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‘हमारे प्यार से इस शहर को कभी जुदा मत करना’

मेरे जानते यह रवीश कुमार की लिखी किताब ‘इश्क में शहर होना’ की सबसे अच्छी समीक्षा है. जब कोई विद्वान् किसी कृति को देखता है तो उसका पाठ उसे कलाकृति में बदल देता है. शिक्षाविद मनोज कुमार ने यही किया है. जरूर पढ़िए और अपनी राय दीजिए- मॉडरेटर 
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इश्क के अफ़सानों में आशिक़ों के नाम होते हैं – जैसे लैला-मजनूँ, हीर-राँझा, राधा-कृष्ण आदि | हालाँकि सूफियाने इश्क में आमतौर पर ‘बालम’, ‘पिया’, ‘साजन’ ‘मुरारी’ ,राधा  जैसे सामान्य जेनेरिक संबोधनों से या द्वितीय पुरुष सार्वनामिक संबोधनों से काम चला लिया जाता है, लेकिन सूफियाने इश्क को भी जब प्रबंध काव्य में रचा जाता है तो वहाँ भी नायक-नायिकाओं के नाम होते हैं – जैसे पदमावती-रत्नसेन आदि | नाम होंगे तो नामो के इतिहास भी होंगे और उनका कुल-गोत्र भी | नामों के अपने देश भी होते हैं जैसे सिंहलद्वीप और चितौडगढ़ | नाम होंगे, नामों के देश और काल होगें तो अफ़साने बनेंगे | अफ़सानों की कहीं शुरुआत होगी, कहीं जाकर कोई पेंच फंसेगा और फिर वह किसी परिणति तक पंहुचेगा| आदि , मध्य और अंत – अरस्तू महाराज के जमाने से प्लाट में इन तीन ठिकानों की पहचान की जाती रही है| 
लेकिन जब कोई इश्क या आशिकी में शहर हो जाए तो आशिकों के नाम क्या होगें? शहर में तो सब गुमनाम होते हैं | शहर में गँवई आदमी गुमनाम होने ही आता है|  इश्क में निश्चित नाम और रूप की सीमा को लाँघ जाना ही शायद इश्क में शहर हो जाना है| लिहाज़ा रवीश कुमार और विक्रम नायक की किताब – ‘इश्क में शहर होना’ में आशिकों के नाम नहीं हैं | कहीं कोई नाम आ भी गए हैं तो बस यूं ही आ गए हैं  वरना , जेनेरिक संबोधनों और द्वितीय पुरुष सर्वनामों से ही काम चला लिया गया है| शायद सर्वनामीकरण अमूर्तन की पहली सीढ़ी है, लेकिन नाम न हो, नामों के कुल-गोत्र नहीं हो और उनका कोई निश्चित देश और काल न हो तो कहानी कैसे बने? तो क्या इसे प्रेम की स्फुट कविताओं के संकलन के तौर पर देखा जाए- कुछ मीरा या कबीर के पदों के संकलन की परम्परा  में या ग़ालिब या मीर के दीवान की तरह ?

इसके पहले कि कोई इस इश्क को झट से निर्गुनिया-सूफियाना इश्क की परम्परा से जोड़ दे एक बार ठहर कर देखना होगा कि इश्क को जिस शहर के सांचे में ढालने की कोशिश है वह शहर  इक्कीसवीं सदी का शहर है और इक्कीसवीं सदी का शहर एक निपट उथला स्पेस है| इस शहर को  इश्क का व्यंजक बनाएँ तो कैसे ? 
  
