• कथा-कहानी
  • स्याह पन्ने सफ़ेद किताब

    आज प्रस्तुत है मनप्रीत कौर मखीजा की कहानी ‘स्याह पन्ने सफ़ेद किताब’। विभाजन, दंगे, विस्थापन यह सब कुछ ऐसा है जहाँ कभी कहानियाँ ख़त्म नहीं होती। इन्हीं के इर्द-गिर्द रची यह कहानी पढ़ने वाले के मन में देर तक ठहरने की ताक़त रखती है – अनुरंजनी
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      स्याह पन्ने सफेद किताब

      मंगोलपुरी

    जाने कैसी नफरत की चिंगारी उठी थी उन दिनों कि कुछ लोगों की ग़लती का हर्जाना पूरी कौम से वसूला गया! वो भी जान लेकर! जिन्होंने अपराध किया, वे अपने पीछे सभी को दोषी ठहरा गए। देश का ही एक हिस्सा उस नफ़रत को झेल रहा था। एक आग उस घर में भी लग गई। घर की आग से बचकर भाग जाना देश में फैलती आग के सामने मामूली घटना हो, लेकिन मेरे जीवन के लिए असाधारण बात थी। हालातों को देखकर इतना तो मैं भी जान चुकी थी कि अगर बच गई तो जिंदा रहकर भी रोज़ एक मौत मरना होगा। दिन रात नोंची जाऊँगी। अलग अलग इंसानी शक्ल लिए गिद्ध की खाल पहने लोग आयेंगे। मुझ पर तरस खाकर कोई मुझे मौत भी नहीं देगा। इसलिए वहाँ से भाग जाना मेरी खुद पर जतलाई हिम्मत थी। हम पर जो बीतता है वह हमें आगे धकेलता है लेकिन हर बढ़ते कदम के साथ पिछला छूट तो नहीं जाता! जकड़न शरीर की नहीं स्मृति की होती है।

    ” जब हमारी शादी होगी न, तब डोली की रात तू वो गुलाबी दुपट्टा ही ओढ़ना सुनहरे गोटे वाला। उसमें तू बहुत सोणी लगती है।” उसका ये कहना और मैंने उसके कंधे पर धीमे से सिर रख लेना ठीक वैसे जैसे कोई शाम रात के अंधेरे में चुपके से घुल जाती हो, सुकून पाती हो। हमारे रोके को अभी दो ही महीने हुए थे लेकिन बेअंत से रिश्ता इतना गहरा हो चुका था जैसे वो मेरे पिछले जन्म से ही मुझसे कोई डोर बंधवाकर लाया हो। देशसेवा के लिए सेना में जाने की अपनी चाह को उसने सबसे पहले मुझसे ही तो ज़ाहिर किया था और मैं नंगे पैरी जाकर गुरुद्वारे में अरदास कर आई थी। मंगोलपुरी की उस छोटी सी गली में रहने वाले दो सिख परिवार, थोड़े में भी रब का शुक्र मनाकर अपने प्रेम और दिलदार व्यवहार से सभी को अपना बना लेने वाले। गली में रहने वाली भाभियाँ हमेशा छेड़ा करतीं, “सुखों! तेरा मायका और ससुराल आसपास ही है। बेअंत सिंह को तो काम पर जाने का दिल ही नहीं करेगा।” रसोई की खिड़की के राही शुरू हुआ लेन देन व्यवहार पिन्नी-पंजीरी*  की मिठास अब रिश्तों में भी घोलने वाला था। ( पिन्नी और पंजीरी पंजाबी परिवारों में सर्दियों या ठंडे मौसम की शुरुआत पर बनने वाला मिष्ठान है जो पॉंच मुख्य चीजों- आटा,घी,चीनी,गोंद और मेवों से बनाया जाता है।)

