पिछले जून जानकीपुल पर शिवांगी गोयल की कुछ कविताएँ प्रकाशित हुई थीं। और ठीक एक साल बाद शिवांगी अपने पहले काव्य-संग्रह ‘हज़ारों निशान’ के साथ उपस्थित हैं। उनका यह संग्रह लगभग महीने भर पहले वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। युवा लेखक महेश कुमार ने इसकी समीक्षा की है। पढ़िए शिवांगी गोयल के पहले काव्य-संग्रह की पहली समीक्षा – अनुरंजनी
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आचार संहिताओं का मूल्यांकन करती कविताएँ: हज़ारों निशान
जिस समाज में लैंगिक भूमिकाएँ तय हों वहाँ सामाजिक अनुबंधों से परे जाकर कोई नागरिक कुछ रचनात्मक करना या रचना चाहे तो उसकी एक ‘कीमत’ होती है। रचनात्मक स्त्रियों ने यह कीमत अलग-अलग कालखण्डों में भिन्न-भिन्न तरीकों से चुकायी है। सबसे बड़ी कीमत सामाजिक वंचना, हत्या और आत्महत्या रही है। जो बच गईं उनको कई तरह के समझौते करने पड़े। भारत और दुनिया का इतिहास ऐसी स्त्रियों की कहानियों से भरी पड़ी हैं। 21वीं सदी में भारत जैसे देश में जहाँ लैंगिक हिंसा और विद्वेष अपने क्रूरतम रूप में मौजूद हैं, लिखने के लिए स्त्रियाँ कीमत चुकाने के लिए तैयार हैं। शिवांगी गोयल जैसी युवा कवयित्री अपनी कविता के लिए और कविता लिखने के अवकाश के लिए जो कीमत चुनती हैं उसमें रसोईघर शामिल है। वह लिखती हैं:-
“हो सकता है एक कविता लिखते हुए मैं/तवे पर रखी रोटी जला दूँ/या आँच पर रखा दूध/पूरा घर भी जल सकता है कभी/कभी मैं भी।”
पितृसत्ता की पकड़ भारतीय घरों में इतनी महीन है कि स्त्री मुक्ति के आंदोलनों और संवैधानिक व्यवस्था के बावजूद स्त्री को रसोईघर मजबूरी में जाना पड़ता है। रसोईघर विकल्प, इच्छा और अवसर की तरह नहीं आता है। यह ‘फोर्स्ड लेबर’ की तरह आता है। कामकाजी स्त्रियाँ रसोईघर जाती हैं ताकि अच्छी, संस्कारी और ‘सबकुछ लेकर चलने वाली’ बहू-बेटी बनी रहें। इस माहौल में कुछ भी रचने के लिए जो अवकाश और एकांत चाहिए उसका विकल्प भी रसोईघर बन जाता है। इतनी सहूलियत या हिम्मत आज की स्त्री को जरूर मिल गई है कि कह सके कि कविता लिखते हुए ‘घर और मैं भी जल सकती हूँ।’ कविता अपना अर्थ वहाँ खोजती है कि वह समय कब आएगा जब किसी स्त्री को बिना जोखिम उसे अपना रचनात्मक स्पेस मिल पाएगा? ठीक इसी समय जब स्त्रियाँ इन सबको झेलते-सँभालते लिख रही होती हैं तब स्त्री द्वेषी समाज समीक्षक, आलोचक और हितैषी के भेष में सुझाव के नाम पर ‘कविता न लिखने’ का आदेश भी देते रहते हैं। आलोचक का काम रचना के साथ रचना के सम्भव होने के परिवेश और परिस्थितियों पर भी जाना चाहिए। इसकी समझ के बिना अपनी समझ का आरोपण रचना पर करके खारिज करने से बचना चाहिए। इस प्रवृत्ति ने अस्मितावादी आवाजों को सौंदर्यबोध के नाम पर कमतर बताया और उनके अनुभवों को कविता की परिधि से बाहर रखने की कोशिश की। ऐसे आलोचकों के लिए ही कवयित्री लिखती हैं:-
