‘विचार और वजूद’ लोक की जड़ों में रोपी गई जमीन की हकीकत

प्रसिद्ध लेखिका नूर ज़हीर के 2008 में प्रकाशित उपन्यास ‘बड़ उरैये’ के बहाने वैचारिकता के संघर्ष पर यह टिप्पणी लिखी है प्रशांत कुमार मिश्र ने। इस विश्लेषण को आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर 

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किसी भी राष्ट्र का असली वजूद उसकी राजधानियों की अट्टालिकाओं, संसद के गलियारों या महानगरों की चमचमाती सड़कों पर नहीं मिलता; वह धूल-धूसरित गाँवों की पगडंडियों, वहाँ बिखरे हुए लोकगीतों और सदियों पुरानी लोकगाथाओं में धड़कता है. लोकगीत और लोकगाथाएं किसी समाज की सामूहिक चेतना के वो दस्तावेज हैं, जिन्हें किसी स्याही से नहीं, पीढ़ियों के साझा अनुभवों और आंसुओं से लिखा जाता है. यही कारण है कि किसी गैरमुल्क से आयातित और वातानुकूलित कमरों में तैयार की गई विचारधाराओं के जरिए स्थानीय लोगों के ठेठ जीवन को बदलना लगभग नामुमकिन-सा होता है. वैचारिक आयात जब तक स्थानीय लोक-जीवन के विमर्श और उसकी सांस्कृतिक बुनावट के साथ सामंजस्य नहीं बैठाता, वह एक बाहरी तत्व ही बना रहता है.

भारतीय मानस और विचारधाराओं का दौर

विविधताओं से युक्त भारत में विचारों का कभी अकाल नहीं रहा. उपनिषदों के ऋषियों से लेकर बुद्ध, कबीर और आधुनिक काल के चिंतकों तक, इस भूमि ने विचारों की अनंत सरिताएं देखी हैं. भारतीय मानस की तासीर ऐसी है कि यहाँ कभी भी कोई एक विचारधारा सर्वमान्य या निरंकुश नहीं हो सकी. भारतीय मानस हर विचार को परखता है, उसे अपनी कसौटी पर कसता है और जो उसकी जड़ों से मेल नहीं खाता, उसे धीरे से किनारे कर देता है.

बीसवीं सदी के मध्य का दौर याद करें. वह एक ऐसा दौर था जब देश की युवा पीढ़ी वैचारिक सम्मोहन में जी रही थी. जवाहरलाल नेहरू के ‘गुलाबी समाजवाद’ की रूमानी कशिश हो या फिर केरल में ई.एम.एस. नम्बूदरीपाद और पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु के ‘वैज्ञानिक समाजवाद’ का व्यावहारिक प्रयोग, पढ़े-लिखे युवाओं का एक बड़ा वर्ग इनसे बेहद प्रभावित था. समानता, न्याय और सर्वहारा के उत्थान के ये नारे किसी भी संवेदनशील मन को आंदोलित करने के लिए पर्याप्त थे.

यह वह दौर था जब जर्मन दार्शनिक कार्ल मार्क्स की किताबों को पढ़कर, उनके सिद्धांतों को आधार बनाकर व्लादिमीर लेनिन ने रूस में एक सफल और कुशल क्रांति का नेतृत्व किया था. इस क्रांति के परिणामस्वरूप दुनिया के नक्शे पर एक नई किस्म की शासन पद्धति और ‘सोवियत संघ’ का जन्म हुआ. शुरुआत में इस कम्युनिस्ट व्यवस्था ने दुनिया भर के बुद्धिजीवियों और शोषितों को अपनी ओर आकर्षित किया. इसका सम्मोहन ऐसा था कि लगा अब दुनिया से सारे दुःख और विषमताएं मिट जाएंगी. इतिहास गवाह है कि जब इस सम्मोहन की ओट में कम्युनिस्ट पार्टी की सत्ता निरंकुश होने लगी और आम लोग प्रताड़ित होने लगे, तो आम जनमानस का मोहभंग होते भी देर नहीं लगी.

