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  • ज़ालिम को जो न रोके वो शामिल है ज़ुल्म में

    एक और द्रोणाचार्य’ (1977) शंकर शेष के इस नाटक की अंजलि नैलवाल ने बेहतरीन समीक्षा लिखी है। वे कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैनीताल से अंग्रेज़ी से स्नातकोत्तर करने के उपरांत इग्नू से हिन्दी में स्नातकोत्तर कर रही हैं। प्रस्तुत है यह समीक्षा- अनुरंजनी

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    ज़ालिम को जो न रोके वो शामिल है ज़ुल्म में

    डॉ‌. शंकर शेष एक बहुआयामी कलाकार थे। उन्होंने न केवल कविता व कहानियाँ लिखीं, बल्कि रंगमंच (नाटक), रेडियो-नाटक, और फिल्मों के लिए कहानियाँ भी रचीं। लेकिन उनका महत्वपूर्ण योगदान आधुनिक हिन्दी नाट्य साहित्य में है। हालाँकि वे एक समय में बैंक-अधिकारी थे (मुंबई में हिन्दी अधिकारी), लेकिन रंगमंच से उनका लगाव बना रहा और उन्होंने अपनी सारी व्यस्तताओं के बीच नाटक लेखन नहीं छोड़ा। वे अपनी साठोत्तरी (1960–70) पीढ़ी के प्रमुख तथा प्रयोगशील नाटककार माने जाते हैं। उनकी कलम से लगभग 22 मूल हिंदी नाटक निकले।  एक दो रचनाओं को छोड़कर, अधिकांश नाटकों का मंचन हुआ। साथ ही, उन्होंने मराठी से हिन्दी में अनुवाद भी किए, जिससे उनकी द्विभाषीय साहित्यिक समझ झलकती है। नाटक लेखन के साथ-साथ, उन्होंने फिल्मों के लिए कहानियाँ भी दी — जैसे कि उनके लेखन पर आधारित फिल्म ‘घरौंदा (1977)’ — जो उन्हें और व्यापक दर्शकों तक ले गई। शंकर शेष के नाटकों की खासियत यह थी कि उन्होंने समाज की जटिलता, मानवीय पीड़ा, आधुनिकता-परंपरा संघर्ष, सत्ता-दमन, जातिप्रथा, शोषण, अशांति आदि को गहराई से उठाया। उनका लेखन सतही नहीं, बल्कि मनो-विश्लेषणात्मक, प्रश्नवाचक और संवेदनशील था। वे कभी समसामयिक सामाजिक यथार्थ दिखाते, कभी पौराणिक मिथकों को आधुनिक संदर्भों में पुनर्रचना करते, इस तरह उनकी नाटकीयता में मिथक और वर्तमान का संगम देखने को मिलता। उनकी लेखनी आज भी धीरे से हमें पुकारती है, पुनर्विचार करने पर विवश करती है। 

    शेष के सभी नाटकों में एक नाटक ‘एक और द्रोणाचार्य’ को विशेष प्रसिद्धि प्राप्त हुई। इस नाटक को अक्सर ही शिक्षा व्यवस्था पर किये गये एक तंज के रूप में देखा जाता है, जो कि उचित है। परन्तु प्रश्न यह है कि क्या केवल वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर तंज कसना ही इस नाटक का उद्देश्य हो सकता है? नाटक का मुख्य पात्र अरविंद, जो एक कॉलेज में प्रोफेसर है, उसका बार-बार निजी जिम्मेदारियों के कारण परिस्थितियों के सामने घुटने टेक देना, बार-बार सत्ता और राजनीति के आगे झुकना, बार-बार अपने नैतिक सिद्धांतों की बलि देना, इस नाटक के माध्यम से क्या केवल यही नाटककार का संदेश हो सकता है? क्या केवल शिक्षा व्यवस्था का दोष उजागर करना इस नाटक का लक्ष्य हो सकता है? क्योंकि ये सब तर्क बेहद सतही प्रतीत होते हैं। शंकर शेष जैसे लेखक और नाटककार, जिन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा भाग रंगमंच को समर्पित कर दिया, बाईस नाटक और न जाने प्रचलित-अप्रचलित कितने ही किरदारों को जन्म दिया, उनके द्वारा लिखे गये इस सर्वप्रसिद्ध नाटक में केवल शिक्षा व्यवस्था के खोखलेपन को उजागर करना या परिस्थितियों के सामने घुटने टेकते एक मध्यमवर्गीय शिक्षक को दिखाना अपने आप में दुर्बल-सा विषय प्रतीत होता है। क्योंकि दूसरा प्रश्न यह भी है कि केवल इस पहलू को दर्शाने के लिए महाभारत के द्रोणाचार्य की कथा का वर्तमान पात्र अरविंद के जीवन के समांनातर चलने, अरविंद की कहानी के प्रत्येक किरदार का महाभारत के किरदारों से मेल खाने, और प्रत्येक वर्तमान दृश्य के संवाद का अतीत के दृश्यों में हो रहे संवादों से एकरूपता रखने का क्या अर्थ है? इसकी आवश्यकता ही क्या थी? अरविंद की कहानी में द्रोणाचार्य की कथा कहने की क्या गरज थी? सीधे-सीधे केवल प्रोफेसर अरविंद की कहानी ही क्यों नहीं कह दी?

