• कथा-कहानी
  • प्रज्ञा विश्नोई की कहानी ‘पागलखाने से कुछ नोट्स’

    समकालीन कथाकारों में प्रज्ञा विश्नोई की कहानियों का स्वर सबसे अलग है। लंबे समय बाद उनकी कहानी आई है। आप भी पढ़िए- मॉडरेटर 
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    मेरे घर के बगल में एक नर्सिंग स्कूल था जहां एक कुतिया रहती थी। एक शाम कुतिया के पिल्लों में से पागलखाने से कुछ नोट्स को किसी गाड़ी ने कुचल दिया। दूर से देखने पर सर्दी की धूप में पिल्ले का शव उसी के खून के घेरे के बीचों बीच वसंत में अपने ही यौवन से गदराए गुलाब सा लग रहा था। कुतिया कुछ घंटे दुःखी रही। इंसानों द्वारा फेंके गए एक्सपायर्ड बिस्किटों से उसने मुंह फेर लिया। रात को कूंकूं से शुरू हुई आवाज़ कुत्तों के महायुद्ध के शोर में बदल गई, तब जाकर इंसानों ने अपनी रजाई से बाहर निकलकर माज़रा जानने की कोशिश करी। कुतिया अपने एक कुत्ते प्रेमी के साथ संसर्ग में व्यस्त थी, और बाकी तीन चार कुत्ते लाइन में अगली बारी के लिए संघर्ष कर रहे थे। शायद यही कारण है कि जो कब्रें बच्चों के लिए भय की गुफा होती हैं वही युवानों के लिए रूमानियत का चरम, अधेड़ों के लिए एक और आखिरी ज़िम्मेदारी और बुज़ुर्गों के लिए फ़िर वह उल्टा पेड़ होती हैं जहाँ से वेताल ऊपर की और लटकता है।
    बीते दिनों मैंने पाया है कि प्रेम चाहे वह मानसिक हो या दैहिक (आत्मिक वात्मिक प्रेम खाली गधियापे की बातें हैं जो सांत्वना पुरस्कार से भी अधिक कमज़ोर हैं) से मुझे कोई खास प्रेम नहीं है। इन दिनों मुझे जुगुप्सा पे आसक्ति हो चली है। जैसे जब कोई फांसी लगाकर आत्महत्या करता है, तो मरने के बाद या मरने के समय उसकी पेशाब निकल जाती है। मुझे संदेह है यदि यह तथ्य कोमलह्रदय प्रेमी और प्रेमिकाओं को पता चल जाए कि ख़ुदकुशी के बाद व्यक्ति किसी अनछुई/अनछुए, फोटोजेनिक राजकुमारी/राजकुमार जैसा नहीं दिखता है तो आत्महत्या दर में अच्छा ख़ासा घटाव देखने को मिले।
    नौ नंबर क्रॉसिंग और गुरुदेव सिनेमा के बीच कई टेडी बियर्स की दुकानें हैं जहां एक छह से सात साल के बच्चे के कद के खिलौना भालू रस्सी से टंगे होते हैं जिन्हें यदि शाम के उजाले में देखो तो ठीक वैसा ही महसूस होता है जैसे बूढ़े बरगद पर १४४ स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी पर लटकाने के बाद उनकी १४४ टूटी मुंडियों और २८८ झाड़ू की सींक सी टांगों की छाया के अंधेरे में अंग्रेज़ों को होता होगा। पर यह भी अजीब है, सब बूढ़े बरगद को तो जानते हैं जहाँ १४४ जीवन जीभ बाहर निकाले अपना शरीर फड़फड़ा रहे होंगे पर उन १४४ में से एक का नाम भी मुझे पता नहीं। ऐसे ही नौ नंबर क्रॉसिंग और गुरदेव सिनेमा तो शायद मुझे अपने जीवन की परिधि के भीतर याद रहेगा पर उन फांसी