अशोक वाजपेयी के श्रीकान्त वर्मा

बरसों पहले अशोक वाजपेयी जी ने श्रीकान्त वर्मा पर यह संस्मरण लिखा था। श्रीकान्त वर्मा के जीवन, उनकी कविता के कई शेड्स हैं इसमें। अशोक वाजपेयी की रचनावली से साभार आपके लिये प्रस्तुत है- मॉडरेटर

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अपने नरक में नाराज़: श्रीकान्त वर्मा

नरेश मेहता मेरे दिल्ली आने से पहले ‘कृति’ छोड़कर इलाहाबाद चले गये थे और श्रीकान्त जी से उनके सम्बन्धों में खटास आ गयी थी। इस बीच हैदराबाद की कवयित्री कान्ता और श्रीकान्त जी निकट आ गये थे। ‘कृति’ का उत्तरार्द्ध उन्हीं के सम्पादकीय सहयोग और शायद वित्तीय मदद से निकला। कान्ता अपने ढंग की शान्त-मन्द कवयित्री थीं और कम बोलती थीं। अपनी मुखरता और प्रखरता दोनों से ही श्रीकान्त उन पर हावी रहते थे।

कमलेश उन दिनों डॉ. राम मनोहर लोहिया के सचिव हो गये थे और उनके साथ मिलकर ‘जन’ मासिक का सम्पादन कर रहे थे। लोहिया कनाट प्लेस के यूनाइटेड काफी हाउस में बैठते थे। एक शाम हमने तय किया कि उनसे मिला जाए। श्रीकान्त जी, कमलेश और पुच्छल के तरह मैं जब वहाँ पहुँचे तो लोहिया जी कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं से घिरे बैठे थे। हमलोगों को अपनी ओर आते देख उन्होंने तुरन्त अपनी मजलिस बरखास्त कर दी। एक व्यक्ति ने हिलगे रहने की कोशिश की तो लोहिया जी बोले कि तुम्हारा यहाँ क्या काम, अब बुद्धिजीवी लोग आ गये हैं। वह मन मारकर चला गया। बाद में पता चला कि वह राज नारायण थे जो कि केन्द्र में मन्त्री भी हुए। उस समय यह स्पष्ट हो चला कि साहित्य और कलाओं के अलावा राजनीति में भी श्रीकान्त जी की अच्छी पैठ है, कम-से-कम दिल्ली की सत्तापरक राजनीति में। वे अपने आरम्भिक वामपन्थी तेवर से हटकर समाजवादी मध्यमार्ग के अधिक नजदीक जान पड़ते थे। उनका परिवार कांग्रेसी रहा था और उनके पिता सम्भवतः स्वतन्त्रता संग्राम में भाग ले चुके थे। दिल्ली में बरसों तक उनकी संरक्षक मिनी माता कांग्रेस से ही थीं। श्रीकान्त जी के दो अनन्य वरिष्ठ मुक्तिबोध और परसाई वामपन्थ के निकट थे। स्वयं श्रीकान्त जी की जिन लेखकों से निस्बत थी उनमें से कई प्रगतिशील थे लेकिन उनका समाजवादियों से, जिनमें लोहिया जी के अलावा मधु लिमये जैसे बुद्धिजीवी भी शामिल थे, अच्छा सम्पर्क और संवाद था। मिनी माता छत्तीसगढ़ के एक दलित पन्थ सतनामियों में से थीं। श्रीकान्त वर्मा के राजनीतिक संस्कारों के विकास में इन सभी की भूमिका है। वे भले बाद में कांग्रेस में शामिल हो गये और उसके महासचिव तक बने। लेकिन उनमें एक समाजधर्मी और दलितों-शोषितों के प्रति गहरी सहानुभूति का तत्व हमेशा सक्रिय रहा। यही कारण है
कि अपने जीवन के उत्तरकाल में उन्होंने ऐसी कविता लिखी जो बेहद स्मरणीय रूप से सत्ता की अन्ततः विफलता की कथा, करुण और दारुण दोनों ढंगों से कहती है। आधुनिक कविता में श्रीकान्त वर्मा विफलता के एक बड़े कवि हैं- वह विफलता जितनी निजी है उतनी ही सामाजिक भी। अगर उसका व्यक्ति और समाज का आधुनिक असन्तुलन में है तो उसके लिए कोई एक पक्ष जिम्मेदार नहीं है। अपनी विफलताओं का प्रणेता स्वयं को ही बताने वाले इस कवि ने समाज को उसकी ज़िम्मेदारी से मुक्त नहीं छोड़ा है।

जिन दिनों हम कुछ लोगों ने सागर में साहित्य में कुछ नया करने की शुरुआत की थी, मध्य प्रदेश के साहित्य-जगत् में तीन बड़ी उपस्थितियाँ तो भवानीप्रसाद मिश्र, गजानन माधव मुक्तिबोध और हरिशंकर परसाई की थीं। चौथी अपेक्षाकृत युवा उपस्थिति बन रही थी बिलासपुर के श्रीकान्त वर्मा की। उनकी रचनाएँ द्वारकाप्रसाद मिश्र द्वारा नागपुर से प्रकाशित-सम्पादित साप्ताहिक ‘सारथी’ में सबसे पहले देखी थीं—गीतिपरक, ऐन्द्रिय और स्थानीयता की गन्ध-लय लिये हुए। वे बिलासपुर में थे जहाँ से 1955 में उन्होंने एक पत्रिका निकाली ‘नयी दिशा’। परसाई जी की पत्रिका ‘वसुधा’ में उनकी कविताओं के अलावा समुद्रगुप्त के छद्मनाम से पिछले महीने प्रकाशित पत्रिकाओं की रचनाओं पर टिप्पणी करता एक स्तम्भ छपता था—’कलम की दिशा’। फिर नरेश मेहता के बुलावे पर श्रीकान्त जी दिल्ली चले गये।

