टिकुली की कविताएँ

आज पढ़िए टिकुली की कविताएँ। टिकुली मूलतः अंग्रेज़ी की कवि और कथाकार हैं। उनकी कई रचनाएँ राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं और पुस्तकों में प्रकाशित हुई हैं।  अंग्रेज़ी में उनके तीन कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं तथा लेखन के लिए उन्हें कई सम्मान भी प्राप्त हुए हैं। टिकुली एक चित्रकार, प्रकृति, इतिहास प्रेमी और घुमक्कड़ भी हैं।

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1. भूली बिसरी यादें

आज कुछ सायों से मुलाक़ात हुई
पुरानी यादें थीं साथ हो लीं
दरियागंज में गोलचा सिनेमा के पास
संडे बुक मार्किट में किताबों के पन्ने पलटते हुए
पुराने दिन याद आ गए,
भीड़भाड़, किताबों, सिक्को, कपड़ों की छोटी छोटी दुकानों से गुज़रते हुए
हम दिल्ली गेट पहुंचे, यहीं सड़क पे जाती एक बस से याद आयी डीटीसी की वो डबल डेकर बस
जिसमे हम कभी कभार छुट्टियों में
अंग्रेजी फिल्म देखने जाते थे
तब सिंगल स्क्रीन सिनेमा हॉल का ज़माना था
और फिल्म देखना एक लग्जरी
दिल्ली में तब हरियाली ज़्यादा और
भीड़ कम दिखती थी और अक्सर
इन बसों की छतें डालियों की मार से
डेंटेड रहती थीं
१४-१५ साल की उम्र में इन
डबल डेकर बसों से दिल्ली शहर
कुछ अलग ही दिखता था
ये समय था फटफटिया, लम्ब्रेटा या वेस्पा स्कूटर का
सड़कों पे ज़्यादातर फिएट और एम्बेसडर
ही दिखती थीं या फिर कभी कभी किसी
रईस की फॉरेन गाड़ी सर्र ने निकल जाती थी
राजपथ पर साइकिलों का मजमा एक आम बात थी
ये वो समां था जहाँ सेंट्रल दिल्ली के पेवमेंट
जामुन से रंगे रहते थे और हम ठंडी मीठी गंडेरी
चबाते नीम की छांव में गर्मी की शामें काटा करते थे
ट्रैफिक के शोर से परे वो मीठी आवाज़ें कानों में गूंजने लगीं
“लैला की उंगलियां,मजनू की पसलियां, ताज़ा ताज़ा ककड़ियाँ”,
” फालसे काले काले, मुझसे भी ज़्यादा काले”, गंडेरी गुलाबवाली
मीठी मीठी मतवाली”, एक दबी सी मुस्कराहट होंठों को छू गयी
और हम चल दिए उन्हीं गुलाबों की भीनी सी खुशबू लिए
शाहजहानाबाद की सैर को

2. दिल्ली ६

आज यूँही पुरानी दिल्ली की उन जानी अनजानी
तंग गलियों में लौट जाने का मन हुआ
गलियां ऐसी की लखनऊ की भूलभुलैया
फीकी पड़ जाये, चांदनी चौक मेट्रो स्टेशन
से उतर हम भी हो लिए लोगों के उमड़ते
हुजूम के साथ, नयी दिल्ली का नक्शा
चाहे बदल गया हो यहाँ कुछ नहीं बदला
नूर से नहायी सहरी की सुबहें, इफ्तार
की पाकीज़ा शामें और जामा मस्जिद की
सीढ़ियों पे रेकॉर्डतोड़ गर्मी से बेपरवाह,
बेफ़िक़्र खेलते नन्हे रोजादार जिन्हें
इंतज़ार है तो बस आने वाली ईद का
आसमां पे वही ढलते सूरज की लाली,
शाम ए इफ्तार की रंगत में सराबोर
बाज़ार, ख़ुशी से दमकते चेहरे,
मस्जिद से आती अज़ान की गूँज
दरगाह हज़रत सरमद शहीद
की जाली से बंधे लाल धागे में
लिपटी एक बाली और इबादत
की रौशनी से गुलज़ार मेरा मन
आज भी उर्दू बाज़ार से मटिया महल
और चितली क़बर से हवेली आज़म खान
तक सिवइयों की खुशबू से महकती दुकानें
याद दिलाती हैं दोस्तों की वो अड्डेबाज़ी,
वो लौंग चुरी कबाब और कालना स्वीट्स
की पनीर जलेबी, वो लज़ीज़ निहारी कुलचे,
हाजी मोहम्मद अनवर की मिर्च मसाला बिरयानी,
कूल पॉइंट का शाही टुकड़ा और नवाब कुरैशी
का प्यार मोहब्बत मज़ा, वो तुम्हारा नज़रें बचा
फतेहपुरी मस्जिद से निकलना और तुम्हारे
इत्र की खुशबू से मेरी सांसों का महक जाना
मेरा तुम्हें चुपके से बालियाँ थमाना ओर
इसी बहाने तुम्हारे नाज़ुक हाथों का
छू जाना, गुड़ के शरबत सी मीठी
तुम्हारी हंसी, चूड़ियों की वो खनखनाहट
और चाट के तीखे मीठे सकोरों के बीच
कभी यूँही शरमा कर तुम्हारा मेरी बांहों में सिमट जाना
और ऐन मौके पर अशरफ चचा का बिज़ी हो जाना
जुगनुओं सी चमकती रात में जब हम आखिर जुदा होते
तो चचा अक्सर पैसे लेना भूल जाते, तुम नक़ाब ओढ़ना
और मैं घर का रस्ता भूल जाता
अब न तुम हो न फुर्सत के वो दिन रात है
और न ही वो दोस्त और न ही चचा जान
पर आज भी मैं शाहजानाबाद की इन रंगीनियों में
खिंचा चला आता हूँ और यादों की मश्क़
कंधे पे उठाये यूँही हर नुक्कड़,
हर दर ओ दरवाज़े, हर झरोखे में
बस तुम्हें ढूढ़ता हूँ

