भाखै अकथ कथा बिरतांत-2: मृणाल पाण्डे

प्रसिद्ध लेखिका मृणाल पाण्डे अपनी आत्मकहानी लिख रही हैं। आज उसकी दूसरी किस्त पढ़िए। पहली किस्त की शुरुआत उन्होंने अपनी माँ से की थी। उनकी माँ गौरा पंत ‘शिवानी’ की आज जयंती है। आज मृणाल जी की आत्मकहानी की दूसरी किस्त पढ़िए। आत्मकहानी में इस बार कथा है अल्मोड़ा की, वहाँ उनके पुरखों के बसने की, पंतों, की पाण्डे की, जोशियों की। हम सब जानते हैं हमारी कहानी में हमारे पुरखों का भी अंश होता है। आइये मृणाल पाण्डे की आत्मकहानी की दूसरी कड़ी पढ़ते हैं- मॉडरेटर

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बनना एक ठो कथा मल्लाह:

ऊंची उम्र की कठोर शिला पर बैठ कर देखो तो लगता है किसी सुदूर हिमनद से बूंद बूंद टपकती आदिम नदी की धार जैसा ही निरंतर बहता है हमारा जिया समय। और यह बहाव हमें सभी दोस्तों, दुश्मनों, नीम दुश्मनों के साथ निरंतर एक अनदेखे अनजाने समुद्र में विलीन होने को ले रहा है। हम चाहें तो भी रुक नहीं सकते। हम सबके पुरखे भी तो यहीं समाहित होते रहे हैं। ‘जम के दूत बड़े मजबूत, ये जम का बहुत झमेला…’

नदी का जल हर घाट पर हमेशा एक जैसा नहीं, नित्यनूतन होता चलता है। आज अभी जो जल हम घाट से बहता देख रहे हैं, घाट वही होते हुए भी कल की धार वैसी ही नहीं होगी। यह सनातन नियम ही जीवन का इकलौता अकाट्य सच है।

भवभूति बताते हैं शंबूकवध के बाद एक बार अयोध्या नरेश राम भी जब लक्ष्मण के साथ पंचवटी दोबारा गये तो उनको तक वह जगह चीन्हने में कठिनाई हुई जहाँ कभी वे और सीता तथा लक्ष्मण के साथ बडे सुख और सादगी से राजशाही के झमेलों से दूर से बरसों तक रहे थे। राम लक्ष्मण से कहते हैं, ‘जहाँ तब झरना था, अब नदी है, जहां जंगल था वहाँ बसासत है, जहां कभी बसासत थी, वहाँ घना जंगल। हे भाई कोई चीज़ नहीं बदली तो वह है  पहाड़।’

हिमालय पर उपमासम्राट् कालिदास कह गये हैं कि दुनिया का वह इकलौता मानदंड है जो कभी नहीं बदलता। ‘स्थित: पृथिव्याम् इव मानदंड’। पर भैया कालिदास अब जब जब हिमालय की ओर घर जाती हूँ पाती हूँ कि हिमालय भी बदल रहा है। उसकी कई हिम से ढँकी चोटियाँ जो हमने चाँदनी रातों में  देवियों जैसी उजली खडी देखीं थीं, बर्फ पिघलने से काली डरावनी आकृतियाँ बनती नज़र आती है। हिमनदियाँ पीछे खिसक रही हैं। नई स्याह झीलें बन रही हैं जो कभी भी तटबंध तोड कर पहाड़, जंगल सबको हिमालय की कोख से बार बार नया भूगोल गढने पर उतारू हैं।

इस बदल रहे हिमालय को हाज़िर-नाज़िर जान कर ही मैंने लिखा जो लिखा और वही अपनी विलक्षण मनमौजी चाल के साथ मेरे एकाकी पलों में यादों में डुबकी लगाने और उबरने का साक्षी है। लगातार हिलडुल रही हिमशीतल मन की गहराई से निकाल कर जो ला सकी, यहाँ बस उतना ही दर्ज करती हूँ। न कम न बेशी। शेष सब भूल चूक लेनी देनी।