उनसे पहली मुलाक़ात कब हुई यह ठीक से याद नहीं है। शायद इलाहाबाद में 1957 में हुए साहित्यकार सम्मेलन में, जहाँ वे अपने पहले कविता-संग्रह ‘भटका मेघ’ की प्रतियाँ लेकर आए थे। एक बार वे उसके बाद सागर आए और विश्वविद्यालय के तब के कुलपति द्वारकाप्रसाद मिश्र से मिलने गये थे। मुक्तिबोध जी के बारे में कुछ बात उन्होंने की थी। तब तक मुक्तिबोध जी राजनांदगाँव के एक कालेज में अध्यापक होकर आ चुके थे।

1958 में जब मैं पहली बार दिल्ली आया तो उनके 17 जनपथ में स्थित ‘भारतीय श्रमिक’ के दफ्तर में पहली बार अज्ञेय जी के दर्शन हुए थे, जो अपने स्कूटर पर नामवर सिंह को खोजते हुए आए थे। नरेश मेहता के साथ मिलकर श्रीकान्त जी ने ‘कृति’ पत्रिका शुरू की थी, जो पहले ही अंक से हिन्दी की अग्रणी पत्रिकाओं में आ गयी थी। पहले ही अंक से यह भी स्पष्ट हो गया था कि उसका एक अघोषित उद्देश्य अज्ञेय के वर्चस्व के बरअक्स दूसरी छवियों जैसे शमशेर बहादुर सिंह और मुक्तिबोध को स्थापित करना था। पहले ही अंक से एक विज्ञप्ति ‘कृति’ में छपती थी जिसमें शमशेर को ‘नयी कविता का प्रथम नागरिक’ कहा जाता था। यह बात भी नोट करने की है कि ‘प्रतीक’ और ‘कल्पना’ के बाद ‘कृति’ ही ऐसी पत्रिका थी जिसमें अन्य कलाओं पर अच्छी और सुविचारित सामग्री को जतन से स्थान दिया जाता था। तब तक श्रीकान्त जी का समकालीन कलाकारों आदि से परिचय भी घनिष्ठ हो चला था। ‘कृति’ के कवर पर लगातार भारतीय और विदेशी चित्रकारों के चित्र प्रकाशित होते रहते थे। मेरी पीढ़ी के कई तरुण-युवा कवियों की कविताएँ ध्यानाकर्षक रूप से पहली बार ‘कृति’ में ही श्रीकान्त जी ने प्रकाशित की थीं।

1958 में श्रीकान्त जी हमें कनाट प्लेस के शंकर मार्केट में स्थित कला वीथिका दिल्ली शिल्प चक्र में लगी रामकुमार के चित्रों की प्रदर्शनी में ले गये थे—हमारे जीवन की पहली चित्र-प्रदर्शनी जहाँ नेमिचन्द्र जैन, निर्मल वर्मा, मोहन राकेश, मनोहर श्याम जोशी आदि से पहली मुलाक़ात हुई थी।

