अनुकृति उपाध्याय की कहानी ‘पचास-बावन की औरतें’

अनुकृति उपाध्याय ने हिन्दी कहानी में अपनी विशिष्ट जगह बनाई है। कहानियों की भाषा, विषयवस्तु सबसे में एकदम अलग। जैसे इसी कहानी को ले लीजिए। यह कहानी ‘वनमाली कथा’ में प्रकाशित हुई है। पढ़कर बताइएगा कि कैसी लगी- मॉडरेटर

================

पचास-बावन की औरतें

प्रवेश

औरत बारिश में नहा रही है।

अहा। औरत और बारिश! कल्पना का आवेश, ताक-झाँक कनखी-टिटकार का समावेश! रोमान रूहान गुदगुदी रोमांच! आँखों के आगे एक चित्र – रिमझिम बरखा गीला बदन उभार उतार केश बरुनियाँ गाल कनखियाँ आड़ी तिरछी फिसली सँभली चाल! देखने वाले का हाल बेहाल। चहुँ ओर वाह-वह, चहुँ ओर कविता कविता की पुकार।

बस।

औरत की बात शुरू हुई नहीं कि कविता की ढलान पर फिसली, कला के दर्रे में धसकी।

अब क्या चर्चा और क्या विमर्श। क्या कहा जाएगा और क्या सुना जाएगा या फिर कुछ कहा जाएगा और कुछ का कुछ सुना जाएगा।

जैसे औरत न हो, कविता का बहाना ही हो।

जैसे औरत हो ही कविता के बहाने को।

जैसे औरत हो ही न, कविता ही हो।

जैसे औरत हो ही न …

चार जन के बीच जो कहते झिझको, उसको कविता का नेपथ्य पहना दो, वासना को वासना मत कहो प्यार कह दो, कामुकता को खुलापन, काइयाँ बदनीयती को समर्थन, आकर्षण को रहस्यमय, औरत को फूल, ख़ुशबू, रंग वग़ैरह। ख़ूब नाटक पसारो, वाद-दर्शन-ज्ञान-विज्ञान बघारो रस के साथ गा कर सुनाओ गुदगुदी सिहरन जगाओ तो सब वाह वाह आह आह। औरत को और औरत की ओर से ख़ूब ऊल-तूल कहो – स्वामिनी कामिनी दामिनी मायाविनी लेकिन ज़रा सी सतह खुरचते ही वही हाड़ माँस की हौंस, वही कुच-कटि-नितम्बों का भूगोल और कामना के बोसीदा नक़्शे, वही भीतरी अँधेरों में इंद्रियों से टोह-टटोल कर गढ़ी गई तिकड़ी – माँ-प्रेयसी-चुड़ैल, वही चाहना और डर, प्यार और हिंसा का घाल-मेल, घृणा और प्रेम में दाँत-पीस कंठ-भींच निकले वही इने-गिने भदेस शब्द।

लेकिन बारिश में नहाती पचास-बावन की औरत यह सब नहीं सोच रही है। वह बूँदों-बूँदों झरती आर्द्रता को अपने अंगों पर से ढलकते और धरती में जज़्ब होते देख रही है और देख रही है कि भीग जाने के लिए उसको कितना कम चाहिए। पचास-बावन की औरत को …

लेकिन ठहरो

क्या कहा?

पचास-बावन की औरत?

पहले क्यों नहीं बताया यह? शुरू में ही क्यों नहीं कहा कि उमर पचास-बावन, कमनीय-रमणीय अकल्पनीय? यह तो विश्वासघात है। सब जानते हैं कि कहने और सुनने वालों के बीच का सम्बंध एक अनकहे अनुबंध पर आधारित है, अनुबंध यह कि कहने वाला कमोबेश ईमानदारी से कहेगा और सुनने वाले कमोबेश ध्यान लगा कर सुनेंगे। कहने वाले ने सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य – बारिश में नहाती औरत की उमर – छुपा कर अनुबंध का सम्बंध विच्छिन्न कर दिया।

सुनने वाले छँट गए हैं । पचास-बावन की औरत अकेली, माने ख़ुद के साथ, ख़ुद का हाथ थामे आँखें बेझिझक ख़ुद की आँखों में डाले झिमिर झिमिर बारिश में घुमुर घुमुर नहा रही है।