“लेकिन अपने शब्दों को समझाओ/ मेरे पास न आएँ बार-बार/ झटकती हूँ इन्हें, मानते ही नहीं/तुमने मुझे बताया कि इन्हें बरतना नहीं आता/इन्हें भी बताओ, कविता का इतिहास बचाओ”
ये पँक्तियाँ आलोचक के ‘ऑथोरिटी’ होने की आलोचना है।
शिवांगी का यह पहला संग्रह है। इसमें रचना और आलोचना के संबंध, परिवेश और परिस्थितियों तो कविता का विषय हैं ही, सबसे अधिक केंद्र में ‘बॉडी पॉलिटिक्स’ हैं। स्त्री-देह और उससे जुड़े कई पहलुओं पर एक युवा स्त्री किस तरह सोच रही है? कितने तरीकों से सोच रही है और सोचने के पीछे के कारक क्या-क्या और कौन-कौन हैं? यह मूलतः ‘बॉडी पॉलिटिक्स’ की कविताओं का संग्रह है। प्रेम, हिंसा, उत्पीड़न, पश्चाताप, ग्लानि सब में दैहिकता और स्पर्श प्रत्यक्ष रूप से शामिल है। स्त्री देह को कई आचार संहिता, इज्जत और अनुबंधों में ‘विषय’ बनाया गया। विषय का रूपांतरण वस्तु में हो गया। स्त्री-देह के वस्तुकरण और स्त्री देह से दूरी ने जो रहस्य, रोमांच, डर और श्रृंगार का भाव पुरुषों में भरा उसका सबसे अधिक दोहन पूँजीवादी व्यवस्था ने किया; यौनिकता को ग्लैमर में बदलकर। स्त्रीवाद ने इससे मुकाबला किया है। उसने अपनी शब्दावलियों और तर्कों से जवाब दिया है। कविता भी उसका एक हिस्सा है। ‘ग्राहक से’ कविता का एक अंश है:- “मेरी टाँगों के बीच देखो/एक सूखी फिसलन है/ एक रिक्तता है, उसे चूमो/ उसे भरमाओ, मुझे चाहो”
इन पँक्तियों को कोई चाहे ‘बोल्डनेस’ कह दे जबकी यह बेहद स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। लेकिन, जैसे ही स्त्री-देह को कॉमोडिटी में बदलते हैं वैसे ही ‘चाहना’ का पूरा संदर्भ ही लोप हो जाता है। कवयित्री ‘मुझे चाहो’ के माध्यम से स्त्री देह को ग्राहक-खरीददार वाली व्यवस्था से अलग करके उसे मनुष्य के दायरे में लाती हैं।
स्त्रियों ने अपने देह को विमर्श का प्रमुख विषय बनाया। इसका स्पष्ट कारण है कि स्त्री-देह इज्जत, शाप, रहस्य, शान और आचार संहिता से बंधा हुआ है। उसकी भौतिक उपस्थिती को इतना अधिक महिमामंडित और संकुचित किया गया है कि उसके नाम पर पुरुषवादी समाज अपनी कुंठा, हिंसा और गौरवबोध का पोषण करता गया। आज हर पुरुष इस व्यवस्था में यही कहता हुआ पाया जाता है कि वह अपने घर की लड़कियों को लेकर चिंतित हैं और उसे सुरक्षित करने का हर प्रयास करते हैं। कवयित्री पुरुषों की इस प्रवृत्ति के विरोधाभास को जानती हैं। लिखती हैं:- “कई लड़के बताते हैं कि वे बचाते हैं अपने घरों की लड़कियों को/ ट्रेन में, बस में, बाजार में, भीड़ में जाने से/ लेकिन वे नहीं बताते कि ठीक उनके ही जैसे लड़कों से/ और भी लड़के बचाते हैं अपने घर की लड़कियों को”