शायद स्वयं एक कस्बे से आकर दिल्ली में बसे श्रीकान्त जी में दूसरे युवतर् कस्बाई लेखकों के प्रति संवेदनशीलता और गरमाहट थी। बल्कि उनका बुनियादी कस्बाईपन दिल्ली में दशकों रहने के बावजूद अन्त तक बचा रहा। उनका अचानक भावोद्रेक, क्षोभ, स्नेह आदि इसी अदम्य कस्बाईपन के हिस्से थे। उनकी आरम्भिक कविताओं में प्रकृति का सान्निध्य है और जीवन की ललित-कोमल छवियाँ और अन्तर्ध्वनियाँ हैं। अपने अंचल और छत्तीसगढ़ी के कुछ शब्दों जैसे ‘झुँझकुर’ आदि का सुन्दर प्रयोग भी उन्होंने अपनी कविता में किया।
दिल्ली में श्रीकान्त जी के आरम्भिक कई बरस काफी कठिन रहे। उनकी आजीविका का साधन तो पत्रकारिता थी, जिसके दौरान उनका राजनेताओं से रोजाना का सम्पर्क रहता था। सम्पर्क ने एक ओर उन्हें राजनीति और सत्ता की गुत्थियाँ और बारीकियाँ समझने में मदद की वहीं दूसरी ओर आगे चलकर जब उन्होंने राजनीति में जाने का फैसला किया तो इन सम्पर्कों का लाभ मिला। लेखक और पत्रकार का काम सत्ता से सम्बन्ध या द्वन्द्व दो खासी अलग किस्म की बातें हैं। लेखक का काम सत्ता के बिना चल सकता है… वह उसे दूर से देखकर उसके किये-धरे को जाँच-परख सकता है। लेकिन पत्रकार का काम सत्ता के पास से, लगभग अन्दर घुसकर देखना है। श्रीकान्त मूलतः लेखक थे, लेकिन जीविका के लिए पत्रकार होने को विवश थे। वे सत्ता को लेकर उदासीन नहीं रह सकते थे-उनका सम्बन्ध, इस वजह से, अव्वल ही जटिल और द्वन्द्वात्मक था। बाद में जब वे स्वयं राजनीति में आ गये तो यह सम्बन्ध और भी जटिल हो गया। सत्ता ने उन्हें शुरू में क्षुब्ध किया, लुभाया, अपने अन्दर लिया और फिर लगभग निहत्था और अकेला छोड़ दिया।
श्रीकान्त जी की कविता में क्षोभ की कुछ शुरुआत तो उनके पहले संग्रह में ही हो चुकी थी। लेकिन दिल्ली के अनेक अनुभवों और कस्बाई कमतरी के तीखे अहसास ने उसे और चैन, धारदार एवं अदम्य कर दिया। इसे याद करना ज़रूरी है कि एक तरह से श्रीकान्त वर्मा इस दौर के पहले नाराज़ कवि हैं जिनके यहाँ गुस्सा जितना दूसरों पर है उससे कुछ ज़्यादा स्वयं पर है। यह भी कि हिन्दी की आधुनिक कविता में मुक्तिबोध और श्रीकान्त वर्मा इस अर्थ में सगोत्रीय हैं कि दोनों ही आत्माभियोगी कवि हैं – मुक्तिबोध अपनी मुक्ति दूसरों में खोजते हैं, तो श्रीकान्त वर्मा के यहाँ मुक्ति नहीं है: सिर्फ नरक है। अक्सर अपने द्वारा ही गढ़ा हुआ और जिसकी खिड़की से कवि वह सब देख पाता है जो उसके नरक की सीमा में कैद नहीं है।
1960 की जुलाई में मैं दिल्ली आया सेंट स्टीफेंस कालेज से एम.ए. करने। श्रीकान्त जी की लेखक-मण्डली में तो सागर रहते ही शामिल हो चुका था। इसलिए दिल्ली में उसे नियमित रूप लेते देर नहीं लगी। उन दिनों वे नार्थ एवेन्यू में बिलासपुर की सांसद मिनी माता के फ्लैट की बरसाती पर बने एक कमरे में रहते थे। उनकी रोजमर्रा की मण्डली में अशोक सेकसरिया, महेन्द्र भल्ला, रमेश गोस्वामी और बाद में प्रयाग शुक्ल शामिल थे। जब भी कालेज के बेहद अंग्रेजी माहौल से भागने का अवसर मिलता, मैं भी शामिल हो जाता। शुरू में हमलोग जनपथ वाले काफी हाउस में बैठते थे जो अब नहीं रहा। वहीं कुछ चित्रकार और डॉ. लोहिया जैसे राजनेता आदि भी आते थे। धीरे-धीरे लेखकों का एक और अड्डा टी हाउस बन गया। उसमें एक मेज पर आकाशवाणी में काम करने वाले लेखक मोहन सिंह सेंगर, मुद्राराक्षस आदि बैठते थे, दूसरी पर अकादमियों में कार्यरत लेखक जैसे नेमिचन्द्र जैन, भारत भूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे आदि। तीसरी पर मोहन राकेश, कमलेश्वर आदि और चौथी पर हमलोग। ठीक से याद नहीं क्यों, पर शायद इसलिए कि वहां उधार की सुविधा थी, बाद में हम डॉ. निझावन के शालामार रेस्तरां में बैठने लगे। वहीं चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन के मित्रों की मण्डली भी जब-तब आती थी। बड़ौदा से गुलाम मुहम्मद शेख, अम्बा दास, हिम्मत शाह आदि से पहली भेंट इसी रेस्तराँ में हुई थी।

श्रीकान्त जी में गजब की हाजिरजवाबी और विट था। मिल-बैठकर घंटों बतियाना उनकी पुरानी कस्बाई आदत थी। बोलने में उक्ति वैचित्र्य का वे बड़ा सटीक इस्तेमाल करते थे। उनका अकस्मात् दिया गया वक्तव्य भी कुछ न कुछ अप्रत्याशित लेकर आता था। उनकी यही विट और शब्दों से खिलवाड़ की वृत्ति ने उनकी बाद की कविताओं को रूपायित करना शुरू किया और उनके सत्ता-प्रवेश में भी सहायक सिद्ध हुई।

हमलोग अक्सर शाम का खाना जनपथ में अन्नपूर्णा के पीछे एक ढाबे में खाते थे। दाम सबलोग शेयर करते थे, हालाँकि अशोक सेकसरिया अक्सर सबके लिए भुगतान करने को उतारू रहते थे। श्रीकान्त जी दिल्ली के अपने आरम्भिक दिनों में समय पर भोजन न करने और कहीं भी कुछ भी खा लेने के अभ्यस्त हो गये थे। इसने उनके पेट को शायद हमेशा के लिए बिगाड़ दिया था। बाद में जब वे साधन-सम्पन्न हुए और उनके पास अच्छे खाने का सुयोग भी जुड़ा तब भी वे अल्पाहारी ही रहे। खाने के प्रति, खासकर शाम को, इतना अन्यमनस्क मैंने स्वामीनाथन के अलावा किसी और को नहीं पाया। यों छोटे-मोटे कष्ट और बीमारियाँ प्रायः हमेशा ही उनकी जान को लगी रहीं। अपनी बीमारियों और उनकी दवाओं को लेकर शायद सबसे अधिक आब्सेशन तो गिरिजाकुमार माथुर को था। लेकिन श्रीकान्त जी के पीछे भी व्याधियों का पिचकैट काफी लम्बे अरसे तक रहा। एक बार उन्हें यह भ्रम हो गया था कि अगर कुछ ठोस खाएंगे तो उनका गला रुंध जाएगा और उनकी मृत्यु हो जाएगी। इस कारण उन्होंने द्रव पदार्थों के अलावा कुछ ठोस खाना बन्द कर दिया। उस दौरान एक शाम रवीन्द्र कालिया टी हाउस में मिले। उन्हें श्रीकान्त जी ने अपना कष्ट जाने क्यों विस्तार से बताया और उन्होंने रस लेते हुए कहा कि ऐसी बीमारी अक्सर भावनात्मक कारणों से होती है। श्रीकान्त खोद-खोद कर उनसे विस्तार से इस बारे में पूछते-बताते रहे और कालिया ने कुछ दवाई भी सुझायी। उनके जाने के बाद मैंने श्रीकान्त जी को आड़े हाथों लिया।  इस पर मैंने सख़्त एतराज किया कि वे सबको अपनी बीमारी के बारे में बताते रहते हैं और फिर उनकी सलाह पर ध्यान देते रहते हैं। उस शाम कुछ मेरी डाँट के असर में श्रीकान्त जी ने स्क्रैमबल्ड अण्डे खाये।