    ” बहनजी , अज तों सुखों साहडी होई।” एक सवेर आकर बेअंत के घरवालो ने मुझे चुन्नी ओढ़ा दी। माँ ने गली भर में बताशे बाँटे। आने वाले गुरुपूरब के अगले रविवार फेरे होने थे पूरे गली के लोगों ने आकर मिलजुलकर काम संभाल लेने का जिम्मा लिया।” तेरा नसीब बहुत चंगा है सुखों, सोहरे परिवार दे नाल नाल आसपड़ोस दी जनानियां वी तैनू किन्ना लाड़ करदियां ने !”  माँ नजरें उतारती, उस दिन अगर वहाँ होती तो देख पाती कि कैसे आज दोनों ही घरों के लोगों को सबने गैर समझ लिया था। हम एक जैसी इंसानी हाड़ माँस और खाल लिए हुए वो लोग है जिन्हें शक्ल से पहले धर्म अलग कर देता है। धर्म ना भी कर पाए तो कुछ लोगों की राज करने की नीति सोच में जातियों का ज़हर भर देती है। बेअंत के साथ के उन सुनहरे दिनों में सजने वाले सुंदर ख्वाबों के साथ बड़े अरमानों से तैयार किया गया वह दुपट्टा भी वही छूट गया। एक ही दीवार से लगे हुए बाहरी बरामदों वाले दोनों घरों को अपने चपेट में लेने वाली आग से सब बर्बाद हो गया। बर्बादी से पहले आबाद रहने वाले भी यहीं थे… उनकी आवाजें यहीं है…

    ” हम तो जी वंड* ( बंटवारे, आमतौर पर भारत-पाकिस्तान विभाजन के लिए बोला जाने वाला शब्द ) के समय इधर आ गए। लोग को तो पता ही नहीं लगा कब कैसे मुल्क के टुकड़े हो गए ! यहाँ भी हमारे जैसे जमीं से जुड़े लोग मिले , कुछ समय राजस्थान में बिताया फिर इधर दिल्ली को चले आए।”  बेअंत के बापूजी जब भी सरहद पार के किस्से कहते पूरी गली के लोग फुर्सत निकालकर सुनते। वे हमेशा कहते, कुछ छोड़कर आए पर यहाँ की धरती ने उन्हें बहुत कुछ दे भी दिया है , और फिर अपने घर को यूँ निहारते जैसे कोई थका हुआ राहगीर भरे हुए पेड़ की छाँव से प्रेम कर रहा हो। जैसे वो पेड़ भी इसी राहगीर की आस में रहा हो हमेशा। उस घर में पढ़ी जा रही गुरबाणी* की आवाज कड़ाह प्रसाद* के साथ एक आशीष लेकर इस घर तक आती कि जल्द ही हमारा भी अपना घर बने ( गुरबाणी – सिख गुरुओं की लिखी हुई बाणियां , जिसमें शबद और पाठ शामिल है। कड़ाह प्रसाद – पाठ के बाद मिलने वाला प्रसाद )

    ” असीस कौर… बड़े जतन नाल घर सजा रहीं ऐ “

    ” हाँजी, किराए दा है तां की हो ग्या, अपणा घर ते चिड़ियाँ कावां नू वी प्यारा हुंदा, तुस्सी वेखना  ऐह घर साहनू आशीर्वाद देगा साहडे बच्चेया नू सुख मिलेगा।”  बड़ी नौकरी और ज्यादा कमाई की आस में पापाजी हमेशा दिल्ली आकर बसना चाहते थे। गाँव में बेबे कहती रही ” वड्डे शहर अजगर हुंदे ने लोक्का (लोगों ) नूं निगल जांदे ने…ओत्थे कोई मदद वी नहीं करदा” लेकिन पापाजी को आना था, वे नहीं रुके। हमें साथ ले आए। एक संकरी गली में दो कमरों का छोटा सा मकान मिला। गुरुद्वारा कुछ ही दूर, लेकिन बाजार पास ही में होने से माँ को सुख भी हो गया था । गली की औरतों के साथ आने जाने लगी। पापाजी ने टैक्सी चलाना शुरू किया। मेरी उमर सोलह साल थी। आसपास के लोगों से घुलना-मिलना अच्छा लगता, मेरे इस चंचल स्वभाव पर बेअंत बहुत खुश होता। कहीं किसी फिल्मी गीत के बजने पर दौड़कर रेडियो की आवाज बढ़ा दिया करता कि मैं सुन लूँ , और मैं इशारा समझकर अपने भाई निक्के के साथ किकली* ( किकली – दो लोगो द्वारा हाथ पकड़कर घूमकर करने वाला नृत्य ) डालने लगती, नाचने लगती।  खुश थी कि एक ओर जान छिड़कने वाला बेअंत होगा और दूसरी तरफ लाड़ करने वाले माँ-पापाजी। जीवन रंग बिरंगे चित्रों से सजा लगता।

    “सुखों दे बापू…, निक्का ते साहडे नाल जाएगा। एह ताँ सोंदा वी मेरे नाल ही है  पर सुखो नु एत्थे छडन नू दिल नहीं करदा।”

    ” तू चिंता न कर असीस कौर, गली आले सारे ही बहुत चंगे ने, इस्दा खयाल रखेंगे नाले असी तां दो दिना विच आ ही जाना।  रिश्तेदारां नूं व्याह दा कार्ड देन ते जाना है न ! एह सुखों ताँ मेरी शेर पुत्तर है  अपणा ध्यान रख लएगी।”  दो दिन के बीच एक काली रात भी आनी थी, सो आई। एक भीड़ ..बहुत शोर और एक ही बात-

    “सिखों को मार डालो।”

    “खून का बदला खून ।”

    “यहाँ कोई सिख रहते है क्या ?”

