• कथा-कहानी
  • अशअर नज्मी की कहानी ‘लाशों का रफ़ूगर’

    अशअर नज्मी उर्दू के सुपरिचित लेखक हैं। 2021 में प्रकाशित उनके उपन्यास उसने कहा था को उर्दू का पहला पोस्ट्माडर्न नॉवेल माना जाता है। उनके दो अन्य उपन्यास ‘शून्य की तौहीन’ और ‘काँग्रेस हाउस’ का हिन्दी अनुवाद ‘सेतु प्रकाशन’ और ‘राजपाल एण्ड संस’ छाप चुके हैं। इसके अतिरिक्त दो उर्दू लघुकथा-संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं। पिछले दो दशकों तक भारतीय टेलिविज़न इंडस्ट्री से जुड़े रहे, जहां उन्होंने कई टीवी धारावाहिक लिखे। 2008 से उर्दू साहित्यिक पत्रिका ‘इसबात’ के संपादक पद पर कार्यरत हैं। आज पढ़िए उनकी कहानी जिसका उर्दू से बाकमाल अनुवाद किया है रिज़वानुद्दीन फ़ारूक़ी ने- मॉडरेटर 

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    मुर्दाघर की पक्की दीवारों पर फॉर्मेलिन (Formalin) की गंध ने एक अजीब सी चिपचिपाहट पैदा कर दी थी जो अब अब्दुल ग़नी के पुराने एप्रन पर भी जगह-जगह धब्बों के रूप में चिपकी हुई थी। लोहे के स्ट्रेचर पर पड़ी लाश इस समय एक फटे कपड़े से ज़्यादा कुछ नहीं थी जिसके रेशे अलग-अलग दिशाओं में खिंचे हुए थे। पीले बल्ब की मद्धम रौशनी स्ट्रेचर के पहियों पर लगे ताज़ा ख़ून और मिट्टी के निशानों को उजागर कर रही थी।
    अब्दुल ग़नी ने धागे की एक लंबी डोरी खींची और उसे दाँतों से काटा। उसके हाथ में पकड़ी सुई झुकी हुई थी, जैसे उसने बहुत से कठोर जिस्मों का बोझ उठाया हुआ हो।
    “ग़नी! अभी कितने टाँके बाक़ी हैं?” तिवारी ने बरामदे में खड़े होकर बीड़ी का धुआँ अंदर की ओर उछाला। “डॉक्टर साहब ने रिपोर्ट पर दस्तख़त कर दिए हैं। बस जल्दी-जल्दी टाँके लगाकर इसे चादर में लपेट दो। पंद्रह मिनट में एम्बुलेंस आ रही है।”
    ग़नी ने जवाब नहीं दिया। उसने लाश के बाएँ पहलू पर मौजूद एक गहरी दरार को देखा। वहाँ से माँस बाहर की तरफ़ उबल रहा था। उसने सुई को खाल में चुभाया। सुई के गुज़रने की एक हल्की सी आवाज़ आई।
    “बहुत बोझ था उस बूट का। एड़ी में कोई कील थी शायद। जब वो मेरी पसलियों पर पड़ा तो अंदर कुछ चटकने की आवाज़ आई थी। मैंने हाथ उठाना चाहा था पर उंगलियाँ सड़क के डामर में चिपक गई थीं। सड़क बहुत गर्म थी।”
    बाहर बेंच पर बूढ़ा हाशिम बैठा अपने घुटनों को धीरे-धीरे सहला रहा था। उसे याद आ रहा था कि पिछले रविवार को जब साजिद घर आया था तो उसकी क़मीज़ का बटन टूटा हुआ था।
    “साजिद! तेरा बटन टूट गया है, ला मैं टाँका लगा दूँ।” हाशिम ने कहा था।
    साजिद हँस पड़ा था। “अरे अब्बा रहने दो! बहुत पुराना हो गया है, नया कुर्ता ले लूँगा।”
    ग़नी ने दूसरा टाँका लगाया। धागा ख़ून में भीग कर काला पड़ गया था। सुई अब गर्दन के पास मौजूद एक नीले निशान की ओर बढ़ रही थी।
