लेखिका रेखा झा के उपन्यास ‘बिना मुरदों वाला दीया’ बचपन की स्मृतियों की अल्हड़ कहानी है। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस उपन्यास पर यह टिप्पणी लिखी है युवा लेखक आशुतोष कुमार ठाकुर ने- मॉडरेटर
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रेखा झा का लघु उपन्यास बिना मुरादों वाला दीया पढ़ते हुए लगता है कि स्मृतियाँ हमारे भीतर कहीं जाती नहीं हैं। वे समय की तहों के नीचे दब जाती हैं और किसी मामूली-सी गंध, किसी पुराने रास्ते, किसी आवाज़ या किसी परिचित नाम के सहारे अचानक हमारे सामने आ खड़ी होती हैं। यह किताब उसी लौटने की कथा है। पूसा की गलियों, आम और लीची के बागों, छुम-छुम बस, मासियों के घर और मुन्नी की छोटी-सी दुनिया के बहाने रेखा झा उस बचपन को फिर से रचती हैं, जिसे हम बड़े होते-होते पीछे छोड़ आए हैं।
इस उपन्यास की सबसे बड़ी खूबी उसका बचपन को देखने का ढंग है। यहाँ बचपन किसी बीती हुई उम्र का सजावटी चित्र नहीं है। वह अपनी पूरी जिज्ञासा, अपने छोटे-छोटे भय, अपनी कल्पनाओं और रिश्तों पर सहज विश्वास के साथ उपस्थित है। मुन्नी की आँखों से दिखाई देने वाली दुनिया में चीजों के अर्थ अभी स्थिर नहीं हुए हैं। मंदिर और मजार के बीच कोई दीवार नहीं है। पीर बाबा और भगवान एक ही आत्मीय संसार के अलग-अलग नाम हैं। मुन्नी को समझाया जाता है, “मजार भी एक तरह का मंदिर ही होता है; जैसे मंदिर में भगवान होते हैं, वैसे ही मजार पर पीर बाबा।” बच्चे के लिए यह किसी विचारधारा का वक्तव्य नहीं, दुनिया को समझने का सहज तरीका है। आज इसे पढ़ते हुए उस मासूम समझ की महत्ता और अधिक महसूस होती है, क्योंकि बड़े होने के साथ हमारे समाज ने जिन पहचानों के बीच दूरियाँ खड़ी की हैं, बचपन उन्हें अभी जानता ही नहीं।
उपन्यास का पूसा भी सिर्फ एक जगह नहीं है। वह स्मृति का भूगोल है। आम और लीची के बाग, पेड़ों की छाँह, घरों की आवाजाही, रिश्तेदारों के बीच का खुलापन और उस समय की धीमी जीवन-लय मिलकर एक ऐसी दुनिया बनाते हैं जिसमें जीवन अभी लगातार किसी अगली मंजिल की ओर भागता हुआ नहीं दिखाई देता। आज के बच्चे जिस दुनिया को स्क्रीन पर खोजते हैं, मुन्नी उसे अपने आसपास जीती है। उसके लिए रास्ता भी अनुभव है और यात्रा भी किसी घटना से कम नहीं।
छुम-छुम बस और बचपन की यात्रा
छुम-छुम बस इसीलिए उपन्यास में इतना महत्वपूर्ण हो जाती है। वह केवल आने-जाने का साधन नहीं है। वह मुन्नी के लिए दूसरी दुनिया में प्रवेश का माध्यम है। अपनी छुम-छुम ड्रेस में बैठी मुन्नी के भीतर जो उत्सुकता है, वह उस उम्र की एक ऐसी मनःस्थिति को पकड़ती है जिसमें छोटी-सी यात्रा भी जीवन की बड़ी घटना बन सकती है। “पूरब की उस छुम-छुम बस में सिर्फ सफर नहीं था, उसमें अपनों से मिलने की बेताबी और बचपन के ढेरों सपने सवार थे।” इस पंक्ति में उपन्यास का पूरा भाव-संसार जैसे एक जगह आ जाता है। यात्रा यहाँ दूरी तय करने का नाम नहीं, अपने लोगों तक पहुँचने की खुशी है।
रेखा झा इस अनुभव को किसी भावुक आग्रह के साथ नहीं लिखतीं। उनकी भाषा सहज रहती है और इसी सहजता में स्मृति की असली शक्ति पैदा होती है। वे बचपन को याद करते हुए उसे किसी चमकीले अतीत में नहीं बदलतीं। छोटे-छोटे दृश्यों और रिश्तों के माध्यम से वह संसार धीरे-धीरे हमारे सामने बनता है।
रिश्तों की दुनिया इस किताब को और आत्मीय बनाती है। मुन्नी की मासियों के साथ उसकी निकटता, विशेषकर गुल्लू मासी के साथ उसका रिश्ता, उस पारिवारिक संसार की याद दिलाता है जिसमें बच्चे सिर्फ अपने माता-पिता के बच्चे नहीं होते थे। वे पूरे परिवार के होते थे। उनके लिए कई घर अपने घर होते थे और कई स्त्रियाँ माँ की तरह उनकी देखभाल करती थीं। यह दुनिया अब पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है, लेकिन उसका स्वरूप अवश्य बदल गया है। न्यूक्लियर परिवारों की व्यस्तता के बीच वह सामूहिक आत्मीयता कम हुई है, जिसमें बच्चे रिश्तों को किसी उपयोग या सुविधा की दृष्टि से नहीं, सिर्फ अपनेपन से पहचानते थे।