    महाभारत युग हो या फिर वर्तमान युग, शिक्षा व्यवस्था सदा ही सत्ता और राजनीति के नीचे दबी ही रही। कई लेखकों ने इस मुद्दे को अपनी कहानियों और उपन्यासों में उजागर किया है। किंतु इस पूरी गलित व्यवस्था में एक किरदार ऐसा है, जो इन सबसे परे है, जिसके लिए न कोई राजा है न कोई रंक, न कोई धनवान् न कोई निर्धन। ऐसा चरित्र जो कई चरित्रों का निर्माण करता है, जो सदा ही सम्मान का अधिकारी है। वह जब भी धर्म की ओर से युद्ध करे, उसकी सदा ही विजय है। और वह किरदार है एक शिक्षक, एक आचार्य, एक गुरु का। आचार्य धर्म का अग्रदूत होता है, वह धर्म का बीज अपने शिष्यों के भीतर बोता है और अपने उपदेश रूपी जल से उसे सींचता रहता है। आचार्य का शासन अपने शिष्य पर नित्य रहता है, इसीलिए प्रत्येक बालक का प्रथम आदर्श उसका आचार्य ही होता है। आचार्य माता-पिता और राजा सबसे ऊपर होता है। किन्तु जब धर्म व नीति पर दिये गए उपदेश शिष्य को उसके आचार्य में ही नज़र नहीं आते, जब वह अपने आचार्य को अधर्म के आसन पर बैठा हुआ देखता है, तो उसके हृदय पर यह सबसे बड़ा आघात होता है और काल के चक्र में वही शिष्य अपने आचार्य की अधोगति का एक बड़ा माध्यम बन जाता है। शंकर शेष के नाटक “एक और द्रोणाचार्य” में भी कदाचित् इसी प्रश्न का चिंतन किया गया है। कदाचित् यह धर्म और धर्मध्वज के रक्षक यानि कि एक आचार्य के चरित्र का विश्लेषण हो। अन्याय को देखकर मौन रहना, कायरता नहीं -पराधीनता की पराकाष्ठा है और एक आचार्य पर पराधीनता शोभा नहीं देती, कायरता शोभा नहीं देती, चाहे वह किसी भी युग में हो। क्योंकि आचार्य के पास धर्मोपदेश, नीति-उपदेश और न्यायोपदेश का अधिकार होता है और इस अधिकार का अतिक्रमण स्वयं आचार्य को शोभा नहीं देता। यह अतिक्रमण केवल उस व्यक्ति पर नहीं, बल्कि ‘आचार्य’ उपाधि पर कलंक बन जाता है। 

    ‘एक द्रोणाचार्य और’ नाटक दो भागों पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध में बंटा है। दोनों भागों में ज्यों ही अरविंद अपनी आत्मा में स्थित शिष्टता, धर्म और करुणा में बहकर कोई संकल्प लेने की ठान लेता है, तभी विमलेंदु की आवाज़ में संवाद करता उसका मन अरविंद को अतीतावलोकन के द्वारा द्रोणाचार्य की कथा में लेकर चला जाता है और वर्तमान के अरविंद को अतीत के द्रोणाचार्य के सामने लाकर खड़ा कर देता है। दोनों आमने-सामने खड़े ऐसे प्रतीत होते हैं, जैसे एक प्रतिबिम्ब अपना असल बिम्ब देख रहा हो। 

    द्रोण समस्त विद्याओं में निपुण एक महान आचार्य थे। उन्होंने अपने गुरुकुल में कौरव और पांडवों को पुरुषार्थ की शिक्षा दी, किन्तु जब–जब उनके समक्ष अपने द्वारा ही दी गई शिक्षा को कार्य में लाने का अवसर आया, तब–तब उन्होंने कुछ ऐसा किया जो सर्वथा अनुचित, अनैतिक और पलायनवादी था। वे वही करते रहे जो वे सही नहीं समझते थे। अरविंद की स्थिति भी परस्पर समान है। जब यदु, अरविंद का मित्र और उसी कॉलेज का एक प्रोफेसर, पहली बार अरविंद से कहता है कि विमलेंदु के नाटक में द्रोणाचार्य का किरदार निभाने के बाद अरविंद द्रोण के समान ही हो गया है, उस समय हमें ऐसा लगता है कि यह कोई महान, विद्वान व्यक्तित्व है, जो अटल सिद्धांतवादी है। एक योद्धा है, जो सत्य और न्याय के लिए अपने जीवन की भी परवाह नहीं करेगा। उस समय हमारे भीतर ‘आचार्य द्रोण’ की मूर्ति उभरती है। किन्तु अंत तक आते-आते जब हम दोनों की कहानियों को जोड़कर देखते हैं, तो यह दोनों, जो वास्तव में एक ही हैं, बस काल का भेद है, हमारे सामने इनके व्यक्तित्व की गंभीरता का सही आकलन निकल आता है। दोनों का प्रवास ‘आचार्य’ से ‘योद्धा’ के रूप में समाप्त होता है— आचार्य जो नीति और धर्म की प्रतिमूर्ति हैं और योद्धा जो मोह और उपकारों के भार से दबकर अपने अस्त्र अधर्म की गोद में डाल चुका है। द्रोण एक महान योद्धा थे, किन्तु उनके अपने पूर्वाग्रह थे और ये पूर्वाग्रह हर पग पर उनकी नैतिकता और सिद्धांतों के आड़े आये और जीत गये। यही बातें अरविंद की कहानी में भी दिखती हैं। 

    पूर्वार्द्ध में नाटक की शुरुआत में ही अरविंद राजकुमार को सरेआम परीक्षा में नक़ल करते हुए पकड़ लेता है और उसकी रिपोर्ट यूनिवर्सिटी भेजने का निर्णय ले लेता है। राजकुमार जो कॉलेज में एक छात्र है और कॉलेज के प्रेसिडेंट का बेटा है, अत्यंत निरंकुश लड़का है। उसका किरदार महाभारत के दुर्योधन से मेल खाता है। उस पात्र का नाम ‘राजकुमार’ होना ही बहुत कुछ बता देता है। अरविंद की पत्नी लीला और यदु उसे समझा-बुझाकर रोकने का प्रयास करते हैं, रिपोर्ट वापस लेने को कहते हैं, पर वह नहीं मानता। प्रिंसिपल जिसका परिचय ‘साठ वर्ष का और आंख से काना’ कहकर किया गया है, और बाद में प्रेसिडेंट द्वारा प्रिंसिपल का व्यक्तित्व बताते हुए संवाद है कि “निहायत बेवकूफ किस्म का आदमी है, ना पर्सनालिटी है ना ग्रेस। हमेशा हें हें करता रहता है।” “बिल्कुल गधे किस्म का आदमी है।” प्रिंसिपल के किरदार में कोई दम नहीं है कोई गहराई नहीं है। कोई उसे कुछ समझता नहीं, इससे साफ-साफ प्रतीत होता है कि वह धृतराष्ट्र की भूमिका में है, वह भी अरविंद को घर आकर समझाता है। परन्तु अरविंद किसी की नहीं सुनता, वह अपने निर्णय पर अड़ा रहता है। अब तक की कहानी में अरविंद पर उसकी अन्तरात्मा का प्रभाव है, जिसमें सारी शुद्धता, सत्यता और सभ्यता निवास करती है। अब प्रवेश होता है प्रेसिडेंट का, जो एक रुबाबदार व्यक्ति है। अपने संवादों से वह शकुनि के समान छलयोजी-सा प्रतीत होता है। जब अरविंद नहीं मानता तो फिर वह पहली चाल चलता है और उसके पासों से प्रिंसिपल बनने का प्रस्ताव अरविंद के सामने आ जाता है। उसके जाने के बाद लीला अरविंद को खूब बातें कहती है, अपने पुत्र के भविष्य के बारे में सोचने को कहती है, जिसे मेडिकल कॉलेज में दाखिला दिलवाना है। उन बातों को वह उस समय तो नकार देता है, किन्तु वे बातें उसके अंतर्मन में कहीं रह जाती हैं। 