    ” नहीं नहीं… जो रहते थे वो तो.. आज सुबह ही अपने गाँव चले गए।”

    खिड़की के टूटे पल्ले से छिपकर देखते हुए मैं अपनी साँसों की आवाज पर भी किसी का ध्यान नहीं लाना चाहती थी। डर को कैसे जीते हैं मैंने उस रात देखा। आवाजें ऐसी कि शब्दों में खंजर लिए बैठे हो। भीड़ का कोई एक चेहरा नहीं था पर भीड़ के सिर पर खून सवार था। उस भीड़ के आगे जाते ही कुछ लोगों की बातें सुनाई दी  “सिखों को देखते ही बड़ी बेरहमी से क़त्ल किए जा रहे है। जिंदा जला रहे है। औरतों और बच्चियों को रात को उठा ले जाने की बातें… बातों से ही नंगपना कर रहे है। कहर बरस रहा है बहनजी !”  मकानमालकिन को हम सभी बहनजी कहते। उन्होंने अंदर आकर मेरे सिर पर हाथ फेरा, मुझे ठहरने का कहकर बाहर चली गई। मैं सवालों से घिरी घबराहट से भरी कोने में छिपी रही। बहुत बार मन किया उठकर बेअंत के घर की तरफ झाँक लूँ किसी को आवाज दूँ मगर बहनजी मुझे आवाज करने के लिए भी मना कर गई थी। पर मेरी ये चुप भी किसी के लिए मौका बन सकती है हमने सोचा नहीं था । घर के सामने मंजी* (छोटी चारपाई )  पर सारा दिन लेटा बीड़ी पीने वाला वो आदमी जिसे हम बहनजी का पति कहते , वह घर में घुस आया। उसकी आँखो के वहशीपने और इरादे को मैंने तुरंत भाँप लिया। मुझे हाथ लगाने को बढ़ते उसके कदमों को मैंने कैसे रोक लिया मैं नहीं जानती!  रब जानता होगा। एक छोटी सी किरपान* ( छोटी तलवार ) बाबाजी की तस्वीर के पास हमेशा रहती । उस कोने में पनाह लेना शायद रब की मर्जी थी। वो वहाँ से चला गया लेकिन कुछ घंटों में फिर वही शोर …

    ” यहाँ इस घर में दुबके बैठे हैं साले, जला दो सबको  ” देर रात जो भीड़ वापस आई वो और भयानक थी।  पास के घर से फैलती आग यहाँ तक आ गई। जैसे-तैसे वहाँ से भाग आई। काँपते पैरों के साथ पूरे शरीर में एक भारीपन लगने लगा। सड़क पर कहीं-कहीं ताजे खून के धब्बे … कहीं किसी की पगड़ी खुली हुई थी, पैरों में आती थी। इतनी बेअदबी देखी नहीं जाती थी… कहीं जले हुए माँस की बदबू और कहीं चीखती-चिल्लाती औरतें। मैं भी रोना चाहती थी लेकिन मैंने अपनी चीख दबा ली। माँ पापाजी और निक्के की बहुत याद आ रही थी । पता नहीं उनके साथ क्या हुआ होगा ..!

    इक प्रेम दा बूटा सी

    नवंबर के शुरुआती दिन

    हम जानते है उम्मीद का धागा कितना महीन होता है फिर भी इस पर पकड़ बनाए रखते है। अंधेरे से घिर जाने पर भी नजरों से रोशनी की तलाश नहीं छूटती।

      ” आप उसे घर क्यों ले आए ! मदद करने वालों के हाथ भी काटे जा रहे है , जानते नहीं आप क्या ! हमारे ही पड़ोस की घटना है… एक लड़का अपने सिक्ख दोस्त की मदद कर रहा था भीड़ ने दोनों को साथ जला दिया। मेरी राय में आप उसे पास के किसी कैंप में छोड़ आइये।”