पर लटके खिलौना भालुओं का चित्र साल दो साल बाद मेरे मनोपटल से मिट जाएगा। ज़िंदगी में ज़िंदगी से ज़्यादा कब्रिस्तान की कीमत है इसलिए किसी सड़क दुर्घटना में मरणासन्न व्यक्ति का बटुआ, घड़ी, सब गायब हो जाते हैं और किसी को एक घंटे बाद भी यह स्मरण नहीं रहता, पर मौत की किसी किताब में, जिसे गलती से या जानबूझ कर प्रेम कहानी समझ लिया गया है (सभ्य समाज में मौत प्रेम से भी बड़ा टैबू है), नायक द्वारा नायिका की कब्र खोदना काल्पनिक स्कैंडल होते हुए भी अविस्मरणीय बन जाता है।
    बगल के सेल में कोई अपना सर दीवार पर पटक रहा है। अच्छा ही है, वरना पागलखाने के सेल में बिना बाहरी शोर के खुद के दिमाग के रुदाली-रूटीन के साथ सोना ठीक वैसा ही है जैसे आपके चूहे में बदलने से पहले कोई आपको नाली के भीतर सोने को बोले। हालांकि मेरे कान अब ऊपर सरकना शुरू हो चुके हैं और मेरे होठों के इर्द गिर्द व्हिस्कर्स की गुदगुदी उठनी भी शुरू हो चुकी है पर फिर भी मेरे चूहे बनने की गति बेहद धीमी है। कुल मिलाकर, मैं बहुत ही मंथर जीव हूँ। पागलखाने के बाहर जिस गति से मैं इंसान होना सीख रही थी, उसके अनुसार मुझे आधा इंसान बनते बनते भी पांच सौ साल तो लग ही जाते। चूंकि चूहे का आकर इंसान के मुकाबले काफी छोटा है, और यहाँ पागलखाने में मुझे चूहा बनना सीखने के अलावा कुछ और काम धाम भी नहीं है, तो डॉक्टर को आशा है कि मौत से पहले कम से कम मैं अस्सी नहीं तो सत्तर प्रतिशत चूहा बन ही जाऊंगी।
    जिस शहर के घाटों के नाम मैसेकर घाट सरीखे हों, और पुलों के नाम मरे पुल जैसे हों, उस शहर में भूत चुड़ैलों का न होना मुझे बड़ा खलता था। कहने को सिविल लाइंस के गोरों के कब्रिस्तान के बारे में उस्ताद गूगल का कहना था कि सूरज ढलने के बाद वहाँ किसी सरकटे अंग्रेज़ घुड़सवार की आत्मा हवा खाने निकलती है पर दफ्तर में देर होने पर जब भी रात डेढ़ दो बजे मैं कब्रिस्तान के बगल से निकली, वहां मुझे केवल ठिठुरते, कराहते और रोते हुए कुत्तों की आत्मा ही दिखी। कहते हैं जिस शहर के अपने भूत न हों, उस शहर की आत्मा या तो संसार की सबसे पुरानी चुड़ैल से भी बूढ़ी होती है या उस शहर की आत्मा मर चुकी होती है। मेरे शहर की आत्मा भी शायद मकड़ी के जाले लगे किसी दरवाज़े के पार आखिरी बार एक गिलास पानी की आस में कराह रही होगी।
    आज सवेरे पानी के साथ ब्रेड खाते वक्त मेरे दांत उंगलियों में गड़ गए। मेरे दांत अब पूरी तरह से चूहे के हो चुके थे पर मेरी उंगली से रिसता लाल खून किसी इंसान का था या चूहे का? इसका उत्तर जानने में समय व्यर्थ करने से बेहतर है कि पूरी तरह चूहा बनने से पहले मैं इंसानों की दुनिया के अपने तज़ुर्बों को कलमबंद कर दूं।