    मन विषयभोग चाहता है, सुविधाएं चाहता है, सुरक्षा चाहता है। वह नहीं चाहता कि मनुष्य अपने सहज-लोक से बाहर निकलकर कोई भी ऐसा कार्य करे, जिससे शरीर और विषयों के बीच दूरी पैदा हो। इसलिए वह धीरे-धीरे मनुष्य की बुद्धि के भीतर तर्क-वितर्कों का एक ऐसा जाल तैयार करता है, जिसमें मनुष्य का फंसना निश्चित है। वह व्यक्ति को निज-संसार और निज-दायित्वों का हवाला देकर उसे सही-ग़लत, न्याय-अन्याय, सामाजिक उत्तरदायित्व, अपराध, यहाँ तक की घृणित से घृणित कर्म के विरोध से भी सर्वथा अनभिज्ञ बना देता है। धर्म से विलग कर देता है। आत्मा नित्य धर्म में स्थित है, किन्तु मन असत्य का चोगा पहनकर सदा ही व्यक्ति को निजी सुखों को प्रधानता देने के लिए विवश करता रहता है। यहाँ नाटक में अरविंद का अपना अंतर्मन विमलेंदु की आवाज़ में बोलता है, ताकि अपनी इच्छाओं को पूर्ण करने के लोभ को किसी और की विफलता के माध्यम से न्यायसंगत सिद्ध कर सके। विमलेंदु उसी कॉलेज में प्रोफेसर हुआ करता था, जिसने कुछ समय पूर्व नक़ल करते हुए एक छात्र को पकड़ा और विरोध करता रहा, किन्तु गुंडों ने सबके सामने उसकी हत्या कर दी। उसका तीन वर्ष पहले ही विवाह हुआ था और एक नवजात पुत्री भी। विमलेंदु की हत्या के बाद से उसकी पत्नी जीविकोपार्जन के लिए नौकरी ढूँढती हुई दर-दर भटक रही है, लेकिन कोई उसे नौकरी देने को तैयार नहीं है। अरविंद सारे मामले पर एकांत में विचार कर ही रहा होता है कि उसके सामने कोने से विमलेंदु की शरीराकृति उभरती है। चेहरा नहीं है, केवल आवाज़ है। जब अरविंद विमलेंदु की हत्या को बलिदान का नाम देता है, तो विमलेंदु की आवाज़ चिढ़ जाती है और उस घटना को मूर्खता बताती है। यहाँ अरविंद की आत्मा जानती है कि वह एक प्रकार से बलिदान तो था, किन्तु वह बलिदान व्यर्थ गया क्योंकि उसके बाद भी कोई बदलाव नहीं आया। उसका कारण अरविंद भी है। विमलेंदु उसका मित्र था, पर उसने या किसी भी सहकर्मी ने उसका बिल्कुल साथ नहीं दिया। वह अकेले लड़ा और मारा गया। बाद में किसी ने उसकी पत्नी की सुध तक नहीं ली। यहाँ भी अरविंद का दोष है इसलिए उसका मन विमलेंदु की आवाज़ में बोलता है और सारी घटना को महज़ एक मूर्खता बताता है केवल मूर्खता। और फिर विमलेंदु अरविंद को द्रोण के किरदार की याद दिलाता है, उसे समझने को कहता है और अतीतावलोकन में ले जाता है, मानो कह रहा हो कि जब वह सर्वसमर्थ द्रोणाचार्य, एक महान योद्धा अपनी परिस्थितियों के सामने नतमस्तक होकर अपने व्यक्तिगत जीवन और अपने पुत्र मोह को प्राथमिकता दे सकता है, तो फिर तुम तो उसकी तुलना में कुछ भी नहीं। इसलिए पूर्वार्द्ध में अरविंद द्रोण के समान ही सुविधा और निजी-जीवन को महत्व देकर प्रेसिडेंट के द्वारा दिया हुआ प्रस्ताव यानि कि कॉलेज के प्रिंसिपल का पद स्वीकार लेता है। चंदू को उसके आन्दोलन में अकेला छोड़ देता है। यहाँ पर चंदू, अरविंद का ही एक छात्र एकलव्य के रूप में है, जो अरविंद के पास नक़ल के विरोध में होने जा रहे आन्दोलन के लिए सहयोग माँगने आता है। आन्दोलन का नेतृत्व चंदू ही कर रहा है क्योंकि उसे नक़ल करने के झूठे आरोप में फँसाकर प्रेसिडेंट द्वारा उसकी रिपोर्ट यूनिवर्सिटी भेज दी गई है। प्रेसिडेंट के आने से पूर्व अरविंद चंदू को समर्थन की आशा देकर भेज तो देता है, किन्तु बाद में प्रिंसिपल बनकर उसी आन्दोलन के विरुद्ध खड़ा हो जाता है। चंदू अकेला लड़ता है और नक़ल करने के झूठे आरोप में कॉलेज से निकाल दिया जाता है। इससे उसके भविष्य पर एक आघात लग जाता है, ठीक वैसे ही जैसे द्रोण ने एकलव्य से उसका अँगूठा माँग कर उसकी प्रतिभा और उसके भविष्य को नष्ट कर दिया था। अरविंद ने द्रोण के समान सीधे-सीधे चंदू के जीवन को प्रभावित नहीं किया, किन्तु चंदू से विश्वासघात करके उसका भविष्य नष्ट हो जाने का कारण अरविंद की निष्क्रियता और उसका मोह ही बने। 