    लोगों को उनकी फिक्र थी। मैं खुद भी नहीं चाहती थी कि एक दिन बीता है और मेरी ही सुरक्षा के लिए मुझे अपने घर ले आने वालों के सिर कोई मुसीबत आ पड़े। हाथ जोड़कर उनसे इजाज़त ली और कुछ दूरी पर एक स्कूल जहाँ कैंप लगा था , मैं वहाँ चली आई। अपनों से तो नहीं, लेकिन अपने जैसे कई मिले। सबके दर्द इतने गहरे कि शब्दों ने साथ छोड़ दिया है। आँखें रोते रोते सूखने लगी है ।

    यहाँ हर इंसान की एक कहानी है । पास सिर्फ बिछोड़ा है , बिछोड़े का दर्द है। खून बहाते ज़ख़्म है, खुद वे जिंदा लाशें है । चुप है , पर बहुत चीखें सुनाई देती है ।

    (” मेरे मुंडे दे सिर तों खून वग्गी* ( वगना बहना, बहते जाना ) जान्दा ए… ओह दूर बैठे डॉक्टर सुन दे वी न्ही ते इलाज वी नहीं करदे…मेरे वड्डे मुंडे दी तरह एहने वी मर जाना है…” ” यहाँ हमारे पास देखने के सिवा काम ही क्या है , इन्हीं लोगों के लिए यहाँ है , देख लेंगे इन्हें ।”)

    ” मैं उस अस्पताल में डॉक्टरों के आगे मिन्नतें करती रही किसी ने बेटे को हाथ भी नहीं लगाया। पास खड़े पुलिस के दो अफसर जोर जोर से हँसते।  बदला बदला … खून …. पिछले चौबीस घंटों में कितना कुछ बदल गया है अब सब जगह खून ही खून है। ऐसे बदला लिया है ….  ये कैसे अपने ही लोग है ! ये कैसा अपना देश है !”

        यहाँ जिस भी दीवार के सहारे टिककर बैठती लगता कि दीवार से ही खून रिसने लगा है। ये मेरे कोई भी तो नहीं , लेकिन हालातों ने कैसे एक सा दर्द देकर लोगों को आपस में जोड़ दिया है। किसी ने अपने दोनों बेटों को खो दिया है गुस्सा आँखों में उतर आया है कुछ कर नहीं सकती बस मरना चाहती है लेकिन मौत का इंतजार करना होगा। एक औरत जिसके चेहरे से लेकर गर्दन तक दाँतो के निशान हैं, बदन पर नील पड़े है। बहुत पूछने पर बताती है कि तीन लोग उसे उठाकर ले गए थे। इसने बहुत कहा मैं तो तुम्हारी बड़ी बहन जैसी हूँ मगर किसी ने नहीं सुना। फिर वापिस पटक गए , वह औरत है या कोई सामान , औरत से बेहतर स्थिति शायद किसी सामान की हो! वह समझ नहीं पाती। सो नहीं पाती। नींद में मेरा ही हाथ लग जाए तो वह डर जाती है। मैं उसे सहलाती हूँ। खुद पर हैरानी है खुद पर तरस भी , क्या वक़्त ने मुझे समय से अधिक पहले इतना परिपक्व और जिम्मेदार बना दिया है! मेरा दुख भी इनके जैसा है लेकिन इनसे बहुत कम लगता है ! कैंप में जहाँ तक निगाह जाती है उदासी ही उदासी है। थोड़ा ठहरती हूँ और एक चेहरा जाना पहचाना लगता है लेकिन रूप कुछ बदला है मैं दौड़कर जाती हूँ। उसके होंठो पर जाने कैसी चुप्पी है जो शब्दों पर भारी है। मुझे उसकी आँखो में एक वीरानी दिखती है

    ” तेरे केशों को क्या हुआ !”

    ” …..”

    उधर से कोई जवाब नहीं आता। मैं फिर बात कहती हूँ

    ” मैंने उस रात तेरे घर तक आने की , आवाज़ लगाने की कितनी कोशिश की, सब खिड़की दरवाजे भी बंद थे … पर बहनजी ने कुछ कहने भी नहीं दिया। एक वही थी जिसने दंगाईयों से बचाया…”

    ” सब तमाशा देखते थे… किसी ने साथ नहीं दिया। इनके लिए हम बस एक कहानी थे जिसे स्वाद ले लेकर सुनते थे। पहले बापूजी से सिंध से आने की कहानी… और अब… अब तो खुलेआम सब देख लिया। “

