
कल यानी 11 जून से फुटबॉल का विश्वकप शुरू हो रहा है। इसी को लेकर लेखिका दीप्ति कुशवाह ने यह लेख लिखा है जिसमें फुटबॉल और राष्ट्रवाद पर उन्होंने बहुत विस्तार से लिखा है। दीप्ति कुशवाह कवि हैं, कलाकार हैं और खेलों की बहुत बड़ी जानकार हैं। आइये यह लेख पढ़ते हैं- मॉडरेटर
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संसार के कोलाहल में अचानक एक साझा विराम जन्म लेता है और उसी विराम से फुटबॉल का महोत्सव अपनी पहली साँस लेता है। हर चार वर्ष बाद दुनिया कुछ दिनों के लिए रंगों में विभाजित हो जाती है।
विश्वकप का एक दृश्य इतिहास है और उसकी शुरुआत जर्सियों से होती है। वे केवल खिलाड़ियों की पोशाक नहीं होतीं, राष्ट्रों की चलती हुई पहचान होती हैं। कुछ रंग इतने गहरे ढंग से टीमों के साथ जुड़ चुके हैं कि अब वे अपने मूल अर्थों से बहुत आगे निकल गए हैं। ब्राज़ील का पीला केवल एक रंग नहीं रह गया है। वह फुटबॉल की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन चुका है। अर्जेंटीना की आसमानी-सफेद धारियाँ देखते ही किसी को माराडोना का गेंद के साथ आधा मैदान चीरता हुआ दौड़ना याद आता है, किसी को मेसी का सिर झुकाकर, लगभग संकोच से भीड़ की तालियों को स्वीकार करना। इटली का नीला एक पुरानी यूरोपीय गरिमा की छाया लेकर चलता है और नीदरलैंड का नारंगी दूर से ही जोश की आहट देने लगता है।
विश्वकप शुरू होने से पहले ही ये रंग लोगों के भीतर जगह बना लेते हैं। शायद यही कारण है कि विश्वकप का पहला चित्र मैदान में नहीं बनता। वह किसी दुकान में हैंगर पर टँगी जर्सी से शुरू होता है, जहाँ कपड़ा अभी स्थिर होता है, पर उसके भीतर आने वाले उत्सव की पूरी हलचल छिपी रहती है।
रंग कभी अकेले नहीं चलते। वे अपने साथ भूगोल, इतिहास और सामुदायिक इच्छाएँ भी लेकर चलते हैं। किसी टीम को मैदान में उतरते देखने से पहले ही उसके रंग दर्शकों के भीतर एक मानसिक छवि बना चुके होते हैं। कई बार पूरा विश्वकप कुछ रंगों का कोलाज बनकर याद रह जाता है।
एक
ऐसा लगता है मानो इस बार विश्वकप की राहों पर पीला रंग कुछ अधिक देर तक ठहरा हुआ है। ब्राज़ील तो बरसों से अपनी धूप के साथ मैदान में उतरता रहा है, लेकिन अब ऑस्ट्रेलिया, इक्वाडोर, कोलंबिया और जमैका भी अपने-अपने पीले रंगों के साथ उपस्थित हैं। दिलचस्प यह है कि इन सबका पीला एक जैसा नहीं है। कहीं वह समुद्र के किनारे की सुबह जैसा है, कहीं उष्णकटिबंधीय दोपहर जैसा, कहीं एंडीज़ के पार फैले पठारों की सुनहरी आभा जैसा।
ब्राज़ील के पीले रंग की अपनी एक कथा है। एक समय वह देश सफेद जर्सी पहनता था। फिर एक हार आई, ऐसी हार जो केवल मैदान में नहीं हुई थी, मस्तिष्क में भी हुई थी। उसके बाद पीला रंग लाया गया और धीरे-धीरे इतना रच-बस गया कि आज उसे देखकर केवल राष्ट्रीय ध्वज नहीं याद आता। उसके भीतर सांबा की लय है, कोपाकबाना के किनारों के बेचैन सपने हैं और फुटबॉल को खेल नहीं, कला की तरह जीने वाली एक पूरी संस्कृति है।