शहर का इतिहास और भूगोल सब गड्डमड्ड है | “मुनिरका से 620 नम्बर की बस तीनमूर्ति पहुँचने से पहले यूरोपीय स्प्रिंग से गुजरने लगती है |” और बारा पुला से गुजरते हुए हुमांयू के मकबरे  की पीठ और निज़ामुद्दीन  की छते दिखती हैं| वैशाली भी है और वैशाली के नगरवधू का बाग़ आम्रपाली  भी , लेकिन स्वंय वैशाली की नगरवधू कहाँ है? सबकुछ गड्डमड्ड- वर्त्तमान में यहाँ –वहाँ तैरते इतिहास के कालखंड और खंड-खंड इतिहासों के चहबच्चों में उबचुभ करता वर्तमान|

इस शहर की कोई चौहद्दी ही नहीं है – शहर कब गुडगाँव में घुसा चला आता है और कब वैशाली और आम्रपाली की ओर चला जाता है पता ही नहीं चलता | बीच में है है छतरपुर मंदिर और रामलीला मैदान | सराय काले खां और साऊथ एक्स के बीच है बारा पुला|

शहर में आशिकों को किस स्थायी पते पर ढूंढेंगे | नाम और पते के बिना अफसाने कैसे बनेंगे | प्लाट के आदि मध्य और अंत का क्या होगा? इस शहर में न तो अपना कोई प्लाट है और न ही स्थायी पता | शहर में कुछ है तो बस डेरा | इसलिए ‘इश्क में शहर होना’ की रचनाएँ पारंपरिक अर्थों में कहानी तो नहीं बन पाती |

मुश्किल यह है कि रवीश कुमार और विक्रम नायक की किताब के प्रकाशकीय पेज पर इस किताब में शामिल रचनाओं को अंग्रेजी में नैनो फिक्शन कहा गया है| हिन्दी में इसे लघु प्रेम कथा की श्रंखला की पहली किताब के रूप में प्रकाशित किया गया है | कथा चाहे लघु हो या दीर्घ किसी कथा से पाठकों की अपेक्षा तो वही होगी जो आम तौर पर कथा से होती है – यानी आदि , मध्य और अंत | और अगर इसे हम प्रेम की कथा नहीं मानकर प्रगीत, दोहा और गजल की तरह देखें तो फिर प्रेम के सान्द्र भाव के बीच मूलचंद फ्लाई ओवर के लिए जगह कहाँ बचती है | 
दरअसल किसी रचना तक कोई पाठक अपनी पूर्व तैयारी के साथ आता है | और ‘इश्क में शहर होना’ जैसी किताब से गुजरते हुए उसकी पूर्व तैयारी धरी की धरी रह जाती है | हालाँकि अरस्तूयुगीन कथानक परम्परा और भरत के समय से चली आ रही काव्य की रसवादी परम्परा को तो हिन्दी के आधुनिक साहित्यकारों ने पिछली शताब्दी में ही चुनौती दे डाली, लेकिन उन  रचनाओं ने अपने आस्वादन की एक उच्च भ्रू दुनिया रची  थी जिस दुनिया में निर्मल वर्मा की उपन्यास कहानियों से लेकर नौकर की कमीज तक स्वीकृति पाती रही | एक लोकप्रिय टीवी पत्रकार जब शहर में प्रेम जैसे विषय पर लिखता है तो उसके पाठक एक उच्चभ्रू मानसिकता और वैसी पाठकीय तैयारी के साथ रचना को एप्रोच नहीं करते | फिर भी उन पाठकों में से कुछ तो इन रचनाओं में अपना स्पेस खोज पाते हैं , कुछ को अपनी पूर्व तैयारी और उससे उपजे पाठकीय संस्कार के कारण ये रचनाएँ किसी हद तक अटपटी और अर्थहीन सी लगती हैं |
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अरस्तू, भरतमुनि और अभिनवगुप्त के मिले-जुले प्रभाव वाले अपने साहित्यक संस्कारों के बावजूद यह किताब मेरे जैसे पाठक के भीतर कोई स्पेस तो रचती है| शायद यह ऐसे समय में और दिल्ली और दिल्ली जैसे शहरों में रहने का नतीजा हो| ये शहर हमारे ऊपर प्रभाव तो डालते हैं, लेकिन न तो हम उस प्रभाव को समझ पाते हैं और न ही अपने समय को| शायद यह किताब उन प्रभावों को छिटपुट ढंग से ही सही यहाँ – वहाँ  कुछ दर्ज करती चलती है | इसलिए इस किताब और अपने साहित्यिक संस्कारों के बीच पुल बनाकर अपने समय में खुद को समझने की दिशा में हम एक पहल कर सकते हैं| और यह जो पुल बनेगा वह बारापुला से कम घुमावदार तो क्या होगा! 
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तो सबसे पहले तो हम अगर इसे श्रृंगार रस की रचना माने तो प्रश्न उठेगा कि इन रचनाओं का स्थायी भाव क्या है? श्रृंगार रस का स्थायी भाव रति है, कौतूहल, उत्कंठा, बेचैनी, व्रीड़ा (लज्जा), चापल्य आदि श्रृंगार के संचारी भाव हैं| इश्क की इन रचनाओं का स्थायी भाव क्या है? रति जैसा सान्द्र भाव तो इन रचनाओं के केंद्र में शायद ही दिखे| ये आशिक तो शहर के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में भागते रहते हैं| खाप और सीसीटीवी कैमरे की नज़रों से बच बचाकर अपना एकांत तलाशते रह जाते हैं| जिस शहर को महज उद्दीपन विभाव होना चाहिए था वह आलंबन विभाव की जगह को घेर लेता है –इस कदर कि दोनों एकरूप हो जाते हैं  –
“तुम मुझसे प्यार करते हो या शहर से ?
शहर से; क्योंकि मेरा शहर तुम हो |”  