पितृसत्ता की यह उलटबांसी है कि ‘पुरूष ही चिंतित है और चिंता विषय भी है।’ वह सुरक्षित करने का यश प्राप्त करना चाहता है, लेकिन स्वयं अपने भीतर के पितृसत्तात्मक लोलुपता से मुक्त नहीं करना चाहता है। मुक्तिदाता होने का गुरुर ऐसा नहीं करने देता है। वह स्त्री-देह को बचाने का बस ढोंग करता रहता है। उसके नाम पर योजनाएँ और कार्यक्रमों की सूची बनाकर एहसान गिनाता रहता है। इससे न हिंसा रुकती है न उत्पीड़न। समाज का मूलभूत आंतरिक ढाँचा जस का तस है। बस बाहरी परिवर्तन देखकर ‘सशक्तिकरण’ का यशोगान होता रहता है। इसको एक दृश्य से समझिए:- “दहेज में ‘कार’ लिए बिना/ ससुराल आयी लड़की कीचन में रोटियाँ बना रही है/ सास अपने बेटे से बुदबुदा रही है/ रोटियाँ चिल्ला रही हैं/ जलना मत”
यहाँ दो बातें हैं विवाह संस्था और पारिवारिक शादी।पारिवारिक शादी को सबसे अच्छा माना गया है। इसमें लड़का खोजने की प्रक्रिया, फिर लड़की का गुण-दोष आकलन, देखा-देखी और लेन-देन की पूरा प्रक्रिया बाजार की तरह है। लड़का एक ऐसा ‘शोकेस’ है जहाँ लड़की को सुरक्षित और व्यवस्थित रखने की व्यवस्था देखी जाती है।लड़की वाले बाजार में निकलते हैं। जगह-जगह घूमते हैं। शोकेस (लड़का) देखते हैं। अपना सामान (लड़की) उनको दिखाते हैं। ‘शोकेस’ का मोल-भाव होता है। सामान की सुंदरता, गुणवत्ता और टिकाऊपन सब देखकर जब मामला तय होता है तो ‘शोकेस’ को दे दिया जाता है। इस तरह पारिवारिक शादी एक बेटबेचवा व्यवस्था में बदल जाता है। कभी-कभी सामान बेचने वाले पूरी तरह कीमत नहीं दे पाते हैं। बदले में ‘शोकेस’ के मालिक और कभी-कभी ‘शोकेस’ खुद सामान को बाहर कर देता है या नष्ट कर देता है। इस तरह विवाह संस्था में स्त्रियों का सबसे अधिक वस्तुकरण होता है। अब सामान की गुणवत्ता में नौकरी के साथ घरेलू कार्यों में दक्षता और साथ में दहेज तो है ही। लड़कियों के घरवालों पर अब और ज्यादा बोझ है। यही कारण है कि शिवांगी की इस कविता में स्त्री रसोईघर में है। ‘रोटी का चिल्लाना’ यह जो दृश्य है बताता है कि स्त्रियाँ रसोई से आत्मीय रिश्ता बना चुकी हैं। मनुष्य से ज्यादा भरोसा और संवाद उनका रसोईघर से है। रसोईघर यह बताना चाहता है कि बहुओं को जलने की जिम्मेदार वे नहीं हैं। बहुओं के जलने को जितना सहज बनाया गया है उतना है नहीं। कोई पुरुष रसोई में नहीं जलता क्योंकि छवि सहज नहीं लगेगी। स्त्री के होने से यह बेहद सहज हो जाता है। ‘रोटी का चिल्लाना’ इस अनुकूलन के खिलाफ अपना विरोध दर्ज करती है कि वे इस साज़िश में शामिल नहीं हैं । विवाह संस्था को आदर्श बताने के लिए यह बात बार-बार कही जाती है कि माँ-बाप कभी अपनी बेटी के लिए बुरा नहीं सोचते हैं। वे जहाँ रिश्ता ठीक करते हैं वह उत्तम ही होता है। जबकी यह सच्चाई नहीं है। आर्थिक स्थिति, गरीबी, बोझ से मुक्त होना, सामाजिक तंज से बचना इन सब कारणों से माता-पिता समझौता करते ही हैं। अमीर घरों में राजनीतिक समझौते और व्यापारिक हितों को देखते हुए भी होता है। इन सबमें सबसे बड़ी भूमिका जाति और गोत्र की होती है। कवयित्री इन चालाकियों को इस तरह देखती हैं:-