    पूर्वार्द्ध का अरविंद शुरुआत में न्याय के लिए जितना तत्पर दिखायी देता है, उत्तरार्द्ध का अरविंद उतना ही उदासीन। अब अरविंद को प्रिंसिपल बने कुछ समय बीत गया है। छात्रों का आंदोलन थम गया है और उसके शिकार चंदू का भविष्य बना। किन्तु अब राजकुमार एक ऐसा कर्म करता है जो सर्वथा दण्डनीय है। वह अनुराधा नाम की एक छात्रा पर बलात्कार करने का प्रयास करता है, किन्तु मौके पर अरविंद वहाँ आ जाता है और राजकुमार उसे देखकर भाग जाता है। यहाँ अरविंद तिलमिलाहट में है, उसे यह भय है कि जब सारे कॉलेज को यह बात पता चलेगी और वह उनके साथ खड़ा नहीं होगा तो लड़के उसके साथ न जाने क्या करेंगे। और यदि साथ दिया तो गुंडे विमलेंदु के समान उसकी भी हत्या कर देंगे। अरविंद यही चर्चा लीला और यदु से कर रहा होता है कि अनुराधा वहाँ आ जाती है और अरविंद को बताती है कि उसके पिता प्रेसिडेंट की बातों में आकर उसका साथ नहीं देना चाहते, अब उसे केवल और केवल अरविंद से ही आश है क्योंकि वही उस घटना का एकमात्र चश्मदीद गवाह है। और साथ ही कॉलेज का प्रिंसिपल भी है, जिससे उसके अधिकार और भी बढ़ गये हैं। अरविंद अनुराधा को आश्वासन देता ही है कि प्रेसिडेंट का फोन आ जाता है और उससे बात करने के बाद अरविंद के मुखमंडल पर एक सन्नाटा छा जाता है। अनुराधा जान जाती है कि अरविंद का आश्वासन उतना भी अटल नहीं था। उसके पूछने पर अरविंद बताता है कि प्रेसिडेंट ने उसे पंद्रह हज़ार रुपयों के गबन के मामले में फँसाने की धमकी दी है। इसके बाद अरविंद के सुर इतनी जल्दी बदलते हैं, जैसे वह किसी बहाने की तलाश में ही बैठा हो — 

    “अरविंद: आखिर कॉलेज का मामला तो है ही। अनुराधा, तुम्हारे पिताजी नहीं चाहते कि तुम रिपोर्ट करो।

    अनुराधा : अब सवाल पिताजी के चाहने-न-चाहने का नहीं रहा। आप क्या चाहते है?

    अरविंद: मैं ? मैं सोचता हूँ कि तुम्हारे पिताजी ठीक कहते है। आखिर अनुभवी आदमी है। तुम्हारा भला-बुरा वे जितना सोच सकते हैं उतना शायद तुम भी नहीं।

    अनुराधा : लेकिन फोन आने से पहले तो आप..

    लीला : अनुराधा, मैं भी सोचती हूँ कि बात का बतंगड़ बनाने में कोई फायदा नहीं ?

    अनुराधा : सर, मैं आपसे अब साफ-साफ ही पूछती हूँ आप कल ऐक्शन लेंगे या नहीं ? मेरी ओर से बोलेंगे या नहीं?

    अरविंद: जरा सोचो तो, जोश अलग बात है। समझदारी से काम लो। रेस्टीकेट होने के बाद भी तो राजकुमार तुम्हें तंग कर सकता है। उसका क्या भरोसा ? हो सकता है क्षमा उसका मन बदल दे। उसे सुधार दे।

    अनुराधा : आप बात को टाल क्यों रहे हैं? साफ-साफ बताइए कि आप मेरा साथ दे रहे हैं या नहीं ?

    अरविंद: तुम्हारे पिता का खयाल करते हुए शायद मैं तुम्हारा साथ न दे पाऊँ।

    अनुराधा : साफ क्यों नहीं कहते कि अपनी नौकरी का खयाल कर आप मेरा साथ नहीं दे पाएँगे !

    अरविंद: अनुराधा!

    अनुराधा: चंदू ठीक कहता था, सर ?

    अरविंद : क्या कहता था ?

    अनुराधा : वह आपको बड़े-बड़े निरर्थक शब्द थूकने वाला नपुंसक बुद्धिवादी कहता था। आपने सचमुच मुझे कहीं का नहीं रखा। मेरे सब भ्रम टूट गए। अब आपको चिंता करने की जरूरत नहीं होगी। कल शायद कोई बवाल ही न उठे।” (एक और द्रोणाचार्य)

    इतना कहकर अनुराधा वहाँ से चली जाती है और कुछ ही समय बाद खबर आती है कि अनुराधा ने ट्रक के सामने आकर अपनी जान दे दी। यहाँ साफ ज़ाहिर होता है कि अरविंद का सहयोग अनुराधा के लिए कितनी बड़ी ताक़त बन सकता था। केवल उसके सहयोग के सहारे वह ये लड़ाई लड़ने के लिए तैयार थी। पूर्व में हुई घटनाओं के बाद भी वह अरविंद पर विश्वास करने को तैयार थी, किन्तु अरविंद तो अब कुछ और ही हो चुका था। उसने निश्चित ही लोभवशात कुछ ऐसा किया था जिस कारण उसने गबन के आरोप का एक क्षण के लिए भी विरोध नहीं किया। 

