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  • मेरी माँ, मेरी गैंगस्टर: निजी इतिहास में छिपा सामाजिक इतिहास

    अरुंधति रे की किताब प्रभात सिंह के अनुवाद में  ‘मेरी माँ, मेरी गैंगस्टर’ जब से प्रकाशित हुई है लगातार चर्चा में बनी हुई है और देश के अलग अलग हिस्सों में लोग इसको पढ़ रहे हैं, इसको पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे। राजकमल से प्रकाशित किताब पर यह टिप्पणी लिखी है प्रशान्त कुमार मिश्र ने। वे एक सुपरचित राजनीतिक विश्लेषक, वरिष्ठ पत्रकार और साहित्य के गंभीर अध्येता हैं। बिहार के मधुबनी में रहते हैं। आप उनकी लिखी यह टिप्पणी पढ़ें- मॉडरेटर

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    अरुंधति रॉय की मेरी माँ, मेरी गैंगस्टर को पढ़ते हुए सबसे पहले जिस भ्रम से बाहर निकलना पड़ता है, वह यह है कि यह सिर्फ एक माँ की कहानी है। यह माँ की कहानी जरूर है, लेकिन उससे कहीं अधिक यह उस बेटी की कहानी है जो अपनी माँ को याद करते हुए अपने भीतर के उस भूगोल में लौटती है, जहाँ प्रेम और भय, कृतज्ञता और क्रोध, स्मृति और अपराधबोध एक-दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते। यह एक ऐसी किताब है जिसमें निजी जीवन धीरे-धीरे सामाजिक इतिहास में बदलता जाता है और पारिवारिक स्मृति, भारतीय समाज की उन संरचनाओं का दस्तावेज बन जाती है जिनसे हम अक्सर अपने सबसे निजी संबंधों में भी मुक्त नहीं हो पाते।

    मूल पुस्तक Mother Mary Comes to Me 2025 में प्रकाशित हुई थी और हिंदी में प्रभात सिंह ने अनुवाद किया है। पुस्तक की शुरुआत ही एक मृत्यु से होती है। लेकिन यह मृत्यु अंत नहीं, स्मृति का आरंभ है। लगभग नवासी वर्ष की उम्र में माँ की मृत्यु के बाद रॉय पीछे लौटती हैं और अपने बचपन, अपनी माँ के संघर्ष, परिवार, शिक्षा, प्रेम, लेखन और अंततः अपनी सार्वजनिक राजनीतिक यात्रा को एक ही स्मृति-रेखा में देखने की कोशिश करती हैं। पुस्तक की मूल प्रेरणा भी यही है। लेखिका स्वीकार करती हैं कि माँ द्वारा छोड़े गए प्रेम और अपने हिस्से आए काँटों के बीच एक गहरी खाई है और इस खाई को पाटने के लिए उन्होंने यह किताब लिखी।

    यहीं से इस संस्मरण की सबसे बड़ी शक्ति और सबसे बड़ी जटिलता दोनों सामने आती हैं।

    माँ, जो आसरा भी है और तूफ़ान भी

    मेरी रॉय इस पुस्तक में किसी पारंपरिक भारतीय माँ की छवि में नहीं आतीं। वह न त्याग की मूर्ति हैं, न वात्सल्य की सरल प्रतिमा। वह असाधारण ऊर्जा, क्रोध, महत्वाकांक्षा, जिद, उदारता और निर्ममता से बनी हुई एक जटिल स्त्री हैं। रॉय उन्हें एक ऐसी महिला के रूप में याद करती हैं जिसने छोटे शहर के पितृसत्तात्मक और रूढ़िवादी समाज में अपने लिए जगह बनाई। उनकी माँ शिक्षक बनना चाहती थीं। विवाह और असम के चाय बागानों में पति के साथ जीवन ने उस आकांक्षा को दबा दिया था। पति की शराब की लत और वैवाहिक जीवन की विफलता के बाद वह अपने बच्चों के साथ एक अलग जीवन चुनती हैं। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद परिवार कलकत्ता और फिर ऊटी पहुँचता है, और पिता से संबंध लगभग पूरी तरह समाप्त हो जाता है।

    यहाँ रॉय की माँ की कहानी एक निजी विद्रोह से आगे बढ़कर स्त्री की आत्मनिर्णय की कहानी बन जाती है।

