14 सितंबर को हिन्दी दिवस क्यों मनाते हैं? संविधान सभा में भाषा को लेकर, राष्ट्रीय भाषा के सवाल पर क्या बहस हुई? किस कारण से हिन्दी राष्ट्रीय भाषा नहीं बन पाई? इन मुद्दों को लेकर आज इंडियन एक्सप्रेस में निकिता मोहता का एक लेख आया है। उस लेख का हिन्दी अनुवाद पढ़िए- मॉडरेटर
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14 सितंबर, 1949 को कई वर्षों तक चली बहस के बाद संविधान सभा ने स्वतंत्र भारत में सरकारी कामकाज के लिए भाषाओं के सवाल को सुलझाने के लिए उस व्यवस्था को स्वीकार किया, जिसे आम तौर पर मुंशी-आयंगर फार्मूला कहा जाता है।
इसमें ‘राष्ट्रीय भाषा’ घोषित करने के बजाय हिंदी को ‘संघ की राजभाषा’ बनाया गया। साथ ही, संविधान लागू होने के बाद 15 वर्षों तक सभी सरकारी कामकाज के लिए अंग्रेजी के इस्तेमाल की अनुमति दी गई। इसी तारीख को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। लेकिन इस सहमति तक पहुँचने का रास्ता लंबा था और भाषा का सवाल संविधान सभा के सामने उठने वाले सबसे विवादित मुद्दों में से एक था।
लंबे समय से चला आ रहा सवाल
आजादी के समय ज्यादातर भारतीय लगभग एक दर्जन प्रमुख क्षेत्रीय भाषाओं में से किसी एक को बोलते थे। इनमें हिंदी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा थी। अंग्रेजी औपनिवेशिक शासन में प्रशासन की भाषा थी, जबकि इसे बोलने वाले भारतीयों की संख्या एक प्रतिशत से भी कम थी। उस समय मुख्य सवाल यह था कि क्या अंग्रेजी की जगह किसी भारतीय भाषा को सरकारी कामकाज की भाषा बनाया जाना चाहिए और केंद्र में किस भाषा या भाषाओं को सरकारी दर्जा मिलना चाहिए।
राजनीतिक वैज्ञानिक हाना लर्नर ने ‘द ऑक्सफोर्ड हैंडबुक ऑफ द इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन’ में लिखा है कि संविधान सभा में राष्ट्रीय भाषा को लेकर बहस करने वाले लोगों के दो मुख्य समूह थे। एक समूह हिंदी भाषी क्षेत्रों, खासकर उत्तर-मध्य भारत, के प्रतिनिधियों का था। दूसरा समूह गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों, खासकर दक्षिण भारत, के प्रतिनिधियों और कांग्रेस पार्टी के उदारवादी नेताओं का था। हिंदी भाषी क्षेत्रों के प्रतिनिधि चाहते थे कि हिंदी को राष्ट्रीय भाषा घोषित किया जाए और अंग्रेजी को तुरंत हटा दिया जाए। लर्नर के अनुसार, उनका मानना था कि बहुभाषी समाज भारतीय एकता के लिए ठीक नहीं है। मध्य प्रांत और बरार से कांग्रेस के प्रतिनिधि सेठ गोविंद दास ने कहा था, “हम पूरे देश के लिए एक भाषा और एक लिपि चाहते हैं। हम नहीं चाहते कि यह कहा जाए कि यहाँ दो संस्कृतियाँ हैं।”
गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों के प्रतिनिधियों ने इस विचार को स्वीकार नहीं किया कि राष्ट्रीय एकता के लिए भाषाई एकरूपता जरूरी है। बंबई के कांग्रेस महासचिव श्री शंकरराव देव ने जोर देकर कहा, “एकरूपता नहीं, बल्कि विविधता में एकता।”
कांग्रेस के उदारवादी नेताओं, जिनमें जवाहरलाल नेहरू भी शामिल थे, ने हिंदी को राष्ट्रीय भाषा बनाने में आने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों को समझा।
बहुमत या सहमति?
