प्रज्ञा गौतम विज्ञान कथा लिखती हैं। हिन्दी में विज्ञान कथा के प्रति क्या नज़रिया है- उसी को लेकर उन्होंने अपने अनुभव साझा किए हैं। संपादकों के अनुभव, लेखकों के अनुभव। बहुत दिलचस्प है और कारुणिक भी। आप भी पढ़कर देख सकते हैं- मॉडरेटर
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यह कहानियों के जंगल जैसा कुछ था।
वह भाग रही थी। घनघोर अंधेरे में गिरते-पड़ते। आकाश के कलेजे को चाक-चाक करती बिजली की धूमिल रोशनियों के बीच कुछ दृश्य कांप उठते थे। आकुल चेहरों पर उगी बेबस आँखें। अधखुले होंठों पर मौन चीत्कार। उसको पहचानने में देर नहीं लगी। यह उसकी कहानियों के पात्र थे। बुनी-अधबुनी कहानियों के पात्र, जो बीते मौसमों की गंध लिए मीलों तक फैल गए थे। वे अब आजाद थे। उनके पैर किसी शिल्प की रेशमी डोरी से नहीं बंधे थे।
वह उनसे भाग रही थी। लेकिन इस जंगल का कहीं अंत नहीं था।
यह सब तब शुरू हुआ था जब उसने यत्न से सहेजे किस्से नोच कर फेंक दिए थे। रातें आधी नींद और आधी जाग में बीत रही थीं। स्वप्न और यथार्थ के बीच झूलती हुई। चेतना और अर्द्ध चेतना के बीच अपनी कहानियों के विक्षिप्त पात्रों के सवालों से जूझते और भागते हुए। उस दिन पूरी की पूरी रात एक यंत्रणादायी बीहड़ में भटकते गुजर गई थी।
सुबह सिर भारी था। उसको अजीब सा हैंगओवर जैसा महसूस हो रहा था। कहानियों के कुछ दृश्य चिथड़ा- चिथड़ा होकर दिमाग की नलियों में अभी तक अटके थे।
कुछ साल पहले तक सब ठीक ही था। अगर यह वाक्य किसी ने उस पर उछाला नहीं होता। ये सारे किस्से रेशमी पोटली में बंद कहीं दफन रहते।
“तुम्हें यहाँ जानता कौन है?”
“लेकिन मैं बहुत पहले से लिखती आ रही हूँ। खूब छपी भी हूँ। लोग जानते हैं मुझे… दूर दराज के लोग और परदेस के लोग भी… कितने संदेश तो रोज मिलते हैं।” उसने खिसिया कर कहा था। आखिर जर्मनी के माइकल आइओलेट और चीन के रिवर फ़्लो ने उसको अपनी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में जगह दी थी।
“मैं यहाँ की बात कर रही हूँ।” वह सगर्व बोली थीं।
‘धत्! यह बात तो कभी सोची ही नहीं कि मुझे यहाँ कोई जाने।‘ इस विचार ने उसके दिमाग के किसी कोटर में से अपनी मुंडी निकाली।
उसी पल उसको लगा था कि जैसे किसी ने उसके पैरों तले से धरती का टुकड़ा खींच लिया हो। या सिर के ऊपर से आकाश की छाया को हटा लिया हो। उसकी लिखी सारी किताबें, सारे लेख उसी क्षण टुकड़ा- टुकड़ा हो कर धूल में मिल गए थे। उसने तो अब तक यह बात सोची ही नहीं थी।
सब कुछ ऐसे ही होता चला गया था। अरसा पहले, एक दिन यूं ही चंद पंक्तियाँ लिख कर किसी पत्रिका को भेज दी थीं। इसका जादू तो छपने के बाद पता चला था। अमूर्त भावों का इस तरह मूर्तिमान होना क्या होता है। चमकीले कागज पर किसी शिशु की तरह रेंगते जिंदा शब्द, बेआवाज बतियाते हुए। एक पहचानी सी गंध लिए। जिनको वह छू सकती थी, देख सकती थी और चूम सकती थी। वे उसकी अपनी आवाज थे। वह भावुक पल आज भी याद है।
अपनी आत्मा की आवाज को कागज पर गोलमटोल शब्दों के रूप में देखना नशा था। वह बेसबब ही शब्दों से खेलती रही। शब्द तितलियों की तरह दूर देश उड़ चले। सुगंध की तरह बिखर गए। नन्ही सी दुनिया ने अपना कलेवर दूर तक फैला लिया। यह विज्ञान की दुनिया थी। ऐसे किस्सों की दुनिया जिसमें झीने परदे की ओट से भविष्य झाँकता था। रहस्यमय और अनंत संभावनाएं लिए हुए।
यह अजब बात थी कि उसके अपने शहर के लोग उन शब्दों के तिलिस्म में नहीं उलझे।
“तुम्हें यहाँ जानता कौन है?” यह वाक्य भूत की तरह उसका पीछा करता रहा। अकेली रातों में डराता रहा।
“मुझे क्या करना होगा इसके लिए?”