“हर बाप को फिक्र होती है अपनी बेटी के लिए/ शायद इसलिए वे अपने कलेजे के टुकड़े को कभी/ अनजान लोगों के साथ, अनजान महफ़िलों में नहीं भेजते/ कभी एक दिन अनजान लोगों के बीच/ अनजान महफ़िल में/ अनजान आदमी को सौंप देते हैं/ और साथ भी नहीं जाते/ क्या तब डर नहीं होता/ वो मर्द जबरन/ हैवानी हवस लिए, आँखों में खून उतारे/ उसकी बेटी को बिस्तर पर खींच सकता है?” (‘बाप की फिक्र बेटी के लिए’)
इस कविता में पारिवारिक विवाह की कमियों, असुरक्षा बोध, सुरक्षा की अवधारणा के अन्तर्विरोधों, सामाजिक अनुबंध, वैवाहिक बलात्कार को मुद्दा बनाया गया है। लेकिन, जो मूल बात है जिसका अर्थ इन पंक्तियों के बीच है वह है ‘प्रेम करने का अधिकार और विवाह के लिए स्वयं चुनने का अधिकार’। जो पारिवारिक विवाह सुरक्षा और सम्मान की सबसे अधिक गारंटी देता है उसी व्यवस्था ने स्त्रियों का सबसे अधिक शोषण और हत्या की है। हत्या केवल शरीर की नहीं, सपनों और स्त्रियों के विकास की भी। पारिवारिक विवाह के नाम पर जातियों की रक्त शुद्धता, इतिहास का गौरवबोध और असमानता को सुरक्षित किया जाता है। यही कारण है कि अंतर्जातीय विवाह में हत्याओं का सिलसिला भारत में रुक ही नहीं रहा है। हत्या के आँकड़ों में ज्यादातर दलित हैं। केंद्र और हाशिया के संघर्ष में स्त्री देह सबसे अधिक वल्नरेबल है। शिवांगी लिखती हैं :- “असल में केंद्र का विवाह हाशिए से होने पर/ गोलियाँ चलती हैं।” जबतक विवाह दो लोगों के आपसी चुनाव और प्रेम पर नहीं छोड़ा जाएगा तबतक पितृसत्ता सुरक्षा, जाति, धर्म, इतिहास आदि के नाम पर स्त्री देह को वल्नरेबल बनाता रहेगा।
देह के इस नियंत्रण के खिलाफ आक्रोश पैदा होगा ही। देह के अधिकार, जन्म का अधिकार और पितृसत्ता के प्रभावों से जूझने की समझ के लिए स्त्रियों ने कठोर कदम उठाए। इन्हीं कठोर कदमों की अभिव्यक्ति में शामिल है बच्चा न पैदा करने की घोषणा। शिवांगी लिखती हैं:- “दुनिया का पहला झगड़ा तुमसे था/ क्यों पैदा किया मुझे?/ आख़िरी झगड़ा खुद से रहेगा/ क्यों पैदा नहीं होने दिया किसी को?” (‘माँ से झगड़ा’)