पचास-बावन की औरत अकेली है। वह जानती है कि वह सबके बूते की नहीं, सिर्फ़ अपने बूते पर, सिर्फ़  अपने बूते की है – अपना घर अपना काम अपनी जमा-जोड़ पूँजी अपनी देह अपने नेह। अपनी नींद अपनी जगार अपना गीत अपनी मीत।

सो

पचास-बावन की यह औरत – ध्यान से सुनने वाले ही लक्ष्य कर पाएँगे कि किसी औरत या कोई एक औरत से बात इस औरत, एक ख़ास औरत पर आ गई है – बंधन ढील अपने में मगन नहा रही है जैसे फूलने के बाद का पका-थका मगर अनचुका पेड़, लौटे पंछियों से गुलज़ार, छाया-माया सोखने वालों से बेज़ार, अपनी शक्ति में आश्वस्त, अपनी क्षमता से आशान्वित। अपने भीतर से सुपरिचित अपने बाहर से अविचलित, अपने से भरपूर स्वीकृत पचास-बावन की ये औरत वर्षा की एक बूँद सी सम्पूर्ण है।

औरत के केश छिटके हुए हैं उनमें नमी ने लहरें बना दी हैं। उन लहरों में चाँदी के तार चमक रहे हैं। वह हल्की अँगुलियों उन्हें सहलाती है जैसे रेशम हालाँकि वे कुछ कड़े-खुरदुरे हैं जैसे सचमुच ही चाँदी के खींच कर गढ़े महीन तार हों। उसकी त्वचा पर यहाँ-वहाँ हल्की रेखाएँ हैं जैसे बारीक़ धाराएँ जिनमें समय बह रहा है। उसकी आँखों में साँवले दिन की चमक अटक गई है। वह बाँहें फैलाए हल्के हल्के झूम रही है, इस ओर उस ओर झुक रही है, उसकी देह पानी की बूँदों के लिए राह है, धरती और धरती की चाह के बीच की धड़कती नाड़ी।

उसके कंठ में जन्मे स्वर उसके होठों से हल्के-हल्के फड़फड़ा कर निकल रहे हैं मंद-मंद्र। सुनने वाले को लग सकता है कि वह गुनगुना रही है। दरअसल वह मंत्र पढ़ रही है। सच तो यह है – साक्षी हो कि कहंता अपना सच कह देने का अनुबंध निभा रहा है, सुनंता अपनी जानें – पचास-बावन की ये औरत जादूगर है । वह बरसों से जादूगर है, पहले उसके जादू ख़ुद उस से छुपे थे, फिर प्रकटे, प्रकट होने की विकट पीड़ा के साथ। जादू क्या यों ही सधते हैं? दाँत तक जबड़ा फोड़ तकलीफ़ के साथ निकलते हैं, ये तो फिर जादू, दाँतों को कचकचा कर खा जाए । ख़ैर पचास-बावन कि यह औरत जादूगर है और अपने जादू का मंत्र पढ़ रही है । मंत्र भी जादू ही के जैसा उसका अपना है –

मैं हूँ आज बावन की

मैं रहती हूँ अपने बदन में

अपने वाहिदपन में

मैं हूँ अदरस (अदृश्य से मंत्र की मंद मुलायमियत छिन्न होती है, अतः अदरस)

मैं हूँ अपरस (अस्पृश्य से भी)

मुझे नहीं दरकार

कोई भरतार

मैं भरती हूँ ख़ुद से

मैं तरती हूँ ख़ुद में

मुझे है प्यार

मुझे है प्यार

इसके बाद का मंतर इतना गुह्य-गूढ़ कि बस अँहह हँमम् में गुम।

आवेश

पचास-बावन की यह औरत सदा से नहीं जानती थी कि वह जादूगर है। पहले उसका बदन गठा-गुँथा-एकतार नहीं था, हर अंग अलग अलग था, छिन्नतार।  जब उसे कहा जाता – गर्दन मत उठा, कंधे मत झुका, छाती ढाँप, कैसी टाँगे फेंक कर चलती है, नितम्ब मत मटका – तो वह गर्दन कंधे छाती टाँगें अलग अलग सँभालती, नितम्बों का तो अर्थ ही वह बाद को समझ पाई।

पहले वह अपनी सी नहीं थी, दूसरी ही थी, अपने से अलग, दूसरों की आँखों से देखती, दूसरे के शब्दों से सहमती।

‘ऊँट के जैसी!’