3. मॉर्निंग वॉक

धुएँ और धुंध के दरमियाँ
फुटपाथ पर बुझते अलावों से
तपिश बटोरती खामोश निगाहें
ठिठुरते दरख़्तों के तले बैठी
ताक रहीं हैं स्याही में लिपटी
सूनी राहों को
सड़क के उस मोड़ पर समय
शायद थम सा गया है

वहीं कुछ दूर चाय के स्टाल के करीब
एक शहर करवट बदल रहा है
कुछ जाने पहचाने धुंधले से चेहरे
फैन, बिस्कुट और चाय की प्यालों
के बीच देश पे चर्चा, बीड़ी सिगरेट
के नोक पे सुलगते सवाल
एक के लिए रोटी मुद्दा है
और दूसरे के लिए रोज़गार

चौराहे पे नीम के पेड़ पर टंगा
अधमरा सा सूरज, नींद में चलती बसें
और मुँह अँधेरे, कन्धों पर
ज़िम्मेदारियों का बोझ उठाये,
रोज़ी रोटी की तलाश में
सड़क पर चप्पल घिसते पैर
शहर की सिलवटों में बसी
धूल खायी ज़िंदगियाँ,बर्बाद बचपन
गुमनाम, गुमसुम, खामोश,
ताश के पत्तों सा बिखरता जीवन
– क्राइम एंड पनिशमेंट

4. अक्स

उभरते हैं कुछ अक्स आईने में हर रोज़,
ताकते रहते हैं बेबस से खामोश दीवारों को,
धुंधले, कभी साफ़, कभी खोए खोये से
जैसे के हों किसी ख्वाब में तैरते कोई ख्वाब,
या किसी ना-मुकम्मल दास्ताँ
का इक़्तिबास, या फिर कोई चाह
असीर चंद लफ़्ज़ों में, वो राज़ ए निहाँ,
वो भूले से नग्मात, वो माशूक चेहरे
वो मख़मूर रातें, वो आबरू के दायरे,
वो मज़हब की कटारें, वो दाग़ – ऐे – तन्हाई
वो गिरहें, जाल फरेब निगाहें, वो ख़्वाब
जिनकी ग़ैर-मुमकिन थी तकमील, इन्हीं
अक्सों के सियह सायों में रेज़ा रेज़ा मेरा भी
अक्स डोलता है बंजारा सा, बे रंग, बे नूर,
आइना गिरफ़्त सदियों से

5. नज़्म

शहर -ए -ग़म से परे
एक उजड़ा पुराना बेनूर मंदिर
दीवारों पे बारिश के बनाये नक़्शे
और यादें जो जगह जगह
काई बनकर हरी हो आईं हैं ‘
एक पहचानी सी ख़ामोशी और
किसी के बुझते आलाव से उठता धुआँ
पेड़ों के झुरमुटों पे गहराते साये
और पिघलते काजल सी रात का कोना थामे
बादलों के बीच से गुज़रता हुआ चाँद का
एक टुकड़ा
पहले भी यूँही आया करते थे हम यहाँ
तब ये मंदिर आबाद था
सर्दी की गुदगुदाती हुई धूप में
हम यूँही पेड़ों तले ख्वाब बुना करते थे
पुराने बरगद की जटाओं के तरह
वो भी उलझ कर रह गए हैं
तुम्हें भी याद होंगे वो पल
जब नरम धूप के बिछोने पर
सीप सी सर्द रातों में
जिस्म की लौ तापा करते थे हम
तेरे जाने से कुछ नहीं बदला
रात भी आयी है और चाँद भी
आज भी उस तपिश का दुशाला ओढ़े
इस बेनूर मंदिर के आँगन में
आगोश में तेरी यादों को लिए
यूँही जलता है जिस्म
सहर होने तक
और चुन चुन के स्याही से लिपटे सितारे
बन जाती हैं हर रात इक नयी नज़्म

6. आओ परोसें कुछ लम्हे इस ख्वाबों की तश्तरी में

आओ परोसें कुछ लम्हे इस ख्वाबों की तश्तरी में
आज बड़े दिनों बाद ज़िन्दगी तुम मिली हो मुझसे
आओ करें कुछ गुफ्तगू
दोपहर की नरम धूप में बैठकर
बुने कुछ गलीचे रंगों से सराबोर
आओ परोसें कुछ लम्हे इस ख्वाबों की तश्तरी में
आओ आईने से झांकते अपने ही अक्स में
ढूंढें खुद को या फिर यूँही ख्वाहिशों की
सिलवटों में एक दूसरे को करें महसूस
या फिर याद करें उन भीगी रातों में
जुगनुओं का झिलमिलाना
आओ खोलें खिड़कियां मन की
हों रूबरू खुदसे
पिरोएँ ख्वाहिशें गजरों में
भरें पींग, छूएं अम्बर को
आओ पूरे करें कुछ अधूरे गीत
छेड़ें कुछ नए तराने
आओ बिताएं कुछ पल साथ
देखें सूरज को पिघलते हुए
इस सुरमई शाम के साये तले
आओ चुने स्याही में लिपटे सितारे
बनायें इस रात को एक नज़्म
आओ परोसें कुछ लम्हे इस ख्वाबों की तश्तरी में

 

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