    मेरी नज़र अब और पैनी होती जा रही है। पर इस कमरे में देखने को केवल चाय बनाने के लिए एक पतीला, गैस का चूल्हा, और चाय/पानी पीने के लिए एक गिलास है। लेकिन पागलखाने की दीवार के उस पार पगला देने वाली रौशनी है, जो मुझे मारना नहीं, तड़पाना चाहती है। हालांकि उस रौशनी में भी कभी कभी हल्का सा ही सुकून देने के लिए अंधेरे की कोई भूली भटकी धुन तितली की तरह मेरे भीतर खिले जाने किस जंगली फूल पर बैठ जाती थी। एक दिन ऑटो से घर लौटते वक्त मैंने अपने आगे चलते ऑटो पर एक विज्ञापन पोस्टर देखा: बाबा मूसा खान। प्रेम विवाह, वशीकरण के लिए संपर्क करें। थोड़ी दूर चलते एक दीवार पर लिखा दिखाई दिया: गुरु समीर बादशाह। तावीज़, वशीकरण, सौत से छुटकारा, नौकरी में परेशानी, जिन्नात से निजात आदि के लिए संपर्क करें। शुद्ध हिन्दी, उर्दू, करियर काउंसलिंग, रिलेशनशिप काउंसलिंग के बीच के फर्क को भूत, प्रेत, जिन्न, आदि से लड़ने के पाक मंसूबे के लिए मिटाते ये इंसानियत की हिफाज़त करने उतरे फरिश्तों के पाक इरादे देखकर मेरा मन भर आया। साथ ही मन ही मन शुक्रिया अदा भी किया कि इन महानुभावों ने अभी अंग्रेज़ों के जादू टोनों की वैरायटी पर अपना हाथ साफ़ नहीं किया है वरना पूंजीवादी राष्ट्रों के दुःस्वप्नों में केवल हमारे आईटी इंजीनियर ही नहीं, वरन इंसानियत के ये रखवाले भी आने लगते। पर आज की रिटर्न एंड रिफंड की ज़िंदगी में जहाँ प्रेम और नौकरी, हर कदम पर कुछ और बेहतर की तलाश में बदल दी जा रही हैं, वहाँ आज भी लव स्पैल्स, इंसानियत के इन फरिश्तों की इतनी मांग कैसे है? क्या जीवन का अर्थ केवल अपने दुःख के एक नए कारण की खोज करना है? क्या हमारी खोज सुख और आनंद की नहीं, वरन् पीड़ा की है? मेरी पीठ पर कुछ खुजली सी उठ रही है और रीढ़ की हड्डी के निचले छोर पर कुछ उठा उठा सा लग रहा है।
    रात को बड़ा ही बेचैन करने वाला सपना आया। तीन से चार बजे के बीच उठी तो खुद को पसीने से लथपथ पाया और मेरा तकिया, पलंग पर बिछा चादर पूरा मेरे पसीने से भीगा हुआ था। मैंने वापिस नींद को हड़काकर वापस बुलाने का प्रयास किया पर पसीने में नहाए होने से जन्मी खुजलाहट और बू के कारण नींद को भी मेरे पास आने से घिन आने लगी। हारकर मैंने मोमबत्ती जलाई और बिस्तर को देखने पर पाया मैं पसीने के बजाय खून के चक्के जैसे घेरे पर लोट रही थी। पर प्रश्न अब भी वही था–यह खून किसी इंसान का था, किसी चूहे का था, मेरा था या मेरे शिकार का?
    चांद का फुंसी से भरा पूरा चेहरा अब झांकने लगा है और चौराहे पर चुड़ैलों का गीत आरम्भ हो चुका है। मैं एक अच्छा चूहा बनने की दुआ करने चुड़ैलों के पास अर्ज़ी लेकर जा रही हूँ। शायद चाय के एक एक कप के बदले वो अगले उजाले तक मुझे अपने उत्सव में शामिल होने की इजाज़त ही दे दें।

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