    लेकिन रॉय अपनी माँ को आदर्श नहीं बनातीं। यही इस पुस्तक की ईमानदारी है। वह माँ के भीतर की क्रूरता, अस्थिरता, नियंत्रण की इच्छा और अपने बच्चों के साथ उनके जटिल व्यवहार को भी दर्ज करती हैं। बचपन में माँ के प्रति उनका प्रेम भय से मिला हुआ है। वयस्क होने पर वह उसी माँ को एक दूसरी स्त्री की तरह देखने की कोशिश करती हैं। वह लिखती हैं कि बचपन में उन्होंने माँ को बिना शर्त प्रेम किया, जबकि बड़ी होने पर उन्होंने समझ और सुरक्षित दूरी के साथ प्रेम करने की कोशिश की।

    इस अंतर को समझना पुस्तक की कुंजी है। रॉय माँ को क्षमा करने नहीं बैठी हैं। वह उन्हें समझने बैठी हैं। दोनों काम एक नहीं हैं।

    निजी इतिहास में छिपा सामाजिक इतिहास

    पुस्तक की उल्लेखनीय विशेषता यह है कि इसमें परिवार कभी सिर्फ परिवार नहीं रहता। मेरी रॉय का जीवन भारतीय समाज की कई संरचनात्मक विसंगतियों को सामने लाता है। एक प्रसंग में बेटी के संपत्ति-अधिकार का सवाल सामने आता है। त्रावणकोर ईसाई उत्तराधिकार कानून के आधार पर यह कहा जाता है कि बेटियों का पिता की संपत्ति पर अधिकार नहीं है। परिवार के पास रहने के लिए कोई दूसरा ठिकाना नहीं, फिर भी कानून और सामाजिक व्यवस्था उन्हें बेदखली की ओर धकेलती है।

    यही वह बिंदु है जहाँ मेरी माँ, मेरी गैंगस्टर सिर्फ आत्मकथा नहीं रह जाती। यह उस भारत की कहानी बन जाती है जिसमें धर्म, परिवार, संपत्ति और पितृसत्ता एक-दूसरे को मजबूत करते हैं।

    रॉय के लिए माँ का संघर्ष इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उनकी माँ ने उस व्यवस्था को सिर्फ वैचारिक स्तर पर चुनौती नहीं दी, उसे अपने जीवन में चुनौती दी। स्कूल बनाना, आर्थिक आत्मनिर्भरता हासिल करना और सामाजिक प्रतिष्ठा अर्जित करना उनके लिए अस्तित्व के औजार थे। पुस्तक में उनकी माँ की शिक्षकीय आकांक्षा और बाद का स्कूल-निर्माण इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। उनकी मृत्यु के बाद विद्यार्थियों और उनसे प्रभावित लोगों की प्रतिक्रियाओं का उल्लेख भी बताता है कि उनकी निजी जिंदगी का सामाजिक प्रभाव कितना व्यापक था।

    द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ के पीछे का घर

    रॉय की पहली प्रसिद्ध कृति The God of Small Things को उनके निजी जीवन से अलग करके पढ़ना संभव है, लेकिन इस संस्मरण के बाद ऐसा करना अधिक कठिन हो जाता है। पुस्तक खुद इस संबंध को खोलती है। माँ ने उपन्यास पढ़ा था, उसे बार-बार पढ़ा और उसमें अपनी संभावित छवि को लेकर आशंकित भी हुईं। अंततः उन्होंने उसे एक अच्छी किताब माना।

    यहाँ संस्मरण एक दिलचस्प साहित्यिक प्रश्न उठाता है। लेखक अपने जीवन को साहित्य में बदलता है तो क्या वह अपने निकटतम लोगों का भी पुनर्निर्माण करता है? क्या किसी माँ का साहित्यिक पात्र बन जाना उसके वास्तविक व्यक्तित्व से अलग एक दूसरी जिंदगी पैदा करता है?

