आज पढ़िए दीपांकर गुप्ता की कुछ कविताएँ। ऐसी कविताएँ जिनमें व्यक्ति का अंतर्विरोध भी है, विकास से हुआ विस्थापन और ढोंग भी है और इन सबमें एक बात जो निरंतर बनी हुई है वह है भरोसा। अंततः ये कविताएँ तमाम निराशाओं के बीच हमारे मन में उम्मीद जगाती हैं – अनुरंजनी
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1. मुखौटा
उन्होंने अपनी कविताओं में मनुष्यता की बातें की
मनुष्यता को शर्मसार करने वाली घटनाओं पर लिखते रहे
पर बलात्कारियों से मित्रता भी बनाए रखा
उन्होंने आदिवासियों के पक्ष में नज़्में कहीं
उनकी भाषाओं में मुखरता से दिखी पर्यावरण के चिंता
पर जंगलों को काटकर कारखाने लगाने को विकास कहा
उन्होंने जातिगत भेदभाव पर कहानियाँ लिखीं
कहा कि सबको है समानता का अधिकार
पर तथाकथित अछूतों को गाँव से बाहर बसाने को तर्कसंगत ठहराया
उन्होंने महिलाओं की आज़ादी पर ग़ज़लें कहीं
उनसे मिलकर उनके अधिकारों की बातें करते रहे
पर अपने घर में उन्हें तुच्छ समझा
उन्होंने अपने गीतों में लोगों का दर्द गाया
लोगों की दु:खों के लिए सरकार को दोषी ठहराते रहे
पर सम्मान पाने के लिए उसके दरबार में हाज़िरी भी बजाया
और इस तरह लोगों को भ्रम में डालकर
मुखौटा पहन, लूटते रहे वाह-वाही,
शब्दों से खेलकर, कवि देवता बनने गये…
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2. कुछ फूल
कुछ फूल
नहीं कहलाते हैं फूल
उन्हें रखा गया है हाशिये पर हमेशा से
उन्हें नहीं है अधिकार –
बागों में रहने का,
ईश्वर के तथाकथित घरों में घुसने का
नहीं सराही जाती कहीं उनकी खूबसूरती
वे जंगलों में,
गंदे नालों के किनारे,
मलिन बस्तियों में खिलते हैं
आकाश को देखकर
ऊपर उठने के सपने संजोते हैं
और ज़िंदा रहने के लिए उपयुक्त
खनिज-लवण जुटाते हुए मुरझाकर
अन्ततः वहीं दफ़्न हो जाते हैं
मैं नहीं कहता
कि उन्हें उठाकर बिठा दिया जाए फलक पर
और कमतर आँका जाए अन्य फूलों की खूबसूरती को
किन्तु उन्हें फूल कहलाने का हक़ तो मिले
मुझे यकीन है
एकदिन वे जंगलों से निकलेंगे
और बागों में पाँव फैलाए बैठे फूलों से
छीनकर अपने हिस्से की ज़मीन
खड़े हो जाएँगे साथ-साथ एक ही पंक्ति में
और बिखेर देंगे पूरे संसार में अपनी सुगंध!
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3. मुट्ठी भर गाँव
आज फुरसत में था
तो यूँ ही खोलकर बैठ गया
पापा की पुरानी अटैची
उसमें पड़ी थीं कितनी ही ब्लैक एंड व्हाइट पुरानी तस्वीरें
जिनके बैकग्राउंड में थी
कहीं दादी माँ की एक साड़ी
कहीं हमारा आमों का बगीचा
और कहीं-कहीं तो
फूस के छप्पड़ के नीचे
मिट्टी का पुराना घर
जिसके ओसारे पर रखी है
मिट्टी तेल की एक डिबिया
और मुझे मिली उस अटैची में
अगणित चिट्ठियाँ
जिसे माँ ने रखा है
वर्षों से सहेजकर
माँ बताती हैं कि
दादी माँ ने लिखी थी ये चिट्ठियाँ
नौकरी की तलाश में शहर गये
मेरे पिता को
मेरी दादी! तुमने अपनी चिट्ठियों में
लिख दिया है पूरा का पूरा गाँव
और ये भी कि कैसे
समय ने उखाड़ डाला हमारा
आमों का बगीचा
कैसे लुप्त हो गईं
गाँव तक जाने वाली सारी पगडंडियां
ट्रैक्टर के आ जाने से लोगों ने
कैसे बेच दिया अपने हीरा-मोती को
कसाई खाने में
धीरे-धीरे
कैसे ख़त्म हो गया
चिट्ठियों का सिलसिला
और ये भी कि कैसे बँट गए लोग धर्मों के नाम पर
चाहता हूँ बचाकर रखना
मुट्ठी भर भी गाँव
ताकि आने वाली माँएँ जब लिखें
अपने बेटे को चिट्ठियाँ
उसमें गाँव उजड़ने की न हो
एक भी बात!