‘ताड़ के जैसी!’

‘नरपत-खरपत सरकंडे सी!’

बहुत सी बोलियाँ ठोलियाँ।

गर्दन झटक आँसू हटक दो लेकिन होंठ? बिसूरे होंठ सहल नहीं होते, बिसुरे-बिफरे अलग अलग सिसकते रहते।

‘अरे लेकिन इनका क्या बुरा मानना? लड़के-बालों का मज़ाक़। ध्यान क्या देना? हँस दो तुम भी।’

‘ग़लत भी नहीं! इतनी लंबी कि भीड़ में शहतीर सी नज़र आओ। माँ ने क्या खा कर जना तुम्हें?’

सौंठ, गौंद और घी-मेथी के लड्डू खा कर नहीं ग़म ग़ुस्सा लात घूँसे सह कर । पस वाले फोड़े सा गर्भ ज़हरदाँत सा उखाड़ फेंका कि जी जाए तो जी जाए मरे तो मुसीबत कटे। जी भी गई बढ़ भी गई सीधी तीर सी शहतीर सी। मामी के चौड़े पंजे से दबा कर गर्दन कंधे पीठ झुकाने के बाद भी साथ के लड़के कान तक ही आएँ। और लड़कियाँ? लड़कियों की बात क्या? इतनी छोटी-मीठी दिखने वाली इतनी कड़वी-तीती?

‘देख कर बता वो देख रहा है क्या? अपनी तरफ़ आ रहा है? नहीं? अरे तुझे क्या पत्थर तोड़ने हैं? बस ज़रा गर्दन उठा कर देख ले।’

‘इसके एक पैर में मेरे दोनों पाँव आ जाएँ और फिर भी जगह रह जाए! चप्पल कहाँ से लेती है?’

‘क़मीज़ के लिए थान जहाँ से लेती है वहीं से!’

चरपरे सान-चढ़े शब्दों से चिर चिर के भीतर तक खुरंट पड़ गए। चोट मारने के लिए कुछ और ही चाहिए अब। अलग कड़क काइयाँ सुलफ़-धार।

बस एक माँ की माई कहती कि कैसी सुथरी सलोनी छरहरी छोरी। आँख के काजल सी सोहिनी-मोहिनी। किसी को क्यों फाँस सी चुभती है ये?

माँ की माई, उसकी नानी, ने अपनी जाई गँवाई थी। पंखा-दुपट्टा मूसमार दवा दौड़ती रेलगाड़ी या ऊँची छत, ज़रिया कोई भी रहा हो, सच यही है कि नानी की बेटी को मारा उसी ने  जिसने उसकी उमगती चिंगारी बुझा कर ‘माँ हुई हो, माँ-पन धारो’ कहा था और पति-पन धार कर उसे धकेल दिया था। पुलिस की जाँच से साबित हुआ था कि वह धकेले जाने, दीवार से टकराने, और आस टूट जाने से नहीं मरी थी, बल्कि क़तई बावली थी क्योंकि धौल-धप्पे जैसी छोटी-छोटी बातों पर बावले ही मरने-गिरने जाते हैं और घर की बात थाना-पुलिस भी बावले ही ले कर जाते हैं, सयान तो औरत को जला-फूँक कर आगे का सोचते हैं। पचास-बावन की औरत बावलेपन वाले निदान से सहमत न हो लेकिन इससे सहमत थी कि उसकी माँ धकेले जाने से नहीं मरी थी, वह तो उससे काफ़ी पहले अपना ख़ुदपन त्याग कर पत्नीपन धारते ही ही मर चुकी थी, बस जान नहीं पाई थी। जैसे ही जान पाई, सह नहीं पाई।

सहना पड़ता है, नानी कहती, पड़ता ही है, सहे बिना कैसे कटे? आँच से ही रोटी पकती है, सौंधी-करारी होती है। तब की लड़की नहीं सोच पाती थी लेकिन अब की पचास बावन की औरत कह देती – मैं रोटी नहीं, पकने-सिकने का सवाल ही नहीं, और खाने का तो सपना भी मत देखना।

सहना सबसे बड़ी शक्ति है, नानी सर सहला सहला कर कहती जाती, ढाल-तलवार में ढाल पर बस दचके-खरोंचे पड़ें, तलवार दो टूक हो जाए। सो सह ले, जीवन में बहुत कुछ सहना पड़ेगा। इतने से घबराने से भवसागर कैसे पार होगी?

