हमारे शायर लेखक और महकमा-ए-पुलिस के अधिकारी सुहैब अहमद फ़ारूक़ी सत्तावन साल के हो गये हैं। इस बात का क़बूलनामा लिखा है उन्होंने। बधाई के साथ पढ़िए- मॉडरेटर
===============
हज़रात!
आज ख़ाकसार सत्तावन बरस का हो गया।
सत्तावन!
यानी अब उम्र को गिनने के लिए उँगलियों की ज़रूरत नहीं पड़ती, कैलेंडर देखना पड़ता है। 😁
पिछले साल तक मैं अपने को “अब तक छप्पन” कह रहा था। अब “सत्तावन साल पुराना आदमी” मुनासिब लगता है।
पुराना इसलिए नहीं कि इस्तेमाल ज़्यादा हो चुका है, बल्कि इसलिए कि अब तजुर्बे की इतनी परतें चढ़ चुकी हैं कि आदमी को हर बात पर अपनी राय देने की ज़रूरत महसूस नहीं होती।
सत्तावन साल में आदमी यह सीख जाता है कि हर बहस जीतना ज़रूरी नहीं है, हर सवाल का जवाब देना ज़रूरी नहीं है और हर बात को दिल पर लेना तो बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं है।
कुछ बातें वक़्त के हवाले कर देनी चाहिए, कुछ लोगों को उनकी राय के हवाले, और कुछ बातों पर बस मुस्कुरा देना चाहिए।
ज़िंदगी ने भी पिछले सत्तावन बरसों में अपना पूरा syllabus पढ़ाया है। कहीं इम्तिहान पहले हुआ और सबक बाद में मिला, कहीं सबक पहले मिला और इम्तिहान बाद में, और कहीं ऐसा भी हुआ कि इम्तिहान चलता रहा और हमें आज तक समझ नहीं आया कि syllabus क्या था। 😁
पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि ज़िंदगी ने मुझे मेरी उम्मीद से कहीं ज़्यादा दिया है। कुछ ख़्वाब पूरे हुए, कुछ अधूरे रह गए। कुछ लोग उम्र भर के लिए मिले, कुछ रास्ते में ही छूट गए। कुछ फ़ैसले सही निकले, कुछ ने सही होने का तजुर्बा दे दिया। और कुछ ग़लतियाँ ऐसी थीं जिनका शुक्रिया अदा करना चाहिए—उन्होंने वह अक़्ल दी जो किसी किताब से नहीं मिल सकती थी।
अब उम्र के इस मुक़ाम पर एक अजीब-सी सुविधा हासिल हो गई है। पहले मैं लोगों को प्रभावित करना चाहता था, अब बस उन्हें बोर नहीं करना चाहता। 😁
पहले यह फ़िक्र रहती थी कि लोग हमारे बारे में क्या सोचते हैं, अब यह सोचकर ख़ुशी होती है कि लोग जो सोचते हैं, सोचते रहें। क्योंकि सत्तावन बरस में यह भी मालूम हो गया है कि दुनिया को हमारी ज़िंदगी में उतनी दिलचस्पी कभी थी ही नहीं, जितनी हम समझते रहे।
हर आदमी अपनी कहानी में व्यस्त है। मैं अपनी स्टोरी में main character हो सकता हूँ, लेकिन बाक़ी भी सब अपनी-अपनी कहानी के hero हैं। शायद ज़िंदगी की ख़ूबसूरती भी यही है।
अब शरीर कभी-कभी उम्र की याद दिलाता है। सीढ़ियाँ पहले भी थीं, मगर अब उनसे दोस्ताना रिश्ता नहीं रहा। कुर्सी पर बैठना आसान है, उठना एक छोटा-सा project बन चुका है। सुबह आँख खुलते ही पहले यह नहीं सोचते कि आज क्या करना है, बल्कि यह देखते हैं कि आज शरीर के कौन-कौन से हिस्से सहयोग करने के मूड में हैं। 😁