यादों की गहराई आज-है-कल नहीं। गहराई से कई बार डुबकी लगा कर टुकड़ों में निकाली गई लेखक की आत्मकथा सोलह आने सत्यकथा नहीं हो सकती। बस यही कर के जानें कि अपनी कथा लिखते समय हर लेखक एक बातून मल्लाह है जो आपको समय की नदी के इस तट से उस तट तक ले जा रहा है। कई बार कथावाचन में प्रासंगिकता के तकाज़ों से मुंह फिरा कर वह कभी अचानक आपसे सीधे मुखामुखी संलाप करता है। तो कभी किसी और ही कथावाचक के मुखरस में भींगी अंतर्कथाओं, कभी कहीं सुनी अनदेखी घटनाओं को भी अपने बेलबूटों से सजा कर अपने अनुभव के नाम से पेश कर देता है। मेरे गुणी अग्रज कवि बनारसीदास कह भी गये कि जिये जीवन की हर आत्मकथा को अर्धकथानक मानना ही सही होगा। यह भी कहते हैं जब लेखन के अकेले निर्जन द्वीप में तटस्थ बैठे उस्ताद महाकवि वेद व्यास के महाकाव्य का भीषण अंतर्विरोधों और क्षेपकोंवाला लंबा डिक्टेशन खत्म हुआ तो उनके चकराये शिष्य एवं सेक्रेटरी गणेश ने भी पूछा था, ‘बाबा, आपने हर पक्ष की नैतिक हार पर समाप्त हुए इस युद्ध का नाम ‘जय’ क्यों? यह विशाल ग्रंथ तो आपने मुझसे बिन रुके लिखवाया, इसका असली मरम कौन बूझता है?’

वेद व्यास या तो हँसे होंगे, या उनके हृदय से दीर्घ लेखकीय नि:श्वास निकला होगा: ‘‘अहं वेद्मि, शुकोवेत्ति, संजयो वेत्ति वा न वा।’’ जय नामके इस वृत्त का रहस्य मैं समझता हूं, संसारत्यागी शुकदेव मुनि समझते हैं, पर वह नैरेटर संजय, जिसने अंधे धृतराष्ट्र को यह सारा अकथ वृत्तांत सुनाया, वह इसे कितना समझ सका, समझा भी या नहीं, क्या पता? 18वीं सदी के जाने-माने रचनाकार नेमत खान उर्फ ‘सदारंग’, भी आज से तीन सौ बरस पहले राग देसी में इसी सचाई को बंदिश बना गये: ‘‘सांची कहत हूँ ‘सदारंग’ सब नदी नाव संजोग,’’ 

पर इससे पहले कि ओटीटी सीरियलों और सोशल मीडिया पर पले नये पाठक गल्पकार को गप्पी कहें, खुदै सोचें कि आभासी ज़िंदगी की बोरियत तज कर की जा रही इस लंबी धारा की एडवेंचरस यात्रा में मुए मल्लाह अपनी डरी सहमी सवारियों का मनोरंजन न करें तो वे क्या इतनी गहरी नदिया में ग्लोबल वार्मिंग के बीच साहित्य की खड़खड़िया पुरानी नैया में बार-बार बैठने को राज़ी होंगे? सो हम कथा मल्लाह कभी-कभार उनको भी कथा में सहज शामिल कर हँसा देते हैं। कुछेक बिसरे हुए चेहरे, अधभूले प्रसंग अचानक दिला देते हैं, और कई यादें क्यों छूट गईं? ऐसे सवाल भी मनों में उठा देते हैं। सवालों के सही जवाब जाने तो यक्ष मन ही जाने, पर हमारा घाट आ गया भाइयो बहनो! निकालो हमारा भाड़ा और चलते बनो। फिर कभी मन करे तो दोबारा सवारी करने आ जाना।