मातृत्व के दबाव का संबंध पितृसत्ता से जुड़ा हुआ है। जिस मातृत्व को सहज होना चाहिए था उसे खानदान, वंश और मुक्ति से जोड़कर ‘बेटा’ देने का दबाव स्त्रियों को मातृत्व के वास्तविक सुख से वंचित रखा। उनपर एक दबाव के साथ डर भी बन गया बेटा पैदा करने का। यहाँ मातृत्व ‘चॉइस’ न होकर एक बंधुआ मजदूरी हो गई। इस मजदूरी की वाहक स्त्रियों को बनाया गया। मातृत्व विवाह के बाद ही स्वागत योग्य माना गया। विवाह होते ही स्त्रियाँ सबसे अधिक दबाव बनाती हैं बच्चा के लिए। यह पितृसत्ता की सबसे बड़ी सफलता है। इसके प्रतिरोध में स्त्री जब बच्चा न पैदा करने की बात करती है तो यह अति लगते हुए भी स्वाभाविक विचार लगने लगता है । पितृसत्ता की चालाकियों को आज की स्त्रियाँ समझती हैं। भारत में आज दो शब्द बेहद प्रचलन में हैं:-गृहिणी और कामकाजी औरत। अब तो माँग उठ रही है कि गृहिणी को ‘होम-मेकर’ की जगह राष्ट्र-निर्माता लिखा जाए। यह सब पितृसत्ता की शब्दवाली है। पढ़ी-लिखी और कामकाजी औरतें फेमिनिस्ट (गाली के रूप में) , कामचोर (घरेलू काम के मामले में) तो कभी घर सँभालने वाली, इज्जत बढ़ाने वाली (यदि वो पैसा घर में दे रही हों, अच्छे पदों पर हों और प्रभावशाली हों) हो जाती हैं। इसका उलट भी होता है कि कभी गृहिणी को अधिक महत्व मिल जाता है। इस तरह स्त्रियों में श्रेणीक्रम विभाजन आर्थिक आधार पर करके भेदभाव बनाए रखने की कोशिश हो रही है। इस जाल में स्त्रियाँ फँसती हुई भी दिखती हैं। शिवांगी इन महीन साजिशों को रेखांकित करती हैं:-
“वो स्त्रीवाद का पर्याय बनीं और उन्होंने देखा/हल्दी सने हाथों को हेय दृष्टि से/ उनकी दृष्टि ने घरेलू काम को बना दिया है हेय, और हेय/ बाकी बहुओं को हीन, और हीन/ जंग जाने कब औरत और औरत के बीच छिड़ गई/ ससुर अपनी कमाऊ पतोह को देखकर मुस्कुराते रहे”
यह दृश्य आज आम है। एक ही घर में जहाँ कामकाजी औरतें हैं उन्हें अधिक महत्व दिया जा रहा है। वो प्रत्यक्ष रूप से आर्थिक मदद करके अपना स्थान सुनिश्चित करने में लगी हैं। गृहिणी के भीतर असुरक्षा बोध भरा जा रहा है। यह स्त्रियों के बीच आपसी घरेलू क्लेश का कारण तो है ही पुरुषों के लिए यह सफलता है। स्त्रीवाद का प्रतिनिधित्व शिक्षित, लकदक और आर्थिक रूप से समृद्ध स्त्रियों के हाथों में है। वंचित, अशिक्षित, आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन अपने मुद्दों को लेकर संघर्ष करने वाली स्त्रियाँ लाइमलाइट में पीछे हैं। इसका नतीजा यह है कि कमाऊ और गृहिणी (समृद्ध और वंचित) पतोह आपस में एकजुट नहीं हो पा रही हैं। जबतक ससुर नाम का पितृसत्ता का पोषक (यहाँ पूँजीवाद, ग्लैमर, विज्ञापन, धर्म, जाति, राजनीति सब हो सकता है) है तब तक यह विभाजन बना रहेगा। इनके बहनापे के लिए जरूरी है कि जो ज्यादा तर्कशील और मध्यवर्गीय स्त्रियाँ हैं वे अपने ‘प्रिविलेज’ को वंचित स्त्रियों को सौंपे और उन्हें भी नेतृत्व करने दें। इसके बिना अचार सहिंताओं से मुकाबला नहीं कर पाएँगी।
हज़ारों निशान
लेखिका:- शिवांगी गोयल
प्रकाशक:- वाणी प्रकाशन