जमैका का पीला एक दूसरी दुनिया से आता है। उसमें कैरेबियाई समुद्र की चमक है, ब्लू माउंटेन्स की हरित छायाएँ हैं और द्वीपीय जीवन की उन्मुक्तता है। इसी तरह, इक्वाडोर की जर्सियों में भी केवल राष्ट्रीय रंग नहीं दिखाई देते; उनमें भविष्य की ओर देखती हुई एक आकांक्षा दिखाई देती है। अब जर्सियाँ केवल झंडों के रंगों तक सीमित नहीं रहीं। वे संगीत, लोक-मन, भौगोलिक विशिष्टताओं और सांस्कृतिक अनुभवों को भी अपने भीतर सँजोने लगी हैं।
दो
इटली का नीला एक बिल्कुल अलग कहानी कहता है। उसके ध्वज में नीला रंग नहीं है, फिर भी दुनिया उसे “अज़्ज़ूरी” (नीला) के नाम से जानती है। यह रंग ‘हाउस ऑफ़ सावॉय’ राजवंश के ‘सावॉय ब्लू’ (Savoy Blue या Azzurro Savoia) से आया था और बाद में राष्ट्रीय खेल-पहचान का हिस्सा बन गया। राजशाही समाप्त होने के बाद भी वह रंग बचा रहा।
कुछ रंग इतिहास की ऐसी परतों से आते हैं जो राजनीतिक व्यवस्थाओं से भी अधिक लंबी उम्र पाती हैं। नीदरलैंड का नारंगी रंग उसके ‘हाउस ऑफ़ ऑरेंज’ राजवंश से जुड़ता है। लेकिन समय के साथ वह केवल राजवंशीय संकेत नहीं रहा। आज विश्वकप या यूरो कप के दौरान पूरा देश नारंगी समुद्र में बदल जाता है। एम्स्टर्डम की नहरों से लेकर छोटे कस्बों तक वही रंग दिखाई देता है। कई बार लगता है कि मैदान में नीदरलैंड की टीम कम, उसकी सामूहिक नागरिक ऊर्जा अधिक उतरती है।
अर्जेंटीना की आसमानी-सफेद धारियाँ विश्वकप की सबसे भावनात्मक दृश्य-पहचानों में गिनी जाती हैं। उनमें एक खुलापन है, जैसे बहुत दूर तक फैला हुआ आकाश। लेकिन उसी के भीतर एक प्रकार की उदासी भी चलती रहती है। शायद इसलिए कि अर्जेंटीना की फुटबॉल-स्मृतियाँ हमेशा विजय से नहीं बनीं; उनमें राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक संकट और माराडोना जैसी दुखांत प्रतिभाओं की छाया भी रही है।
मेज़बान देशों की जर्सियाँ भी हर विश्वकप में विशेष उत्सुकता जगाती हैं। अमेरिका, मेक्सिको और कनाडा इस बार अपने-अपने रंगों के साथ उपस्थित हैं। मेक्सिको की जर्सियों में बार-बार अपनी प्राचीन सभ्यताओं की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। अमेरिका अपनी विविधताओं को दृश्य रूप देने की कोशिश करता है और कनाडा अभी अपनी फुटबॉल-यात्रा की अपेक्षाकृत नई कहानी लिख रहा है। तीनों की जर्सियाँ मिलकर यह बताती हैं कि फुटबॉल केवल खेल नहीं, आत्मपरिचय की एक भाषा भी है।
विश्वकप की जर्सियों में रंग केवल खिलाड़ियों को अलग दिखाने के लिए नहीं चुने जाते। वे स्मृति में टिके रहने के लिए चुने जाते हैं। मैच समाप्त हो जाते हैं, स्कोर धुँधले पड़ जाते हैं, लेकिन रंगों की यात्रा भीतर चलती रहती है। वर्षों बाद लोगों को यह याद न रहे कि किसी मैच का परिणाम क्या था, पर उन्हें यह याद रहता है कि उस दिन उनकी गली में कौन सा रंग छाया हुआ था।
तीन
विश्वकप में जर्सियाँ टीमों को अलग-अलग पहचान देने का साधन हैं पर धीरे-धीरे वे चलते हुए झंडों में बदल जाती हैं। कई बार ऐसा लगता है कि मैदान में राष्ट्र उतरते हैं। रंग, प्रतीक, पैटर्न और डिज़ाइन मिलकर ऐसी दृश्य-भाषा रचते हैं जिसमें खेल और राष्ट्रीय पहचान एक-दूसरे के भीतर घुलने लगते हैं।