    “वो लोग चीख़ रहे थे। उनकी आवाज़ें एक दूसरे में उलझ रही थीं। कोई मेरे बालों को खींच रहा था और कोई मेरे गले को अपने अंगूठे से दबा रहा था। मुझे बस इतना याद है कि आसमान एकदम से बहुत काला हो गया था, बिल्कुल वैसा ही जैसा अब्बा की दुकान के कोने में रखा हुआ वो पुराना और काला कड़ाहा।”
    तिवारी बरामदे में टहल रहा था। “ओए ग़नी! सुन रहा है? उसका बाप बाहर बैठा है, कह रहा है कि लाश का चेहरा साफ़ कर देना। इससे कह देना कि ये सरकारी अस्पताल है, ब्यूटी पार्लर नहीं। और हाँ, सिलाई के धागे का ख़र्चा इसी के खाते में लिख देना।”
    ग़नी ने एक बार फिर से धागा निकाला। इस बार उसने सुई को ज़रा ज़्यादा गहराई से माँस के अंदर उतारा। चमड़ी सख़्त हो चुकी थी और उसे ताक़त लगानी पड़ रही थी।
    “मेरे पैर में जूता नहीं था। एक पैर की जुराब फट गई थी और एड़ी सड़क पर रगड़ खा रही थी। किसी ने मेरी पीठ पर डंडा मारा तो मुझे ऐसा लगा जैसे रीढ़ की हड्डी में सैकड़ों सुइयाँ एक साथ चुभ गई हों। मैं बोलना चाहता था पर मेरे मुँह में मिट्टी और ख़ून भर गया था। मिट्टी का स्वाद बिल्कुल वैसा ही था जैसा बचपन में दीवार चाटते हुए लगता था।”
    बूढ़े हाशिम ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसे साजिद के बचपन की वो दोपहर याद आई जब वो साइकिल से गिर गया था और उसके घुटने पर ज़रा सी ख़राश आ गई थी। हाशिम उसे उठाकर आधा किलोमीटर दूर डॉक्टर के पास भागा था कि कहीं निशान न रह जाए।
    अंदर मुर्दाघर में ग़नी ने आख़िरी टाँका लगाया और धागे को क़ैंची से काट दिया। उसने एक मैले कपड़े से लाश के माथे पर जमी मिट्टी को साफ़ करने की कोशिश की, पर वो मिट्टी माँस के अंदर विलीन हो चुकी थी।
    बाहर गलियारे में स्ट्रेचर के पहियों की चरमराहट क़रीब आकर रुक गई। तिवारी की आवाज़ गूँजी, “अरे भाई, एम्बुलेंस वाले को बोलो ज़रा पीछे करके लगाए। और ग़नी! हाथ थोड़ा जल्दी चलाओ भाई। अभी एक और केस आ रहा है, ट्रेन वाला। सारा काम अधूरा पड़ा है।”
    ग़नी ने सुई को दोबारा चुभाया। इसबार धागे ने चमड़ी को थोड़ा सा खींच दिया, जिससे लाश के पहलू में एक झुर्री सी पैदा हो गई।
    “वो लोग मेरी जेबों में हाथ डाल रहे थे। उनके हाथों में मोबाइल फ़ोन थे और उनकी स्क्रीनें मेरी आँखों के सामने नाच रही थीं। वो मेरा नाम पूछ रहे थे। मैंने नाम बताना चाहा था, पर हर बार जब मैं मुँह खोलता, कोई ज़ोर से मेरे जबड़े पर ठोकर मार देता। मेरा नाम मेरे टूटे हुए दाँतों के बीच कहीं पिस कर रह गया था।”
    बूढ़े हाशिम ने बेंच पर बैठे-बैठे अपना सिर दीवार से टिका दिया। उसे वो दोपहर याद आई जब साजिद ने स्कूल से आकर बड़े गर्व से अपना परिणाम दिखाया था। उसके नाम के आगे ‘प्रथम श्रेणी’’लिखा था। हाशिम ने उस समय साजिद के माथे को चूमा था और उसकी ठोड़ी को प्यार से छुआ था।