    रॉय स्वयं इस प्रश्न से बचती नहीं हैं। वह मानती हैं कि उनकी किताबों में माँ से मिलते-जुलते चरित्र आए हैं। यानी स्मृति और कल्पना के बीच की सीमा यहाँ लगातार धुंधली होती रहती है। यही संस्मरण की साहित्यिक शक्ति भी है और उसका जोखिम भी।

    लेखिका बनाम बेटी

    इस पुस्तक की एक सबसे महत्वपूर्ण परत यह है कि रॉय स्वयं को दो भूमिकाओं में देखती हैं। एक बेटी के रूप में और दूसरी लेखक के रूप में। वह स्वीकार करती हैं कि माँ की मृत्यु का शोक उन्हें बेटी से अधिक एक लेखक के रूप में है, क्योंकि उन्होंने अपना सबसे दिलचस्प विषय खो दिया है।

    यह स्वीकारोक्ति असाधारण है और थोड़ी असुविधाजनक भी।

    यहीं किताब अपनी सबसे ईमानदार जगह पर पहुँचती है। संस्मरण लिखने वाला लेखक हमेशा अपने अनुभव का मालिक नहीं होता। कभी-कभी वह अपने प्रियजनों को भी साहित्यिक सामग्री में बदल देता है। रॉय इस अपराधबोध को पूरी तरह छिपाती नहीं हैं। माँ उनके लिए प्रेम का विषय हैं, लेकिन साथ ही लेखन का विषय भी। इसीलिए शीर्षक में ‘मेरी’ का दोहराव महत्वपूर्ण है। मेरी माँ, मेरी गैंगस्टर में माँ जितनी मेरी रॉय हैं, उतनी ही अरुंधति रॉय की स्मृति में निर्मित एक पात्र भी।

    गैंगस्टर’ क्यों?

    ‘गैंगस्टर’ शब्द शीर्षक को असामान्य बनाता है। माँ अपराधी नहीं थीं। फिर यह शब्द क्यों?

    दरअसल, यह शब्द उस सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध एक निजी व्यंग्य है जिसमें एक स्त्री का आत्मविश्वास, उसका नियंत्रण और उसका सार्वजनिक प्रभाव असामान्य दिखाई देता है। छोटे शहर के उस समाज में मेरी रॉय का व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि बेटी उन्हें लगभग किसी गैंगस्टर की तरह देखती है। वह बुद्धिमत्ता, जुझारूपन, कारोबार की समझ, उदारता, बेरहमी और धौंस, सबको एक साथ अपने व्यक्तित्व में रखती हैं।

    इस अर्थ में ‘गैंगस्टर’ एक हास्यपूर्ण लेकिन गहरा स्त्रीवादी शब्द है। पुरुष के लिए प्रभुत्व शक्ति हो सकता है, लेकिन स्त्री के लिए वही प्रभुत्व अक्सर ‘मुश्किल स्वभाव’, ‘सनक’ या ‘असामान्यता’ बन जाता है।

    निजी कथा से सार्वजनिक राजनीति तक

    पुस्तक का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा तब सामने आता है जब पारिवारिक संस्मरण धीरे-धीरे अरुंधति रॉय की सार्वजनिक जिंदगी में प्रवेश करता है। नर्मदा बाँध, अदालत की अवमानना, गुजरात, आतंकवाद के खिलाफ युद्ध और भारतीय राष्ट्र-राज्य की आलोचना जैसे प्रसंग पुस्तक को एक निजी संस्मरण से राजनीतिक आत्मकथा में बदल देते हैं। पुस्तक की विषय-सूची भी इस विस्तार को स्पष्ट करती है, जिसमें ‘रैली फ़ॉर द वैली’, ‘मेरा दिल देशद्रोही’, ‘द ग्रेट इंडियन रेप-ट्रिक’, ‘चलता-फिरता गणराज्य’ और ‘क़ानून के और नये पचड़े’ जैसे अध्याय शामिल हैं।

    यहाँ रॉय की पुरानी आवाज़ पूरी ताकत से लौटती है। अदालत से सामना और नर्मदा के प्रश्न पर उनकी स्थिति पुस्तक में निजी प्रसंग नहीं रहती। वह भारतीय लोकतंत्र, न्यायपालिका और नागरिक असहमति के व्यापक प्रश्न से जुड़ जाती है। एक जगह वह बताती हैं कि अदालत की अवमानना का आरोप उन पर लगाया गया और उन्होंने माफी माँगने से इनकार किया।