फुटबॉल का राष्ट्रवाद हमेशा सीमाओं और संघर्षों का राष्ट्रवाद नहीं होता। उसमें सांस्कृतिक गर्व की परतें भी शामिल रहती हैं। विश्वकप के दिनों में लोग अपनी टीम का समर्थन करने के साथ, अपने राष्ट्र की दृश्य उपस्थिति का भी जश्न मनाते हैं। जर्सियाँ इस उपस्थिति का सबसे प्रत्यक्ष माध्यम बन जाती हैं।
क्रोएशिया की चौखानेदार लाल-सफेद जर्सी इसका उल्लेखनीय उदाहरण है। उसका पैटर्न देश के ऐतिहासिक प्रतीक ‘शाहोव्नित्सा’ (क्रोएशियाई भाषा में ‘शतरंज की बिसात‘) से आता है। 1990 के दशक में यूगोस्लाविया के विघटन और उसके बाद हुए संघर्षों के बीच जब क्रोएशिया ने एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान निर्मित की, तब यही चौखाने उसकी सार्वजनिक पहचान बन गए। 1998 के विश्वकप में जब क्रोएशिया ने दुनिया को चकित किया, तब वह जर्सी केवल खिलाड़ियों की पोशाक नहीं रही; वह एक नए राष्ट्र के आत्मविश्वास का रूप बन गई। छोटे राष्ट्र कई बार खेलों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दुनिया में कहीं अधिक तीव्रता से दर्ज कराते हैं, क्योंकि खेल उन्हें वह दृश्यता देता है जो राजनीति या अर्थव्यवस्था हमेशा नहीं दे पाती।
अफ्रीका की जर्सियों में भी पहचान का यही आग्रह दिखाई देता है। 2018 विश्वकप के दौरान नाइजीरिया की मिंट ग्रीन जर्सी ने असाधारण लोकप्रियता प्राप्त की थी। पारंपरिक अफ्रीकी रूपांकनों और आधुनिक डिज़ाइन के मेल ने उसे विश्वकप इतिहास की सबसे चर्चित जर्सियों में शामिल कर दिया। लेकिन उसकी सफलता केवल फैशन की सफलता नहीं थी। उसमें एक ऐसे महाद्वीप का आत्मविश्वास दिखाई देता था जो लंबे समय तक वैश्विक खेल-सौंदर्यशास्त्र के भीतर अपनी जगह खोजता रहा और अब अपने रूपांकनों और प्रतीकों के माध्यम से स्वयं को व्यक्त करना चाहता था।
इसीलिए आज अनेक देश अपनी स्थानीय कला, स्थापत्य और सांस्कृतिक परम्पराओं को जर्सियों में स्थान देने लगे हैं। जापान ने एक विश्वकप किट में ओरिगामी से प्रेरित पैटर्न का उपयोग किया था। मैक्सिको समय-समय पर एज़्टेक सभ्यता के प्रतीकों की ओर लौटता रहा है। मोरक्को की जर्सियों में पारंपरिक ज्यामितीय आकृतियों की छाया दिखाई देती है। इन डिज़ाइनों को देखते हुए लगता है कि वैश्विक खेल-बाज़ार के भीतर भी संस्कृतियाँ अपनी विशिष्टता बचाए रखने के रास्ते खोज लेती हैं।
जर्सियाँ कई बार सांस्कृतिक स्मृति का ऐसा घर बन जाती हैं जहाँ इतिहास बिना शब्दों के उपस्थित रहता है। एक पैटर्न, एक आकृति या एक रंग अपने भीतर उन कथाओं को सँजोए रखता है जिन्हें लंबी व्याख्याओं की आवश्यकता नहीं होती।
2026 का विश्वकप इस दृष्टि से भी अलग है कि अब मैदान में 32 नहीं, 48 टीमें उतरेंगी। इसका अर्थ है कि पहले से कहीं अधिक रंग, अधिक प्रतीक, अधिक इतिहास और अधिक व्याख्याएँ एक साथ विश्वकप की दृश्य-भाषा का हिस्सा बनेंगी। कुछ सप्ताहों के लिए ऐसा लगेगा मानो पृथ्वी के अनेक भूगोल अपनी-अपनी जर्सियाँ पहनकर एक ही मैदान की ओर चल पड़े हों।