    यह नाटक वर्तमान परिप्रेक्ष में महाभारत की एक नवीन संकल्पना है। किन्तु इसमें द्रोणाचार्य (अरविंद) मुख्य पात्र क्यों है? चंदू भी मुख्य पात्र हो सकता था, अनुराधा भी मुख्य पात्र हो सकती थी, क्योंकि सबसे अधिक इस कहानी में उन्हीं लोगों ने संघर्ष किया है, किंतु द्रोणाचार्य ही क्यों? इसका एकमात्र कारण हमें अतीतावलोकन के उस दृश्य से पता चलता है, जो ठीक उस समय विमलेंदु की आवाज़ के माध्यम से आता है, जब अनुराधा के प्रसंग के बाद अरविंद अपना इस्तीफा लिख रहा है। विमलेंदु की आवाज़ अरविंद को इस्तीफा देने से पहले एक बार उस दृश्य को देखने पर विवश कर देती है। वह दृश्य जहाँ भरी सभा में द्रोपदी का चीरहरण हो रहा है, दुर्योधन उसे अपनी जंघा पर बैठने का आदेश दे रहा है। द्रौपदी की करुण पुकार सारे सभागार में गूँज रही है। वहाँ सभासीन प्रत्येक अभिजात, गणमान्य और सर्वसमर्थ व्यक्ति के सम्मुख जा-जाकर अपने सतीत्व की रक्षा के लिए सहायता की भीख माँग रही है, उन्हें अपने दायित्वों का स्मरण करा रही है। किन्तु सब अदृश्य बंधनों से बंधे हुए हैं। कोई उसकी ओर देखना भी नहीं चाहता। विवश अपने स्थान पर मृतकों की भाँति स्थिर हैं। उसके पति पांडव दुर्योधन के दास हो चुके हैं। पितामह भीष्म सिंहासन के प्रति ली गई अपनी प्रतिज्ञा से बंधे हुए हैं। धृतराष्ट्र तो पुत्र मोह और सिंहासन मोह में बहुत पहले ही दोबारा अन्धा हो चुका है। विदुर के हाथ में नीति तो है पर शस्त्र नहीं। तो फिर ऐसी स्थिति में द्रौपदी जब द्रोणाचार्य के पास जाती है तब वह जो संवाद उनसे कहती है, यह संवाद यहाँ अश्वत्थामा के मुख से कहा गया है—

    “अश्वत्थामा : पिताजी, आप कल दरबार में चुप क्यों रहे? कल से यह प्रश्न मुझे नोच-नोच कर खा रहा है। बताइए न, आप चुप क्यों रहे? 

    द्रोणाचार्य : क्या इस प्रश्न का उत्तर देना अब जरूरी है? 

    अश्वत्थामा : हाँ, पिताजी, जब द्रौपदी की पुकार किसी ने नहीं सुनी, तब वह आपके सामने आकर खड़ी हो गयी थी। याद है, उसने क्या कहा था? उसने कहा था- आचार्य, आप न तो पांडवों के रक्त-संबंधी है, न कौरवों के। आप आचार्य हैं दोनों के। क्या दुर्योधन आपका कहना नहीं मानेगा? आपको तो सत्ता का मोह नहीं। क्या आप अपने शिष्यों की पत्नी को सार्वजनिक रूप से अपमानित होते देख सकते हैं? उठाइए अपना धनुष। (विराम) पर आप चुप रहे। क्यों? द्रोणाचार्य : इस प्रश्न का उत्तर अपनी मां से पूछो।” (एक और द्रोणाचार्य)

    यहाँ पर द्रौपदी का एक प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है कि “आचार्य, आप न तो पांडवों के रक्त-संबंधी है, न कौरवों के। आप आचार्य हैं दोनों के। आपको सत्ता का मोह नहीं, फिर आप चुप क्यों हैं?” यही स्थिति अरविंद के समक्ष भी थी, क्योंकि अनुराधा सबसे हारकर उसके पास आयी थी। यहाँ पर अरविंद और द्रोण, दोनों पात्रों की कायरता हमारे सामने निकलकर आती है। इन्हें सत्ता का मोह नहीं, पर आवश्यकता है। अपनी खुद्दारी पर पत्नियों के लगातार चलने वाले शब्द रूपी बाणों से मुक्त होने की व्याकुलता है। सरल मार्ग चुनकर कुछ काल सुख से रहने की इच्छा है। और जितना सुख भोग लिया है, उसका भार सर पर है। धर्म त्यागने का अपराधबोध हृदय में है, जो इन्हें अपने आसन से उठने नहीं देता। इस प्रकार आगे के संवादों में द्रोणाचार्य अपनी मूकता और जड़ता का ठीकरा अपनी पत्नी पर फोड़ देते हैं, क्योंकि वह बार-बार उन्हें सुविधाओं के लिए उकसाती रहती है, ग़लत को नज़रन्दाज़ करने की और अपने व्यक्तिगत संसार पर ध्यान देने की शिक्षा देती है। स्त्री की मर्यादा पर हुये घृणित प्रयासों से भी विचलित नहीं होती। लीला और कृपि दोनों एक दूसरे की पूरक हैं, किन्तु उन्होंने व्यावहारिक रूप से किसी भी प्रकार अरविंद और द्रोण को किसी भी दृश्य-अदृश्य वचन या बंधन से बाँधा नहीं है। इसलिए अरविंद और द्रोण की निष्क्रियता का कारण ये दोनों नहीं हो सकतीं। स्त्री की लज्जा का इस प्रकार से अपमान वो भी सार्वजनिक, एक आचार्य तो कभी नहीं देख सकता। पहले जो भी किया हो किन्तु अब अवसर था एक मनुष्य होने के कर्तव्य को निभाने का, धर्म की रक्षा का। इससे स्पष्ट हो जाता है कि द्रोणाचार्य के हाथ में द्रौपदी को और अरविंद के हाथ में अनुराधा को बचाना संभव था, किंतु उनके लिए सांसारिक विनिमय के बोझ इतने भारी हो गये कि वो एक स्त्री का अपमान भी पचा गये। उन्होंने अपने सिद्धांतों को व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों की अग्नि में भष्म कर दिया। द्रोण अपना जीवन उसी समय खो चुके थे जिस समय उन्होंने द्रौपदी की करुण पुकार सुनकर भी अपने शस्त्र नहीं उठाए और नज़र फेरे वहीं अपने आसन पर एक पंगु व्यक्ति की भाँति बैठे रहे। द्रौपदी का यह कहना कि आप किसी के रक्त संबंधी नहीं, न कौरवों के, न पांडवों के – अनुराधा ने भी अरविंद से यही प्रार्थना की थी क्योंकि अनुराधा के पिता ने स्वयं उसका साथ छोड़ दिया। प्रेसिडेंट तो उसका साथ किसी भी हालत में देता नहीं। किंतु अरविंद जो उस मामले का एकमात्र गवाह था, जो एकमात्र व्यक्ति था जिस पर स्टूडेंट विश्वास करते थे, अनुराधा भी इसी विश्वास के साथ अरविंद के पास गयी। किंतु अरविंद अपने आसन पर बैठा रहा, एक लाचार की भाँति। जिसकी कीमत अनुराधा ने अपने प्राण देकर चुकायी। अरविंद अपने अपराध का पश्चाताप इस्तीफा देकर करने ही वाला था कि द्रोण को द्रौपदी के हो रहे अपमान के सम्मुख चुप बैठा देखकर अरविंद को अपनी तुच्छता का बहाना फिर से एक मिल गया हो, ‘कि द्रोण के पास तो दिव्यास्त्र भी थे, फिर भी वे नहीं बोले, मौन सब देखते रहे और अपना जीवन जीते रहे तो फिर मैं तो कुछ भी नहीं। एक दान में मिला हुआ पद ही तो है मेरे पास जिसे चलाने वाला भी प्रेसिडेंट ही है।’ उसने इस्तीफा नहीं दिया। वह अपने पद पर बना रहा। 

