कांग्रेस पार्टी से जुड़े शुजा गांधी की किताब आई है ‘मिट्टी याद रखती है’। यह किताब चम्पारण की जीवनी है। पंक्ति प्रकाशन से प्रकाशित इस किताब का लोकार्पण 1 अक्टूबर को दिल्ली के जवाहर भवन में हुआ। इसकी रपट लिखी है शोधार्थी है युवा रपटकार मुशर्रफ परवेज़ ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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गाँधी जयंती की पूर्व संध्या पर यानी 1 अक्टूबर की शाम जवाहर भवन में ‘मिट्टी याद रखती है (चंपारण की जीवनी)’ का लोकार्पण हुआ। लोकार्पण का हाल बताने से पहले कुछ एक बातें आपको अपनी समझ से बता देना ठीक समझता हूँ।
सर्वप्रथम तो आपको गाँधी जयंती की अहिंसावादी शुभकामनाएं। गाँधी कौन थे? ये बताने की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं। यदि आप गाँधी को नहीं जानते हैं, तो ये आपकी ग़लती है! ख़ैर, गाँधीजी को जानना हम भारतीयों के लिए ज़रूरी बन जाता है। जब अपन छोटे थे। मुहम्मदपुर गांव में रहा करते थे। उन दिनों हमें बस इतना पता था कि गाँधी जी ने देश को आज़ादी दिलाई। इसलिए प्रतिवर्ष उनके जन्मदिन पर ‘राष्ट्रीय छुट्टी’ होती है। या फिर गांवों में जाड़े के मौसम में ‘सामान्य ज्ञान’ प्रतियोगिता आयोजित किया जाता था। उसमें कुछ एक प्रश्न होते थे। वे प्रश्न यूँ हुआ करते थे- “गाँधीजी का पूरा नाम क्या है?; उनके माता और पिता का क्या नाम था?; गाँधीजी को बापू कहकर किसने पुकारा?; गाँधीजी दक्षिण अफ्रीका से कब लौटे?” ब्ला… ब्ला…
ख़ैर, महात्मा गांधी जी को समझने का मौक़ा तब मिला, जब मेरे हाथों उनकी जीवनी ‘The Story of My Exeperiments with Truth’ लगी। अपन ने जीवनी के तीसरे भाग के 9वें अध्याय को सबसे पहले पढ़ा। क्योंकि अपने गुरुओं ने बता रखा था कि किसी भी पुस्तक को पढ़ने से पहले उसकी अनुक्रमणिका ज़रूर देखो।
जिसका उप-शीर्षक ‘Simple Life’ यानी ‘सादा जीवन’ है। जिसमें पृष्ठ संख्या- 261 पर वे कहते हैं-
“मुझे वह पहला कॉलर कभी नहीं भूलता, जिसे मैंने स्वयं धोया था। मैंने उसमें आवश्यकता से अधिक कलफ़ लगा दिया था। इस्त्री भी पर्याप्त गरम नहीं हुई थी और कॉलर के जल जाने के डर से मैंने उसे ठीक से दबाया भी नहीं था। परिणाम यह हुआ कि कॉलर यद्यपि काफी कड़ा हो गया था, लेकिन उस पर लगा अतिरिक्त कलफ़ लगातार झड़ता रहता था। मैं वही कॉलर पहनकर अदालत गया। इस प्रकार मैंने अपने साथी वकीलों को मेरा मज़ाक उड़ाने का अच्छा अवसर दे दिया। लेकिन उन दिनों भी मैं उपहास की परवाह किए बिना अपने आत्मविश्वास पर कायम रह सकता था।
मैंने कहा- “भाइयो, यह अपने कॉलर को स्वयं धोने का मेरा पहला प्रयोग है और इसी कारण इसमें अतिरिक्त कलफ़ लगा रह गया है। लेकिन इससे मुझे कोई परेशानी नहीं है। बल्कि इसका एक लाभ तो है ही- इससे आपको इतना मनोरंजन करने का अवसर मिल रहा है।”
अब मैं आपको कार्यक्रम का हाल सुनाता हूँ। कार्यक्रम में अतिथि के रूप में विजय महाजन, के०एल० शर्मा और सुप्रिया श्रीनेत उपस्थित रहीं। अब देखिए न गाँधी जयंती की पूर्व संध्या पर हिंदी भाषा में लिखित पुस्तक का लोकार्पण हो रहा है। और बात की शुरुआत अंग्रेज़ी में हो रही है। कितना बड़ा विरोधाभास है न! जबकि महात्मा गांधी ने कभी कहा था- “मुझे अपनी मातृभाषा पर गर्व है। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, वह हमारी आत्मा की अभिव्यक्ति है।” वैसे संचालक महोदय यदि हिंदी में बात शुरू करते तो कार्यक्रम बोझ बनता हुआ दिखाई नहीं देता।
लोकार्पण का फॉर्मेट थोड़ा अलग था। एक मॉडरेटर थे, वे एक ही प्रश्न करते थे। और तीनों वक्ता अपने-अपने विचार रखते थे। कई प्रश्नों का एक सा ही जवाब मिला। पर छोड़िए, एक प्रश्न जो मॉडरेटर ने पूछा उससे आपको रूबरू कराता हूँ। लेकिन उससे पहले लेखक यानी शुजा गाँधी से पूछे गए पहले सवाल से आपको परिचित करवाता हूँ।
मॉडरेटर- “आपने चंपारण पर ही पुस्तक क्यों लिखा?”