    कुछ शब्दों का जामा पहनाकर वह अपना दर्द मेरे सामने रखता है और फिर एक लंबी चुप ओढ़ लेता है। उसके शरीर पर ज़ख्म के निशान नहीं है । लेकिन मन पर तो है । मैं अपने मन से उसके मन तक कोई राह बनाती हूँ। सोचती हूँ.. वह कह दे तो मैं अपनी झोली आगे कर दूँ और उसके सारे दुख अपने पास रख लूँ।

    ” बापूजी को मेरे दोस्त आफ़ताब से कभी कोई शिकायत नहीं थी। वे मज़हब से पहले इंसान देखते थे। उस रात दंगाइयों के आने से पहले वो घर पर आया। सारी बत्तियां बंद कर दी , कहने लगा अपनी पगड़ी उतारकर केशों को काट दे तो गली से उसके साथ सही सलामत निकल सकते है। एक एक केश के कटने पर माँ गुरबाणी पढ़ती, रोती रही ! वे फिर आए। माँ हमें खींचते हुए छत पर ले गई और छिप जाने को कहा। आग छत तक नहीं पहुँची लेकिन … बाकी सब तो राख़ होने जा रहा था। रज्जो( छोटी बहन) ….. कहीं नहीं मिली!  लोगों से मालूम होता है उसे साथ ले गए। कहते थे… इसके लिए ही तो इतनी रात को आए है। रज्जो…यहाँ भी नहीं दिखती… कोई नहीं दिखता !”

    ” तू मिल गया ना मैनू “

    ” जो खुद को ही खो चुका हो, वो किसी को नहीं मिल सकता।”

    ” पर तेरा मेरा ते व्याह होन वाला सी “

    उसने कुछ नहीं कहा , मैंने सुनने से अधिक समझ लिया। कैंप में बीबीयों ( जनाना) के पास लेटकर उसकी तरफ देखती रही उसने मुड़कर नहीं देखा। रात सोचने में बीती, हर पल गुजरते हुए एक सवाल सिरहाने छोड़ जाता । क्या हालात अब कभी नहीं सुधरेंगे?  वो रंग जो आपस में घुले मिले थे अब अपने अपने रंगों तक ही रह जायेंगे ! जो लोग ग़ुम हो जाते है उन्हें कौन ढूंढ़कर ला सकता है, कौन लौटा सकता है गए हुए को ! वें जहाँ चले जाते है क्या उधर तक कोई आवाज पहुँचती होगी! जो पीछे रह जाते है उन्हें जीना कौन सिखाता होगा! जीवन खुद आकर उनके कंधों पर सवार हो जाता होगा, बन्दा नाचता होगा, थकता होगा पर फिर चलता होगा।

    मेरे लिए अगली सवेर रात से भी ज्यादा काली थी। एक पर्ची पास मिलती है जिस पर लिखा था-

    “मैं नाउम्मीदियों से घिरा हूँ मुझसे आस का सिरा ना जोड़। जिधर खून पानी हो जाए फिर इंसान खोखला ही रह जाता है।”

    मेरे पास अब सब्र और अरदास के अलावा कुछ नहीं बचा था। ये सोचकर दो आँसू और बहा लिए कि इश्क़ दी जितनी खुशबू ठहर गई उतनी काफ़ी। अब मेरी रूह बची हुई जिंदगी उसी में महकेगी। प्रेम दे इस नन्हें बूटे को शायद इतना ही बढ़ना था। रब उसे किसी भी भटकन से बचाए, कहकर कैंप में ही रह गई कि अब जो राह दिखेगी वही मेरी। कुछ दूरी पर अम्मा बाबा मेरा कड़ा हाथ में लिए खड़े थे, मैं उन्हीं के साथ वापिस लौट आई।

     ज़िंदगी स्याह पन्नों की सफेद किताब है।

    अक्टूबर के आख़िरी दिन से वर्तमान

    “अपना शरीर ढक लो बेटी ” कहीं कहीं से फटे और जले हुए कपड़े…मेरी कमीज से दिखने वाले अंगो ने उनकी दया भरी निगाह को एक दुपट्टे संग मुझ तक पहुँचा दिया ।

    ऐसा नहीं था कि अक्टूबर के उस आखिरी दिन की दोपहर से शहर पर जो बीत रहा था उससे लोग अंजान थे लेकिन कुछ लोगों के लिए तब तक सब अविश्वसनीय रहता है जब तक आँखों देखा नहीं करते। उनकी मंशा तो नहीं थी कि मेरे दुःख का रसपान करें पर हालात ऐसे बद्तर हो सकते हैं ये उनकी सोच के दायरे से बाहर था।