सत्ता के अति-केंद्रीकरण और सर्वाधिकारवादी (Totalitarian) प्रवृत्ति ने उस सोवियत संघ के भीतर ही भीतर असंतोष का ऐसा बारूद भर दिया, जिसने अंततः उसके ऐतिहासिक विघटन का मार्ग प्रशस्त कर दिया. दूसरी ओर, पड़ोसी देश चीन ने समय की नब्ज को पहचाना. चतुर चीन को समझ आ गया कि शुद्ध और कट्टर साम्यवाद के सहारे आधुनिक दुनिया में टिकना संभव नहीं है, इसलिए उसने पूँजीवाद से व्यावहारिक समझौता करना मुनासिब समझा. यही कारण है कि आज चीन की अर्थव्यवस्था की साइकिल का एक पहिया अगर साम्यवाद का है, तो दूसरा पहिया पूँजीवाद का प्रतिनिधित्व करता है. वह राजनीति में कम्युनिस्ट है, बाजार में घोर पूँजीवादी.

हिंदुस्तानी कम्युनिस्ट और जमीनी हकीकत से दूरी

बदलते हुए इस वैश्विक परिदृश्य, सोवियत संघ के पतन और चीन के इस वैचारिक रूपांतरण की ओर देखने की कोशिश हिंदुस्तानी कम्युनिस्टों ने कभी गंभीरता से नहीं की. वे मार्क्स की पोथियों और रूसी-चीनी चश्मों से ही भारतीय समाज को देखने की जिद पर अड़े रहे. परिणाम हमारे सामने है. सन् 1957 में बैलेट बॉक्स यानी लोकतांत्रिक चुनाव के जरिए दुनिया में पहली बार केरल में कम्युनिस्ट सरकार गठित करने वाली भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी आज देश के राजनीतिक परिदृश्य में अपनी प्रासंगिकता लगभग खो चुकी है.

इसका सबसे बड़ा कारण यह रहा कि भारत में कम्युनिस्ट हमेशा यहाँ के मूल जनमानस, उसकी सांस्कृतिक संवेदनाओं और लोक-चेतना से दूर रहे. उन्होंने भारत को केवल ‘वर्गों’ (Classes) में विभाजित करके देखा; वे यह भूल गए कि भारत ‘वर्णों’, जातियों, गहरे धार्मिक संस्कारों और आध्यात्मिक आस्थाओं का एक जटिल ताना-बाना है. वे भारतीय समाज के इस मर्म को समझने में पूरी तरह चूक गए.

ऐसा नहीं है कि मुल्क के सजग नागरिकों, लेखकों और चिंतकों ने कभी इस विसंगति की ओर ध्यान नहीं दिया हो. सुप्रसिद्ध लेखिका नूर जहीर का उपन्यास ‘बड़ उरैये‘ इसी वैचारिक भटकाव और ज़मीनी हकीकत के बीच के द्वंद्व को बेहद खूबसूरती से रेखांकित करता है. यों तो यह उत्तर प्रदेश के संभल जिले की पृष्ठभूमि पर आधारित एक गाँव की कहानी है, इसके पात्रों के संवाद और उनकी मानसिक यात्राएं पूरे मुल्क की कड़वी हकीकत को बयाँ करती हैं.

‘बड़ उरैये‘ का वैचारिक विमर्श और शाश्वत प्रासंगिकता

वर्ष 2008 में प्रकाशित यह उपन्यास भले ही डेढ़ दशक से अधिक पुराना हो चुका है और बीते दौर की कहानी कहता है, इसके बावजूद इसमें उठाए गए सवाल आज भी उतने ही नए और प्रासंगिक हैं. दशकों पुराना होने के बाद भी यह रचना वर्तमान समय की वैचारिक उथल-पुथल को समझने की एक अचूक अंतर्दृष्टि देती है. उपन्यास का एक मुख्य पात्र है रिजवान, जो लंदन से बैरिस्ट्री की पढ़ाई करके लौटा है और कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रति समर्पित है. जब वह गाँव की जमीन पर उतरता है, तो उसके भीतर का रोमानियत का पर्दा हटने लगता है. उपन्यास में दर्ज है: ‘पहली बार रिजवान के मन में संदेह जागा कि चाहे कितने ही पार्टी यूनिट क्यों न खुल जाएं, हिंदुस्तान अभी कम्युनिज्म के लिए तैयार नहीं है. नहीं! उन्होंने खुद से कहा. यह वे गलत सोच रहे हैं. असल में तो कम्युनिज्म हिंदुस्तान के लिए तैयार नहीं है. कम्युनिज्म को यहाँ के समाज, धार्मिक आस्थाओं, रीति-रिवाजों और संस्कारों को समेट कर खुद को बदलना होगा.’