चार
जर्सियाँ रंगों और पैटर्नों के माध्यम से बोलती रही हैं। अब वे अपने भीतर शब्द भी सँजोने लगी हैं। कई टीमों ने अपनी किटों में छोटे-छोटे संदेश, सांस्कृतिक सूत्र और राष्ट्रीय उद्घोष अंकित किए हैं। इक्वाडोर की जर्सी में अंकित वाक्य, “Sonar, Trascender y Hacer Historia” सपने देखने, सीमाओं से आगे बढ़ने और इतिहास रचने की आकांक्षा व्यक्त करता है। मेज़बान अमेरिका की जर्सी “The Best of Us” का संदेश लेकर आती है, मानो विविधताओं से भरे समाज का सर्वश्रेष्ठ रूप मैदान पर उतर रहा हो।
मैक्सिको ने अपनी एक किट के पिछले हिस्से पर “Somos México” अंकित किया, जो सामूहिक आत्मपरिचय की घोषणा जैसा प्रतीत होता है। अर्जेंटीना की जर्सी पर पीछे अंकित छोटा सा “1893” देख गफलत में मत पड़िए। यह वह साल है जब अर्जेंटीना फुटबॉल महासंघ की स्थापना हुई थी।
इस तरह जर्सियाँ अब देखी जाने के साथ, पढ़ी भी जाती हैं। उनमें राष्ट्र अपने बारे में कुछ कहने लगे हैं। रंग जहाँ उनकी दृश्य पहचान हैं, वहीं ये शब्द उनकी आत्मकथा के संक्षिप्त वाक्य बन जाते हैं।
पाँच
फिर भी फीफा-जर्सियों की कहानी केवल राष्ट्रीय पहचान की कहानी नहीं है। उसकी एक दूसरी धारा भी है जो सीमाओं के पार बहती है। दुनिया के अनेक देशों में लोग अपनी राष्ट्रीय टीम से अधिक किसी दूसरी टीम के समर्थक बन जाते हैं। दक्षिण एशिया के अनेक हिस्सों में अर्जेंटीना और ब्राज़ील की जर्सियाँ उतनी ही आत्मीयता से पहनी जाती हैं जितनी ब्यूनस आयर्स या रियो डी जनेरो में। अफ्रीका और एशिया के कई देशों में फ्रांस, पुर्तगाल और स्पेन के समर्थकों की बड़ी संख्या दिखाई देती है। यहाँ समर्थन भूगोल से कम और भावनात्मक आकर्षण से अधिक तय होता है।
इस प्रकार विश्वकप एक रोचक विरोधाभास रचता है। एक ओर जर्सियाँ राष्ट्रों की पहचान को और स्पष्ट करती हैं, दूसरी ओर वही जर्सियाँ सीमाओं के पार नए अनुरागी समुदाय भी बनाती हैं। कोई व्यक्ति किसी देश का नागरिक हुए बिना भी उसके रंगों से जुड़ सकता है।
शायद इसी कारण मैच समाप्त होने के बाद जर्सी बदलने का दृश्य इतना प्रतीकात्मक लगता है। कुछ क्षण पहले तक जो रंग एक-दूसरे के विरुद्ध खड़े थे, वे अचानक एक-दूसरे के हाथों में दिखाई देते हैं। मानो राष्ट्र थोड़ी देर के लिए अपने औपचारिक तनाव उतारकर मनुष्य में लौट आए हों।
इसी में विश्वकप की एक गहरी सुंदरता छिपी है। जर्सियाँ राष्ट्रों का प्रतिनिधित्व करती हैं, लेकिन अंततः वे हमें यह भी याद दिलाती हैं कि हर रंग के भीतर एक मनुष्य खड़ा है और हर प्रतीक के भीतर एक कहानी।
छह
विश्वकप की जर्सियों का इतिहास केवल सफल डिज़ाइनों का इतिहास तो है ही; उसमें कुछ ऐसी जर्सियाँ भी हैं जिन्हें लोग उनकी सुंदरता के लिए नहीं, उनकी विचित्रता के लिए याद रखते हैं।