सत्ता को लेकर एक तरह का दुश्चितापन श्रीकान्त जी में अन्त तक रहा। जब वे सांसद बन गये थे और उनके पास तरह-तरह के वांछनीय-अवांछनीय लोग मँडराते रहते थे तो वे उस चकाचौंध को हटाने की कोई ख़ास कोशिश करते भले न दिख पड़े, सत्ता के प्रति गहरी अवज्ञा का भाव उनके मन से कभी गया नहीं। सत्ता में रहकर उन्होंने लोगों की मदद बहुत की जिनमें लेखकों की संख्या कम नहीं है, भले उनके अधिकांश उपकृत बन्धु इसे स्वीकार करने से कतराते हों।
आपात् काल के दौरान श्रीकान्त वर्मा की भूमिका उचित ही विवादास्पद रही है। यह याद रखना ज़रूरी है कि उस समय वे कांग्रेस में शामिल हो चुके थे। ऐसे कई वामपन्थी और प्रगतिशील लेखक थे, जिनमें हरिशंकर परसाई और नामवर सिंह शामिल हैं, जिन्होंने इमरजेंसी का समर्थन किया था। हालाँकि वे सत्ताधारी दल के बाकायदा सदस्य नहीं थे। उस समय कभी-कभी अपने असावधान वीर क्षणों में वे किसी को जेल भेजने की शक्ति या मंसूबे का इज़हार कर बैठते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा कभी किया नहीं। उन दिनों उन्होंने भारतीय लेखक संघ नाम की एक संस्था बनाने की कोशिश भी की थी। वे उसका एक चैप्टर मध्य प्रदेश में खोलना चाहते थे। भोपाल के हम अधिकांश लेखक उनके इस उपक्रम से सहमत नहीं थे। हमारी असहमति को महत्त्व देते हुए उन्होंने भोपाल में इस सिलसिले में हो रही बैठक में आने का तो अनुरोध किया पर उनकी संस्था में भाग लेने का नहीं।

श्रीकान्त वर्मा की एक कविता का शीर्षक है – ‘बुखार में कविता’। यह उनकी समूची कविता का एक मौजूँ शीर्षक हो सकता है क्योंकि उनकी कविता का तापमान, ज़्यादातर, ऊँचा चढ़ा हुआ रहा है। कई बार लगता है कि कविता में बीभत्स और विद्रूप लाने का दावा तो तथाकथित अकवितावादियों ने किया, लेकिन कविता को लगभग अपशब्द के रूप में इस्तेमाल करने और फिर भी उसके कविता बने रहने का असली जतन श्रीकान्त ने किया। अक्सर या ज़्यादातर नहीं, फिर भी जब-तब कविता श्रीकान्त के यहाँ शब्द नहीं अपशब्द है- क्षोभ और क्रोध से, कई बार अपने कारगर न हो पाने की लाचारी से, झुँझलाहट और नफ़रत से उपजा और बिंधा हुआ अपशब्द। विफलता, नाराज़गी और गाली के कवि होने के साथ ही साथ श्रीकान्त ऐसे कवि भी हैं जिन्होंने अपनी नफ़रत कविता से बाहर रखने या छिपाने की कोशिश नहीं की। बल्कि अन्य भावों की तरह नफ़रत को भी अपनी कविता में जगह दी। यह थोड़े हिम्मत का काम है। यह कविता की जातीय परम्परा को अपदस्थ और उसमें तोड़-फोड़ करना है। दिलचस्प यह है कि यह तोड़-फोड़ श्रीकान्त कविता के अपने तत्वों का उपयोग करके करते हैं। वे ही थे जिन्होंने तुकों का इस्तेमाल संगति या समरसता जताने के लिए नहीं, विसंगति और विरसता व्यक्त करने के लिए किया।

श्रीकान्त वर्मा मुक्तिबोध को अपना गुरु मानते थे – उनका सम्बन्ध लम्बा और जटिल था। मुक्तिबोध दिल्ली आने के बाद उनकी सामाजिक आकांक्षाओं को सन्देह की नज़र से देखते थे और श्रीकान्त की कविता में उधर बढ़ रहा निषेध उन्हें निम्न मध्यवर्गीय सिनिसिज्म जान पड़ता था। मुक्तिबोध को जीवन छोटा मिला जिसमें उन्होंने अपनी अभिव्यक्ति के  लिए लम्बी कविता लिखने का कठिन और अलोकप्रिय माध्यम चुना। उन्हें अपने एक बड़े कवि होने का ज़रा भी अहसास नहीं था। जो कुछ लोग उन्हें यह आश्वस्त कराने में विफल रहे लेकिन ऐसा करते रहने से कभी विरत नहीं हुए उनमें श्रीकान्त जी एक थे। इसकी कुछ लम्बी पड़ताल होना बाकी है कि कैसे श्रीकान्त जी ने अज्ञेय के उस समय अविजेय लगने वाले वर्चस्व के रहते मुक्तिबोध और शमशेर की पताकाएँ फहराने की चेष्टा की। इसका एक दुष्परिणाम आगे जाकर भले यह हुआ हो कि अज्ञेय और मुक्तिबोध, अपने गहरे साहचर्य के बावजूद, परस्पर शत्रु कवि मान लिये गये और यह रूढ़ि हिन्दी में आज तक अडिग बनी हुई है। लेकिन इसमें शक नहीं कि मुक्तिबोध को उनके योग्य मान्यता मिले, इसका लगातार प्रयत्न करने वालों में श्रीकान्त जी थे। उन्होंने मुक्तिबोध को दिल्ली लाने का प्रयत्न भी किया जैसा कि नेमि जी ने किया था। मुक्तिबोध एक तरह से ज़िन्दगी भर हिन्दी के मुख्य अंचल के हाशिये पर भौतिक रूप से रहे-बिल्कुल अन्त में दिल्ली आए तो अचेत और यहीं दिवंगत हुए। इसमें भी एक विडम्बना थी कि जो शहर श्रीकान्त जी की रणभूमि रहा वह मुक्तिबोध की मृत्युभूमि बना।