    एक मनुष्य, विशेष रूप से जब वह शिक्षक हो, उसके सामने नैतिक, सामाजिक और धर्म-संहितात्मक ज़िम्मेदारियाँ कैसी होती हैं, और जब अपराध हो, अन्याय हो रहा हो- तब उसका कर्तव्य क्या है? आचार्य – धर्म, व्यावहारिक नियम, नैतिक दायित्व, सामाजिक न्याय, सद्भाव सभी का एक समेकित संकल्प है। जब एक आचार्य के रूप में व्यक्ति ज्ञान, नैतिकता और संस्कार बाँटता है, तो उसकी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ किताबी शिक्षा तक सीमित नहीं होती, वह समाज की चेतना, उस व्यक्ति की आत्मा, उसकी संवेदनशीलता विकसित करता है। इसलिए आचार्य का कर्तव्य ख़ास होता है। यदि वह चुप बैठ जाए, तो उसका मौन भी समाज को मौन रहने की सीख दे सकता है। ऐसे व्यक्ति जो सिर्फ वचनबद्ध, उपदेशक, दिखावटी, पर कर्म में निष्क्रिय रहें – उनकी भारतीय मनीषा में केवल निंदा ही है। क्योंकि धर्म केवल उपदेश नहीं, व्यवहार भी मांगता है। चुप रहना भूल है; बोलना, न्याय के लिए खड़ा होना – स्वधर्म है। और किसी से न सही परंतु एक आचार्य से हर परिस्थिति में स्वधर्म पालन करने की अपेक्षा की जाती है। स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने गीता में अर्जुन को स्वधर्म का उपदेश किया है, जोकि महाभारत का ही अंग है –

    श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।

    स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह: ।। श्रीमद्भागवत गीता, 3.35।। 

    अर्थात अपने धर्म को दोष युक्त सम्पन्न करना किसी अन्य के धर्म को समुचित ढंग से सम्पन्न करने से कहीं अधिक श्रेष्ठ होता है। वास्तव में अपने कर्तव्य का पालन करते हुए मर जाना दूसरों के कर्तव्य का अनुसरण करने से श्रेयस्कर होता है। दूसरे के धर्म का पालन भययुक्त है। 

    सच्चा धर्म वही है जो ईश्वर ने प्रत्येक मनुष्य के हृदय में उसकी भूमिका के अनुसार रखा है। भय, मोह या पीड़ा के कारण कर्तव्य का त्याग करना परधर्म हो जाता है, जो विनाशकारी है। यदि आवश्यक हो तो स्वधर्म के लिए प्राण देना भी श्रेयस्कर है।

    आठ वर्षों का समय बीत जाता है। कोर्ट में पेशी चल रही है। प्रेसिडेंट की एक हादसे में मृत्यु हो चुकी है। अरविंद पर उसकी हत्या का आरोप है। एक तरफ अरविंद है और उसके सामने चंदू गवाही दे रहा है —

    “चंदू : प्रोफसर अरविंद ने झूठ बोलकर मेरी सब श्रद्धाओं को कुचल दिया। कॉलेज से मैं जिस तरह निकाला गया उससे मेरा ज़िंदगी के प्रति रहा-सहा विश्वास भी जाता रहा।

    पहली आवाज : तो तुमने आत्महत्या क्यों नहीं की ?

    चंदू : मैं क्लिफ़ से कूदने वाला था…

    पहली आवाज : तो क्यों नहीं कूदे ?

    चंदू : मुझे पाँवों को आहट सुनाई पड़ी। करीब आती हुई बातचीत ।

    पहली आवाज : तो तुमने क्या किया ?

    चंदू : एक ओर झाड़ी में सरक गया।

    पहली आवाज : तुमने किसे आते देखा ?

    चंदू : प्रोफेसर अरविंद और प्रेसिडेंट को ।

    पहली आवाज : दोनों में क्या बातचीत हो रही थी ?

    चंदू : प्रोफेसर अरविंद क्लिफ़ की ओर बढ़ रहे थे और प्रेसिडेंट को अपने पास बुला रहे थे। लेकिन प्रेसिडेंट हिचक रहा था।

    पहली आवाज : इसके बाद क्या हुआ ?

    चंदू : प्रोफेसर अरविंद उन्हें बहुत उकसाते रहे। उनसे नीचे तराई का मेला देखने का आग्रह करते रहे।

    पहली आवाज : तब ?

    चंदू : आखिर विवश होकर प्रेसिडेंट क्लिफ़ के छोर तक आया।

    पहली आवाज : आगे कौन था ?

    चंदू : प्रेसिडेंट।

    पहली आवाज : पीछे ?

    चंदू : प्रोफेसर अरविंद।

    पहली आवाज : प्रोफेसर अरविंद  का हाथ कहाँ था ?

    चंदू : प्रेसिडेंट की पीठ पर। वे उनकी पीठ पर हाथ रखकर मेले की ओर इशारा कर रहे थे ?

    पहली आवाज : इसके बाद ? 

    चंदू : इसके बाद मुझे प्रेसिडेंट का शरीर लड़खड़ाता दिखा और क्लिफ़ से नीचे गिरता ।

    पहली आवाज : क्या प्रोफेसर अरविंद  ने प्रेसिडेंट को धकेला ?