1998 में मेक्सिको की हरी जर्सी पर एज़्टेक सभ्यता की आकृतियों का इतना बड़ा विस्तार था कि दूर से देखने पर वह किसी प्राचीन शिलालेख जैसी लगती थी। मानो खिलाड़ी की छाती पर कोई विशाल चेहरा उभर आया हो जिसकी जिव्हा पेट से झाँक रही है। इसे अखबारों ने फैंसी ड्रेस करार दे दिया। उसी विश्वकप में दक्षिण अफ्रीका की सफेद जर्सी अपने असमान रंग-विन्यास के कारण चर्चा में रही। एक बाँह और धड़ के हिस्सों पर रंगों का वितरण ऐसा था कि पूरी पोशाक किसी अधूरे रेखाचित्र जैसी दिखाई देती थी।
इस सूची में स्कॉटलैंड की 1986 की और स्पेन की 1994 की किट भी शामिल हैं। कहीं रेखाएँ अचानक शुरू होकर अचानक समाप्त हो जाती थीं, कहीं रंगों का संतुलन आँखों को असहज कर देता था। 2014 में कैमरून की जर्सी पर बने छोटे-छोटे शेर भी दूर से एक विचित्र दृश्य रचते थे।
ऐसी जर्सियाँ याद दिलाती हैं कि विश्वकप की जर्सी-संस्कृति में सौंदर्य और असफलता दोनों साथ चलते हैं। कुछ डिज़ाइन इतिहास में इसलिए दर्ज होते हैं कि वे कालजयी थे और कुछ इसलिए कि वे अपने समय की सबसे साहसी भूल साबित हुए।
सात
विश्वकप की जर्सियों में रंगों और प्रतीकों से इतर, एक और संसार चलता है, नंबरों का संसार। वही नंबर जो पहली दृष्टि में खिलाड़ियों की पहचान के लिए दिए गए अंक प्रतीत होते हैं, लेकिन समय के साथ मिथकों में बदल जाते हैं। फुटबॉल में कुछ अंक ऐसे हैं जिन्होंने अपनी गणितीय प्रकृति बहुत पहले छोड़ दी। वे अब संख्या कम, संदेश अधिक हैं।
“10” उनमें सबसे प्रसिद्ध है।
एक समय वह केवल मैदान पर एक स्थान का संकेत था। फिर पेले ने उसे पहना, माराडोना ने उसे कथा में बदला, ज़िदान ने उसमें शिल्प जोड़ा और मेसी ने उसे एक नए युग तक पहुँचाया। धीरे-धीरे “10” एक अंक से अधिक एक कल्पना बन गया। दुनिया भर के असंख्य बच्चों ने उसे प्रतिभा, सृजन और खेल-सौंदर्य के प्रतीक की तरह देखना शुरू कर दिया। शायद इसीलिए किसी भी खेल-सामग्री की दुकान में जाकर देखिए, सबसे अधिक बार वही अंक दिखाई देगा। वह जर्सी की पीठ पर लिखा रहता है, पर उसकी आकांक्षा बच्चों की आँखों में रहती है।
“7” की यात्रा भिन्न है।
उसमें एक प्रकार की सार्वजनिक चमक दिखाई देती है। जॉर्ज बेस्ट, डेविड बेकहम और क्रिस्टियानो रोनाल्डो जैसे खिलाड़ियों ने उसे मैदान से निकालकर लोकप्रिय संस्कृति तक पहुँचा दिया। यह उन दुर्लभ नंबरों में है जिसने खेल, फैशन और बाज़ार; तीनों संसारों में समान रूप से अपनी जगह बनाई। “सीआर7” (क्रिस्टियानो रोनाल्डो7) को देखते हुए कभी-कभी लगता है कि एक अंक भी ब्रांड बन सकता है।
“9” लंबे समय तक गोल की प्रतीक्षा का अंक रहा। वह कलाकार की तुलना में निष्कर्ष का अधिक प्रतीक दिखाई देता है। मैदान में बहुत-सी सुंदर चीज़ें घट सकती हैं, पर अंततः गेंद को जाल तक पहुँचाने की जिम्मेदारी अक्सर उसी नंबर से जुड़ती रही है। रोनाल्डो नाज़ारियो, एर्लिंग हालैंड, करीम बेंजेमा को कौन भूल सकता है! इसीलिए इस नम्बर के भीतर एक प्रकार की निर्णायकता बस गई है।
और फिर “1” है।