मुक्तिबोध का कोई भी कविता-संग्रह उनके जीते जी प्रकाशित नहीं हो पाया, यह आधुनिक हिन्दी के सबसे दु:खद प्रसंगों में से है। हमलोग लगातार कोशिश करते रहे थे। सागर में एक प्रकाशक को मनाया गया था और उसने कुछ रुपये पेशगी मुक्तिबोध को भेज भी दिये थे लेकिन उन्होंने इस आधार पर पाण्डुलिपि नहीं दी कि छोटा प्रकाशक है, उनका संग्रह छापकर डूब जाएगा। सागर से निकलने वाले त्रैमासिक (जो कहने भर को त्रैमासिक था क्योंकि उसके दो बरसों में कुल दो अंक निकल पाये) ‘समवेत’ का एक पूरा अंक मुक्तिबोध के कविता-संग्रह के रूप में छापने का इरादा श्रीकान्त जी की सक्रिय सहमति से बना, पर उस पर भी मुक्तिबोध राजी नहीं हुए।

मुक्तिबोध की मरणान्तक बीमारी की ख़बर जब दिल्ली आयी, मैं एम.ए. करने के बाद दयालसिंह कालेज में अध्यापक हो गया था। निजामुद्दीन मोहल्ले में, जो कालेज के नज़दीक था, एक कमरे का मकान किराये पर लेकर रहता था। तब तक भारतीय ज्ञानपीठ के दरियागंज स्थित कार्यालय में हमलोग एक साहित्य-गोष्ठी चलाने लगे थे जिसमें दिल्ली के कई लेखक भाग लेते थे। उसकी एक गोष्ठी में चर्चा हुई और हमलोग यह तय कर पाये कि मुक्तिबोध का कविता-संग्रह ज्ञानपीठ से निकलवाने की कोशिश करें… ज्ञानपीठ के निदेशक लक्ष्मीचन्द्र जैन से बात करने की ज़िम्मेदारी नेमि जी और प्रभाकर माचवे की थी। इस बीच पोलिश आनेष्का सोनी के पास मुक्तिबोध जी ने अपनी लम्बी कविता ‘आशंका के द्वीप अँधेरे में’ भेजी। एक गोष्ठी में उसका पाठ किया गया-कुछ श्रीकान्त जी ने और उनका गला ठीक न होने से बाक़ी और बड़ा हिस्सा मैंने। सभी उसके रेंज, अन्धकारमयता और सघनता से अभिभूत हुए। इस बीच ज्ञानपीठ ‘एक साहित्यिक की डायरी’ और मुक्तिबोध जी का कविता-संग्रह छापने को राजी हो गया। मुझे गर्मी की छुट्टियों में घर सागर जाना था। मैं अनुबन्ध पत्र लेकर वहाँ से भोपाल गया जहाँ तब तक मुक्तिबोध अपने उपचार के लिए मध्य प्रदेश सरकार के द्वारा लाये जा चुके थे। उन्होंने जिस अनुबन्ध पर दस्तखत किये, वह भी हमेशा के लिए अचेत होने के  चार-पाँच दिनों पहले। उसमें संग्रह का नाम श्रीकान्त जी की हस्तलिपि में ‘सहर्ष स्वीकारा है’ लिखा था। मुक्तिबोध की हालत की गिरावट देखकर मैं बहुत उद्विग्न था। दिल्ली लौटकर हाल श्रीकान्त जी को बताया। हमलोगों ने तय किया कि मुक्तिबोध को दिल्ली लाना चाहिए, एम्स में। लेखकों का एक प्रतिनिधि मण्डल बच्चन जी के नेतृत्व में तब के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री से मिला जिनसे मुलाकात रघुवीर सहाय ने तय करायी थी क्योंकि वे तब ‘नवभारत टाइम्स’ के विशेष संवाददाता थे। शास्त्री जी ने हमारा आग्रह तुरन्त मान लिया।

थोड़े दिन बाद हिन्दी लेखकों का एक बड़ा दल और नेमि जी का परिवार भी दिल्ली स्टेशन पर मुक्तिबोध की प्रतीक्षा करते हुए जमा था। माचवे जी ने श्रीकान्त जी, नेमि जी, गिरिजाकुमार माथुर आदि को साथ देखकर, अप्रासंगिक कुछ कहने की अपनी अदम्य प्रतिभा के अनुरूप, कहा कि हम सभी मध्य प्रदेश के हैं। श्रीकान्त जी ने तुरन्त उत्तर दिया- ‘माचवे जी, आप होंगे मध्य प्रदेश के, मैं तो आजकल आल इण्डिया में हूँ।’

मुक्तिबोध के एम्स में भरती होने के बाद हम सभी की वहाँ बारी-बारी से हाजिरी लगती थी-अक्सर शाम को कई लेखक जमा होते थे। श्रीकान्त जी ने इस बार सुनिश्चित किया था कि उनकी हालत के बारे में खबरें बराबर निकलती रहें। यही नहीं, वे मुक्तिबोध को देखने लोहिया जी आदि को भी अस्पताल लाते रहे। वे दिन थे जब शमशेर एक दुतही बेंच पर मुक्तिबोध के कमरे में सो जाते थे क्योंकि एक बिस्तर पर अचेत मुक्तिबोध लेटे रहते थे और दूसरे पर उनकी पत्नी। एक विचित्र संयोग से श्रीकान्त उस शाम एम्स नहीं आ पाये और हम कहीं उन्हें ट्रेस नहीं कर पाये जब मुक्तिबोध की मृत्यु 11 सितम्बर, 1964 को रात में लेकिन वे जैसे ही एम्स पहुँचे उन्होंने मुझे पीटीआई के दफ्तर रवाना किया ताकि खबर सब जगह दी जा सके।