    मैं फफककर रो पड़ी। मैं उस औरत को सब कुछ बता देना चाहती थी कि मैं कौन हूँ, कहाँ से आई हूँ। अब तक जो साहस जवाब दे चुका था ऐसे में एक औरत के लहज़े  में सहानुभूति के दो बोल सुनकर उन्हें गले लगाकर रोने को दिल किया लेकिन समय और परिस्थिति जब दिमाग को अविश्वासी बना दे तब कोई लफ़्ज़ विश्वास का बीज नहीं बो पाता। मुझसे कुछ कहा नहीं गया । वे मुझे अपने साथ ले गए। रात के अंधेरे में बहुत तेज और दूर तक भागने के बाद भी कहाँ तक जा पाती! एक थका हुआ शरीर कहीं तो रुकता। रास्ते भर का खौफनाक मंजर देख वे सारी घटना समझ पा रहे थे। वे हिंदू थे और सड़क पर हथियार और कैरोसिन लेकर घूम रहे भेड़ियों को सिक्खों के खून की प्यास थी। उन्हें रोका नहीं गया। जगह-जगह खून से सनी सड़क से उनके कार की पिछली सीट और उनके घर आ जाने का सफर मैंने बेसुध होकर तय किया।

    मेरे दाहिने हाथ के जलने पर वो दवा लगाने बैठी तो कलाई तक आकर रुक गई। दोनों पति पत्नी ने एक दूसरे को देखा और मेरे हाथ से कड़ा निकाल कर एक अलमारी में रख दिया। समय जब अपनी माँगे सामने रखता है तो इंसान को जीवन में अभी तक बनाये और निभाये हुए अपने उसूल जान के आगे कीमती नहीं लगते। समय हमारे उन उसूलों को उठाता है और अपनी गति से आगे बढ़ता रहता है। हम सब समय की उस अनदेखी विशाल काया के आगे बौने रह जाते है ।

    उस घटना को दो हफ्ते बीत चुके थे। और इतना ही वक़्त हुआ अम्मा और बाबा के साथ रहते हुए। घर में आने जाने वाले सहायकों के मुँह से उनके लिए यही  शब्द सुने और मैं भी उन्हें यही कहने लगी। दिल कहता वे मेरे लिए कोई अजनबी फरिश्ते बनकर आए है  जिनसे नाता जुड़ गया है। बाबा एक बैंक कर्मी,  स्वभाव से एकदम सज्जन व्यक्ति। अपनी नौकरी के बँधे समय के अलावा जो भी वक्त उन्हें  मिलता उसमें किसी न किसी व्यक्ति की मदद करने में लग जाते। ये शहर उनके लिए भी नया था पर थोड़े ही समय में शहर ने उन्हें अपना बना लिया। मोहल्ले भर के लोग उन्हें सम्मान दिया करते। उनके कमरे को देख जान पड़ता कि वे एक गहरे पाठक है, किताबों से दो अलमारियाँ भर रखी है जिनका ज्ञान और दर्शन जीवन में उतर चुका है। अम्मा भी दुनिया भर की समझ और ज्ञान रखती।  घर संभालने में कभी कोई चूक होते मैंने नहीं देखी। इतने चंगे लोगों के घर में भी रब अपनी मेहर की एक निगाह करना कैसे भूल जाता है ! औलाद का सुख उन्हें अब तक नहीं मिला !  आस पड़ौस की औरतें अपने बच्चों की हारी – बीमारी में अम्मा से ही नुस्खे पूछने आती। वे जाने लगते और अम्मा बहुत देर तक नजर दरवाजे तक टिकाए रखती । किसका दुख ज्यादा है यह आज तक कौन जान सका है ! जीवन का खाली रह जाना सबसे गहरा दुख है। हम इस खालीपन को भरने का प्रयास करते हुए भी जीवन जीते जाते है। अम्मा की बुझी आँखें मुझे अक्सर अपने मन की सूखी जमीन सी लगती।

    चढ़ते नवंबर के दिनों में दिल्ली को अगर एक नक्शा मान लिया जाए तो जगह जगह फैले खून के छींटे और नमी से कागज का कुछ हिस्सा लगभग गलने जैसा हो चुका था। तीन दिन तीन रातों की दहशत सहने के बाद जब धीरे-धीरे शहर के हालात सामान्य लगने लगे तो अम्मा को साथ लेकर मैंने गुरुद्वारे आना जाना शुरू किया। गुरपुरब के समय भी संगत उतनी नहीं थी।  बोर्ड पर लगी कार – सेवा की सूचना से मालूम हुआ कि उस गुरु घर की दीवारें जो कभी सुंदर सफेद संगमरमर से सजी जानी थी उन पर बीते दंगों की काली कहानियां आकर चिपक गई। दंगाइयों ने गुरुद्वारे को जला दिया। गुरु ग्रंथ साहिब की बहुत बेअदबी हुई। सीढ़ियों पर बैठी कुछ बुजुर्ग औरतें दबी आवाजों में रोया करती। ” बहनजी मेरे पाँच बच्चे थे और सब मार दिए उन्होंने। भरा पूरा घर लूट के ले गए… सब खाली छोड़ दिया। मैं अकेली … अब इस दर  पे अपने मरने की अरदास करती हूँ। हे वाहेगुरु , मैनू वी लै जाओ … मैं नहीं रहना।”