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4. हमारी चुप्पी
ये चुप होना ही एक दिन उजाड़ डालेगा उपवन
ख़त्म कर देगा सब कुछ
हमेशा के लिए
खुद की आँखों के सामने घट रहे
दुर्घटनाओं को देखकर
हमने भी जिस तरह साध ली चुप्पी,
देखकर तमाशा खुद को दर्ज़ कर लिया
‘सभ्य इंसानों’ के रजिस्टर में
यकीन मानो,
एक रोज
इस धरा से मिट जाएंगे इंसान
यूँही रहे मौन तो प्रेम पढ़ेंगे बस किताबों में
एक दिन सबका अलग देश होगा जहाँ
हम नितांत अकेले करेंगे आख़िरी सत्य का इंतज़ार!
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5. चीखें
जब भी अख़बार उठाता हूँ हाथ में
मेरा ही मन व्यंग्यात्मक हँसी हँसते हुए
कहता है मुझसे-
रोज़-रोज़ कैसे पढ़ लेते हो ‘एक ही अख़बार’?
और फिर सुनता हूँ हमेशा की तरह
एक लड़की को चीख़ते हुए किसी पन्ने से
नहीं, एक नहीं, अनेक लड़कियाँ
और कई महिलाएँ चीख़ती हैं कई-कई पन्नों से
पास वाले शहर की लड़की की चीख़
सुनाई पड़ती है ज़्यादा ज़ोर से
मैं मन ही मन दुःखी होता हूँ
या पास बैठे लोगों के साथ मिलकर
उक्त घटनाओं पर गहरा दुःख प्रकट करता हूँ
फिर… फिर पन्ने पलटते ही
पीछा छुड़ा लेता हूँ इन चीख़ों से
धार्मिक खबरों में उलझकर एक ‘सभ्य इंसान’ की तरह
और यह दिन भी कट जाता है एक सामान्य दिन की तरह
अपने कार्यों में लगे रहकर
लेकिन ये चीख़ें खदेड़ती हैं उस पिता को हमेशा
जिसे गरीबी के कारण ‘खरीदना’ पड़ा था
एक सस्ता अनपढ़ दामाद
जो रोज ताने मारता है उसकी बेटी को दहेज के लिए
ये चीख़ें सदा खदेड़ती हैं उस लड़की को
जो प्रताड़ित होकर भाग आयी है
अपने ससुराल से!
क्योंकि ये चीख़ें उत्पन्न हुईं है
एक अंधपरंपरा से उपजे उसी कुप्रथा से
जिसने धकेल दिया
सैकड़ों लड़कियों को आग की लपटों में
जिसने कच्ची उम्र में ही
ज़िम्मेदारियों का चोगा पहना दिया
कितनी ही हँसती-खिलखिलाती लड़कियों को!
जिसने कर्ज़ लेकर बेटी ब्याहने के कारण
अवसाद की सूली चढ़ा दिया
कितने ही पिता को!