इस बीच मुक्तिबोध के कविता-संग्रह की पाण्डुलिपि तैयार होती रही थी। मेरे आग्रह पर कि मुक्तिबोध की कविता हर्ष और स्वीकार की कविता नहीं है और इसलिए उनके संग्रह का नाम ‘सहर्ष स्वीकारा है’ अनुपयुक्त होगा, श्रीकान्त जी ने संग्रह का नाम बदलकर ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ करने पर सहमति दी। नेमि जी की मदद से मुक्तिबोध की हस्तलिपि को ठीक से पढ़कर हमने पाण्डुलिपि तैयार की। जब पुस्तक प्रकाशित हुई तो मुझे यह देखकर धक्का सा लगा कि उसमें श्रीकान्त वर्मा का नाम सम्पादक के रूप में था। संग्रह के सम्पादक होने की कोई बात ही कभी नहीं उठी थी। अगर होना ही था तो उसके सम्पादन में नेमि जी और मेरी भी भूमिका थी। बल्कि उसकी कविताओं का क्रम तो मैंने ही तय किया था: ‘भूल-गलती’ से शुरू कर ‘अँधेरे में’ से समाप्त करने का। कई बार मेरा ध्यान इस विडम्बना की ओर जाता रहा है कि जिस आपात काल का मुक्तिबोध ने अपनी विलक्षण प्रतिभा से पूर्वाभास कर मानो ‘अँधेरे में’ कविता लिखी थी, वह जब सचमुच इस देश में आया तो उसके पक्ष में खड़े होने वालों में श्रीकान्त वर्मा भी थे। लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि किसी चूक को पैमाना नहीं बनाया जा सकता और न ही उसके आधार पर किसी की उपलब्धि को नकारा जा सकता है। गलत राजनीति के बावजूद सच्ची और महान कविता लिखने वालों की इतिहास में कमी नहीं है। श्रीकान्त वर्मा की कविता उनकी चूकों और सत्ता-कामना का अतिक्रमण करती है और उसमें ऐसा कुछ है जो इनसे प्रतिहत और उजला बना रहता है।
अज्ञेय के साथ श्रीकान्त जी के सम्बन्ध कभी बहुत सहज नहीं रहे। एक तो उन्होंने बहुत खुले तौर पर अज्ञेय के वर्चस्व को चुनौती देते हुए मुक्तिबोध और शमशेर को प्रोजेक्ट किया था। वे उनलोगों में से थे जो अज्ञेय के काव्यशास्त्र से अलग और शायद उसके विरुद्ध एक दूसरा काव्यशास्त्र गढ़ने की चेष्टा कर रहे थे। अज्ञेय के सम्पादन में निकलने वाले साप्ताहिक ‘दिनमान’ में श्रीकान्त जी विवश होकर ही गये थे, हालाँकि उनके व्यावसायिक गुणों का अज्ञेय ने सम्मान किया और वे उन्हीं विषयों पर लिखते रहे जिनके कि वे विशेषज्ञ थे। स्वयं अज्ञेय के प्रति श्रीकान्त जी ने आदर या सम्मान निजी या सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने में कभी कोताही नहीं की।

एक शाम 1985 में उनके सफदरजंग लेन स्थित बँगले के पीछे के लॉन पर एक बड़ी पार्टी थी जो कि मैक्सिकन कवि आक्तावियो पाज़ के सम्मान में श्रीकान्त जी ने आयोजित की थी। पाज़ से उनका परिचय पुराना था, जब वे भारत में मैक्सिको के राजदूत थे और स्वामीनाथन जैसे चित्रकार से उनकी मित्रता थी जो कि श्रीकान्त जी के भी गहरे मित्र थे। उस शाम हम सभी वहाँ थे। पता नहीं कैसे यह तय हुआ कि पाज़, अज्ञेय और श्रीकान्त मिलकर एक कविता लिखेंगे। आठ बन्दों की यह संयुक्त कविता तीनों कवियों ने अलग-अलग बन्द लिखकर पूरी की।

शुरू में रघुवीर सहाय अज्ञेय के निकट थे- उनके साथ ‘प्रतीक’ के सम्पादन में सहयोगी रह चुके थे। वे ‘दूसरा सप्तक’ के कवि थे और उनकी पहली पुस्तक की भूमिका अज्ञेय ने ही लिखी थी। लगभग समवयसी और सहकर्मी होने के कारण रघुवीर सहाय, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना और श्रीकान्त वर्मा के बीच कुछ स्पर्धाभाव, कुछ रकाबत जैसी थी। रघुवीर जी और श्रीकान्त जी में कुछ ज्यादा लगती थी। रघुवीर जी की सामाजिक आकांक्षा श्रीकान्त जी से कम रही हो, ऐसा कम-से-कम मुझे कभी सन्देह नहीं हुआ। कौन कितना कर पाया यह अलग बात है। बाद में दिल्ली में उनके बीच संवाद प्राय: बन्द सा हो गया था। वे कई बार तो महीनों बाद एक-दूसरे से भारत भवन के किसी आयोजन में ही मिलते थे। मिलने पर एक-दूसरे के स्वास्थ्य के बारे में उनमें लम्बी बातचीत होती थी जिनमें ब्लड प्रेशर आदि का जिक्र होता और अक्सर कुछ नयी दवाइयों का मिलान भी।

