• पुस्तक अंश
  • ‘मिडिल क्लास मंचूरियन’ का एक अंश

    लेखिका जयंती रंगनाथन लेखन में लगातार प्रयोग करती रहती हैं। कथा-कहानी में हर बार कुछ नया रचती हैं। इस बार पुस्तक मेले में उनका कहानी संग्रह आ रहा है मिडिल क्लास मंचूरियन। राजपाल एंड संज से प्रकाशित होने वाले इस संग्रह का एक अंश पढ़िए- मॉडरेटर 

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    (संग्रह की भूमिका का एक अंश)

    मिडिल क्लास ज़िंदाबाद!

    मेरी तरह आपने भी सुना-समझा और बूझा होगा कि हम समाज के जिस वर्ग में पैदा हुए, वहाँ की दुश्वारियाँ, मजबूरियाँ, ख़ुशियाँ और महत्त्वाकांक्षाएँ लगभग एक जैसी हैं।
    आँकड़ों की मानें तो साल 2021 की जनगणना के मुताबिक़, हमारे देश में रहने वाले लगभग 31 प्रतिशत लोग मध्यम वर्ग के हैं, उच्च वर्ग के मात्र 5 प्रतिशत। इसके बाद जो भी बचते हैं, वे निम्न वर्ग के हैं। लेकिन हम यह भी सुनते आए हैं कि देश चलता मध्य वर्ग के लोगों की वजह से ही है।
    मैंने भी इसी वर्ग में जन्म लिया और ज़िंदगी का एक लंबा अरसा जिया। बेशक हमारे परिवारों को दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ नहीं करना पड़ा होगा, पर हमारी दिक़्क़तें अलग स्तर की रहीं। अकसर परिवारों के भीतर की राजनीति, रिश्तों को पकड़कर रखने की ख़्वाहिशें और साज़िशें, महत्त्वाकांक्षाएँ जो कभी बाग़ी बना दें तो कभी बेचारा। पैसों का लालच भी है और सत्ता भी चाहिए। ऊपर देखते हुए अपने को छोटा महसूस करते हैं ओर नीचे देखते हुए चौड़े हो जाते हैं। समाज में सबसे ज़्यादा क़ायदा-क़ानून भी हमारे हिस्से, इनकम टैक्स पेई भी हम ही, अच्छे भी हम और बुरे भी हम। लेकिन ज़्यादातर भीरू बनने में लगे रहने वाले लोग। बहुत ज़्यादा पंगा न लेने वाला वर्ग। पीढ़ियों के संघर्ष में मारा जाने वाला वर्ग।
    इतने विविध रंग हैं मध्य वर्ग के, जिनके बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है। कुछ रंग मेरी तरफ़ से भी। जो देखा, जैसा देखा, बिलकुल वैसा…
    इन रंगों में आप अपने रंग भी मिला दीजिए। हैं तो हम सभी एक ही परिवार के। मध्य वर्गीय परिवार ज़िंदाबाद!