     ” सब बुरे नहीं है वीरजी। हमारे बहुत से पड़ोसियों ने अपने घरों के दरवाजे हमारे मुँह पर बंद कर दिए, उनकी छतों पर काँटे रख दिए कि हम जाकर वहाँ छुप न सके लेकिन कुछ हिंदू भाईयों ने भीड़ के सामने खड़े होकर हमें बचाया भी।”

    गुरुद्वारे के बाहर बने थड़े के सहारे टिककर कुछ वीरजी बीते समय के थपेड़े सहकर भी खुद को तसल्ली देते। मेरी अरदास में उन दिनों बस, ” सारेया दे सिर ते हथ देके रख्खी मालका, अपने बच्चेया दी रक्षा करीं ” ये ही शब्द होते। लौटते हुए देखती कि कुछ सिख संगत दंगों में बेघर हुए लोगों के घर बनाने के लिए अपनी अपनी तरफ से रुपए इकट्ठे करती, मुझे माँ पापाजी याद आ जाते।

    ” मर मरा गए होंगे … या समझ लो लापता हो गए । हमारा पीछा छोड़ो।  पहले ही इतने केस पड़े है कैसे ढूंढे आपके घरवालों को जिनकी फोटो और ठीक ठीक जानकारी भी नहीं आपके पास।”

    “आप ठीक से देखिए तो … देखते क्यों नहीं ! लाभ सिंह नाम है उनका।” पुलिस के पास काम अधिक होता है या बहाने, पता नहीं!  कि मेरी बात को बार बार अनसुना किया गया।

    रात गहराने लगती और मैं नींद से पीठ मोड़ लेती। जीवन में बचा ही क्या था कि सुकून का सिरहाना मिले। इन दो हफ्तों में अम्मा और बाबा ने मेरे लिए बहुत प्रयास किए मेरे जीवन की खाली जगह को भरने , मेरे सिर पर छाँव बनकर हाथ रखने, माँ, पापाजी और निक्के को ढूंढने की भी कोशिश की। दो तीन बार उस गली की तरफ गए , बाबा अपना नाम पता दे आते कि कहीं से कोई खबर मिले लेकिन अब वहाँ कुछ नहीं बचा था।  मैं मुड़ मुड़कर उन  मकानों को देखती अभी अभी तो रंग बिरंगे चित्र सज रहे थे यहाँ, जाने कैसे जले हुए दिखाई पड़ रहे । बहुत सोचकर बाबा ने मेरे कहने पर खुद ही मुझे पिंड ( गाँव) ले जाने का मन बनाया लेकिन कौन जानता था वहाँ भी अपनों का सही सलामत मिलना मुमकिन होता या नहीं !

    बेबे गुजर चुकी थी। माँ, पापाजी कभी गाँव पहुँचे ही नहीं ये जानकर मैं एक पल में हजार मौत मर गई। उम्मीद का दिया बुझता सा लगने लगा। वहाँ किसके भरोसे रुकती ! रिश्तेदारों ने पानी तक नहीं पूछा बल्कि किसी किसी को तो मैंने उसी वहशीपने में डूबा पाया । ऐसे लोगों को औरत का सिर्फ तन दिखता है उसके जीवन से जुड़ा रिश्ता नहीं दिखता। मेरा वापिस लौटना ही ठीक था।

    ” सुनिए.. मैं सोचती हूँ अगर हम इस बच्ची को अपना लें.. कागज़ी तौर पर भी .. तो ! अपनी सारी ममता, सारा स्नेह इस बच्ची पर उड़ेल देने को जी करता है।”

    अम्मा की ये अर्जी बाबा का कलेजा चीरने लगी। दूसरी तरफ मानो जीवन उन्हें चुनौती देता हो अपने स्वभाव के अनुकूल जाकर भी वें मेरे लिए कुछ नहीं कर पा रहे। मैं एक खोखला जीवन जी रही थी।  अधिक सोचती और यूँ लगता जैसे हमारे साँस लेने पर अगली साँस बाहर आती है मेरा सुख भी वैसे ही जीवन में थोड़ी सी जान देकर तुरंत चला जाता हो । गलत कहती थी माँ कि मेरा नसीब बहुत चंगा है । ये कैसा नसीब कि जिसमें माँ-पापाजी ही नहीं !