“हमारा साहित्यिक ग्रुप ज्वॉइन कर लो।”
“ठीक है।”
“मैं क्यू आर कोड भेज देती हूँ। दो हजार सदस्यता फीस है।”
“अच्छा!” वह बुझे मन से बोली थी।
उसको तुरंत ही एक व्हाट्सएप समूह में जोड़ लिया गया। विज्ञान पत्रिकाओं के राष्ट्रीय- अंतर्राष्ट्रीय मंचों से इतर यह एक लोकल साहित्यिक समूह था। इस कोलाहल भरे समूह में हर कोई अपनी कविताएं डालता रहता। ज्यादातर सब कवयित्रियाँ थीं। हालांकि उनको पता नहीं था कि कविता ने कितनी यात्रा तय कर ली है। वे सब अपने दायरे में खुश थीं। वे शहर के हर साहित्यिक आयोजन में शिरकत करती थीं।
आए दिन ही किसी न किसी को कोई सम्मान-अलंकरण फलां-फलां हस्तियों के कर कमलों से मिलता रहता। सबके ऊपर वरिष्ठ लेखिका का लेबल चस्पा था। यह एक अलग ही दुनिया थी। शहर के बाहर जिसको कोई नहीं जानता था।
उस समूह की शुरुआती बैठकों में वह नहीं गई। समय नहीं था। उसका मन भी नहीं था। रविवार की एक दोपहर वह थक कर लेटी ही थी कि फोन घनघना उठा। समूह एडमिन का फोन था। “तुरंत चली आओ। आज बारिश के कारण बहुत कम लोग आ रहे हैं। आयोजन तुम्हारे घर से ज्यादा दूर नहीं है। आज कोई बहाना नहीं…”
उनींदे चेहरे पर छपाक-छपाक ढेरों पानी के छींटे डाले। साड़ी पहनने का समय नहीं था। उसने सूट पहना और नीचे उतर कर गाड़ी निकाली। बाहर रिमझिम बारिश थी। घिरा हुआ उदास मौसम।
दस मिनट में वह गंतव्य पर पहुँच गई थी। यह एक लेखिका का सुरुचिपूर्ण ढंग से सजा हुआ घर था। हॉल की एक दीवार पर समूह का बैनर टाँग दिया गया था। दीवान और सोफ़े पर कवयित्रियाँ विराजमान थीं। आत्मविश्वास से लबरेज, दर्प पुते हुए चेहरे। वह सोफ़े के एक कोने में सिकुड़ कर बैठ गई। पूरे समय वह खुद को बेमेल सा महसूस करती रही। सब की कविताएं सुनी। खुद भी एकाध पढ़ दी। कविता पाठ के बाद जलपान हुआ। यह सब एक किटी पार्टी जैसा था।
अगली सुबह व्हाट्सएप समूह कोलाहल से भरा था। फोटो, वीडिओ, गोष्ठी का मीडिया कवरेज.. और जाने क्या-क्या डाले जा रहे थे। वह इन सब से अछूती ही रह गई। उस शोर में कुछ सहेजने जैसा नहीं मिला। मन की बेचैनियाँ कम नहीं हुईं।
उसने शहर के कुछ लेखकों के नंबर लिए थे। सब की सलाह थी कि उसको विज्ञान के इतर भी कुछ लिखना चाहिए। एक वयोवृद्ध साहित्यकार कह रहे थे-
“मैं तुमको लिखना सिखाऊँगा। शहर की अमुक लेखिका को मैंने व्हाट्सएप पर ही लिखना सिखा दिया था। मेरी श्रीमती को भी मैंने ही साहित्यकार बनाया है।”
उसको एक पुराना वाकया याद आ गया। अपने विज्ञान लेखन के शुरुआती दिनों का समय। एक प्रसिद्ध पत्रिका से जुड़ी थी। उसके संपादक बहुत विद्वान थे। उनका नाम विकिपीडिया पर भी था। फोटोग्राफिक स्मृति थी उनकी। किसी भी टॉपिक पर जब वह धाराप्रवाह बोलते तो वह मंत्रमुग्ध सुनती रह जाती। वह लगातार यात्राएं करते और सम्मान पाते रहते थे।
वह हमेशा कहते कि चुपचाप काम करने से कुछ नहीं होता। तुमको खुद को प्रमोट करना आना चाहिए। कहते, कभी इधर आओ, तुम्हें यह सम्मान दिलवा दूँ.. वह दिलवा दूँ..
