‘देह ही देश’ जैसी चर्चित किताब की लेखिका गरिमा श्रीवास्तव का पहला उपन्यास प्रकाशित हुआ है ‘आउशवित्ज़: एक प्रेम कथा’। वाणी प्रकाशन से प्रकाशित अपने ढंग के इस अनूठे उपन्यास की समीक्षा लिखी है जाने-माने लेखक अवधेश प्रीत ने। आप भी पढ़ सकते हैं-
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गरिमा श्रीवास्तव की क्रोएशिया-प्रवास डायरी ‘देह ही देश’ क्रोएशिया-बोस्निया की युद्ध पीड़िताओं पर केंद्रित एक ऐसा मार्मिक आख्यान है, जिसे भुला पाना संभव नहीं. इसी क्रम में उनका सद्यः प्रकाशित उपन्यास ‘आउशवित्ज़: एक प्रेम कथा’ युद्ध और यातना के बीच राग-विराग, मन और मनुष्यता की एक ऐसी कथा लेकर आया है, जो हमें एक साथ उदास, विचलित और द्रवीभूत करती है. उपन्यास का वितान दूसरे विश्वयुद्ध की यातना-कथा से लेकर बांग्लादेश में हुए मुक्ति-युद्ध की त्रासद परिणतियों तक फैला है. युद्ध के विरुद्ध खड़ा यह उपन्यास युद्ध पीड़ित उन स्त्रियों की दास्तान कहता है, जिनका ज़िक्र इतिहास में कहीं नहीं.
पोलैंड की सबीना से लेकर हसनपुर की अम्मा तक अनेकानेक स्त्रियों की कथा समेटे यह उपन्यास अकथ दुखों का वृतांत है, जिसे सुनते-सुनाते हुए प्रतीति सेन हमारी हमराह हो जाती है या कि हम उसके हमराह हो जाते हैं. प्रतीति सेन नैरेटर भी है और प्रेम में छूट गई वह स्त्री भी, जो प्रेम की पीड़ा से कभी उबर नहीं पाई.यही प्रतीति सेन एक सेमिनार में शामिल होने के बहाने पोलैंड पहुंचती है, जहां उसका सामना नाज़ी यातना शिविरों ‘आउशवित्ज़’ से होता है. इन शिविरों में दफ़न हैं नाज़ी नस्लीय घृणा के शिकार लाखों निर्दोष यहूदियों की अनकही-अनसुनी कहानियां, सिसकियाँ, चीखें और मनुष्यता को शर्मसार करती क्रूरताएं. प्रतीति सेन इन यातना-कथाओं से जैसे-जैसे रु-ब-रु होती जाती है, इतिहास के सबसे क्रूर और हृदयद्रावक दस्तावेज़ खुलते जाते हैं.इन दस्तावेज़ों में दर्ज़ लोमहर्षक जानकारियां पाठकीय चेतना को झकझोरती हैं. खासतौर पर स्त्रियों के साथ हुए यौन शोषण और अमानुषिक अत्याचारों के साक्ष्य.
इसके समानांतर प्रतीति सेन, उसकी अम्मा और माँ टिया की कहानियाँ भी हैं, जो पश्चिमबंगाल से शुरु होकर बांग्लादेश के युद्ध की भेंट चढ़ चुकी हत्भागिनों की नियति तक जाती है.उपन्यास में प्रेम से ऊबी हुई सबीना है, तो अभिरूप के प्रेम में डूबी हुई प्रतीति सेन है और बिराजित सेन के प्रेम से परित्यक्त द्रौपदी देवी उर्फ़ रहमाना ख़ातून है. इन तमाम किरदारों की अपनी-अपनी आपबीतियाँ हैं, लेकिन उनके तार एक-दूसरे से इस तरह जुड़े हैं कि उन्हें अलगाना संभव नहीं,’मैं अपने -आपको कितनी जगहों पर पाती हूँ. अम्मा को लिखती हूं तो ख़ुद ही रहमाना ख़ातून हो जाती हूँ, सबीना से मिलती हूँ तो उसकी आँख का आँसू मेरे मेरे गले की हिचकी बनकर अटक जाता है. आउशवित्ज़ के दस्तावेज़ पढ़ती हूँ तो उन्हीं की तरह गैस चैम्बर में ठूँसे जाने की पीड़ा से मन थर्रा जाता है. अपनी माँ टिया के बारे में सोचती हूँ तो मुझे अनाथ होने की पीड़ा इतनी सालती है कि गहरी नींद की सुबकियों में गला रुंध जाता है मेरा ‘ मैं ‘ है ही नहीं, कभी रहा ही नहीं मेरे अपने साथ.’
यह प्रतीति सेन विभिन्न किरदारों में ढलती- चलती उपन्यास की सूत्रधार भी है, ख़ुद को तलाशती, बिसराती और प्रश्ननांकित करती हुई,’अउशवित्ज़ क्यों आई हूं यह मैं ख़ुद को ही ठीक से समझा नहीं पाई हूं. लगता है अपने-आपसे भागते-भागते एक अर्सा हो गया है. सच कहूँ कि यहाँ आई थी युद्ध के आँकड़ों में ख़ुद को खो देने. मुझे याद ही न रहे कि मैं कौन हूँ और कहाँ से आई हूँ.’ प्रतीति सेन जितना ख़ुद को खो देने का उपक्रम करती है, उतनी ही उसकी जिंदगी की तमाम परतें उधड़ती चली जाती हैं. इन्हीं परतों में है उपन्यास की वेदना, संवेदना और संरचना के तमाम उत्स हैं. पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश की पृष्ठभूमि पर केंद्रित उपन्यास में बांग्ला भाषा, परिवेश और आचार-विचार इस कदर अनुस्यूत है कि कई बार पाठक को बांग्ला उपन्यास पढ़ने का आभास होता है. हिन्दी में युद्ध केंद्रित उपन्यास लेखन की परंपरा नहीं दिखती,यहाँ तक कि बांग्लादेश मुक्ति-युद्ध पर भी कोई बृहद रचना नज़र नहीं आती.ऐसे में गरिमा श्रीवास्तव का यह उपन्यास एक महत्वपूर्ण पहल और प्रस्थान है, जिसका भरपूर स्वागत किया जाना चाहिए.
समीक्षक
अवधेश प्रीत
कहानीकार
समीक्षित कृति- आउशवित्ज़: एक प्रेम कथा
लेखिका- गरिमा श्रीवास्तव
प्रकाशक- वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य- 399

