कथ्य और शिल्प में दोहराव दिखता है।इन सभी कविताओं पर डरे हुए आदमी का असर है।बेहतर होता लेखक इस शीर्षक से लिखी कविताएं एक ही कविता के अलग अलग खंडों में करता या एक लंबी कविता लिखता।
कुल मिलाकर यह आम भाषा शिल्प में आम आदमी की कविताएं हैं जिनके सियाह शब्दों पर उसका मन अपना प्रतिबिंब देखता है और हृदय स्पंदन।चंबा की लोक संस्कृति और गद्दी जनजाति के काव्यात्मक आख्यान के लिए भी इस संग्रह को याद किया जाना चाहिए।
परिचय–
जावेद आलम ख़ान
प्रकाशित पुस्तकें – स्याह वक्त की इबारतें, सलीब पर नागरिकता
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