“रहने दीजिए। अभी कुछ ऐसा खास लिखा ही नहीं कि कोई सम्मान पाऊँ।” उनके एक निमंत्रण पर उसने बेपरवाही से कहा था।
इस मूर्खतापूर्ण बात पर वह ठठा कर हंस दिए थे। उनका आग्रह जारी रहा। फिर वह समय- असमय वीडियो कॉल करने लगे। उनकी आवाज बहकने लगी। शब्दों ने विद्वता का चोला उतार फेंका। उनमें एक आदिम गंध उतर आई थी। जिसको वह फोन के दूसरी तरफ महसूस करने लगी थी। तब वह सोच भी नहीं सकती थी कि उसकी माँ की उम्र का यह व्यक्ति… छी! खैर.. अब तो यह पुरानी बात हुई। उनको और उनकी पत्रिका को आखिर नमस्कार करना पड़ा। इस तरह वह बहुत सारे संभावित सम्मानों और पुरस्कारों से वंचित रह गई।
अब आगे क्या? कम से कम उसके शहर के लोगों को जानना तो चाहिए कि वह लिखती है। ऐसा लिखती है जिसके कुछ मायने हैं।
उसके शहर में ही एक और वयोवृद्ध लेखक-पत्रकार हैं। उनसे नया-नया परिचय हुआ था। वे चींटी की तरह निरंतर कुछ न कुछ करते रहते। लेखन प्रतियोगिताओं का आयोजन, साझा कविता संकलनों और रचनाकार परिचय कोशों का प्रकाशन। कितने ही प्रकार के परिचय कोश बना चुके थे, शहर के रचनाकार, क्षेत्र के रचनाकार और पूरे प्रांत के रचनाकार। और.. उनमें ज्यादातर ऐसे थे जिन्होंने कुछ खास नहीं लिखा था।
वह किसी कार्यक्रम में उसको विशिष्ट अतिथि बनाना चाहते थे। कार्ड पर मोटे-मोटे अक्षरों में उसका नाम छपा था। आह! शहर के साहित्यकारों के साथ मंच साझा करने को मिलेगा। अच्छा अवसर था। अब सब उसको जान ही जाएंगे।
वह सुबह से उत्साह में थी। उसने पहनने के लिए एक बेहतरीन सिल्क की साड़ी का चुनाव किया। छोटी बहन घर पर आई हुई थी। उसने उससे भी साथ चलने को बोला –
“तुम भी चलो न! एक साहित्यिक कार्यक्रम में बुलावा है। मैं वहाँ विशिष्ट अतिथि हूँ।”
कार्यक्रम सार्वजनिक पुस्तकालय में था। वह बहन को साथ लिए तय समय पर पहुँच गई। उस समय मंच सज्जा हो रही थी। कोई अतिथि नहीं आए थे। वे दोनों हॉल में लगी कुर्सियों पर बैठ गईं। करीब एक घंटे बाद अतिथि आना शुरू हुए। कुछ देर बाद मुख्य अतिथि मंच पर विराजे। वह प्रतीक्षा करती रही कि उसको मंच पर बुलाया जाएगा। तभी धड़धड़ करती उसके समूह की कवयित्रियाँ पधारीं और सीधी मंचासीन हो गईं। सारी कुर्सियाँ भर गईं। उनमें अधिकतर का तो कार्ड पर नाम भी नहीं था। उनको मालाएं और दुपट्टे पहनाए गए।
किसी ने उस पर ध्यान नहीं दिया। यहाँ तक कि आयोजक महोदय ने भी नहीं देखा। साथ बैठी बहन भुनभुनाती रही-
“दीदी, तुझे अपनी वैल्यू करनी नहीं आती। क्यों आ जाती है ऐसे कार्यक्रमों में।”
लंबे और उबाऊ कार्यक्रम की समाप्ति के ठीक दस मिनट पहले पुस्तकालय प्रभारी का उस पर ध्यान गया। फिर उसको डाइस के पीछे वाली कुर्सी पर बैठा दिया गया। वह किसी का परिचय नहीं पा सकी। ये मंचासीन कौन लोग हैं? क्या लिखते हैं? और वह छपता कहाँ है?