इस इश्क के केंद्र में शायद रति नहीं, बल्कि एक अस्तित्वगत उद्विग्नता या existential angst है | 
यह उद्विग्नता अपने समय में होने और नहीं होने को लेकर है; अपने समय को ठीक-ठीक पहचानने को लेकर है –
‘तुम आजकल हिस्ट्री चैनल हो गए हो|…तुम्हारी बातें, तुम्हारे स्टेटस और तुम्हारी ये जगहें| यह भी कोई आने की जगह है! विशाल हुमायूँ के मकबरे के नीचे|… सेलेक्ट सिटी मॉल चलते हैं |’
यह उद्विग्नता अपने प्रेम को निश्चित स्थान में टिकाने को लेकर है – ‘करावल नगर, राजौरी गार्डेन या साउथ एक्स , साउथ दिल्ली – ‘सुनो क्या तुम साउथ दिल्ली में मकान नहीं ले सकते?’ 

प्रेम में अकसर कुल खानदान की ओर से बाधा आती है | मीरा को राणा ने विष का प्याला दिया| यहाँ प्रेमियों के बीच कुल खानदान नहीं बल्कि सर्वव्यापी राज्य है जो सीसीटीवी कैमरों से हमेशा प्रेमियों को घूरता रहता है | और खापवादी राजनीति है जो परम्परागत जाति व्यवस्था से कम और राष्ट्र-राज्य की आधुनिक राजनीति से ज्यादा पोषित है | फिर अन्ना आन्दोलन द्वारा उपलब्ध करवाया गया मुक्ति और एकांत का स्पेस है जो जल्दी ही मध्यवर्गीय अभिभावकों द्वारा हड़प लिया जाता है | 

प्रेमी प्रेम के सहेट स्थल की तलाश में प्रेमी दिल्ली की बसों में भटकते रहते हैं | शास्त्रीय नायिकाओं की तरह यह नायिका अमास्वस्या की रात में काला वस्त्र पहनकर और पूनो की रात में श्वेत वस्त्र धारण कर के नहीं निकलती है | – ‘मार्कोपोलो| ये बसें न होतीं तो तुम कहाँ भटकती, हम कहाँ मिलते| सरोजनी नगर में सीसीटीवी कैमरे लगे हैं| लाजपत नगर में भी यही हाल है| शहर का हर उजाला कैमरे में कैद है | मार्कोपोलो में भटकना हमारे लिए अच्छा है दोस्त |   