    लेकिन यहीं पुस्तक की एक सीमा भी दिखाई देती है।

    जो पाठक माँ की कहानी पढ़ रहा है, उसके लिए राजनीतिक हिस्से कई बार मूल कथा से दूर जाते हुए लग सकते हैं। रॉय की राजनीति इतनी शक्तिशाली है कि वह कई जगह संस्मरण पर हावी हो जाती है। यह पुस्तक को व्यापक बनाती है, लेकिन हमेशा अधिक गहरा नहीं।

    पुस्तक की सबसे बड़ी कमजोरी

    इस किताब की सबसे गंभीर आलोचना इसकी संरचना को लेकर की जा सकती है। रॉय की स्मृति रैखिक नहीं है। वह एक घटना से दूसरी घटना, एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति और निजी अनुभव से सार्वजनिक राजनीति की ओर लगातार छलाँग लगाती हैं। यह शैली उनकी साहित्यिक पहचान का हिस्सा है, लेकिन संस्मरण के स्तर पर कभी-कभी पाठक को भावनात्मक निरंतरता से बाहर भी कर देती है।

    दूसरी समस्या यह है कि पुस्तक में अरुंधति रॉय स्वयं कभी-कभी इतनी बड़ी उपस्थिति बन जाती हैं कि मेरी रॉय पीछे चली जाती हैं। यह विडंबना है, क्योंकि पुस्तक का घोषित विषय माँ है। लेकिन लेखक के रूप में रॉय की प्रसिद्धि, उनका राजनीतिक जीवन और उनकी सार्वजनिक छवि इतनी विशाल है कि माँ की कथा को पढ़ते हुए पाठक बार-बार उसी सार्वजनिक अरुंधति रॉय से टकराता है।

    फिर भी इसे पूरी तरह दोष कहना उचित नहीं होगा। शायद यही इस संस्मरण का केंद्रीय सत्य है। बेटी अपनी माँ को याद कर रही है, लेकिन बेटी स्वयं अब वही लड़की नहीं है जो घर से निकल गई थी। वह एक प्रसिद्ध लेखिका है, एक राजनीतिक आवाज़ है और अपने अतीत को शब्द देने वाली व्यक्ति है। स्मृति कभी निष्पक्ष नहीं होती। वह हमेशा वर्तमान से लिखी जाती है।

    प्रभात सिंह का अनुवाद

    हिंदी अनुवाद के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण चुनौती अरुंधति रॉय की भाषा रही होगी। उनकी अंग्रेजी में व्यंग्य, बोलचाल, राजनीतिक कटाक्ष, दृश्यात्मकता और अचानक भावुक हो जाने की क्षमता एक साथ काम करती है। प्रभात सिंह ने इस बहुस्तरीय आवाज़ को हिंदी में पकड़ने की गंभीर कोशिश की है और अधिकांश जगह उनकी भाषा प्रवाहपूर्ण तथा पठनीय बनी रहती है। खास तौर पर संवादों और आत्मकथात्मक प्रसंगों में अनुवाद एक सहज गति बनाए रखता है।

    लेकिन इस अनुवाद की एक सीमा उसकी उर्दू-फ़ारसी शब्दावली की अपेक्षाकृत अधिकता है। ‘बेबाक’, ‘बदतमीज़ी’, ‘मशविरा’, ‘अहमियत’, ‘मसला’, ‘मुक़दमा’, ‘इक़रार’, ‘रवायत’, ‘ज़िंदगी’, ‘सरपरस्ती’, ‘फ़ितरत’ जैसे शब्द अपने आप में हिंदी-उर्दू की साझा बोलचाल का हिस्सा हैं और इनके इस्तेमाल से कोई समस्या नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब ऐसे शब्दों का लगातार इस्तेमाल उस प्रसंग की भाषिक प्रकृति पर हावी होने लगता है। रॉय की अंग्रेजी का एक बड़ा गुण उसकी अनगढ़, सीधी और कई बार लगभग बातचीत जैसी भाषा है। हिंदी में कहीं-कहीं यह आवाज़ अधिक अलंकृत और उर्दू-प्रधान हो जाती है। नतीजतन, मूल की सहजता और वाक्य की तत्कालता कुछ जगह कम होती महसूस होती है।