सो लंबी-छरहरी उम्र से बड़ी बढ़ी लड़की सहती – आह अह नँह नँह – मुँह में मुट्ठी आँख में आँसू तकिए में धँसे भीगे गाल – अँह नँह नँह – दबी मसली पिसती कुटती सहती जाती। मामा झोंक में कहता जाता – येह येह येह… भोली नहीं है तू, मज़ा तुझे भी आ रहा है, है कि नहीं? सुखों की सीढ़ी है जादू की पोटली है जहाँ हाथ लगाओ वहीं वहीं… दाँत मिसमिसाता झकझोरता जाता – हैं हैं हँह हँह ले ले साली कु…

रात अँधेरे के जाने से पहले मामा चला जाता । जाते जाते कह जाता – ख़बरदार, कुछ कहा किसी को। दोष तुझे ही लगेगा, मर्द की ग़लती होती है, औरत का गुनाह। घर से बेघर हो जाएगी। जाएगी कहाँ? माँ की राह? मुँह सी के रह, चुप्पचाप।

लड़की चित्त-चुप्प रहती, पहले से भिंचा मुँह और भींच लेती, होंठ कस कर एक पर एक कि कुछ बाहर न निकले, न सिसकी न उबकाई न शब्द। वह चुप रहती, जब स्कूल में पानी की टंकी के पास यूकलिप्टस के सफ़ेद-फट्ट पेड़ों के बीच बारहवीं के भैया चिकोटी काट कर पेड़ के तने से सटा कर कुर्ता ऊपर उठा कर सलवार नीचे खींच कर… तब भी चुप रहती जब पड़ोसी दुपट्टे के दोनों छोर पकड़ कर भीतर खींच कर खिड़की-दरवाज़े भेड़ कर कपड़े उतार कर… वह हर वक़्त चुप रहती, होंठ और आँखों से चुप, दिमाग़ से सुन्न जैसे सोच थक्कों-धब्बों में जम कर जड़,  देह से सुस्त जैसे रात की उचटी नींद में लिथड़ी-लिसी, किसी और के गर्दन छाती जाँघें पिंडली साथ घसीटती लाती, घसीटती जाती । पैर उठा कर चल, जो पैर घसीटे उसका भाग घिसटे, नानी कहती। लड़की अपने कुचले-रुँदे सत्रह-साला भाग पर नज़र डालती – चुप रहते रहते मूक पड़ा, मिंजा मसला कुम्हलाया भाग। फिर एक दिन स्कूल में वही भाग फटा, उसकी सुती जाँघें भिगोता जिसकी पीड़ा से दुहरी देह पर आरोपों लांछनों गालियों कोसनों के दुहत्थड़ बरसे।

अस्पताल में पेट गुँधवाने और ‘चुप रह’ की हिदायत न मानने पर थप्पड़ खाने के बाद जब नवजात उसकी चिरी योनि से फिसला तब उसका मूक-बधिर कठाया भाग एकदम मर गया। लेकिन शिशु – एक छोटी बिल्कुल सम्पूर्ण सुबुक गढ़ी लड़की काले घुँघराले बालों के नीचे फड़कती सूजी आँखें जैसे जन्मने से पहले ही जी भर रो ली हो, गुलाबी अँगुलियों गुलाब-पाँखुर नखों में अपना भाग भींचे – जीती जागती रही तो उसने रात सबकी निगाह बचा कर कराहते-गंधाते मरीज़ों से भरे वॉर्ड के बाहर धूल-गंद अँटे गलियारे में उसे डाल दिया कि अच्छा हो अपने भाग के कुचले जाने से पहले ख़ुद ही कुचली जाए।

इस जघन्य क्रिया के बाद मरे भाग वाली सत्रह साल की उम्र में जाने किसके बच्चे की बिनब्याही माँ बनी लड़की को कोसने-श्रापों को सच करते मर जाना चाहिए था, या कम से कम जेल की कालकोठरी में खटना-खपना, सदा के लिए आँख ओझल मरे जैसे ही जीना।