    [चंदू चुप रहता है।]

    पहली आवाज़ : बोलते क्यों नहीं? प्रोफेसर अरविंद ने प्रेसिडेंट को धकेला था ?

    [चंदू अरविंद की ओर देखता है। अरविंद कातर दृष्टि से उसकी ओर देखता है। फिर क्षण भर में चंदू की मुद्रा कठोर हो जाती है।]

    चंदू : हो सकता है।” (एक और द्रोणाचार्य)

    कोर्ट अरविंद के खिलाफ़ अपना फैसला सुना देता है। अरविंद जेल में वीभत्स स्थिति में बैठा हुआ है। फिर से उसे विमलेंदु की आवाज़ आती है। दोनों में चर्चा हो रही है सही और ग़लत की। यही आवाज़ अरविंद के मुखौटे को उतारकर फेंकती है और यही आवाज़ फिर से उसे मुखौटा पहनने के लिए सज्ज करती है —

    “अरविंद : विमलेंदु, चंदू ने सच क्यों नहीं बोला ?

    विमलेंदु : लेकिन वह झूठ भी तो नहीं बोला। उसने यह तो नहीं कहा कि तुमने प्रेसिडेंट को धकेला। उसने सिर्फ़ कहा- हो सकता है।

    अरविंद  : पर वह जानना था कि प्रेसिडेंट को मैंने नहीं धकेला। वह जानता था कि मैं अपराधी नहीं हूँ, खू़नी नहीं हूँ। इसके बाद भी वह झूठ क्यों बोला ?

    विमलेंदु: यही प्रश्न पूछा था द्रोणाचार्य ने। बिलकुल यही प्रश्न। मरते-मरते । क्यों भूल जाते हो बार-बार मेरा लिखा हुआ नाटक? याद करो। महाभारत का पंद्रहवाँ दिन। द्रोणाचार्य स्वयं सेनापति था। घमासान युद्ध।” (एक और द्रोणाचार्य)

    और इसके बाद फिर से एक अतीतावलोकन का दृश्य आता है, जहाँ रणभूमि में पांडवों की ओर से उद्घोषणा हो रही है, ‘अश्वत्थामा मारा गया! अश्वत्थामा मारा गया!’ द्रोणाचार्य को विश्वास नहीं हो रहा। वे रणभूमि में युधिष्ठिर को खोज रहे हैं, क्योंकि वे जानते हैं युधिष्ठिर कभी असत्य नहीं बोल सकता है —

    “द्रोणाचार्य : युधिष्ठिर कोलाहल सुन रहे हो !

    युधिष्ठिर : हाँ, गुरुदेव ।

    द्रोणाचार्य : मेरा मन इसे सुनकर काँप रहा है। मुझे कुछ समझ में नहीं आता। तुम सच बोलोगे ?

    युधिष्ठिर : मैंने कभी झूठ बोला, गुरुदेव।

    द्रोणाचार्य : इसीलिए तो मैं तुमसे पूछ रहा हूँ। मुझे गुरु-दक्षिणा चाहिए ।

    युधिष्ठिर : यहाँ, युद्ध में।

    द्रोणाचार्य : हाँ, यहाँ युद्ध में। जहाँ सब कुछ सत्य है और कुछ झूठ। मुझे गुरु-दक्षिणा के रूप में बताओ कि कौन मारा गया। अश्वत्थामा नाम का हाथी या मेरा पुत्र ? नर या कुंजर ?

    युधिष्ठिर : मैं इतना ही जानता हूं कि अश्वत्थामा मारा गया ।

    द्रोणाचार्य : वह नर था या कुंजर ? बोलो, इस प्रश्न के उत्तर पर मेरा जीवन निर्भर करता है। जल्दी बताओ।

    युधिष्ठिर : अश्वत्थामा अवश्य मारा गया। वह नर था (इसके आगे बुदबुदाता है) या कुंजर..” (एक और द्रोणाचार्य)

    कोर्ट में चंदू का वाक्य ‘हो सकता है’ युधिष्ठिर के इस अंतिम वाक्य के समान ही है, जो न पूर्ण रूप से सत्य है न ही पूर्ण असत्य। यहाँ चंदू का किरदार युधिष्ठिर का रूप ले लेता है, जो धर्म है। चंदू अपने जीवन से हताश हो चुका है, किन्तु उसे ज्यों ही एक अवसर मिलता है न्याय पाने का, वह उसे गँवाता नहीं और अरविंद के जेल जाने का कारण बन जाता है। यह न्याय वह अपने लिए नहीं अनुराधा के लिए करता है, जोकि उसकी प्रेयसी भी थी। 

    यह सब कहने के बाद फिर से विमलेंदु अरविंद का मुखौटा उतार कर रख देता है और उसे इस युग का द्रोणाचार्य कहकर सदा के लिए ग्लानि के दलदल में धकेल देता है –

    “विमलेंदु : मिल गया न तुम्हें अपने प्रश्न का उत्तर !

    अरविंद : चंदू की, धर्मराज से तुलना करना क्या ठीक है ?

    विमलेंदु : फिर झूठ ! तुम जानते हो कि तुम्हारे प्रश्न का उत्तर क्या है। आवर ऑफ कन्फेशन इज अप्रोचिंग। पर तुम सच नहीं बोलना चाहते। बताओ, चंदू को झूठ बोलना किसने सिखाया ?

    अरविंद : किसने सिखाया ?

    विमलेंदु : तुमने, और किसने !

    अरविंद : मैंने ?

    विमलेंदु : तुम उसके लिए कब सच बोले ? जानते हो तुम्हारे हर झूठ ने उसके हर विश्वास को गहरे धक्के दिए। कुल मिलाकर शिक्षक के रूप में तुमने उसे क्या दिया ? अर्थशास्त्र पर भाषण। माल्थस, पीगू और केन्स के सिद्धांत। ये तो किताबों से भी पढ़े जा सकते थे। सवाल है, तुमने क्या दिया ? क्या ऐसा कुछ दिया तुमने जो उसके जीवन को अर्थ देता ?

    अरविंद : तुम रह-रहकर मुझे दोष दे रहे हो। पर बताओ, मुझे झूठ बोलना किसने सिखलाया ?

