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  • दिल्ली नालंदा डायलॉग 2026 का समापन: ज्ञान, संस्कृति और भविष्य की शिक्षा

    दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित दो दिवसीय ‘दिल्ली नालंदा डायलॉग’ का कल समापन हो गया। दूसरे दिन के सत्रों पर पढ़िए यह रपट- मॉडरेटर 

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    इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित “दिल्ली नालंदा डायलॉग 2026” का आज दूसरा एवं अंतिम दिन रहा। नालंदा लिट फेस्ट 2026-27 के अंतर्गत आयोजित इस दो दिवसीय संवाद में देश-विदेश से आए वरिष्ठ सरकारी प्रतिनिधियों, नीति-निर्माताओं, विद्वानों, लेखकों, राजनयिकों तथा युवा सिविल सेवकों ने भाग लिया। कार्यक्रम के दौरान उपस्थित श्रोताओं को शासन, संस्कृति, शिक्षा, कूटनीति और भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े विविध विषयों पर प्रमुख वक्ताओं के विचार सुनने और संवाद का अवसर प्राप्त हुआ।

    धनु बिहार द्वारा आयोजित तथा कला, संस्कृति एवं भाषा विभाग, दिल्ली सरकार एवं इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के सहयोग से आयोजित इस गोष्ठी में अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा हुई। “नॉलेज, यूथ एंड कल्चरल एक्सचेंज डायलॉग” सत्र में भाषा, शिक्षा और सांस्कृतिक निरंतरता के विभिन्न आयामों पर विचार साझा किए गए। इसके बाद “पब्लिक एंगेजमेंट, अकादमिक एक्सचेंज एंड कल्चरल डायलॉग” में संस्थानों और समाज के बीच संवाद को सशक्त बनाने पर चर्चा हुई।“द लैंग्वेज ऑफ विज़डम: डिकोडिंग नालंदा थ्रू ज्ञान भारतम” सत्र ने नालंदा की बौद्धिक विरासत को समझने का अवसर प्रदान किया, जबकि “एआई, नॉलेज सिस्टम्स एंड फ्यूचर लर्निंग” में भारतीय ज्ञान परंपराओं और तकनीक की भूमिका पर विचार-विमर्श हुआ। अंतिम सत्र “गोल्डन पाथवे, विद नालंदा एट इट्स सेंटर” के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ।

    दूसरे दिन का पहला सत्र ‘इंडियन लैंग्वेज एंड  नॉलेज प्रिजर्वेशन’-इस सत्र श्री ए. जे. अल्फोंस, श्री कौशल किशोर, सुश्री सुरेखा साहू एवं प्रो. एम. जे. वारसी मंच पर थे, जबकि संचालन श्री विनय कुमार जिंदल ने किया।

    ए. जे. अल्फोंस ने भाषा, शासन और ज्ञान संरक्षण पर अपने विचार साझा किए। मलयालम भाषा से अपने भावनात्मक जुड़ाव का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि कोई भी भाषा दूसरी भाषा से श्रेष्ठ नहीं होती और भाषाई विभाजनों से अधिक महत्वपूर्ण मूलभूत ज्ञान और स्पष्ट समझ है। उन्होंने साहित्य, राष्ट्रवाद, अमेरिका में नस्लीय भेदभाव तथा भारत की ऐतिहासिक वैज्ञानिक परंपराओं पर भी चर्चा की। एआई और एलएलएम मॉडल्स का उल्लेख करते हुए उन्होंने संस्कृत और भारतीय भाषाओं में भाषा मॉडल विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया, जैसा कि चीन अपनी भाषाई व्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए कर रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति और अनुच्छेद 370 के दौरान अपनी भूमिका का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हर भाषा सुंदर है और उसका उपयोग आने वाली पीढ़ियों तक सकारात्मकता और ज्ञान पहुँचाने के लिए होना चाहिए।

    प्रो.एम. जे. वारसी ने कहा कि भारत विश्व की सबसे समृद्ध भाषाई संस्कृतियों में से एक का धनी है और स्थानीय भाषाओं को एआई तथा आधुनिक तकनीक के माध्यम से संरक्षित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। राष्ट्रीय शिक्षा नीति का उल्लेख करते हुए उन्होंने सामुदायिक भागीदारी, सरकारी सहयोग और भारतीय ग्रंथों में संरक्षित पारंपरिक ज्ञान, विशेषकर चिकित्सा संबंधी जानकारी के दस्तावेजीकरण के महत्व को रेखांकित किया।