लेकिन ऐसा हुआ नहीं। लड़की नहीं जानती थी कि दरअसल भाग एक ही नहीं होता, अनेक होते हैं, मरे भाग की मुर्दार देह से नए नए भाग प्रकट होते हैं । सुबह जब कि उसे अपने मरे भाग और मरी बच्ची के साथ स्वाहा हो जाना चाहिए था, उसके भस्मीभूत भाग से एक चमकता दमकता नया भाग्य निकला, जैसे सूरज रात की राख झाड़ कर, हालाँकि उस समय तो लड़की को लगा था कि तेज़ तलवार निकली है और सबकी गर्दनें काटेगी – मामा की, बारहवीं वाले भैया की और भैया के दोस्तों की, पड़ोसी की और पड़ोसी की पत्नी की, उसकी अपनी।

बहरहाल घटनाक्रम यूँ घटा – रात भर की जागी, रातों भर भर जागी लड़की ने लाल लाल आँखों क्षितिज पर फैला लाल लाल रक्त देखा, सोचा – कौन मरा? फिर ध्यान आया – अरे मैं ही मरी, मेरा ही ख़ून हुआ और मैं ही जीती हूँ? तभी पुराने अस्पताल के पुराने गलियारे के पुराने पत्थरों पर नए ऐड़ीदार जूते ठकठकाती डॉक्टर आई, वार्ड के चौपट खुले दरवाज़े से दिखा – थमक कर रुकी ठिठकी झुकी और पान की पीक थूक वमन से सने खंभे की जड़ में पड़ी पोटली बाँह में ले कर उठी जैसे गहरी साँस भीतर से थकी-बुझी उठती है और वार्ड के भीतर आने के बजाए गलियारे में टकटक टकटक ग़ायब। लड़की वैसे ही बैठी रही बैठी रही बैठी रही ।

आख़िर डॉक्टर वापस लौटी। साथ में एक कोई पचास- बावन की औरत। कोई कुछ कहे इस से पहले लड़की ने कह दिया – मैंने मार दिया।

किसे, उस पचास-बावन की औरत ने पूछा?

लड़की भ्रमा गई। वाक़ई किसे मारा उसने जो कि ख़ुद ही मरी हुई है? अपनी मरी ज़ात से जीते-जागते जन्माई थी, मुँह नहीं भींचा, कंठ नहीं दाबा, कोमल हड्डियाँ चटखा कर नहीं तोड़ीं, तो उसने कैसे मारा? मारने के कई तरीक़े लड़की जान चुकी थी लेकिन शायद कुछ अजाने भी होंगे ही, सब जान लेना देह कैसे सहार सकती है? लड़की ने ही मारा होगा, मामा और बारहवीं वाले भैया और भैया के दोस्त और पड़ोसी ने तो नहीं ही मारा। सब सज्जन सब के घर-बार भरे-पूरे परिवार। वो क्यों करते ऐसा दुष्कर्म ? और अगर करते  तो क्या चिल्लाती नहीं? रोती-चीखती-कुरलाती नहीं? हाथ लगाते ही कपड़े अलगाते ही क्यों नहीं चीखी? क्यों नहीं गला-फेफड़े-हृदय फाड़ कर चीखी?  माँ-सी नानी मौसी-सी पड़ोसन का आँचल पकड़ कर क्यों नहीं कुहरी? क्यों पछाड़ें नहीं खाईं, दहाड़ें नहीं मारीं? क्यों सिल सी चुप्प मिट्टी सी लद्द? मम्म् मम महम्म लड़की के चिपके होंठ खुलने के बजाए कटे। सूखे होंठों की दरारों में लहू लेकिन रूखी आँखें सूखी ही।

औरत बग़ल में बैठ गई। कंधे पर हाथ रखा। बाँह पर इकट्ठी आस्तीन खींच कर सहल की। हाथ में धँसी सुई और सुई को ढँके प्लास्टिक की नली को हल्के छुआ। कैसे हाथ ठंडे हो रहे हैं इसके, सिस्टर, इधर एक हॉट वॉटर बॉटल – पुकार कर काठ की लड़की को कहा – हम बड़ी मज़बूत होती हैं जन्म से ही, एक रात माँ के अलहदा कर देने दूध न पिलाने  धूल मिट्टी में डाल देने से हम मरती नहीं, देखो, तुम भी ज़िंदा हो, मैं भी और ये भी।