शहर के ही एक भले मन और स्नेही स्वभाव के साहित्यकार थे। उन्होंने भी उसको अपने समूह में जोड़ लिया। वे भी कहते कि मैं तुम्हें आगे बढ़ाऊँगा। यह आगे बढ़ाना आखिर होता क्या है? वह समझ नहीं पाती। इंसान को खुद ही तो चलना होता है.. अपने पैयाँ-पैयाँ। खुद सीखना होता है।
उसके सपने डरावने होते जा रहे थे। वह लोगों की भीड़ को पागलों की तरह मंच की तरफ बढ़ते देखती। और वह पीछे खड़ी उन अदृश्य शक्तियों के बारे में सोचती जो इन लोगों को आगे बढ़ा रही थीं।
साहित्यिक समारोहों में वह श्रोताओं के बीच बैठी ऊँघती रहती। वहाँ मैं- मैं का भयानक शोर था। मंचासीन होने और माइक पकड़ने की अफरातफरी मची थी। किसी से भी बौद्धिक संवाद की उम्मीद नहीं थी। पूरा एक साल बीत गया। वह वहीं खड़ी थी जहां पहले थी।
अब उसकी यह इच्छा कतई समाप्त हो चुकी थी कि इस शहर में कोई उसको जाने।
“साहित्यकारों के समाज में विज्ञान साहित्यकार की स्थिति एक दलित की तरह है।” एक परिचित प्रोफेसर कह रहे थे।
“अच्छा! यहाँ भी वर्ण व्यवस्था है।”
“बिल्कुल है।”
पहले-पहल उसने यह बात मजाक में ली थी। बाद में यकीन होने लगा कि ऐसा ही है। लेकिन ऐसा क्यों है? विज्ञान लेखन तो कहीं अधिक जटिल और बौद्धिक है। वह इतना तेज चीख कर यह सवाल पूछना चाहती थी कि उसकी आवाज पूरे ब्रह्मांड में फैल जाए। लेकिन कुछ प्रश्नों के कोई उत्तर नहीं होते। वे बारम्बार प्रतिध्वनित होकर आप के पास लौट आते हैं। वे प्रेत की तरह आपके कंधों पर सवार रहते हैं। वे दिमाग में कूदफाँद करते हैं। वे सपनों में आकर उत्पात मचाते हैं। वे आपकी आत्मा को घुन की तरह खाते हैं।
फिर एक दिन क्या हुआ, अरसे से किसी अंधेरी कोठरी में पड़ी, धूल-जालों में सनी हुई नीली जादुई किताब उसके हाथ लगी। तब उसमें विज्ञान जगत के थोड़े से चेहरे दर्ज थे। खुलते ही किताब में कैद दुनिया ब्रह्मांड की तरह विस्तार पाने लगी।
शहर में उगे अनेक नन्हे-मुन्ने साहित्य -संसारों से ऊबी हुई वह इस विशाल दुनिया के सामने चमत्कृत सी खड़ी थी। नीली किताब में प्रकाश वर्षों की दूरी तक फैली एक विलक्षण और लुभावनी दुनिया। हर आदमी यहाँ ज्ञान का अकूत भंडार लिए बैठा था। कहन में अनोखे शब्द और शिल्प। आकाश तक चली जाएं, इतनी किताबों की बातें। कितना सहेजे, कितना समेटे वह। देश भर के विद्वान लेखक अब उसके मित्र थे। आभासी मित्र!