    कौशल किशोर ने भारत की मौखिक परंपराओं, भाषाई विविधता और स्थानीय भाषाओं के घटते उपयोग पर अपने विचार व्यक्त किए। गौतम बुद्ध, सम्राट अशोक और गंगा-घाटी की भाषाई विरासत का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय भाषाओं का संरक्षण स्थानीय शासन और सांस्कृतिक सहभागिता के माध्यम से संभव है। उन्होंने कहा कि नए नालंदा की मूल भावना बौद्धिक विमर्श और संवाद होनी चाहिए।

    सुरेखा साहू ने भाषा को अभिव्यक्ति का माध्यम बताते हुए कहा कि अंग्रेज़ी को साक्षरता का मानक नहीं माना जाना चाहिए। लोक परंपराओं, शारदा सिन्हा और तीजन बाई का उल्लेख करते हुए उन्होंने स्थानीय भाषाओं और कलाओं के संरक्षण पर बल दिया। उन्होंने कहा कि मनुष्य सपने भी अपनी मातृभाषा में देखता है और भय भी उसी भाषा में महसूस करता है।

    पब्लिक एंगेजमेंट, अकादमिक एक्सचेंज एंड कल्चरल डायलॉग– इस सत्र में  श्री विश्वपति त्रिवेदी, श्री तेजिंदर सिंह लूथरा एवं श्री चैतन्य के. प्रशाद मंच पर थे और सत्र का संचालन श्री राजेश रंजन ने किया।

    डॉ. विश्वपति त्रिवेदी ने भाषा और संस्कृति के संरक्षण में जनभागीदारी की महत्वपूर्ण भूमिका पर बल दिया। सेंट स्टीफंस कॉलेज के अपने दिनों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि भाषा व्यक्ति की पहचान को आकार देती है। उन्होंने अपनी माता की पुस्तक के अनुवाद के अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि अनुवाद बौद्धिक रूप से सबसे कठिन और श्रमसाध्य कार्यों में से एक है।

    श्री तलेंदर सिंह लूथरा ने संस्कृति पर अपनी प्रभावशाली दृष्टि रखते हुए कहा कि संस्कृति को अभिजात वर्ग परिभाषित नहीं करता, बल्कि वह केवल उसकी चर्चा करता है। आम जन से भिन्न, अभिजात वर्ग संस्कृति के चयनात्मक उपभोग में विश्वास रखता है। उन्होंने कहा कि हम भाषा के स्तर को ऊँचा उठाने की बात तो करते हैं, लेकिन उसके पोषण की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं देते। उन्होंने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि जेन-ज़ी की भाषा को समझना एक चुनौती है, लेकिन इस दूरी को पाटना आवश्यक है, क्योंकि उदासीनता पीढ़ियों के बीच दूरी पैदा करती है।

    श्री चैतन्य के. प्रशाद ने त्वरित संचार के वर्तमान युग पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि आज हम चौबीसों घंटे सूचनाओं से घिरे हुए हैं। उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि एक समय था जब ज्ञान के लिए पुस्तकालयों में जाना पड़ता था, जबकि आज दुनिया का समस्त ज्ञान हमारी जेब में मौजूद है। उन्होंने डिजिटल माध्यमों पर बढ़ती निर्भरता और उसके संस्कृति तथा ज्ञान से हमारे जुड़ाव पर पड़ने वाले प्रभाव को रेखांकित किया।