पोटली लड़की की गोद में थी और कुनमुन कुनमुन। लड़की ने आँखें उठा कर उस पचास-बावन की औरत को देखा और देखा कि भौंहें कितनी दयालु हो सकती हैं और हथेलियाँ कितनी कोमल, खुले गले का स्वर कितना सहज। ऐसी सुलझी-समझी दया पर वह रो उठी, उसके कंठ की चिंघाड़ ख़ुद उसके कानों में पराई-पराई – मैंने मारा नहीं मैंने नहीं मारा मारा मारा…

आख़िर रो उठने की इस घटना के बाद बहुत दिनों तक कुछ न कुछ घटता रहा। लोग आते रहे जाते रहे – स्कूल की प्रिंसिपल, कोतवाली से थानेदार, ननिहाल से मौसी। नानी। एकदम बुढ़ाई सन से सफ़ेद बाल झूली खाल चाल पस्त। अलग कुर्सी पर बैठी रोती रही। तब तक लड़की ने उस पचास- बावन की औरत को – वह वक़ील थी, उस सुबह पति की मार से टूटी पसलियों वाली मुवक्किला को अस्पताल में भर्ती करवाने लाई थी – सब कह दिया था – मामा, भैया, पड़ोसी, होंठ, हाथ, हिंसा और मरा-गिरा-सड़ा-गला घिनौना भाग। औरत ने चौकन्ने सुना था, आँखें उस पर नर्म-टिकाए, शब्द अटकने पर हाथ सहला, आँसू बहने पर नाक पोंछ, सुन्न पड़ने पर चुप बैठ।

नानी को गुहार कर जब लड़की रोई तो बेटी की बेटी और अपने बेटे के बीच चुनने की चढ़ाई पर हाँफती नानी के कंधे किसने थामे? उसी पचास- बावन की वकील औरत ने। शहर में फैले अपवाद से कौन नहीं घबराया? वही पचास- बावन की औरत। थानेदार और अख़बार के रिपोर्टरों के सामने मज़बूती से कौन जमा? पचास- बावन की औरत ही।

क्योंकि थानेदार और रिपोर्टरों के सामने जम कर खड़ा होना ज़रूरी था उनके आरोपों, वक्रोक्तियों, कटाक्षों से बिना घबराए अपनी बात कहना, कह कर आँसुओं से भर्राए कंठ को सुधारना और सुधार कर फिर से अपनी बात दोहराना। क्योंकि लड़की के एक बार कहने से ही बात कही हुई और हिंसा की हुई नहीं मान ली जाती, बार बार कहना होता है और कहने में हर बार वहीं वहीं होना होता है – अधरात बिस्तरे में, यूकलिप्टस के परछटें उतरते तने तले और पड़ोसी के कड़े ठंडे फ़र्श पर – शादी में मिला पलँग चूँ चाँ करता है, सट-पट से पड़ी सलवट खुली लट से गिरे बाल देह की गंध से कहीं दफ़्तर से लौटी पत्नी भाँप न ले जो वह वैसे भी भाँप ही लेती है और कस कर झाँपड़ लड़की के गाल पर। लड़की बार बार कहती है – अस्पताल में डॉक्टर से, सुधार गृह की सूपरिंटेंडेंट से, थाने में कोंस्टेबलों से घिरे हुए, एसपी के दफ़्तर में, डीएम के सामने, निचली अदालत में, उँचली अदालत में, जज से, वक़ीलों से। करने वालों को करनी का फल जब मिले तब मिले, लड़की को फल मिलने का सिलसिला ज़ारी रहता है – गर्भ और बच्ची के बाद बच्ची का डीएनए परीक्षण, परीक्षण में मामा-पड़ोसी नहीं बारहवीं वाले भैया का भी नहीं, बारहवीं वाले भैया के दोस्त का अंश। फिर नए नए प्रश्न – कब कहाँ कैसे, ऐसा सुदर्शन क़द्दावर होनहार लड़का, कैसा सभ्य सुसंस्कृत परिवार, तिस पर पढ़ानलिखान डॉक्टरी का इम्तिहान सामने पूरा जीवन-जहान और ये लड़की? अपने ही मामा पर कुत्सित आरोप लगाने वाली, चाल-चलन से कुलटा, माँ मानसिक रोगी, बूढ़ी नानी अधबहरी आधी अंधी, क्या क्या करती-धरती जिस तिस के साथ ख़ुदमर्ज़ी से ? सोलह-सत्रह की नाबालिग़ तो क्या? हमारे शास्त्रों में तो अष्टवर्षीया द्वादशवर्षीया कुमारिका विवाह योग्य। फिर इसे देखें, इसकी देह, इसके लच्छन, पूरी औरत वाली गढ़न-बढ़न, चुस्त-दुरुस्त डॉक्टरी जाँच में योनि सम्भोगाभ्यस्त। अव्वल तो कुछ घटा नहीं, और दोयम जो घटा वह इस घाट  घाट का पानी पिए लड़की के ललचाने से। मामा ने कहा ही था मर्दों से ग़लती होती है लेकिन लड़कियाँ गुनाह करती हैं।