    (स्ट्रगलर कहानी का एक अंश)
    उस समय पवन को मुंबई आए नौ साल हुए थे। बाईस का था, जब वह आया था यहाँ। इकतीसवाँ जन्मदिन था उसका। जन्मदिन मनाने जैसा था कुछ नहीं। घाटकोपर की मिसेज जॉयस शाह का वह एक तरह से परमानेंट पार्टनर बन गया। जब भी शाह जी अपने रत्नों के बिजनेस के सिलसिले में जाम नगर जाते, जॉयस उसे बुला लेती। बहुत बड़ा-सा घर था। शायद उनके पास ऐसे कई घर थे। क्योंकि इस घर में जॉयस अकेली रहती थी। जिस दिन पवन को जाना होता, नौकरों की छुट्टी कर देती। दोनों पूरा दिन और रात साथ में ही बिताते। जॉयस पहले से खाने-पीने का पूरा इंतज़ाम करके रखती। एक से एक ब्रांड की दारू!
    जॉयस ख़ुशगवार महिला थी। थोड़ी सनकी ज़रूर थी। शुरू में पवन को अटपटा लगता था, उम्र में बड़ी और अनजान औरत की समीपता। जॉयस प्रेम की भूखी थी, मन की अधिक, तन की कम। चार-पाँच मुलाक़ात के बाद पवन को अच्छी लगने लगी जॉयस। हर बार के दस हज़ार रुपये कैश हाथ में रख देती। आने-जाने का ख़र्चा अलग देती। उसके साथ बड़े-बड़े होटलों में रात बिता आया पवन। सुबह जब होटल का बाथरोब पहन और कपड़े की सफ़ेद चप्पल पहनकर वह बाथरूम में बबल बाथ के बाद निकलता तो दिल की कसक ज़ुबाँ तक आ जाती– काश, ये सब तब होता, जब वह कुछ बन जाता!
    जॉयस की वजह से उसकी ज़िंदगी ज़रा-सी ही सही, पटरी पर चल पड़ी। किराया समय पर चुकाने लगा। वड़ा पाव की जगह ढंग का खाना खाने लगा और जिम भी जॉइन कर लिया।
    फिर वही हुआ, जो उसके साथ हमेशा होता था। जॉयस के पति को हार्ट अटैक हुआ और पाँच स्टेंट लगने के बाद वह सीधे बिस्तर पर आ गए। जॉयस की आवाज़ कॉंप रही थी, जब वह कह रही थी कि अब वह पवन से नहीं मिल पाएगी। गुड बॉय! आगे कभी सब ठीक हुआ तो देख लेंगे।
    ये सुनकर पवन सदमे में आ गया। तो अब?
    पूरे चालीस दिन बाद उसे काम मिला था। फ़िल्मों में या सीरियल में नहीं, एजेंट वाला काम। बुलावा आया था। लोअर परेल में एक बिलकुल नई बनी बिल्डिंग के पेंट हाउस में जाना था उसे। मैडम बर्नी अपना पचासवाँ जन्मदिन मना रही थीं। लगभग बीसेक महिलाओं के सामने उसे पोल डांस करना था। डांस मतलब, सिर्फ़ डांस नहीं। फुल मोंटी। पैसे अच्छे मिल रहे थे। अस्सी हज़ार। अगर किसी मैडम का दिल आ गया और उसने ऑफ़र कर दिया और वह तैयार हो गया तो उसके पैसे अलग। कॉन्ट्रेक्ट में नहीं है ये सब। पवन ने किया है सब कुछ। पहले दिक़्क़त होती थी, पूरा-पूरा दिन मन में कड़वाहट बनी रहती। फिर उसे बुरा कम लगने लगा। पैसे अच्छे और तुरंत मिलते थे। एजेंट चालू था। उसे पता था पवन ज़रूरतमंद है। इस बार बिना लाग-लपेट के कहा, “तुम सिर्फ़ एक औरत को ख़ुश करके इस धंधे को नहीं चला सकते। काम का तरीक़ा बदल गया है।”
    मैडम बर्नी जॉयस नहीं थी। ऊँची सोसाइटी की अजब ख़्वाहिशों वाली तितली थी। पवन की हवा टाइट हो गई। बीस आदमखोर महिलाओं के सामने उसे इस तरह परोसा जा रहा था, मानो वह रसीला आम हो, जिसे जितना चूसा जाए उतना ही मीठा रस टपके।
    पवन पोल डांस कर ज़रूर रहा था, पर उसकी आँखों से आँसू टपक रहे थे। झपट्टे मारते जनाना हाथों से बचते-बचाते भी उसकी देह तेज़ बनावटी नाख़ूनों से गुद गई। नख से शिख तक लिपस्टिक के निशान और वासना का ज्वार।
    सुबह जब अपने कपड़े पहनकर वह बर्नी के तीन मंज़िला पेंट हाउस में बीस लोलुप महिलाओं के चंगुल से निकला तो तय कर चुका था कि जान भी चली जाए तो उसे यह काम नहीं करना। इतना निचुड़कर इस शहर में रहने का कोई मतलब नहीं। संघर्ष कर जिस मकाम तक पहुँचने के लिए वह घर-बार छोड़कर मुंबई आया है, वह इस रास्ते से चलकर तो बिलकुल नहीं मिलेगा।
    सुबह-सुबह चौपाटी में समंदर की लहरों के संग-संग चलते हुए उसने यहाँ तक सोच लिया कि कल जब उसे फ़िल्म मिलेगी और उसका नाम होगा, अपने इंटरव्यू में वह इस दिन का ज़िक्र ज़रूर करेगा। छिपाएगा कुछ भी नहीं। यह भी नहीं कि अभी-अभी उसके बैंक अकाउंट में जो अस्सी हज़ार रुपये जमा हुए हैं, उससे भी उसे किक नहीं मिल रहा।

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