स्मृति की रोशनी
बिना मुरादों वाला दीया की भाषा भी इसी संसार के अनुकूल है। रेखा झा भाषा को साहित्यिक बनाने के लिए उस पर अतिरिक्त भार नहीं डालतीं। उनके वाक्य स्मृति की तरह चलते हैं, कभी किसी दृश्य पर ठहरते हुए, कभी किसी पुराने रिश्ते की ओर मुड़ते हुए। यही कारण है कि किताब पढ़ते हुए कई प्रसंग कहानी से अधिक किसी अपने पुराने अनुभव की तरह लगने लगते हैं।
इस उपन्यास का शीर्षक भी धीरे-धीरे अपना अर्थ खोलता है। दीया सामान्यतः किसी इच्छा, प्रार्थना या मुराद से जुड़ता है। लेकिन यहाँ वह बिना मुराद का है। बचपन का प्रेम शायद ऐसा ही होता है, जिसमें प्रतिफल की कोई अपेक्षा नहीं होती। बच्चे जिनसे प्रेम करते हैं, उनसे कुछ माँगते नहीं। उनकी प्रसन्नता में ही उस प्रेम का अर्थ पूरा हो जाता है। इसीलिए यह दीया किसी इच्छा की पूर्ति के लिए नहीं जलता, फिर भी भीतर रोशनी करता है। बचपन की यादें भी शायद ऐसी ही होती हैं। वे किसी मुराद के लिए नहीं लौटतीं, फिर भी मन के किसी अँधेरे हिस्से को प्रकाशित कर देती हैं।
रेखा झा की कथा में प्रकृति भी स्मृति का हिस्सा बनकर आती है। बाग, पेड़, रास्ते और मौसम केवल पृष्ठभूमि नहीं हैं। वे उस बचपन के अनुभव में शामिल हैं। आज जब हमारे आसपास की जगहें तेजी से बदल रही हैं, ऐसे विवरण किसी पुराने नक्शे की तरह लगते हैं। वे हमें बताते हैं कि स्मृति केवल लोगों को नहीं बचाती, वह जगहों को भी बचाती है।
इस किताब को पढ़ते हुए यह भी महसूस होता है कि स्मृति हमेशा अतीत की हूबहू वापसी नहीं होती। हम अपने अतीत को याद करते हुए उसे वर्तमान की आँखों से भी देखते हैं। मुन्नी का संसार जितना उस समय का है, उतना ही आज के पाठक की स्मृति में पुनर्निर्मित संसार भी है। शायद इसी कारण उपन्यास में बीता हुआ समय किसी संग्रहालय की वस्तु नहीं बनता। वह हमारे वर्तमान में आकर फिर से जीवित हो उठता है।
बचपन से वर्तमान तक
बिना मुरादों वाला दीया किसी बड़े सामाजिक निष्कर्ष का आग्रह नहीं करता। फिर भी किताब पढ़कर अपने समय के बारे में सोचने से बचा नहीं जा सकता। आज जब बचपन निर्धारित समय-सारिणियों, स्क्रीन और लगातार बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच आकार ले रहा है, तब मुन्नी का संसार हमें उस जीवन की याद दिलाता है जिसमें समय का अर्थ कुछ और था। जहाँ किसी मासी के घर जाना एक उत्सव हो सकता था, बाग में जाना एक अनुभव और बस की यात्रा एक रोमांच।
लेकिन यह उपन्यास सिर्फ अतीत की प्रशंसा नहीं है। इसकी खूबी इस बात में है कि यह हमें अपने भीतर के उस बच्चे तक वापस ले जाता है, जिसके लिए दुनिया अभी पूरी तरह परिचित नहीं हुई थी। साहित्य की एक बड़ी शक्ति शायद यही है कि वह हमें अतीत में लौटाकर वहीं नहीं छोड़ता। वह वर्तमान को देखने की हमारी आँख बदल देता है।
रेखा झा ने इस छोटी-सी कथा में स्मृति, रिश्तों और बचपन के अनुभवों को जिस सहजता से एक साथ रखा है, वह इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। बिना मुरादों वाला दीया पढ़ते हुए पूसा कहीं बाहर छूट गया कोई कस्बा नहीं रह जाता। वह हमारे अपने बचपन की किसी गली में बदल जाता है। मुन्नी भी केवल उपन्यास की पात्र नहीं रहती। वह हमारे भीतर बची हुई उस उम्र की प्रतिनिधि बन जाती है, जिसे हम कितना भी पीछे छोड़ आएँ, वह पूरी तरह हमसे विदा नहीं होती।
शायद इसीलिए इस किताब का दीया “बिना मुराद” है। उसे जलाने के लिए किसी इच्छा की जरूरत नहीं। वह बस जलता है और अपनी छोटी-सी रोशनी में हमें कुछ देर के लिए उस दुनिया तक ले जाता है, जहाँ प्रेम अभी किसी शर्त के साथ नहीं आता था और स्मृतियाँ अभी बोझ नहीं, घर लौटने का एक रास्ता हुआ करती थीं।
कृति: बिना मुरादों वाला दीया
लेखिका: रेखा झा
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन समूह (राधाकृष्ण)
मूल्य: रु.199/
(आशुतोष कुमार ठाकुर समाज, साहित्य और कला पर नियमित लिखते हैं.)