    सत्र – द लैंग्वेज ऑफ विज़डम: डिकोडिंग नालंदा थ्रू ज्ञान भारतम

     प्रो. सिद्धार्थ सिंह, प्रो. हिमांशु प्रभा राय एवं प्रो. आनंद सिंह ने मंच साझा किया और  संचालन डॉ. शशांक शेखर सिन्हा ने किया। प्रो. हिमांशु प्रभा राय ने बताया कि संस्कृत, पाली, गांधारी प्राकृत, तमिल और चीनी भाषाओं में उपलब्ध बौद्ध पांडुलिपियों ने बौद्ध धर्म और नालंदा की अवधारणा को नए रूप में समझने का अवसर दिया। उन्होंने औपनिवेशिककालीन व्याख्याओं, अशोक अभिलेखों, चीनी यात्रियों के विवरण, पुरातात्त्विक खोजों तथा नालंदा और बौद्ध नेटवर्क पर नए शोध की आवश्यकता पर विशेष बल दिया गया। उन्होंने आगे  कहा, “आज नालंदा की पुरातत्व संबंधी जो सामग्री और लेखन हमारे पास हैं, सच तो यह है कि वह 0.1 फ़ीसदी भी नहीं हैं; अभी बहुत कुछ है जिसको समाज के सामने लाया जाना ज़रूरी है।” प्रो. आनंद सिंह ने नालंदा की समृद्ध पांडुलिपि परंपरा को रेखांकित करते हुए इसके धार्मिक, वैज्ञानिक और बहुभाषी ज्ञान परंपरा पर प्रकाश डाला। उन्होंने दुनिया भर में पांडुलिपियों के आवागमन, संस्कृत और पाली की भूमिका तथा भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया और पूर्वी एशिया तक फैले बौद्धिक नेटवर्क में नालंदा के प्रभाव को महत्त्वपूर्ण बताया।प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने नालंदा के विकास को बौद्धकालीन युग से निकली एक वैश्विक बौद्धिक परंपरा के रूप में रेखांकित किया, जिसमें दर्शन, संवाद और अंतरानुशासनात्मक शिक्षा का समन्वय दिखाई देता है।

    सत्र – एआई, नॉलेज सिस्टम्स एंड फ्यूचर लर्निंग

     इस पैनल में प्रो. उमा कंजीलाल, डॉ. आनंद कुमार एवं डॉ. अमित पांडे ,अकील अहमद के मंच साथ  का  संचालन सुश्री अदिति महेश्वरी ने किया ।

    प्रो. उमा कांजीलाल ने “डिजिटल नालंदा” की प्रेरणादायी परिकल्पना प्रस्तुत करते हुए प्राचीन ज्ञान परंपराओं को भविष्य की शिक्षा से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि शैक्षणिक संस्थानों को एआई को डिजिटल रूप से अपनाना होगा और उसका विरोध करने के बजाय उसके साथ विकसित होना होगा। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय पहले से ही एआई आधारित उपकरणों और नई कार्यप्रणालियों के माध्यम से परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

    डॉ. अमित पांडेय ने कहा कि उन्होंने एआई पर काम उस समय शुरू किया था जब यह मुख्यधारा का विषय नहीं बना था। एआई और रोबोटिक्स में अपनी गहरी विशेषज्ञता के आधार पर उन्होंने स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य अनेक क्षेत्रों में एआई की बढ़ती भूमिका पर चर्चा की। उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि एआई को केवल उन पर थोपे गए माध्यम के रूप में न देखें, बल्कि स्वयं उसे सीखें और समझें। उन्होंने यह भी कहा कि अधिकांश लोग एआई का उपयोग केवल सुविधा और आराम के लिए करते हैं, जबकि इसका प्रयोग सार्थक सृजन और नवाचार के लिए भी किया जाना चाहिए।

    डॉ. आकिल अहमद ने अपने वक्तव्य की शुरुआत आज के समय में एआई साक्षरता की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए की। उन्होंने कहा कि एआई का प्रभावी उपयोग करना आसान नहीं है, इसके लिए जागरूकता और समझ दोनों आवश्यक हैं। अपने बेटे से एआई सीखने के व्यक्तिगत अनुभव को साझा करते हुए उन्होंने विषय को सहज और मानवीय रूप दिया। पूरे सत्र के दौरान उन्होंने संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए एआई से जुड़े सकारात्मक अवसरों और संभावित जोखिमों दोनों पर गंभीरता से विचार रखा।

    डॉ. आनंद कुमार ने एआई, मानव चेतना और पोस्ट-ह्यूमनिज्म के दर्शन पर गहन और विचारोत्तेजक विमर्श प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार मशीनें मानव बुद्धि और मस्तिष्क की नकल करने का प्रयास कर रही हैं। प्रभावशाली प्रस्तुति के माध्यम से उन्होंने इन विचारों को भारत की प्राचीन ज्ञान परंपराओं, विशेषकर योगियों की चेतना संबंधी अवधारणाओं से जोड़ते हुए एआई के विकास और मानव पहचान के बीच संबंधों को एक नए दृष्टिकोण से समझाया।