    विमलेंदु : व्यवस्था ने। दम घोटकर रख देने वाली व्यवस्था ने। विरोध से तिलमिला उठने वाली व्यवस्था ने।

    अरविंद : क्या मैं शुरू से कमीना आदमी था ?

    विमलेंदु : नहीं।

    अरविंद  : क्या मैंने माल्थस, पीगू और केन्स के सिद्धान्तों से आगे बढ़कर जीवन का अर्थ खोजने की कोशिश नहीं की।

    विमलेंदु : की।

    अरविंद  : क्या मुझमें आक्रोश नहीं था, छटपटाहट नहीं थी ?

    विमलेषु : मैं कहाँ मना करता हूँ।

    अरविंद : तब तुम उस प्रेसिडेंट को दोष क्यों नहीं देते ?

    विमलेंदु : क्योंकि उसके पास शक्ति थी। व्यवस्था उसकी पीठ थपथपाती थी। शक्ति के कारण तुम्हारी नियति तय करने का उसे अधिकार था। सवाल है तुमने तय कर दिया, उस पर तुम चले क्यों नहीं। याद है जब तुमने विरोध की भाषा अपनायी, सत्ता ने तुम्हारे अस्तित्व पर सीधे हमला किया। कभी प्रलोभन देकर, कभी आतंक जमाकर। इसलिए विरोध मत करो। सब विरोध बकवास है। यदि व्यवस्था तुम्हें अपने इशारे पर भौंकनेवाला कुत्ता बनाना चाहती है तो भौंको, कुत्ते के पिल्लों को जन्म दो। चंदू और युधिष्ठिर मत पैदा करो। राजकुमार और दुर्योधन पैदा करो..” (एक और द्रोणाचार्य)

    यहाँ अंतिम संवाद से ऐसा प्रतीत होता है विमलेंदु अरविंद से यह कहना चाहता है कि अरविंद ने शुरू से ही प्रेसिडेंट की बात क्यों नहीं मानी। अर्थात जैसा प्रेसिडेंट सदा से चाहता था वैसा ही क्यों नहीं करता रहा। विरोध क्यों किया, आवाज़ क्यों उठाई। उसके विरोध को देखकर न्याय चाहने वाले छात्रों पर ऐसा असर पड़ा कि उन्होंने अरविंद के समर्थन के भरोसे पूरी तरह से अपने आप को आन्दोलन में झोंक दिया। उन्हें अरविंद में उनका नायक नज़र आने लगा। केवल अरविंद के भरोसे पर वे इतनी बड़ी राजनीति से टकराने को तैयार हो गए। किन्तु अरविंद ने क्या किया? एक झटके में उनके भरोसे को चूर-चूर कर दिया। उनका भविष्य बर्बाद कर दिया, अनुराधा की मौत का कारण बन गया। विमलेंदु की आवाज़ में उसका मन यहाँ उससे कहना चाह रहा है की यदि लड़ नहीं सकते, तो लड़ना सिखाते भी क्यों हो। क्यों बेवजह ऐसी बातें करते हो जिसे स्वयं कार्य में नहीं ला सकते। ये अन्याय के दलदल में धँसी व्यवस्था को न्याय की ज़मीन पर उतारने का प्रयत्न ही क्यों करते हो जब तुम जानते हो कि तुम्हारा आत्मबल इसमें पैर रखते ही डूब जाएगा। 

    नाटक के अंत में विमलेंदु जेल में सजा काट रहे अरविंद को बलात् रणभूमि में मृत पड़े द्रोणाचार्य के सामने बिठा देता है और मजबूर करता है अरविंद को अपने चरित्र की सच्चाई देखने के लिए –

    “विमलेंदु : जानता है तू कौन है ?

    अरविंद : मैं कौन हूँ ?

    विमलेंदु : तू द्रोणाचार्य है। व्यवस्था और सत्ता के कीड़ों से पिटा हुआ द्रोणाचार्य- इतिहास की धार में लकड़ी के ठूंठ की तरह बहता हुआ, वर्तमान के कगार में लगा हुआ सड़ा-गला द्रोणाचार्य। व्यवस्था के लाइटहाउस से अपनी दिशा मांगने वाले टूटे जहाज-सा द्रोणाचार्य।

    अरविंद : मैं द्रोणाचार्य नहीं, अरविंद हूँ, प्रोफेसर अरविंद!

    विमलेंदु : बकवास। तू द्रोणाचार्य है। कौरवों की भाषा बोलने वाला, युद्ध में भी उसका साथ देने वाला। तू किस बात का प्रोफेसर ? तू द्रोणाचार्य है।

    अरविंद : नहीं नहीं…

    विमलेंदु : हाँ-हाँ, तू द्रोणाचार्य है। एक और द्रोणाचार्य! एक और द्रोणाचार्य ! एक और द्रोणाचार्य !”  (एक और द्रोणाचार्य)

    अरविंद द्रोणाचार्य का प्रतिबिंब है, और इस नाटक के माध्यम से जब हम दो कालों के द्रोण को एक दूसरे के सामने खड़ा देखते हैं, तो किसी भी दृष्टिकोण से इनमें भेद कर पाना बहुत कठिन हो जाता है। इनकी कहानी देखकर, जोड़कर साहिर लुधियानवी की लिखी एक नज़्म ‘मगर ज़ुल्म के ख़िलाफ़’ की दो पंक्तियाँ याद आती हैं —

    ज़ालिम को जो न रोके वो शामिल है ज़ुल्म में

     क़ातिल को जो न टोके वो क़ातिल के साथ है।।

    ———————-

    परिचय 

    नाम – अंजलि नैलवाल 

    शिक्षा – एम. ए. अंग्रेज़ी, एम. ए. हिन्दी अध्ययनरत, पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन ट्रांसलेशन (PGDT) अध्ययनरत  

    प्रकाशित रचनाएं – विश्वरंग संवाद (कथेतर विशेषांक) और अनुनाद (anunad.com) पत्रिकाओं में अनुवाद, कहानी एवं कविताएं प्रकाशित  

    पता – इंद्रप्रस्थ कॉलोनी, छोई, रामनगर, नैनीताल, (उत्‍तराखंड) 244715  

    मोबाइल नंबर – 9520640253 

    ई-मेल – nailwal.anju04@gmail.com

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