ठीक इसी समय उसको अपनी रेशमी पोटली याद आई थी जिसमें बुने-अधबुने ढेरों किस्से जमा थे। यह पोटली बरसों से कहीं दफन थी। इस पोटली की याद आने का एक कारण और भी था। उसकी अपनी विज्ञान की छोटी सी खूबसूरत दुनिया स्याह हो चली थी। उसके अग्रज जो हर पल उसको प्रोत्साहित करते थे, प्रतिद्वंद्वी की तरह उसके सामने खड़े थे।
“तुम खुद को प्रमोट करती हो!” वह दहाड़ते।
“मैं.. मैं कहाँ प्रमोट करती, सर। मैं तो फेसबुक भी कम खोलती हूँ।” वह घिघियाती।
“तुम को पुरस्कार के लिए फॉर्म नहीं भरना चाहिए। आखिर तुमने लिखा क्या है।” वह आदेश देते।
“जी सर।”
“अब तो तुम बड़ी लेखिका हो गई हो।” वह व्यंग बाण चलाते।
“नहीं.. नहीं..” वह कानों पर हाथ रख लेती।
उनका लहजा स्थायी रूप से व्यंगात्मक हो चला था। वह अभिभावक स्वरूप थे। उनके इस रूप से उसका मन बुरी तरह क्षत-विक्षत हो गया। उन्होंने पत्रिकाओं के पते दिए थे.. लिखना तो उसने जाने कितनी रातों की नींद खो कर सीखा.. और अभी तो जाने कितना सीखना बाकी है। यह रास्ता ही ऐसा है। अथक चलते रहो।
हाँ, तो फिर वह अपनी किस्सों की पोटली को सीने से लगाए एक बड़ी और अनजान दुनिया के सामने खड़ी थी। किस्से कहना कहीं अधिक आसान है बनिस्बत विज्ञान गल्प गढ़ने के।
लेकिन कहना क्या आसान है जब कोई सुनने वाला ही न हो। उस दुनिया के वे सारे आभासी मित्र एक कांच के विचित्र गोले में बंद थे। अजीब टेक्नॉलॉजी थी। भीतर से आने वाली आवाजों को वह सुन सकती थी लेकिन वे उसको सुन नहीं सकते थे। वे उसको दिखते थे लेकिन उनको वह नजर नहीं आती थी। भीतर के लोग अदृश्य तारों से जुड़े थे। एक दूसरे के साथ बतियाते। एक दूसरे की किताबों की चर्चा करते। आपस में भर-भर प्रेम बरसाते। आह!
शीघ्र ही महसूस हुआ कि यह गोला उसकी जमीन से करोड़ों प्रकाश वर्ष दूर किसी अन्य आकाशगंगा में स्थित है।
इसी दुनिया में नए-नए प्रविष्ट हुए एक वाशिंदे को कहते सुना था कि अमुक पत्रिका के संपादक नए लोगों को प्रोत्साहित करते हैं। ढेरों किताबें पढ़ने को देते हैं। उसके दिल में आस का अंकुर अंखुआया था। बस किसी विधि से इन महोदय से संपर्क हो जाए। आखिर प्रकाश वर्षों में दूरी थी।
उनसे संपर्क हुआ। वह बहुत विनम्र और उदार मालूम हुए जैसी कि उनकी छवि थी। उनको कहानी भेजी। कुछ दिनों बाद पूछा तो बोले कि इसमें पूर्ण विराम की अशुद्धि है। आप ठीक करके भेजिए हम छाप देंगे। उसका दिल बल्लियों उछलने लगा था। यह सब कितना आसान था। उसने इंतजार किया। एक माह बीता। उनसे वापस संपर्क किया-
“ओह! मैं भूल गया था। उम्र हो गई है न। आप याद दिला देते। अब छाप देंगे।”
एक महीना फिर बीत गया। फिर याद दिलाई। वह फिर भूल गए थे। अब की बार भी आश्वासन मिला। जब इस सिलसिले की चौथी आवृत्ति हुई तब जाकर उसको एहसास हुआ कि उसको बनाया जा रहा है।
बहन ने कहा –