लेकिन दिल अब भी शरारती बच्चा है। वह उम्र की कोई बात मानने को तैयार नहीं।
अच्छा गाना सुनकर अब भी ठहर जाता है, पुराने दोस्त की आवाज़ सुनकर बरसों पीछे चला जाता है, बच्चों के साथ बैठकर अब भी बच्चा बनने में उसे कोई शर्म नहीं और कभी-कभी आईने में देखकर यह उम्मीद भी कर लेता है कि सामने वाला आदमी उससे सिर्फ़ दस साल छोटा होगा। फिर चश्मा पहनकर अंकिल जी को वास्तविकता दिखाई देती है। 😁
सत्तावन बरस ने एक और बात सिखाई है—
ख़ुशी कोई मंज़िल नहीं है, यह रोज़ की छोटी-छोटी आदतों का नाम है। एक अच्छी चाय, किसी अपने का फ़ोन, दोस्तों के साथ बेवजह की गुफ़्तगू, अच्छी किताब, एक पसंदीदा शे’र, बच्चों की हँसी और कभी-कभी दोपहर की वह नींद, जिसमें दुनिया कुछ घंटों के लिए हमारी ज़िम्मेदारी नहीं रहती। शायद यही ज़िंदगी है।
53 की उम्र में मुझे लगा था कि ज़िंदगी की ट्रेन Fast Mode में चल रही है और एकरसता ने घेर लिया है। 56 पर आकर महसूस हुआ कि ज़िंदगी को थोड़ा हँसकर देखना चाहिए और अब 57 पर लगता है कि ट्रेन जहाँ जा रही है, जाने दीजिए। खिड़की से बाहर के मंज़र का मज़ा लीजिए। मंज़िल का पता सबको एक दिन चल ही जाता है। फ़िलहाल सफ़र बाक़ी है और सफ़र में अभी कुछ स्टेशन ऐसे हैं जहाँ उतरना है, कुछ ऐसे लोग हैं जिनसे मिलना है, कुछ किताबें हैं जिन्हें पढ़ना है, कुछ शे’र हैं जिन्हें कहना है और कुछ बेवक़ूफ़ियाँ हैं जिन्हें करने से अभी तौबा नहीं की है।
आख़िर उम्र का बढ़ना अपने आप में कोई उपलब्धि नहीं। उपलब्धि यह है कि इतने बरस गुज़र जाने के बाद भी आदमी के भीतर हैरान होने की क्षमता, मुस्कुराने की वजह और उम्मीद करने की हिम्मत बची रहे।
तो साहिबान,
सत्तावन साल पुराना आदमी हूँ।
कुछ जगहों से घिसा हुआ, कुछ जगहों से चमका हुआ, कहीं-कहीं थोड़ा टूटा हुआ, मगर अल्हम्दुलिल्लाह…
अभी चलता हूँ। 😁
और अगर चलने में थोड़ी तकलीफ़ हो भी तो क्या हुआ— साथ चलने वाले अच्छे हों तो रास्ते की लंबाई मायने नहीं रखती।
इन सत्तावन बरसों में जिन लोगों ने मुझे मोहब्बत दी, दोस्ती दी, इज़्ज़त दी, डाँटा, समझाया, हँसाया, मेरी ग़लतियाँ बर्दाश्त कीं और मेरी ख़ुशियों में शरीक हुए—उन सबका शुक्रिया।
बाक़ी जो लोग मेरी ज़िंदगी में आए और मुझे कुछ सिखाकर चले गए, उनका भी शुक्रिया।
और जिन्होंने कुछ नहीं सिखाया…उनका भी शुक्रिया। उनसे मैंने सीखा कि किन लोगों से कुछ सीखना नहीं चाहिए। 😁
दुआ बस इतनी है कि आने वाले बरसों में उम्र बढ़े तो उसके साथ सुकून बढ़े, शुक्र बढ़े, मोहब्बत बढ़े और शरारत कम न हो।
क्योंकि- उम्र का क्या है, वह तो बढ़ती रहेगी। असल सवाल यह है कि आदमी के भीतर का आदमी बचा रहे।
क्योंकि, बक़ौल हज़रत सुहैब फ़ारूक़ी साहब—
सर पर अपने बोझ न भारी रखना
चल पड़ना कभी भी तैयारी रखना
दुआओं में याद रखिएगा।