हरिशंकर परसाई से श्रीकान्त जी का सम्बन्ध बहुत पुराना था। दिल्ली आने पर परसाई जी अक्सर श्रीकान्त जी के साथ ही ठहरते थे। परसाई विख्यात सामाजिक टिप्पणीकार और व्यंग्यकार थे। उनकी राजनीति और सत्ता की अपनी समझ थी। वामपन्थी होते हुए भी उनका कांग्रेस से अच्छा सम्बन्ध था। एक वक्त ऐसा भी आया कि ये दोनों ही राज्यसभा के सदस्य होना चाहते थे। हुए तो श्रीकान्त वर्मा ही।

श्रीकान्त वर्मा हिन्दी के पहले लेखक थे जिनके समकालीन चित्रकारों में से कई के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध बने और जिन पर उन्होंने सूक्ष्मतापूर्वक लिखा भी। उनमें रामकुमार, मक़बूल फ़िदा हुसैन, जगदीश स्वामीनाथन और हिम्मत शाह प्रमुख थे। रामकुमार के गोल बाज़ार स्थित स्टूडियो में तो हमलोगों ने कई बार फर्श पर अखबार बिछा कर और कागज़ की पुड़ियों से नमकीन निकालकर खाते हुए रसरंजन किया था। श्रीकान्त जी ने ही आधुनिक भारतीय कला पर गम्भीरता और समझ के साथ लिखने की हिन्दी में शुरुआत की थी-कला के लिए नये मुहावरे की खोज भी उन्होंने की। पर यह भी हमेशा स्पष्ट रहा कि वह कवि की लिखी कलालोचना है।

हमने जब भोपाल से ‘पूर्वग्रह’ निकाला तो शुरू से ही श्रीकान्त जी उसके साथ रहे और हमलोग मध्य प्रदेश में जो सांस्कृतिक पहल कर रहे थे, उसे उनका अचूक और उदार समर्थन मिलता रहा। कई बार ऐसा लगा कि कांग्रेसी सरकार होते हुए भी कुछ हस्तक्षेप हो सकता है या कि कोई गड़बड़ी पेश आ सकती है, तो श्रीकान्त जी ने अपनी हैसियत और कद का प्रयोग कर उसे रोकने-बरकाने में मदद की। वे भारत भवन के पहले न्यासियों में से थे। उस पर जब भी संकट आया उन्होंने अपनी शक्ति उसकी रक्षा में लगायी।

भारत भवन में भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् के सहयोग से आयोजित पहले विश्व कविता समारोह को लेकर हिन्दी में बड़ा विवाद मचा था-बहुत सारे लेखकों और संगठनों ने उसे भोपाल गैस काण्ड के बाद होने के कारण आपत्ति की थी। हमारा रुख यह था कि कविता एक गम्भीर और उत्तरदायी विधा है, निरा मनोरंजन नहीं और उसे स्थगित नहीं किया जाना चाहिए। उस समय श्रीकान्त जी ने, शायद लेखकीय दबाव में झुककर, यह दुरभिसन्धि कर ली कि समारोह दिल्ली में ही हो, भोपाल में नहीं। इससे बड़ी बदमजगी हमलोगों के बीच हुई। श्रीमती पुपुल जयकर के हस्तक्षेप से समारोह में आए अधिकांश कवि बाद में भारत भवन में भी अलबत्ता आए। मैंने बहुत आहत महसूस किया और श्रीकान्त जी से बातचीत तक बन्द हो गयी। कुछ महीनों बाद एक दिन श्रीकान्त जी का फ़ोन आया यह बताते हुए कि उनके शहर बिलासपुर में उनका नागरिक अभिनंदन हो रहा है और एक गोष्ठी में मुझे प्रमुखता से भाग लेना है। मैं गया क्योंकि उन्होंने अपने अनुरोध में मुझ छोटे से क्षमा करने की बात भी कही थी। नागरिक अभिनंदन में पहले प्रीतीश नन्दी को मुख्य वक्ता के रूप में बोलना था। वे नहीं आ पाये तो ऐन वक़्त पर श्रीकान्त जी ने मुझसे कहा। मंच पर मध्य प्रदेश का आधा मन्त्रिमण्डल, मुख्यमन्त्री और स्पीकर बैठे थे। मेयर ने स्वागत भाषण दिया। मैंने वक्तव्य दिया, मुख्यमन्त्री बोले और श्रीकान्त जी ने कुछ कहा। मैं उन दिनों शिक्षा सचिव था और मंच पर मेरे मन्त्री भी विराजमान थे। सभी प्रशस्ति में, ‘अपनी माटी के पूत’ के बारे में बोलना चाहते थे पर श्रीकान्त जी ने तय किया कि एक राजनेता और एक लेखक बस दो बोलेंगे। इस घटना से शिक्षामन्त्री मुझसे और खिसिया गये और उन्होंने मुझे शिक्षा विभाग से हटाने की अपनी मुहिम तेज़ कर दी।
एक बार श्रीकान्त जी किसी राजनीतिक काम से भोपाल आए। मुझे पता नहीं था। यकायक उनका फ़ोन आया। कहा कि मैं उनके होटल आ जाऊँ…कुछ गपशप और रसरंजन के लिए। मैं उनके कमरे पर जब पहुँचा तो देखा कि वनमन्त्री मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं क्योंकि श्रीकान्त जी को तभी मुख्यमन्त्री ने बुला लिया था और वे अपने राजनीतिक-मित्र और अनुचर वनमन्त्री को मेरी देखभाल करने के लिए छोड़ गये थे। मैं राज्य शासन का एक सचिव था। बहुत अटपटी स्थिति थी। मन्त्री महोदय मुझसे कुछ न कुछ लेने की मिन्नत करते रहे।