    करीब एक महीना बीत गया है। आज भी निक्के की वो शरारती हँसी सुनाई देती है जैसे अभी मेरी चोटी खींचेगा और किसी कोने में जाकर छिप जाएगा। माँ अभी ही घी में चूरी* ( रोटी , घी और गुड़ से बनी चूरी) बनाकर ले आएगी मुझे अपने हाथ से खिलाएगी और पापाजी अभी आवाज लगाएंगे कि चल तैनू टैक्सी विच दिल्ली दी सैर करा दूँ। भरभरी आँखो से दरवाजे की तरफ देखती हूँ कोई आता क्यों नहीं दिखता! खुशी नाराज़ हो गई है, नसीब में दरारें है , मेरी अरदास रब तक क्यों नहीं पहुँचती!

    सुखों के इसी वर्तमान में कहीं दूर एक अस्पताल में तीन जली हुई लाशें अब भी किसी शिनाख्त किसी पहचान के लिए रखी है। ये वे लोग है जो 31 अक्टूबर की सुबह अपनी टैक्सी से घर से निकले। गाँव जाने से पहले बाजार गए। ” कुड़ी दे व्याह लायक चूड़ा दिखाओ वीरजी!” नाप के लिए औरत साथ लाई गुत्थी ( पोटली) से सोने की चूड़ी निकाल कर दिखाती है। अपनी बेटी के गोरे हाथों पर सजाने के लिए दोनों माँ बाप ने दुकान का एक सुंदर लाल चूड़ा पसंद किया है। लौटते हुए माता-पिता के चेहरे पर बेटी को समय से अच्छे परिवार में ब्याहने का सुकून है , खुशी है। तभी कुछ सौ दो सौ लोग इन्हें देखकर चिल्लाते हुए भागे आ रहे है। सिर्फ तीन लोगों के खून के लिए एक बहुत बड़ी भीड़ ! कौन बचाएगा! कैसे बच पाएंगे! कुछ देर की चीखें, फिर जलती हुई लाशें। उस छोटे लड़के का रोना किसी का दिल नहीं चीरता बल्कि ” साँप का बच्चा है मार डालो” कहकर लाठियां बरसाते है। तीनों की लाशें टैक्सी में है , जिस पर कैरोसिन छिड़क दिया गया है। सदाएं लपटों में लिपटकर आसमान का सिरा छूती हो शायद ! भीड़ दूर बहुत दूर जा चुकी है। किसी भले आदमी ने जिसे भीड़ का सामना करने की हिम्मत नहीं थी , आकर इन पर पानी फेंक दिया है और दूर गिरी उस छोटी पोटली को उठाकर ले जा रहा है। पोटली में सोने की दो चूड़ियां है … एक निक्के की वोहटी* ( बीवी) के लिए काम आती  और दूसरी, सुखों दे सुख के लिए।

     

    परिचय 

    जन्म : 1989,  राजगढ़ (अलवर) राजस्थान 

    वर्तमान निवास : गांधीनगर , गुजरात 

    शिक्षा : स्नातकोत्तर 

    गद्य एवं पद्य लेखन में सक्रियता।  राजस्थान पत्रिका , दैनिक भास्कर , अमृत विचार आदि समाचार पत्रों के साथ विभोम स्वर ( अंतरराष्ट्रीय पत्रिका) में लघुकथा का प्रकाशन । प्रतिष्ठित मंच साहित्य तक के ऑनलाइन पेज के माध्यम से कविताओं का प्रसार। दो साझा संग्रह में सहभागिता से कहानियां प्रकाशित । विगत वर्षों में कईं ऑनलाइन मंचों पर कविताएं , कहानियां , बाल साहित्य लिखकर जीत हासिल की है। 

    पाठन व संगीत में रुचि। लेखन पथ पर अग्रसर। 

    सम्पर्क: makhijamanpreetkaur@gmail.com

    manpreetmak6@gmail.com

    One thought on “स्याह पन्ने सफ़ेद किताब

    1. आँखों के सामने सब चलचित्र सा दिखाई देता है और दर्द महसूस होता है । जीवंत लिखा!

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