    साजिद की ठोड़ी एक कृत्रिम टाँके के सहारे टिकी थी जिसे ग़नी ने बड़ी मुश्किल से जोड़ा था। अब ग़नी ने हाथ में एक छोटी सी क़ैंची थाम रखी थी। वो छाती के पास एक नीले गड्ढे को समतल करने की कोशिश कर रहा था जहाँ माँस की तहें आपस में उलझ गई थीं।
    “कपड़े फट गए थे। सर्दी नहीं लग रही थी, बस एक अजीब सा सुन्नपन था जो पैरों की उंगलियों से शुरू होकर ऊपर की ओर आ रहा था। किसी ने मेरी क़मीज़ की आस्तीन खींची तो मुझे अपने बाज़ू पर वो पुराना निशान याद आया जो बचपन में गर्म दूध गिरने से पड़ गया था। लेकिन वो निशान मुझे अब क्यों नज़र नहीं आ रहा है, शायद ख़ून के धब्बों के नीचे कहीं छुप गया होगा।”
    तिवारी ने मुर्दाघर का दरवाज़ा आधा खोला और अंदर झाँका। “हो गया? देख ग़नी, रिपोर्ट में ‘भीतरी चोट’ लिखा है, बाहर ज़्यादा निशान नज़र नहीं आने चाहिए।”
    ग़नी ने सिर उठाकर नहीं देखा। वो तो एक बारीक सुई से साजिद की दाईं आँख के ऊपर एक छोटी सी लकीर को रफ़ू कर रहा था, जहाँ किसी नुकीली चीज़ ने खाल को उधेड़ दिया था।
    “वो आख़िरी पल बहुत लंबा था। सड़क पर पड़ी एक ख़ाली बोतल मेरी नज़रों के सामने थी। मैं उसपर लिखा हुआ पढ़ने की कोशिश कर रहा था। मुझे लगा कि अगर मैंने वो शब्द पढ़ लिया तो मैं बच जाऊँगा। लेकिन शब्द धुंधला रहे थे। फिर सबकुछ शांत हो गया, बिल्कुल वैसा ही जैसा अब ये कमरा है।”
    ग़नी ने आख़िरी गाँठ लगाई और धागे का बचा हुआ हिस्सा काट दिया। उसने सफ़ेद चादर को धीरे से उठाया और लाश के चेहरे तक ले आया। चादर के सफ़ेद कपड़े पर एक छोटा सा ख़ूनी धब्बा उभर आया, ठीक वहीं जहाँ साजिद का माथा था।
    बाहर बूढ़ा हाशिम खड़ा हो गया था। उसे पता चल गया था कि अंदर का काम ख़त्म हो चुका है। उसने अपनी जेब में हाथ डाला, जहाँ सिर्फ़ कुछ मुड़े-तुड़े नोट और कुछ सिक्के थे। उसने एक बार फिर अपनी लुंगी के कोने से अपना चेहरा पोंछा और दरवाज़े की ओर क़दम बढ़ाया।
    अब्दुल ग़नी ने लोहे की मेज़ के पास लगे नल को खोला। पानी की तेज़ धार ने उसके दस्तानों पर जमी लाली को बहा दिया, लेकिन उंगलियों के पोरों में एक अजीब सी गर्माहट अब भी बाक़ी थी। उसने साबुन की टिकिया से अपने हाथ रगड़े, मगर फॉर्मेलिन की वो विशेष गंध जैसे हड्डियों के अंदर तक उतर चुकी थी।
    उसने पलटकर स्ट्रेचर पर पड़ी उस गठरी को देखा जो अब सफ़ेद चादर में लिपटी थी। चादर के ऊपर से साजिद के शरीर का उभार किसी कटे पेड़ के तने जैसा लग रहा था।
    “अब मैं एक बंद किताब हूँ। मेरे अंदर के सारे सूराख़ अब रेशमी धागों के पीछे छिप गए हैं। वो सभी पत्थर, वो सभी गालियाँ और वो सभी ठोकरें अब मेरी छाती के इस लंबे टाँके के नीचे दफ़न हैं जिसे किसी ने बड़ी मेहनत से सिया है। अब जब माँ मुझे देखेगी, तो उसे सिर्फ़ नींद नज़र आएगी, वो ज़ख़्म नहीं जिन्हें सड़क ने चाटा था। मिट्टी अब मेरा इंतज़ार कर रही है, वहाँ कोई मुझसे मेरा नाम नहीं पूछेगा।”