अख़बार-दरबार के चर्ख़े चलते रहे, वही पचास-बावन की वकील औरत उसकी पुश्त थामे रही और लड़की सिर झुकाए आँखें निचाए कहती रही कहती रही कहती रही, एक बार कहना शुरू किया तो बार बार दुर्निवार कहती रही। सुधारगृह में जो मिलता उस से पूछती – मेरे मामा ने, मेरे पड़ोसी अंकल ने, बारहवीं वाले भैया ने, भैया के दोस्त ने… उस समय मैं क्यों कुछ कह नहीं पाई? क्यों जम कर सिल्ली सी, ख़ुद से अलग जैसे किसी दूसरे का शरीर चिंथ रहा हो, बाद में क्यों ग्लानि से गलती रही? जैसे बिस्तर पर, पानी की टंकियों के पीछे, पड़ोस के सुनसान घर में दबोचे जाने में मेरा अपराध, मेरी छातियों नाभि योनि जाँघों की ग़ुस्ताख़ी… कुछ समय बाद उसने दूसरों से उत्तर की उम्मीद समेट ली और जैसे ही दूसरों की ओर आस लगाना बंद किया, उसका अपना जादू जाग गया ।

मर कर जी उठी लड़की ने अपना नया भाग पहन लिया। पूछने-ताछने वालों की आँखों में देखने लगी, बिना झिझके बोलने लगी। हाट-बाज़ार-बस-टेम्पो-ट्रेन में किसी से भी आँख मिलती तो मज़बूत सुरों में कहती – मेरे मामा ने पड़ोसी अंकल ने, बारहवीं वाले भैया ने, भैया के दोस्त ने मेरे साथ बलात्कार किया, मेरी कोई ग़लती नहीं, शर्म मेरी नहीं, गुनाह मेरा नहीं, मेरी बच्ची का तो बिल्कुल नहीं, उसने तो गुनाह का पर्दाफ़ाश किया, जैसे अँधेरे का क़िला फोड़ कर सुबह करती है। कंधे का बैग खोल कर शिशु की तस्वीरें दिखाती कि देखो देखो कैसी भोली कितनी प्यारी। उसके शब्दों से उसका जादू रिसता और जो सुनता उस पर झरता, भिगो कर मुलायम उर्वर कर देता। अदालत की तवालत के बावजूद उसका जादू कम होने के बजाए बढ़ता जाता – विपक्षी वक़ील शिकायत करते कि मुक़द्दमा जारी है और वह जहाँ-तहाँ उसके बारे में बोल रही है, उनके मुवक्किलों की मानहानि, परिवार, समाज, इज़्ज़त, हैसियत सबकी हानि, माननीय न्यायाधीश मी लॉर्ड हुज़ूर उसे रोका जाए।