इस अभिज्ञान के बाद जब जीवन पल छिन दूर अंत की तरफ बह चले, तो मल्लाह को गंगासागर के पास पहुंचती गंगा के विशाल पाट में दूर कहीं कृष्ण द्वैपायन व्यास का निर्जन द्वीप दिखने लगता है जहाँ महाकवि ने अपने समय और युद्ध की विभीषिका को जीते हुए उसे विडंबना भरा नाम दिया था: ‘जय’। और ऐसे बिंदु पर पहुंचते ही वह पाता है कि उस द्वीप में बाणभट्ट, हेरोडोटस, बनारसीदास, नज़ीर अकबराबादी, बाबा नागार्जुन, शरतचंद्र, अमृतलाल नागर, व्योमकेश दरवेश उर्फ हज़ारीप्रसाद द्विवेदी भी उसको टेरते हुए एक दिव्य मलंग आवारगी से नाच रहें हैं  ‘भाखै अकथ कथा बहु भांत, किया निरत पाय एकांत’!

सो सुनहु तात, जहाँ तक टोह पाई अल्मोड़ा अखबार तथा ‘शक्ति’ जैसे पत्रों के संस्थापक बद्रीनाथ पाँडे जी लिखित कुमाऊं का इतिहास, और 1916 में त्रिलोचन पंत द्वारा संकलित पंतों की वंशावली की दी जानकारियों के अनुसार मेरे पंत कुल का मुख्तसर इतिहास कुछ यूं दीखता है। संवत 1303 के आसपास एक घुमंतू (भारद्वाज गोत्रीय, त्रिप्रवर, शुक्ल यजुर्वेद की माध्यंदिन शाखाध्यायी) पं जयदत्त पंत सपरिवार कुमाऊं आये और यहीं के हो रहे। पंत दरअसल वह पदवी थी जो दक्षिण के जिस दरबार में वे काम करते थे, शायद वहाँ से उनको मिली। कोंकणस्थ महाराष्ट्रीय ब्राह्मणों के मूल कुलनाम तब गाँवों से जुड़े होते थे जैसे वरसईकर, अगरकर आदि। पहाड़ आकर जयद्त्त जी ने पदवी को ही उपनाम बनाया सो उनके साले साहिब दिनकर राव भी जो उनके साथ बद्रीनाथ धाम आये और पाराशर गोत्रीय थे, पंत कहलाये। इन दोनो से कुमाऊं में पंतों के कुल दो गोत्र चले। इसमें भारद्वाज गोत्रवाले ही बहुसंख्य थे। सगोत्रीय विवाह निषिद्ध होने से तय हुआ कि पंत कुल के लोग पाण्डे, जोशी, भट्ट जैसे संप्रदायों में ही विवाह संबंध करें पंत की शादी पंतों में नहीं होगी। यह क्रम 60 के दशक तक सर्वमान्य था।

लौटें जयद्त्त पंत पर। 1303 का समय वह समय था जब पश्चिम से उमड़ी इस्लामी हमलावर जत्थों की आँधी अचानक सदियों बाद पुराने उत्तरी भारत का राज समाज आमूलचूल बदल रही थी। पीढ़ियों से पूजा-पाठ पठन-पाठन से जीवनी कमानेवाले पुजारियों की जीविका की राह, चूँकि पुराने नये सारे मंदिर तोड़े जा रहे थे, इसलिए हमसे बहुत पहले बन जाती है। उनके दरबारी संरक्षकों के राज्य आक्रांताओं के फैलते साम्राज्य में शामिल हो रहे थे। नये नकोर धर्म इस्लाम का परचम उठाये इस तरह की हिंसक चुनौती के लिये उस समय के अधिकतर राजे रजवाड़े तैयार नहीं थे। ऐसे में जान माल और स्वधर्म की रक्षा के लिये ब्राह्मणों का एक महापलायन शुरू हुआ उस ओर जहाँ अब भी हिंदू राजाओं की शरण मिलनी संभव थी। कुछ गौड़ देश भागे, कुछ कन्नौज, कुछ सरयू पार कुछ सारस्वत क्षेत्र।