गोलकीपर की जर्सी बाकी खिलाड़ियों से अलग होती है। उसका रंग अलग होता है, उसका क्षेत्र अलग होता है और उसका भाग्य भी। वह टीम का हिस्सा होते हुए भी कुछ दूरी पर खड़ा रहता है। फुटबॉल के इतिहास में अनेक महान क्षण ऐसे हैं जहाँ वही अंतिम नायक दिखाई देता है। अनेक दुखद स्मृतियाँ भी ऐसी हैं जहाँ हार का सारा बोझ उसी के कंधों पर आ गिरता है। शायद इसीलिए गोलकीपर की जर्सी पर लिखे नम्बर “1” में एक इकलौतापन, अनोखा अकेलापन बसा रहता है।
अलग-अलग फुटबॉल संस्कृतियाँ अलग-अलग नंबरों को अलग अर्थ देती हैं। अर्जेंटीना में “10” लगभग एक सांस्कृतिक विरासत है। इंग्लैंड में “7” का अपना आकर्षण है। इटली में रक्षात्मक खिलाड़ियों से जुड़े नंबरों की प्रतिष्ठा अलग रही है। यानी अंक भी अपनी-अपनी यात्राएँ करते हैं और अलग-अलग भूगोलों में अलग अर्थ ग्रहण करते हैं।
लेकिन नंबरों का वास्तविक जीवन मैदान में नहीं, आख्यानों में शुरू होता है।
बहुत से लोगों को पुराने विश्वकपों के सभी परिणाम याद नहीं रहते, पर उन्हें यह अवश्य याद रहता है कि उनकी पहली जर्सी पर कौन-सा अंक लिखा था। वह अंक किसी खिलाड़ी से जुड़ा होता है, किसी शाम से, किसी दोस्त से, किसी हार या किसी जीत से। धीरे-धीरे संख्या और स्मृति एक-दूसरे में घुल जाते हैं।
कई बार बच्चे किसी देश से पहले किसी नंबर के प्रशंसक बनते हैं। वे उरुग्वे नहीं चुनते, “10” चुनते हैं। वे पुर्तगाल नहीं चुनते, “7” चुनते हैं। उनके लिए अंक ही खिलाड़ी का दूसरा नाम बन जाता है।
शायद इसी कारण विश्वकप की कुछ सबसे यादगार तस्वीरें चेहरों की नहीं, पीठों की तस्वीरें होती हैं। कैमरा दूर चला जाता है, खिलाड़ी भीड़ में खो जाता है, लेकिन जर्सी पर लिखा हुआ एक अंक बचा रह जाता है। और कभी-कभी वही अंक पूरे युग की पहचान बन जाता है।
आठ
विश्वकप की जर्सियाँ केवल खेल-पोशाक नहीं रहीं। वे उन दुर्लभ वस्तुओं में शामिल हो चुकी हैं जिनमें खेल, बाज़ार और आकांक्षा एक साथ दिखाई देते हैं। टूर्नामेंट शुरू होने से बहुत पहले नई जर्सियाँ दुनिया के सामने आ जाती हैं। बड़े खेल-ब्रांड उनके लिए विशेष अभियान चलाते हैं। वीडियो बनाए जाते हैं, पुराने विश्वकपों की स्मृतियाँ जगाई जाती हैं, महान खिलाड़ियों की छवियाँ फिर से सामने लाई जाती हैं। कई बार लगता है कि विश्वकप का पहला मैच स्टेडियम में नहीं, जन-मन में खेला जाता है।
तो क्या जर्सियों की कहानी केवल बाज़ार की कहानी है? यदि ऐसा होता तो विश्वकप समाप्त होते ही वे अपना महत्व खो देतीं। लेकिन लोग जर्सियाँ केवल इसलिए नहीं खरीदते कि वे किसी टीम का समर्थन कर सकें। वे उन्हें इसलिए भी चुनते हैं क्योंकि उनके भीतर किसी कथा का हिस्सा बनने की इच्छा होती है। कोई व्यक्ति स्पेन की जर्सी पहनते समय केवल एक देश नहीं पहनता; वह अपने भीतर टिकी-टाका की लय, आंद्रेस इनिएस्ता के निर्णायक स्पर्श और फुटबॉल को धैर्य से रचने की कला भी पहनता है। कोई जर्मनी की जर्सी चुनता है तो उसके साथ केवल सफ़ेद और काला रंग नहीं आता, उसके साथ फ्रांज़ बेकेनबाउर और खेल को सामूहिक अनुशासन की मिसाल में बदल देने वाली एक परंपरा भी आती है। इसीलिए पुरानी जर्सियों का आकर्षण कई बार नई जर्सियों से अधिक होता है। 1994 की नाइजीरिया, 1998 की जापान और 1990 की कोस्टा रिका की जर्सियाँ ऐसी यादगार चीजें हैं जिनमें एक पूरा युग सुरक्षित है। अनेक युवा उन विश्वकपों के जन्म के वर्षों बाद पैदा हुए, फिर भी वे उन जर्सियों को पहनते हैं। मानो स्मृति भी विरासत की तरह अगली पीढ़ियों तक पहुँचती हो।