    यहाँ सवाल उर्दू शब्दों के इस्तेमाल का विरोध करना नहीं है। हिंदी की प्रकृति ही ऐसी है कि उसका बड़ा हिस्सा उर्दू, फ़ारसी, संस्कृत, अंग्रेजी और अनेक भारतीय भाषाओं से मिलकर बना है। बल्कि समस्या शब्द-चयन की संगति की है। कहीं-कहीं प्रभात सिंह की भाषा मूल की आवाज़ को पकड़ने के बजाय उसे एक विशिष्ट साहित्यिक हिंदुस्तानी रंग दे देती है।

    फिर भी इसे अनुवाद की बड़ी विफलता कहना उचित नहीं होगा। प्रभात सिंह ने पुस्तक की आत्मस्वीकृतिपरक आवाज़, को काफी हद तक बचाए रखा है। उनकी हिंदी पाठक को रॉय की दुनिया से बाहर नहीं करती। समग्र रूप से अनुवाद पुस्तक की जटिल आवाज़ और उसके निजी-सार्वजनिक विस्तार को हिंदी पाठक तक पहुँचाने में सफल रहता है। यदि शब्दावली में थोड़ी अधिक भाषिक संयमिता और प्रसंगानुकूलता बरती जाती, तो यह अनुवाद रॉय की मूल आवाज़ के और निकट पहुँच सकता था।

    अंततः यह किसकी किताब है?

    शायद इस पुस्तक की सबसे दिलचस्प बात यही है कि इसका उत्तर आसानी से नहीं दिया जा सकता।

    यह मेरी रॉय की जीवनी नहीं है। यह अरुंधति रॉय की पारंपरिक आत्मकथा भी नहीं है।

    यह माँ और बेटी के बीच उस जटिल संबंध की कहानी है जिसमें प्रेम हमेशा सुखद नहीं होता और चोट हमेशा प्रेम को नष्ट नहीं करती।

    रॉय ने अपनी माँ को देवता नहीं बनाया। उन्होंने उन्हें खलनायक भी नहीं बनाया। उन्होंने उन्हें मनुष्य रहने दिया। एक ऐसी मनुष्य, जिसने अपने बच्चों को प्रेम दिया, उनसे गलतियाँ कीं, अपने समय और समाज से लड़ी, दूसरों की जिंदगी बदली और अपनी बेटी की स्मृति में इतनी गहरी छाप छोड़ी कि मृत्यु के बाद भी वह उसकी सबसे जटिल साहित्यिक उपस्थिति बनी रही।

    इसलिए मेरी माँ, मेरी गैंगस्टर का असली विषय ‘माँ’ नहीं, माँ को समझने की असंभव कोशिश है।

    और शायद इसी वजह से पुस्तक की सबसे मार्मिक पंक्ति वह है जिसमें रॉय माँ को अपना ‘आसरा’ और अपना ‘तूफ़ान’ दोनों कहती हैं। यही विरोधाभास पूरे संस्मरण को संचालित करता है।

    एक अच्छी आत्मकथा हमें लेखक के बारे में बताती है। एक बड़ी आत्मकथा हमें अपने बारे में सोचने पर मजबूर करती है। मेरी माँ, मेरी गैंगस्टर इन दोनों के बीच कहीं खड़ी है। इसकी कुछ जगहें लंबी हैं, कुछ राजनीतिक प्रसंग मुख्य कथा पर भारी पड़ते हैं और कभी-कभी लेखिका की सार्वजनिक छवि निजी स्मृति पर छा जाती है। लेकिन इसकी ईमानदारी, इसकी असुविधाजनक आत्मस्वीकृतियाँ और माँ-बेटी के संबंध को बिना भावुकता के देखने का साहस इसे साधारण संस्मरण से ऊपर उठाता है।

    आखिर में यह किताब माँ की मृत्यु पर लिखी गई किताब नहीं लगती। यह उस सवाल पर लिखी गई किताब लगती है जो किसी प्रिय व्यक्ति की मृत्यु के बाद हमारे भीतर बचा रह जाता है। और इसीलिए यह किताब, अपनी तमाम असमानताओं के बावजूद, याद रह जाती है।

    पुस्तक: मेरी माँ मेरी गैंगस्टर (मूल: Mother Mary Comes To Me)

    लेखिका: अरुंधति रॉय

    अनुवादक: प्रभात सिंह

    प्रकाशक: राजकमल पेपरबैक्स

    मूल्य: रु  550/ मात्र

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