भाषा के विवाद ने एक दूसरा सवाल भी खड़ा कर दिया था कि राष्ट्रीय भाषा का चुनाव किस तरीके से किया जाए। हिंदी के समर्थक चाहते थे कि साधारण बहुमत से फैसला हो, जबकि उनके विरोधी चाहते थे कि इस मामले में सहमति बनाई जाए और बेहतर होगा कि सभी की सहमति से फैसला हो।
बंगाल के एस. पी. मुखर्जी ने भाषाई अल्पसंख्यकों पर बहुमत का फैसला थोपने के खिलाफ चेतावनी दी। उन्होंने कहा, “अगर कोई यह दावा करता है कि भारत के संविधान में एक अनुच्छेद पारित करके जबरदस्ती एक भाषा को सभी पर स्वीकार कराया जा सकता है, तो मैं कहता हूँ कि ऐसा संभव नहीं होगा।”
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इस व्यवस्था में 15 वर्षों का एक संक्रमण काल रखा गया था। इस दौरान केंद्र सरकार के कामकाज में हिंदी का इस्तेमाल धीरे-धीरे बढ़ाया जाना था। लर्नर के अनुसार, संविधान ने सरकारी इस्तेमाल के लिए 14 अन्य भाषाओं को भी मान्यता दी थी, जिन्हें संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया। राज्यों को अपने आंतरिक कामकाज के लिए क्षेत्रीय भाषाओं में से किसी एक या अंग्रेजी को चुनने की अनुमति दी गई। वहीं, राज्यों के बीच आपसी सरकारी संपर्क के लिए अंग्रेजी का इस्तेमाल जारी रखा गया।
संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने भी इसी तरह का विचार व्यक्त किया। उन्होंने कहा, “जो भी फैसला लिया जाएगा, उसे पूरे देश को स्वीकार करके लागू करना होगा। अगर हम बहुमत से किसी प्रस्ताव को पारित कराने में सफल भी हो जाएँ, लेकिन देश का कोई बड़ा वर्ग उसे स्वीकार न करे, तो संविधान को लागू करना बहुत मुश्किल हो जाएगा।”
सेठ गोविंद दास ने हिंदी भाषी लोगों का पक्ष रखते हुए कहा, “हमने लोकतंत्र को स्वीकार किया है और लोकतंत्र तभी चल सकता है जब बहुमत की राय का सम्मान किया जाए। बहुमत जो भी फैसला करे, अल्पसंख्यक को उसे सम्मान के साथ और बिना किसी कटुता के स्वीकार करना चाहिए।”
समझौता
लेकिन जब 15 वर्षों की यह अवधि 1965 में खत्म हुई, तब तक सरकार के कामकाज में हिंदी का इस्तेमाल व्यापक रूप से नहीं हो पाया था। 1960 के दशक में गैर-हिंदी भाषी राज्यों में हुए हिंसक आंदोलनों के बाद संसद ने राष्ट्रीय भाषा बनाने के विचार को छोड़ दिया। बाद में 1963 के राजभाषा अधिनियम में यह व्यवस्था की गई कि हिंदी के साथ अंग्रेजी भी सरकारी भाषा के रूप में जारी रहेगी।
संविधान सभा ने अंततः मुंशी-आयंगर फार्मूले को स्वीकार कर लिया। बाद में इसे भारतीय संविधान के भाग 17 में अनुच्छेद 343 से 351 तक शामिल किया गया। इसका नाम संविधान की प्रारूप समिति के सदस्यों के. एम. मुंशी और एन. गोपालस्वामी अयंगर के नाम पर पड़ा। इस समिति के अध्यक्ष बी. आर. आंबेडकर थे।
लर्नर के अनुसार, अंततः व्यावहारिक सोच और सहमति बनाने का रास्ता ही सफल हुआ।
ऑक्सफोर्ड हैंडबुक में विद्वान सुजीत चौधरी लिखते हैं कि पहली नजर में, क्योंकि अनुच्छेद 343 हिंदी को ‘संघ की राजभाषा’ घोषित करता है, ऐसा लगता है कि हिंदी के समर्थकों की जीत हुई। लेकिन जब पूरे प्रावधानों को ध्यान से देखा जाता है तो पता चलता है कि संविधान में की गई व्यवस्था इन दोनों पक्षों के बीच एक व्यापक और कई स्तरों वाला समझौता थी।