यह पंक्तियाँ भारतीय वामपंथ की सबसे बड़ी त्रासदी को उजागर करती हैं और आज के दौर में भी उतनी ही सच साबित होती हैं. जो लोग वर्ग युद्ध के सिपाही बनने वाले हैं, यानी इस देश के किसान, मजदूर और वंचित, वे अपनी धार्मिक आस्थाओं, त्योहारों और संस्कारों के बिना जिंदा नहीं रह सकते. आप उनके हाथ में लाल झंडा तो थमा सकते हैं, उनके दिलों से राम, कृष्ण, सूफी संतों और कबीर को बाहर नहीं निकाल सकते. खुद लेनिन ने भी इसी लचीलेपन की ओर इशारा करते हुए कहा था कि हर मुल्क में कम्युनिज्म का रूप उस देश की विशिष्ट जरूरतों और परिस्थितियों के हिसाब से बदलेगा, इसके विपरीत भारतीय कम्युनिस्टों ने इस फलसफे को एक रूढ़िवादी मजहब बना दिया. यह वैचारिक हठधर्मिता आज भी हमारे राजनैतिक और सामाजिक परिदृश्य में देखी जा सकती है, जो इस पुराने उपन्यास की प्रासंगिकता को और गहरा करती है.

रिजवान जब गाँव के बुजुर्ग नजमुल नाना से संवाद करता है, तो नजमुल नाना की बातें किसी भी जमे हुए विचार की काई को साफ करने वाले झरने जैसी लगती हैं. जब रिजवान उनसे सवाल करता है, तो नाना उसकी आँखों में अपनी बूढ़ी आँखें उतारते हुए कहते हैं:

‘नए और अनोखे दिखने वाले दर्शन और अकीदे पुराने हो जाते हैं. धीरे-धीरे उनमें भी मजहब जैसा कट्टरपन और संकीर्णता आ जाती है. वे मतांध या हठधर्म का रूप ले लेते हैं… जिंदगी बहती रहती है. इसलिए नई लगती है. कोई सोच और उस पर आधारित समाज रुक जाए तो सड़ने लगते हैं. काई जम जाती है और उसकी पारदर्शिता खत्म हो जाती है.‘

नजमुल नाना का यह कथन केवल कम्युनिज्म पर नहीं, हर उस विचार पर लागू होता है जो समय के साथ बहना छोड़ देता है. सोच की प्रगति को जब जटिल और जड़ विचारधाराओं की कैद में डाल दिया जाता है, तो वह विचार सबसे पहले दम तोड़ता है. विचार के जिंदा रहने के लिए और समाज को कुछ सार्थक दे पाने के लिए ‘बहाव’, ‘सवाल’ और ‘हर वजूद व यकीन पर बहस’ बेहद जरूरी है. पुराने समय में कही गई नाना की यह बात आज के सोशल मीडिया और वैचारिक ध्रुवीकरण के दौर में और भी अधिक मौजूं हो उठती है.

मिट्टी की सुवास और लोक का वजूद

‘बड़ उरैये’ उपन्यास की सबसे बड़ी ताकत इसके पात्र हैं, जो अपनी बात अपनी ही ठेठ जबान में कहते हैं. वे किसी दार्शनिक किताब से निकले हुए काल्पनिक चरित्र प्रतीत नहीं होते; उनकी जड़ें इसी देश की मिट्टी में गहरी फैली हुई हैं. अमीना बेगम को देखिए, जो विभाजन के समय अपने शौहर बैरिस्टर मुस्तफा के साथ पाकिस्तान जाने से साफ इंकार कर देती हैं. उनकी यह वैचारिक दृढ़ता और अपनी मिट्टी के प्रति निष्ठा देश के विभाजन की त्रासदी के बीच एक नई राह देश को दिखाती है. दूसरी तरफ रिजवान है, जो कम्युनिस्ट पार्टी के बड़े लीडरों की अकड़, ढिठाई और जमीनी हकीकत से नासमझी से भीतर तक व्यथित है; इसके बावजूद वह अपने बुनियादी मानवीय आदर्शों को नहीं छोड़ता. वह पार्टी की राजनीति से ऊपर उठकर किसानों और खेत-मजदूरों की वास्तविक मदद करना ही अपना पहला फर्ज मानता है.