हाँ, इसी अंधपरंपरा ने छीन लिया है
कितनी ही लड़कियों की आँखों से उनके सपने
और कितनी ही लड़कियों को तो
जीने से पहले ही मार डाला
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6. बची रहेगी यह दुनिया
इस क्रूर होते समय में
जब सच बोलना
अपराध मान लिया गया है,
शासक के झूठ को झूठ कहने पर
उसके समर्थकों द्वारा मार दिया जा सकता है
कभी भी, कहीं भी
यातनाएँ और गाली खाकर भी
तुम अड़े हो सत्य पर,
निर्भीक हो बोले जा रहे हो
इन सबके ख़िलाफ़ लगातर…
मेरे दोस्त!
मुझे यकीन है,
बची रहेगी यह दुनिया।
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7. अभी भी तुम सुप्त हो?
जग विचारहीन हो रहा है
भावनाएं मर रही हैं
कानन नष्ट हो रहे हैं
इंद्रधनुष विलुप्त होने के कगार पर हैं
पंछियां बस संस्मरणों में नज़र आते हैं
अभी भी तुम सुप्त हो?
अपराधियों की मौज है
निर्दोष मारा जा रहा
मूक होकर सभ्य वर्ग ज़ुर्म को निहारता
दिखावा वास्तविकता पर हावी है
झूठ ही है सच बना
अभी भी तुम सुप्त हो?
सबसे बुद्धिमान प्राणी जो
चाँद पर पहुँचने की कोशिशें कर रहा
हर तरफ अपने ही सीमाओं में बंधा है
ब्रह्मांड पर नियंत्रण करना चाहता है
पर खुद के अस्तित्व मिटाने की ही
कर रहा है साज़िशें
अभी भी तुम सुप्त हो?
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8. इंतज़ार
यूँ शाम उतरती है दिल में
जैसे सबकुछ छूट रहा हो
जैसे यह जीवन रूठ रहा हो
वही धुंध, वही सन्नाटा, वही तन्हाई
और व्यर्थ के विचारों में
खुद से द्वन्द्व करता हुआ
उलझा हुआ ख़ामोश मैं
इंतज़ार करने लग जाता हूँ
एक नई सुबह का।
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9. तुम्हारा होना
होना ये था
तुम्हारे बोलने से
डोलनी चाहिए थी पृथ्वी
तुम गरजते
तो काँप उठता तानाशाह
ज़िंदा होने का ढोंग करते मुर्दो!
तुम्हारे बोलने से
आवाज़ नहीं होती
तुम हो ऐसे
कि नहीं हो तुम
तुम्हारा होना न होना
बराबर है अब।
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परिचय-
दीपांकर गुप्ता समकालीन हिंदी के युवा कवि, पटकथा लेखक एवं ग्राफिक डिज़ाइनर हैं। उनका जन्म 5 दिसंबर 2000 को बिहार के अररिया ज़िले के विशनपुर गाँव में हुआ। वर्तमान में वे भोपाल, मध्य प्रदेश में निवास करते हैं।
उनकी कविताएँ, लेख और अन्य रचनाएँ हिंदुस्तान (फुरसत, कादम्बिनी) अहा! ज़िंदगी, सुमन सौरभ, पलाश, इन्द्रधनुष, संवदिया सहित अनेक राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। साहित्य के साथ-साथ वे लघु फ़िल्मों के लिए कहानी, पटकथा और संवाद लेखन में भी सक्रिय हैं।
व्यवसाय से वे ग्राफिक डिज़ाइनर हैं और वर्तमान में भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR) से संबद्ध दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान, भोपाल में प्रकाशन एवं डिज़ाइन संबंधी कार्यों से जुड़े हैं। इससे पूर्व वे दैनिक भास्कर समूह की बाल पत्रिकाओं बाल भास्कर एवंयंग भास्कर के डिज़ाइन विभाग में कार्य कर चुके हैं।
हिंदी भाषा, साहित्य, सिनेमा, संस्कृति और प्रकाशन उनके प्रमुख रुचि-क्षेत्र हैं।
सम्पर्क : contactdeepankargupta@gmail.com
मोबाइल : 9006223860
पता :
दीपांकर गुप्ता
मधुबन पार्क अपार्टमेंट के पास, कोलार रोड, गेहूँखेड़ा
भोपाल, मध्य प्रदेश – 462042