लेकिन जादू नहीं रुकना था, नहीं रुका। आख़िर ये उसके ख़ून से बना था, उसकी देह में शुरू दिन से खुबा, जैसे कंकर-काँटा जिसे उसने मोती सा चमकाया था, ये जादू जिसे वह और और जनों से बाँटना चाहती थी – कह देने का, ना सहने का, सह कर कहने का, धीरे धीरे, चीख़ चीख़ कर, फुसफुस बरबस डरते कँपते निधड़क बिनडर झर  झर निर्झर सा जीतेजी या मरणघाट, जब भी बने, जैसे भी बने। पर बस कह देना, चुप न रहना – शर्म देह में नहीं, छाती-योनि में नहीं, हिंसा में है, जो हुआ, कह दो, जिसका जुर्म उसकी शर्म, लेकिन बदला लेने नीचा दिखाने के लिए नहीं, इसलिए कहो कि कहने से मुक्त होने की शुरुआत है, मुक्त होना यात्रा है, घटना नहीं, सो जब यात्रा के लिए तैयार हो तब कहो, धीरे धीरे, कोई जल्दी नहीं, यात्रा की तैयारी करती रहो। वह कहती तो कई बार नदियाँ बाढ़ होतीं सीने-आँखों से बहती और धड़ धड़ धड़ धड़ बाड़ें गिरती दीवारें ढहतीं । एक-दो फिर चार-दस-सौ-हज़ार लोगों तक जादू पहुँचा लेकिन जादू करने वाली ख़ुद जादू की आग में जली, जादू करने का मोल तो चुकाना होता है, मोल उसने बहुत चुकाया – अदालत के गलियारे में मामी ने चाँटा मारा और मौसी ने मुँह फेर लिया, नानी का न जीता मुँह देख पाई न मरा, राह-चलतों की गालियाँ खाईं, बच्ची के स्कूल में दाख़िले समय तरह तरह की बातें झेलीं, पहली बार अदालत में वक़ील के तौर पर पेश हुई तो उस तरफ़ के वक़ील ने कहा ख़ुद ही रेप विक्टिम है, निष्पक्ष हो कर बहस नहीं कर पाएगी। लेकिन जादू कि फिर भी बरक़रार, बल्कि और बढ़ा-चढ़ा। जादू ने अपना धर्म निभाया, उसने अपना – घिसते रहना पैनाते रहना अडिग रहना निरंतर चलना।

इस सबमें वह पचास-बावन की औरत, वह वक़ील, टूटी पसलियों और फूटे भाग वालियों की पैरोकार कहाँ? सत्रह साल की लड़की से तैंतीस साल की औरत होने तक उसकी पुश्त पर और कहाँ? सत्तर-इकहत्तर पर जब विदा हुई तो एक और पैरोकार, एक और योद्धा तैयार थी।

योद्धा भी बरखा में भींज कर झूम सकते हैं, यह संभव है, इसकी अनुमति है।

+++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++

उन्मेष

पचास-बावन की औरत अब भी बारिश में नहा रही है। बूँदें तीव्र से तीव्रतर हो कर मंद पड़ गईं हैं, आकाश से कम पेड़ों की पत्तियों से ज़्यादा गिर रहीं हैं, धरती में कम हवा में ज़्यादा जज़्ब हो रहीं हैं। पीछे घर का दरवाज़ा खुलता है – उसका अपना घर है, ईंट-पत्थर, मेहनत और ई.एम.आई. का, दिए-पाए या माँगे का नहीं। खुले दरवाज़े से कोई निकलती है और पचास-बावन की औरत पर हँस पड़ती है। ‘रेनडांस! हाउ सेक्सी! एकदम हीरोइन लग रही हो, लेकिन जब नाक बहेगी और बुख़ार से माथा फटेगा तो नहीं लगोगी! चलो, अंदर आओ, चाय बनाई है गर्म गर्म।’

‘अभी तो बारिश रस वाली हुई है और हवा ठंडी-मीठी, अभी कुछ देर और…’ पचास-बावन की औरत गोल घूमती है।

‘अरे, पाँव फिसल जाएगा… समझ नहीं आता यहाँ कौन माँ है, कौन बेटी…’

पचास-बावन की औरत तैंतीस साल की जवान औरत का हाथ पकड़ कर हँसती है। उनके जुड़वां जादू से वहाँ सत्रह साल की लड़की नमूदार है – सत्रह साल पर असंभव हँसी हँसती ।

More From Author

हाइफ़न: भारतीय भाषाओं के साहित्य के आपसी संवाद का मंच

अमरकान्त की कहानी ‘हत्यारे’

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

जानकी पुल को सहयोग करें

Jankipul : A Bridge of World's Literature एक नयी शुरुआत! मेरा कॉलम #Jankipul के लिए " जनहित में जारी सब पर भारी" आपकी टिप्पणी की अपेक्षा रहेगी