इसी तरह बेगम रक्शंदा हैं, जो गाँव के बच्चों के भविष्य के लिए वहाँ एक स्कूल कायम करती हैं. इस पूरे ताने-बाने के बीच एक बेहद मुग्ध कर देने वाला चरित्र है, उनकी छोटी सी बेटी लूना. लूना अक्सर अकेली घूमती-फिरती है, तन्हाई में खुद से बातें करती है; वह अकेली नहीं है, उसे अपने क्षेत्र के सारे लोकगीत जुबानी याद हैं. वह लोककथाओं को इस नाटकीय ढंग से सुनाती है कि सुनने वाला मंत्रमुग्ध रह जाए. वह खुद कहानियाँ लिखती और गढ़ती है.

लूना उस बेढंगे नाम वाले गाँव ‘बड़ उरैये’ (यानी बड़/बरगद के पेड़ के उस पार वाला गाँव) में पूरी तरह रची-बसी और खुश है. गाँव का नाम भले ही सुनने में अजीब लगे, सब जानते हैं कि ग्रामीण जीवन में उस बूढ़े बरगद का क्या महत्व है. वह बरगद केवल एक पेड़ नहीं, उस पूरे इलाके की सांस्कृतिक विरासत का गवाह है, जिससे हजारों लोकगाथाएं, सुख-दुःख और किंवदंतियाँ जुड़ी हुई हैं.

उपन्यास का अंत लूना की इसी दास्तान और उसकी आत्मिक संतुष्टि के साथ होता है, जो आधुनिकता और महानगरीय चकाचौंध के मुंह पर एक करारा तमाचा है. लूना ने बड़े ही सहज ढंग से अपनी जिंदगी को किसी बड़े शहर की कृत्रिमता से उखाड़कर इस छोटे से गाँव की सोंधी मिट्टी में रोप लिया है. वह इस बोध में परम आनंद का अनुभव करती है कि वह इसी मिट्टी की बनी है जो उसके चारों तरफ बिखरी हुई है.

जब वह महसूस करती है कि उसके दिल की धड़कन और उसके आस-पास गाए जाने वाले आल्हा, बिरहा और फाग के गीतों की ताल बिल्कुल एक ही है; जब उसे लगता है कि उसकी नसों में बहने वाला खून और उस गाँव से होकर गुजरने वाली मौसमी नदी के पानी की गर्माहट में कोई फर्क नहीं है; तब वह वैचारिक रूप से पूर्ण हो जाती है. उसे इस बात का पूरा यकीन है कि जब एक दिन उसकी मृत्यु होगी, तो उसका शरीर, उसकी जान और उसकी रूह कहीं अनजानी गलियों में बिखर नहीं जाएंगे; उसका पूरा वजूद इसी मिट्टी में विलीन हो जाएगा, उसी मिट्टी में, जो उसके जैसी अनगिनत बस्तियों और पीढ़ियों के अस्तित्व से रची-बसी है.

जड़ विचार बनाम बहती जिंदगी

यह उपन्यास और इसके विचार हमें यह सिखाते हैं कि कोई भी दर्शन तब तक महान या प्रासंगिक नहीं हो सकता, जब तक वह लोक की धड़कन को न पहचान ले. समय बीतने के साथ यह किताब भले ही पुरानी हो गई हो, लेकिन इसका संदेश एकदम शाश्वत है. देश और समाज का कल्याण आयातित सिद्धांतों की जुगाली करने में नहीं है; वह अपनी जड़ों को पहचानने, लोकगीतों के मर्म को समझने और जनमानस की आस्थाओं का सम्मान करते हुए आगे बढ़ने में निहित है. विचार वही जीवित रहेगा जिसमें नदी जैसा बहाव होगा, वह विचार समय की धूल में नष्ट हो जाएगा जो किसी बंद तालाब की तरह रूढ़ियों की काई से ढक जाएगा.

(प्रशान्त कुमार मिश्र देश के एक सुपरचित राजनीतिक विश्लेषक, वरिष्ठ पत्रकार और साहित्य के गंभीर अध्येता हैं.)

उपन्यास का नाम: बड़ उरैये

लेखिका: नूर ज़हीर

प्रकाशक: मेधा बुक्स

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