    दरवाज़ा पूरी तरह खुला और तिवारी अंदर आया। उसके पीछे हाशिम था, जिसके पैर काँप रहे थे और नज़रें ज़मीन पर टिकी थीं।
    “चलो भाई, ये रहा तुम्हारा लड़का। ग़नी ने बड़ी ‘स्पेशल’ सिलाई की है इसकी,” तिवारी ने लापरवाही से चादर के एक कोने को छूते हुए कहा। “लाओ, अब वो पर्ची और बाक़ी पैसे निकालो। अस्पताल का ख़र्चा और सफ़ाई की फ़ीस तो देनी ही होगी।”
    हाशिम ने काँपते हाथों से अपनी लुंगी की गाँठ खोली और वो मुड़े-तुड़े नोट मेज़ के कोने पर रख दिए। तिवारी ने नोट गिने और एक व्यंगपूर्ण नज़र ग़नी पर डाली, जैसे कह रहा हो कि तुम्हारी मेहनत का फल केवल इतना ही है।
    ग़नी ने हाशिम की ओर देखा। हाशिम की नज़रें एक पल के लिए ग़नी के काले हाथों से टकराईं जिनपर अभी तक नमी बाक़ी थी। उन नज़रों में कोई आभार नहीं था, बस एक ऐसी पहचान थी जो केवल उन लोगों के बीच होती है जो एक ही दुर्घटना के अलग-अलग भागों में जकड़े हुए हों।
    “एम्बुलेंस बाहर खड़ी है। इसे ले जाओ,” तिवारी ने रजिस्टर पर आख़िरी दस्तख़त किए और बाहर निकल गया।
    हाशिम ने स्ट्रेचर के पास जाकर साजिद के चेहरे से चादर को ज़रा सा हटाया। उसने देखा कि ग़नी ने साजिद की दाईं आँख के पास मौजूद उस गहरे ज़ख़्म को कितनी सफ़ाई से जोड़ा था कि वो अब बस एक मामूली सी लकीर लग रहा था। हाशिम ने एक ठंडी आह भरी और अपने बेटे के माथे पर हाथ रखा। ठंडे माँस का एहसास हाशिम की हथेली में समा गया।
    दो वार्डबॉय अंदर आए और उन्होंने लाश को एम्बुलेंस के स्ट्रेचर पर डाल दिया। हाशिम उनके पीछे-पीछे हो लिया। स्ट्रेचर के पहियों की आवाज़ गलियारे में दूर तक सुनाई दे रही थी।
    ग़नी वहीं मेज़ के पास खड़ा रहा। उसने देखा कि खाली पड़े स्ट्रेचर पर अभी तक ख़ून और पानी का एक छोटा सा तालाब बाक़ी था, जिसमें पीले बल्ब की परछाईं काँप रही थी। उसने वाइपर उठाया और उस पानी को नाली की ओर धकेल दिया।
    “सड़क पर अब भी धूल होगी और लोग अब भी मोबाइल फ़ोन लिए किसी नए नज़ारे की तलाश में भटक रहे होंगे। वो नहीं जानते कि जो ‘पंक्चर’ उन्होंने मेरे शरीर में किए थे, उन्हें रफ़ू करने वाला एक आदमी इस मुर्दाघर में अब भी बैठा है, जिसके पास धागा तो रेशमी है पर उसके अपने हाथ काले हैं।” दूर गलियारे से आख़िरी बार वो आवाज़ ग़नी के कानों से टकराई।
    बाहर एम्बुलेंस के स्टार्ट होने की आवाज़ आई और फिर एक सायरन की लंबी गूँज हवा में घुल गई।
    अब्दुल ग़नी ने अपना एप्रन उतारा और दीवार पर लगी खूँटी पर टांग दिया। उसने देखा कि उसके अपने अँगूठे के पास खाल में सुई का एक बारीक सा निशान पड़ गया था, जहाँ से ख़ून की एक नन्ही सी बूँद निकल रही थी। उसने उस बूँद को नहीं पोंछा, बस ख़ामोशी से दरवाज़े की ओर बढ़ गया, जहाँ एक और स्ट्रेचर के पहियों की चरमराहट सुनाई दे रही थी।
    रात की शिफ़्ट अभी बाक़ी थी और ‘सिलाई’ का काम भी बाक़ी था।
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