शुजा गाँधी- “सबसे पहले तो मैं बता दूँ कि मैं चंपारण का निवासी हूँ। वहीं मेरा जन्म हुआ। हम ‘चंपारण मीट’ का ही नाम सुनते रहते थे। लेकिन चंपारण इससे आगे की चीज़ है। चंपारण के लोगों के अनोखे किस्से हैं, उनके अपने इमोशंस हैं, उनकी अपनी दीगर कहानियां हैं और तो और एक ऐतिहासिक महत्व भी है।”
शुजा जी ने एकदम ठीक जवाब दिया क्योंकि चंपारण मीट से नहीं बल्कि गाँधीजी से जाना जाता है।
अब गाँधीजी का जिक्र चल ही गया है, तो एक किस्सा सुना देता हूँ। हुआ यूँ कि एक बार मैं ‘लाल किला’ घूमने गया। वहाँ विदेश से कुछ पर्यटक आए हुए थे। अपनी अंग्रेजी थोड़ी अच्छी है, तो अपन ने उनसे ख़ूब बातें की। उनमें से एक ने पूछा- “Where are you from?” तो अपन ने कहा- “I am from Bihar.” तो वे समझे नहीं, फ़िर मैं बिहारी दिमाग़ लगाया और बोल दिया- “Bro, I am from Champaran.” चंपारण सुनते ही वे सब बोले- “Got it dear. That’s place of Gandhi.” तो ये ताक़त है गाँधी की साहब।
इसके बाद मॉडरेटर ने सामूहिक रूप से चंपारण को लेकर तीनों वक्ताओं से प्रश्न किया। तीनों वक्ताओं ने अपने-अपने विचार रखें। उन्होंने क्या कुछ कहा, चलिए आपको सुनवाता हूँ। एक बात स्पष्ट कर दूं जनाब, इसमें मैंने कुछ भी नहीं जोड़ा। जो आप लोगों ने कहा, मैंने वही उद्धृत कर दिया।
किशोरी लाल शर्मा जी ने सबसे पहले अपने बिहार के उन दिनों को याद किया जब वे सह-प्रभारी हुआ करते थे। फ़िर कस्तूरबा गाँधी जी द्वारा स्थापित आश्रम का उल्लेख किया। साथ हीं उन्होंने नील के खेती वाले प्रकरण पर थोड़ा प्रकाश डाला। फ़िर कहा- “गाँधीजी ने सबसे अधिक ग़रीबी चंपारण में देखी थी। इसीलिए वे कहते भी थे कि असली हिंदुस्तान चंपारण में है।”
सुप्रिया श्रीनेत जी की बातों को रखने से पहले स्पष्ट कर दूं कि अपने शानदार बोला। वैसे भी आपकी वाकपटुता अच्छी है। आपने अपने जन्मस्थली का उल्लेख करते हुए गाँधीजी के साथ अपनी स्मृतियों को जोड़ा। चंपारण से जुड़े रहने का कारण अपने गांव व विधानसभा क्षेत्र को बताया। आगे आपने कहा- “चंपारण एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं बल्कि सामूहिक बल का प्रतीक है। इस देश के स्वतंत्रता संग्राम की नींव चंपारण ने रखी। चंपारण अन्याय के खिलाफ़ इतिहास बनाने वाला स्थल है। गाँधी से महात्मा गाँधी बनने का सफ़र है।”
विजय महाजन- “सुप्रिया जी ने जितने ओजस्वी और प्रभावशाली ढंग से बोला है, मैं उतने अच्छे से नहीं बोल पाऊँगा। लेकिन आपको कुछ बातें अवश्य बताऊंगा। मैंने वर्ष 2011 में 80 दिन की शोध यात्रा की थी। जिस यात्रा में मैंने दो जगह अवश्य जाने को चिह्नित किया था। पहली जगह चंपारण और दूसरी जगह मदुरई। वही मदुरई जहां से बापू ने वस्त्र त्यागा था। और दोस्ती को अपनाया था।”
आपने पुस्तक से कुछ एक बातें भी पेश किया। साथ ही ‘कटहल’ का भी ज़िक्र किया।
इसके बाद भी लगातार सवाल और जवाब का दौर चलता रहा। हालाँकि अधिकतर बातें गाँधीजी के चंपारण सत्याग्रह से जुड़ा हुआ था। जहां तक किताब की बात करूं तो मैंने पढ़ी नहीं है। अनुक्रमणिका में बड़े रोचक-रोचक शीर्षक दिखे। अध्याय:1 जिसका शीर्षक है- ‘नदियों से बनी हुई एक धरती’ का पहला पैराग्राफ पढ़वाता हूँ। शुजा जी लिखते हैं- “गंडक कोई गंगा नहीं है। गंगा गंभीर है, विशाल है, उसके किनारे मंदिर हैं, उसके पानी में पूजा का इत्मीनान है। गंडक अलग है। गंडक जवान है। गंडक को गुस्सा है। गंडक हिमालय की तीखी ढलान अपने साथ लेकर चलती है, और उसने मैदानों का धैर्य नहीं सीखा। वह नेपाल के ऊँचे पहाड़ों में शुरू होती है, अन्नपूर्णा के उत्तर से, और जब तक त्रिवेणी पर चंपारण में घुसती है, तब तक हज़ारों फुट गिर चुकी होती है।” बाक़ी बातें आप पुस्तक को पढ़कर ही समझ सकते हैं।
मैं जब भी गाँधीजी को पढ़ या लिख रहा होता हूँ, तो मुझे अनायास ही ‘कृष्णबिहारी नूर’ का एक शेर याद आ जाता है। आप कहते हैं-
“कितने अवतार हुए ,कितने पयम्बर आये,
तू न आया , तेरे पैगाम बराबर आये।”