बदलते समय की करवट को भाँप कर कुछेक अन्य दुनियादार ब्राह्मणों की तरह जयदत्त पंत ने भी मैदानों की दुर्दशा देखने के बाद सपरिवार सह्याद्रि पहाड़ के पूर्व महाराष्ट्र के निकट हिंबरा प्रदेश से सुदूर बद्रीनाथ धाम की यात्रा पर हिमालय की जानिब चले जाने की ठान ली। सो परिवार सहित वे बद्रीनाथ धाम को रवाना हो गये। उस समय इलाके में कत्यूरी राजपूतों का शासन था। दर्शन के बाद जयदत्त पंत तत्कालीन कत्यूरी राजा से मिले और उनको धन्यवाद देते हुए उनके राजकुल के लिये कुछ चौंकानेवाली भविष्यवाणियाँ कर दीं। शायद इसलिये भी कि बाहर से इस बहुत कम आबादीवाले आदिवासी इलाके के राजा को लगे, कि उन जैसा पंडित राजकीय सलाह लेने देने के साथ उनकी निरक्षर प्रजा को साक्षर सुसंस्कृत बनाने में बहुत काम आ सकता है। तरकीब कारगर रही। पांडित्य से प्रभावित राजा ने जयदत्त पंत को तुरत जीवन-यापन के लिये उड्यारीमिल गाँव की जाथ (जागीर) दे कर अपना राजगुरू नियुक्त कर लिया। धीमे धीमे परिवार की जड़ें जमती गईं।

17वीं सदी तक, जब चंद राजाओं ने राजधानी अल्मोड़ा ले जाने का तय किया, ग्यारहवीं पीढी तक आते आते पंतों ने भी उपराड़ा, मल्लाकोट, बरसायत, छखाता, मालूंज और मलेरा के गाँव भी हासिल कर लिये। उनके जो मुहल्ले राजधानी अल्मोड़ा में बसे उनका नाम उनके गाँवों पर ही रखा गया। मेरे पिता के पिता अंबादत्त इन्हीं पंतों की मलारा शाखा की 24वीं पीढी से थे जो अल्मोड़ा  के ढुंगाधारा नामक मोहल्ले में बसी।  

अन्य प्रवासी ब्राह्मण कुलों में शाक्तों की बहुलता के बाद भी अधिकतर पंत शाकाहारी वैष्णव ही रहे। मेरी नानी लीलावती और मेरे श्वसुर की माँ भुवनेश्वरी दोनो अल्मोड़ा के जीवनपुर मोहल्ले के प्रतिष्ठित पंत घरानों की लडकियाँ थीं। दोनो के बीच अंत तक गहरा बहनापा कायम रहा। मेरी नानी का कहना था कि भुनि लली अपने नन्हें बेटे भैरव (मेरे श्वसुर) को बीमार पड़ने पर वे उनको छाती का दूध पिलवाने को घर के भरोसेमंद व्यक्ति की मार्फत अपनी ससुराल चंपानौला से नानी की गोद तक उनकी ससुराल कसून भिजवा देतीं थीं । ‘’तू जो बाद को इतना बडा आईसीएस अफसर बना, उसमें मेरे दूध का प्रताप भी कम नहीं!’’ मेरी परिहासरसिक नानी जब तब बब्बा से कहतीं और वे विनयशीलता से सर झुका कर मंद मंद मुस्कुरा कर मूक समर्थन कर देते। अल्मोड़ा में नानी के दबंग, प्रखर, नीर क्षीर विवेकी व्यक्तित्व का अपना आभा वलय था। और हर बार शहर आने पर नानी के दरबार में हाज़िरी लगाना हर रिश्तेदार का कर्तव्य था। कभी मेरे श्वसुर हँस कर मुझसे कहते भी, ‘’तुम्हारी नानी, हमारी मुन्नी दीदी हुईं। उनसे मिलना बद्रीनाथ धाम के दर्शन करने जैसा है। सब जानते हैं कि उनसे पहले समय लेकर फिर ठीक टाइम पर न पहुँचो तो उनके मंदिर के पट बंद मिलेंगे।’’ दबंग और तेजस्विनी नानी का अटूट स्नेह उन पर अंत तक रहा।