शास्त्रीय प्रेम से इन तमाम विचलनों के बावजूद है तो यह प्रेम ही | क्या हो गया अगर यह प्रेम शहर हो गया है – उदारीकृत वैश्विक संस्कृति का शहर जिसकी शिनाख्त नहीं हो पा रही है | अगर इस शहर को शहर होना है तो इसे प्रेम में होना ही होगा|

जो इश्क में शहर हो गया है उसका existential angst यह है कि जिसे दिल्ली कहते हैं वह शहर है भी कि नहीं | करावल नगर है , साउथ एक्स है , हुमायूँ का मकबरा है, वैशाली है , आम्रपाली है , दिल्ली किधर है ? और जिस इश्क को शहर दिल्ली होना है जब उसके वजूद का ही पता नहीं है तो इश्क के वजूद को लेकर निश्चिंत कैसे हो सकते है |
सो एक न टलने वाली उद्विग्नता किताब के पहले पन्ने से लेकर आख़िरी पन्ने तक पसरी है | और इश्क में होना इस उद्विग्नता को भरसक टालने की कोशिश है |
 “ हमारे प्यार से इस शहर को कभी जुदा मत करना|”
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मुझको पता है कि इस किताब के बारे में पाठकों की अलग-अलग राय है , लेकिन अपने हमउम्र सहपाठियों को बेहिचक कह सकता हूँ कि इस किताब को पढ़ना उन्हें शहर में होने , होते रहने या न हो पाने की बेचैनियों और बेकरारियों को देखने-बूझने का एक मौक़ा देगा | अलग-अलग तरह की किताबें अलग-अलग पाठकीय बर्ताव की माँग करती है| आज तीसरे पहर किताब को फिर से उलट-पुलट रहा था तो बेटी ने पूछ लिया कि तुमने तो यह किताब कल ही पढ़ डाली थी , फिर आज दोबारा क्या पढ़ रहे हो | निर्मल वर्मा ने कभी एक लेख लिखा था – “नोबोकोव साहित्य शिक्षक के रूप में|” मुझको इस लेख का ध्यान आया | इस लेख में नोबोकोव को यह कहते हुए उध्दृत किया गया है कि पहले पाठ में हम किसी रचना का एकरेखीय (linear) पाठ करते हैं | दूसरे-तीसरे पाठ में हम उसे किसी पेंटिंग या कलाकृति के रूप में देखना शुरू करते हैं |

मेरी हैसियत नहीं है कि मैं इस किताब के साहित्यिक मूल्यवत्ता के बारे में कुछ कह सकूँ | लेकिन एक आम पाठक की हैसियत से कह सकता हूँ कि यह किताब अगर आपकी मेज पर हो तो इसे बार – बार पलट सकते हैं , कहीं से भी पढ़ना शुरू कर सकते हैं और विक्रम नायक के बनाए रेखाचित्रों के सहारे दृश्यों के उस पार झाँकने की कोशिश कर सकते हैं | जैसा कि लेखक रवीश कुमार ने स्वीकार किया है कि यह विक्रम नायक और रवीश दोनों की किताब है | किताब के रेखाचित्र सजावटी नहीं हैं | ये रेखाचित्र प्रसंग के भीतर प्रसंग और कथा के भीतर उपकथा रचते चलते हैं | हिन्दी प्रकाशन की दुनिया में यह एक नया प्रयास है अन्यथा चित्रकार का काम कवर पेज डिजाइन करने के बाद समाप्त हो जाता है | संयोग से किताब का कवर पेज भी सुन्दर बना है| किताब की साइज थोड़ी छोटी है | अगर यह सामान्य आकार की हार्ड बाइंडिंग वाली किताब होती तो शायद इसका कवर और निखर कर आता | किताब की कीमत कम रखने के उद्देश्य से शायद इसके उत्पादन लागत को कम रखने की कोशिश की गई है | इसे कॉफ़ी टेबल बुक नहीं बनाकर अच्छा ही किया, लेकिन हिन्दी के पाठकों से कुछ और पैसे तो वसूले ही जा सकते हैं !   
मनोज कुमार

   

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