“दीदी, तू भोली है। यह आजकल का लैटेस्ट ट्रेंड है। कोई सीधा मना नहीं करता।
उसको दुःख हुआ था। कहानी न छपने का दुःख नहीं, इस तरह बनाए जाने का दुःख। काश वह सीधे ही मना कर देते। या फिर कमी ही बता देते। लेकिन वह आधुनिक ट्रेंड को फॉलो करते थे। उसके मन में एक खयाल यह भी आया कि क्या पता उनसे संपर्क ही न हुआ हो। आखिर दूरी प्रकाश वर्षों में थी। उनके किसी अवतार ने उसको डील किया हो।
वह बस उनसे कहना चाहती थी कि उसको उस गोले कि नागरिकता नहीं लेनी। वह बस इतना चाहती है कि लोग जानें कि विज्ञान कथाएं भी कहानियाँ ही होती हैं। विज्ञान कथाकार भी एक मुकम्मल कहानी लिख सकता है।
इस बीच ही एक सहृदय लेखक से परिचय हुआ जो इसी गोले के वासी थे। उन्हें विज्ञान कथाओं में रुचि थी। इतनी लंबी दूरियों को पाट कर मन के कोमल तन्तु उनसे जुड़ते चले गए। उस अजनबी संसार में वे उसके इकलौते मित्र थे। उन्होंने अपना एक वादा निभाया भी। पुस्तक मेले में मिले तो उनको अपनी किताबें भेंट की थीं।
“आप लिखिएगा इन पर। मैं चाहती हूँ कि इन किताबों पर चर्चा हो।”
“जरूर लिखूँगा। चिंता न करो।”
वह इंतजार करती रही। पाँच माह गुजरे। एक बार उनको हल्का सा याद दिलाया था-
“कोई दबाव है?” उनका जवाब आया था।
एक छोटा सा जवाब। आधा- अधूरा सा। लेकिन वह सुई की नोक सा दिल में चुभा था। दिल लहूलुहान हो गया था। दिमाग में कितने ही प्रश्न दिन- रात भड़भड़ाते रहे थे। क्या वह प्रेमिल भाषा में मना नहीं कर सकते थे? वह तो उसके मित्र थे। वह सप्ताह भर ज्वरग्रस्त रही। दिमाग में भयानक उथलपुथल से बदन तपता रहा।
जब बुखार उतरा तो दिल का वह हिस्सा सुन्न था जो उनसे जुड़ा था। अब यदि वह उसकी किताबों को किसी नाले में भी बहा आयें तो उसको जरा भी दुख नहीं होगा।
इस बीच उसकी कहानियाँ कुछ अच्छी पत्रिकाओं में आई थीं। कुछ कहानियाँ पत्रिकाओं के इनबॉक्स में सो रही थीं। बीती गर्मियों में जब धधकती लू चल रही थी। मन आतप से झुलस कर कोयला हुआ जा रहा था। मोह और प्रेम जैसे शब्द वाष्प हो चुके थे। किसी दिन सन्निपात जैसी स्थिति में उसने अपनी पुराने किस्सों की पोटली चिथड़ा- चिथड़ा करके उधेड़ दी थी।
वह उसके पात्रों पर चिल्ला रही थी-
“तुम मेरे किसी काम के नहीं! दबे- दबे से हो तुम। सत्तर के दशक के पात्रों की तरह पूरे ढके से। तुम्हें मुखर होना चाहिए था। अपना तन- मन सब उघाड़ कर रख देना था। अपने वीभत्स चेहरों से नकाब को हटा देना था। जानते नहीं कि सच नंगा होता है। सच वीभत्स होता है। सच से सड़ांध फूटती है। दफा हो जो तुम!”
तब से कहानियों के पात्र अपने कपड़े उतार कर, चेहरे के नकाबों को नोच कर उसका पीछा कर रहे हैं। अतीत के डरावने प्रेतों को खदेड़ती वह कभी नए किस्से चुनती है तो कभी पुराने किस्सों को फिर से सहेजती है। जंगल घना है। घनघोर अंधेरा है। और रास्ता बहुत लंबा…