नौ
विश्वकप की इस कथा का एक विशेष अध्याय भारत में भी लिखा जाता है।यह एक अद्भुत दृश्य है कि जिस देश की टीम विश्वकप में नहीं खेलती, उसके बाज़ार फिर भी विश्वकप के रंगों से भर जाते हैं। महानगरों से लेकर छोटे कस्बों तक दुकानों में अर्जेंटीना की धारियाँ, ब्राज़ील का पीला, फ्रांस का नीला और पुर्तगाल का लाल दिखाई देने लगता है। कुछ दिनों के लिए भारतीय गलियाँ दूर देशों के रंगों में रंग जाती हैं।
यह खेल-प्रेम है। यह भागीदारी की इच्छा भी है। कोई बच्चा मेसी की जर्सी पहनकर स्कूल जाता है। कोई युवक रोनाल्डो का सात नंबर अपनी पीठ पर लेकर मोटरसाइकिल चलाता है। कहीं मित्रों का समूह फ्रांस और अर्जेंटीना में बँट जाता है। यह भी बहुत रोचक है कि इस उत्सव का बड़ा हिस्सा उन जर्सियों के सहारे बनता है जो आधिकारिक नहीं होतीं। फुटपाथों, स्थानीय बाज़ारों और अस्थायी दुकानों में बिकने वाली सस्ती प्रतियाँ विश्वकप को उन लोगों तक पहुँचाती हैं जिनके लिए मूल जर्सियाँ एक विलासिता हैं। वे तकनीकी रूप से भले असली न हों, लेकिन उनके भीतर जो उत्साह होता है, वह पूरी तरह असली होता है। कई बार फुटबॉल का सबसे लोकतांत्रिक रूप वहीं दिखाई देता है।
दस
और फिर विश्वकप समाप्त हो जाता है।
झंडे उतर जाते हैं। स्टेडियम सूने हो जाते हैं। भीड़ अपने-अपने शहरों में लौट जाती है। दुनिया दूसरे प्रसंगों में व्यस्त हो जाती है। नए मैच, नए नायक और नई चर्चाएँ धीरे-धीरे पुरानी उत्तेजनाओं की जगह ले लेती हैं।
लेकिन जर्सियाँ इतनी जल्दी विदा नहीं लेतीं।
वे अलमारियों में टँगी रहती हैं। कुर्सियों के हत्थों पर पड़ी रहती हैं। पुराने बैगों में तह करके रख दी जाती हैं। धीरे-धीरे समझ में आता है कि विश्वकप केवल मैचों की कतार नहीं है। वह उन दुर्लभ क्षणों में से एक है जब दुनिया के करोड़ों लोग किसी रंग, किसी नंबर और किसी खिलाड़ी के भीतर अपनी थोड़ी-सी उम्मीद रख देते हैं।
इसीलिए लोगों को पुराने विश्वकपों के सभी स्कोर याद नहीं रहते। उन्हें अपनी पहली जर्सी याद रहती है। वह कहाँ से खरीदी थी। किस खिलाड़ी का नंबर था। किस शाम उसे पहनकर पहला मैच देखा था। उसने उल्लास दिया था या निराशा। जीत के बाद उसे गर्व से झलकाया था या हार के बाद चुप्पी से उतारकर रख दिया था। बरसों बाद भी किसी सूटकेस के कोने से वह पुरानी जर्सी निकल आए तो उसके साथ समय का एक टुकड़ा भी बाहर आता है। कुछ चेहरे, कुछ आवाज़ें, कुछ अधूरी बहसें और कुछ भूले हुए मैच भी।
यादों को ज़रा टटोलिए। आपकी पहली जर्सी किस देश की थी? उसकी पीठ पर कौन-सा नंबर लिखा था? शायद उसी उत्तर में आपका पहला विश्वकप छिपा हुआ है।
दीप्ति कुशवाह
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