    सत्र -गोल्डन पाथवे, विद नालंदा एट इट्स सेंटर

     “गोल्डन पाथवे विद द ऐडेड सेंटर” सत्र में विलियम डेलरिम्पल ने भारतीय इतिहास की ओर अपनी यात्रा पर चर्चा करते हुए अपने शोध में अब तक अप्रयुक्त फ़ारसी स्रोतों के महत्व को रेखांकित किया।  सुनीत टंडन  के साथ संवाद में उन्होंने गणित, दर्शन और बौद्ध धर्म जैसे क्षेत्रों में भारत के वैश्विक योगदान को अपेक्षाकृत कम मान्यता मिलने की बात कही। डैलरिम्पल ने कहा कि नालंदा की स्थापना से पहले ही भारतीय विचार एशिया के अनेक हिस्सों में फैल चुके थे, लेकिन नालंदा बाद में ज्ञान और बौद्धिक प्राधिकार का सर्वोच्च केंद्र बन गया। उन्होंने नालंदा की तुलना आधुनिक AI से करते हुए कहा कि वहाँ अपार ज्ञान तक तुरंत पहुँच संभव थी। उन्होंने चीनी बौद्ध भिक्षु ह्वेनसांग की यात्राओं का भी उल्लेख किया, जिनके लेखन में नालंदा के पुस्तकालयों और विद्वत परंपरा का जीवंत वर्णन मिलता है। डैलरिम्पल ने नालंदा के उत्खनन, संरक्षण और संग्रहालय विकास में अधिक निवेश की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि प्राचीन विश्वविद्यालय का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा अब भी ज़मीन के नीचे दबा हुआ है।

    समापन समारोह

     इसके बाद सम्मान समारोह तथा समापन संवाद हुआ , जिसमें पद्म विभूषण डॉ. सोनल मानसिंह, डॉ. सच्चिदानंद जोशी, सुश्री डी. आलिया एवं डॉ. के. महेश मंच पर उपस्थित थे , जबकि संचालन श्री संजय कुमार ने किया । दिल्ली नालंदा डायलॉग के समापन समारोह में बात रखते हुए डॉ. के. महेश ने सांस्कृतिक संवाद को सशक्त करने, पांडुलिपियों की पहुँच बढ़ाने, संस्कृति को आभिजात्य वर्ग से आगे बढ़ाकर आमजन तक पहुँचाने तथा शासन के महत्त्वपूर्ण ज्ञान साधन के रूप में गज़ेटियरों के पुनर्जीवित पर बल दिया। उन्होंने भारत की सूचनात्मक विरासत प्रणालियों के संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित किया। सोनल मानसिंह ने कहा, कला, विद्या और संस्कृति हमारे देश की सबसे मजबूत शक्ति है। उस देश ने, जिसने हजारों वर्षों से अनेक आक्रांतताओं का भय झेला है, कार्रवाइयाँ झेली हैं और फिर भी हमारी संस्कृति, हमारे मूल्य, हमारे आदर्श, हमारी परंपराएं अक्षुण्ण पड़ी हैं।

    नालंदा लिट फेस्ट के बारे में बात करते हुए श्री गंगा कुमार,फेस्टिवल डायरेक्टर ने कहा, मैं कुछ चीज़ें बताना चाहता हूँ कि जब हम लोग इस लिट फेस्ट के बारे में सोच रहे थे तो हमने सोचा कि लिट फेस्ट तो बहुत सारे होते हैं, दिल्ली में भी होते हैं, बॉम्बे में, कई जगह होते हैं। लेकिन हमारा ऐसा उद्देश्य कतई नहीं था कि हम आएँ, पार्टी करें, बात करें, निकले और चले जाएँ। हम ऐसा लिट फेस्ट चाहते थे जिसका क्वांटिटेटिव आउटकम हो, जो लिटफेस्ट यंग जेनरेशंस को कुछ देकर जाए, मतलब उनको रिसर्च में, पब्लिकेशंस में, एडिटिंग आदि में टेक्निकल एंड फाइनेंशियल सपोर्ट दें। इस काम के लिए हमारी एकेडमी कमिटी भी बनी हुई है, कुछ मेंबरान यहाँ मौजूद हैं। तो मूल यह है कि हम इस तरह से साहित्य को प्रोमोट करना चाहते हैं।

    अधिक जानकारी के लिए: @NalandaLittFest

    धनु बिहार के बारे में:

    धनु बिहार, वर्ष 2020 में स्थापित एक गैर-लाभकारी संस्था है, जो बिहार में वंचित समुदायों के सशक्तिकरण के लिए कार्यरत है। इसके प्रमुख क्षेत्र हैं—महिला सशक्तिकरण, किसान सहयोग, सांस्कृतिक संरक्षण, शिक्षा और सामाजिक कल्याण।

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