लगभग डेढ़ घण्टे बाद श्रीकान्त जी आए और आते ही बोले कि अरे अभी तक सोडा-बरफ क्यों नहीं मँगवाया! मन्त्री ने सफाई दी। श्रीकान्त जी उनसे बोले कि अब आप चलिए और हम दो घण्टे बाद डिनर पर आपके यहाँ आएँगे। हम रात एक बजे उनके बँगले पहुँचे तो वे दरवाजे पर खड़े थे।
बाद में एक बार दिल्ली में उनके निवास पर बिना पूर्वसूचना के पहुँचा तो वे बरामदे में कुछ राजनेताओं से घिरे बैठे थे जिनमें कुछ शायद बिहार के मन्त्री आदि थे। अपने बेटे को उन्होंने मुझे अन्दर यथास्थान बैठाने और सामग्री आदि लगाने का निर्देश दिया। दसेक मिनट में ही वे अपनी राजनीतिक मजलिस बरखास्त कर अन्दर आ गये। मुझे याद है कि उस दिन उन्होंने अपने पीने के बारे में एक नुस्खा भी बताया था। बोले दो-तीन तो मित्रों के साथ पी लेता हूँ, फिर अगले दो थोड़ा संकोच से और आख़िरी अपने से, छुपाकर।
इस बात पर कम ध्यान गया है कि रघुवीर सहाय, कुँवरनारायण और श्रीकान्त वर्मा ने कुछ बेहतरीन कहानियाँ लिखी हैं। उसमें गल्प की प्रकृति, भाषा की चुस्ती और अभिव्यक्ति की मितव्ययिता अपनी अलग जगह रखती है। आलोचना हो या कहानी, श्रीकान्त वर्मा का गद्य कसा हुआ गद्य है। आलोचना में तो उनका विट देखने लायक है। एक बार दिल्ली विश्वविद्यालय में डॉ. नगेन्द्र द्वारा आयोजित आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की अध्यक्षता में हुई एक संगोष्ठी में उन्होंने कविता पर टिप्पणी करते हुए कहा था— ‘यह कविता आलोचना के कुछ शब्दों को लेकर खड़ी हुई है, बल्कि कहना चाहिए कि पड़ी हुई है।’
श्रीकान्त वर्मा के निधन को हुए दो दशक बीत चुके। हमने यानी मैंने और केदारनाथ सिंह ने स्लोन केटरिंग अस्पताल में वह कमरा देखा था जिसमें वे बीमार थे, अपनी मृत्यु के बहुत निकट। बिलासपुर के एक कस्बाई व्यक्ति की मृत्यु न्यूयॉर्क के एक धनाढ्य अस्पताल में हुई। उन्हें अपना समय ‘छीनाझपटी’ का लगा था जिसके सारे नायक अन्ततः ‘जय-पराजय’ दोनों से उबे हुए थे—जहाँ ‘सब कुछ हो चुका है’ और फिर भी सवाल बना रहता है: ‘क्या होना चाहते हो?’
श्रीकान्त वर्मा की सत्ता की राजनीति से निकटता और उसमें गहरी अलिप्ति से उनके साहित्य को लेकर गहरा सन्देह उपजना स्वाभाविक है। लेकिन इससे इस आसान नतीजे पर पहुँच जाना सरल दिमागी निष्कर्ष है कि उन्होंने अपने साहित्य में भी सत्ता-भक्ति की या समझौता किया या कि अपनी बुनियादी नाराज़गी को मन्द-कुन्द कर दिया। जीवन की तरह साहित्य भी अनन्त सम्भावनाओं का क्षेत्र है। अगर इस सीधी सचाई को हम न भूलें और श्रीकान्त जी की बाद की रचनाओं को ध्यान से पढ़ें तो स्पष्ट होगा कि उनकी नाराज़गी अन्त में काल के समक्ष, इतिहास की गति के रूबरू एक दूसरे क़िस्म की आध्यात्मिक छटपटाहट में बदल जाती है। उसमें लाचार स्वीकार उतना नहीं जितना अपनी अर्थात् मनुष्य मात्र की स्थिति को समझने का एक निर्मम प्रयत्न है। इन रचनाओं में इतिहास, गाथाएँ, मिथक, काल, मृत्यु आदि कविता की काया में प्रवेश करते हैं। कवि कहीं भी किसी सरलीकृत आध्यात्मिक समाधान की ओर न तो इशारा करता है, न ही उसका सहारा लेता है। उसका नरक समकालीन जीवन से इतिहास तक फैल जाता है। (हिन्दी कविता में यह नरक कई अर्थों में अनूठा है—वह युवा से अधेड़ होता नरक है, वह जितना दूसरों ने गढ़ा है उतना ही स्वयं कवि ने। वह नरक है जो क्रोध और शब्दों से, नफरत और युक्तियों से, सत्ता और घृणा से, क्रूरता और अपशब्द से बना है। वह कुछ कुछ काफ़्काई नरक है क्योंकि वह जितना सत्ता का है उतना भाषा का भी, जितना राजनीति का है उतना विचार का भी। आप इनसे सहमत हों या असहमत, आप उसमें कितनी ही फाँकें क्यों न पायें, यह नरक श्रीकान्त वर्मा ने पूरी ईमानदारी से खोजा-बनाया था।) वे हमेशा नरक के कवि रहेंगे जो हमें उजालों के झूठ, उम्मीदों के फरेब और सपनों के मायाजाल से सतर्क करते रहेंगे ताकि हम अपने दुःस्वप्न, नियति और नश्वता को खुली आँखों देख और झेल सकने का साहस जुटा पाएँ। ऐसा नरक जो उतनी ही ईमानदारी से उन्होंने दूसरों पर थोपा नहीं। बीसवीं शताब्दी का अँधेरा जिन हिन्दी लेखकों में है, उनमें वह श्रीकान्त वर्मा के यहाँ शायद सबसे गाढ़ा और बेराहत है।



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