पाठकों को कुछ कुछ अंदाज़ हो चला होगा कि मेरे बचपन के कुमाऊं में प्रवासी पहाड़ी ब्राह्मणों, विशेषकर पंत, पाण्डे और जोशी खानदानों की दुनिया कितनी सीमित और अंतर्गुन्फित थी। बड़े बताते थे कि पहले शादी ब्याह के लिये सही कुल गोत्र का वर या वधू खोजने दूर देस बंगाल, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, काँगडा आदि से आये सभी विभिन्न ब्राह्मण स्वदेश जाने को बाध्य थे, जो बड़ा तकलीफदेह और खतरनाक था। मौजा सकनौली के पंडित परशुराम जोशी ने लिखा कि उनकी सुविधा के लिये चंद राजा रुद्रचंद के समय एक काउंसिल बैठी जिसने कुमाऊँ के तमाम ब्राह्मणों की सूची बना कर उनको तीन वर्गों में बांटा। वे पंत, पाण्डे और जोशी जो कुल प्रवर और ज्ञान के आधार पर उच्चतम साबित हुए सेना और दरबारी काम के उपयुक्त ठहराये गये। फिर आये वे जो कुछ मायनों में कमतर ठहरते थे। और कुछ जो लोकल थे और जिनका संबंध किसी बडे मान्य ब्राह्मण कुल प्रवरादि से नहीं पाया गया। पहले वर्ग के लोगों के एक बड़े भोज में उन सबने साथ बैठ कर खाया और अब से रोटी बेटी का संबंध परस्पर करने का फैसला लिया क्यों कि वे सभी औपचारिक लिस्ट में उच्चतम तथा आपस में शादी ब्याह करने के योग्य पाये गये।

अल्मोड़ा नगर राजा बालोचंद ने 16वीं सदी में बसाया। राजा के साथ धीमे-धीमे उनके विश्वस्त ब्राह्मण परिवार भी आने लगे। उनमें से एक थे गंगोली के वीर पुरुष पंत जो मूलत: मणिकोटी राजाओं के चाणक्यनुमा होम मिनिस्टर (दीवान) और खासे पैसेदार थे। बालोचंद ने साम-दाम-दंड-भेद से उनको फोड़ लिया और सेनापति बना कर रैका राजा हरिमल्ल का सीराकोट का किला फतह करने का दाय सौंपा। बडी कठिनाई से पाँचवें हमले में पुरुखू बाबा ने सीराकोट का किला फतेह कर राजा के परम विश्वस्त का दर्जा पाया। परिवार की बूढियों से सुनी उनकी जीत की मेरी प्रिय कथा कुछ कुछ चंद्रगुप्त मौर्य की किंवदंतियों सरीखी है। चौथी हार के बाध पुरखू बाबा ने जंगल में एक बुढिया के झोंपडे में पनाह ली। दादी ने उनको गर्म खीर परोसी और उनको फू: फू: करते खाते देख कर कहा : तूने न जानी खानी खीर, पुरखू पंत न ले पाया सीर (कोट का किला)। अरे बाबा, पत्ते पर सीधे बीच से नहीं चारों तरफ से खीर धीमे से खाई जाती है। और सुन सीरकोट की ताकत का राज़ है उसकी गुप्त पानी की धारा और जोहार से लगातार आता राशन। धारा के मुख पर और जोहार घाटी के गिर्द सेना का घेरा डाल दे और जीत ले किला!     

इस चतुर सेनापति का अंत दर्दनाक रहा। कहते हैं जब वे एक युद्ध और जीत कर लौट रहे थे तो रास्ते में देर रात गंगोल घतकौण गांव में लगाये के उनके डेरे से एक भेदिये ने उनका सर काट कर गढवाल में अपोज़िशन के राजा सुकालदेव को भेंट किया और इनाम इकराम पाया।

इति पुरुष पंत कथा।

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